भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 238, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८७ तथा लेप में 'रक्तचन्दन' का ही प्रयोग होता है। शरीर के भीतरी भाग की शुद्धि के लिये जहाँ अजमोदा लेना कहा गया हो वहाँ जवाइन लेनी चाहिये तथा बाहर की शुद्धि अर्थात् प्रलेपादि के लिए जहाँ अजमोद लेना कहा हो वहाँ 'वनजवाइन' लेना चाहिये। जहाँ केवल दूध या घी का निर्देश किया गया हो वहाँ गाय के ही दूध और घी का प्रयोग करना चाहिये। जहाँ विष्ठा का रस लेने को कहा हो, वहाँ गौ के गोबर का रस लेना चाहिये। जहाँ केवल 'मूत्र' का निर्देश हो वहाँ गौ का ही मूत्र लेना चाहिये ॥१३५-१३७॥ अथ प्रतिनिधिद्रव्याण्याह- चित्रकाभावतो दन्ती क्षारः शिखरिजोऽथवा। अभावे धन्वयासस्य प्रक्षेप्या तु दुरालभा ।।१३८।। प्रतिनिधि द्रव्यों का संकेत—चित्रक (चित्त) के अभाव में दन्ती या अपमार्ग (चिचिड़ा) का क्षार और धन्वयास (मरुभूमि की जवासा या धमासा) के अभाव में दुरालभा (जवासा) लेना चाहिये ।।१३८।। ❖ शिखरी=अपामार्गः ।।१३८।। यहाँ 'शिखरी' से 'अपामार्ग' अर्थात् 'चिचिड़ा' का ग्रहण करना चाहिये ।।१३८।। तगरस्याप्यभावे तु कुष्ठं दद्याद्भिषग्वरः। मूर्वाऽभावे त्वचो ग्राह्या जिङ्गिनीप्रभवा बुधैः ।।१३९।। जो तगर के अभाव में विद्वान् वैद्य कूठ और मूर्वा के अभाव में मञ्जीठ की छाल लेवें ।।१३९।। अहिंस्राया अभावे तु मान कन्दः प्रकीर्त्तितः । लक्ष्मणाया अभावे तु नीलकण्ठशिखा मता ।।१४०।। अहिंस्रा के अभाव में मानकन्द और लक्ष्मणा के अभाव में मयूरशिखा लेवें ।।१४०।। ❖ नीलकण्ठशिखा=मयूरशिखा ।।१४०।। यहाँ 'नीलकण्ठशिखा' से 'मयूरशिखा' का ग्रहण करना चाहिये ।।१४०।। बकुलाभावतो देयं कहारोत्पलपङ्कजम्। नीलोत्पलस्याभावे तु कुमुदं देयमिष्यते ।।१४१।। जातीपुष्पं न यत्रास्ति लवंगं तत्र दीयते। अर्कपर्णादिपयसो ह्यभावे तद्रसो मतः।।१४२।। पौष्कराभावतः कुष्ठं तथा लाङ्गल्यभावतः। स्यौणेयकस्याभावे तु भिषग्भिर्दीयते गदः ।।१४३।। चविकागजपिप्पल्यौ पिप्पलीमूलवत्स्मृतौ ।।१४४।। मौलसिरी के अभाव में कल्हार, नीलकमल या पद्म लेवे और नीलकमल के अभाव में कुमुद (कोई) का फूल (नीलोफर) लेवे। चमेली का फूल जहाँ न हो वहाँ उसके स्थान में लवङ्ग देना चाहिये। आक (मदार) के पत्ते आदि के दूध के अभाव में उसके पत्ते का रस लेना चाहिये। पोहकर मूल तथा कलिहारी के अभाव में कूठ और थुनेर के अभाव में कूठ लेना चाहिये। चव और गजपीपल ये दोनों पिपरामूल के समान माने गये हैं अतः दोनों के अभाव में इसे देना चाहिये ।।१४१-१४४।। अभावे सोमराज्यास्तु प्रपुन्नाडफलं मतम्। यदि न स्याद्दारुनिशा तदा देया निशा बुधैः ।।१४४।। बाकुची के अभाव में चकवड़ का फल और यदि दारुहलदी न हो तब उसके अभाव में बुद्धिमान् वैद्य को हल्दी ही लेना चाहिये ।।१४५।। ❖ सोमराजी=बाकुची। प्रपुन्नाडफलं=चक्रमर्दफलम्। दारुनिशा=दारुहरिद्रा। निशा=हरिद्रा ।।१४५।। यहाँ 'सोमराजी' से 'वाकुची' का और 'प्रपुन्नाड फल' से 'चकवड़ के फल का तथा दारुनिशा' से 'दारुहल्दी' का एवं 'निशा' से 'हल्दी' का बोध करना चाहिये ।।१४५।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA