भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे रसाञ्जनस्याभावे तु १दार्वाक्वथः प्रयुज्यते । सौराष्ट्रयभावतो देया स्फटिका तद्गुणा जनैः ।।१४६।। रसौत के अभाव में दारुहल्दी के क्वाथ का प्रयोग करना चाहिये और सौराष्ट्र देश की मिट्टी अर्थात् सोरठी माटी के अभाव में उसी के समान गुणवाली फिटकिरी लेना चाहिये ।।१४६।। ❖ सौराष्ट्री='सोरठी माटी' इति लोके । स्फटिका='फिट्किरी' इति लोके ।।१४६।। यहाँ 'सौराष्ट्री' से 'सोरठी माटी' नाम से लोकप्रसिद्ध द्रव्य का तथा 'स्फटिका' से 'फिट्किरी' का ग्रहण करना चाहिये ।।१४६।। तालीसपत्रकाभावे स्वर्णताली प्रशस्यते । भार्ङ्गयभावे तु तालीसं कण्टकारीजटाऽथवा ।।१४७।। तालीसपत्र के अभाव में स्वर्णताली और भार्ङ्गी के अभाव में तालीस पत्र अथवा कटेरी (भटकटैया) की जड़ देना चाहिये ।।१४७।। रुचकाभावतो दद्याल्लवणं पांशुपूर्वकम् । अभावे मधुयष्ट्यास्तु धातकीं च प्रयोजयेत् ।।१४८।। रुचक (कालानमक) के अभाव में खारीनमक (रेह का नमक) और मधुयष्टि (मुलहठी) के अभाव में धाय का फूल देना चाहिये ।।१४८।। ❖ रुचकं='चौहार' इति लोके । पांशुलवणं='खारी' अथवा 'रेह' इति लोके ।।१४८।। यहाँ 'रुचक' से 'चौहार' नाम से लोक में प्रसिद्ध वस्तु को और 'पांशुलवण' से 'खारी अथवा रेह' को समझना चाहिये ।।१४८।। अम्लवेतसकाभावे चुक्रं दातव्यमिष्यते । द्राक्षा यदि न लभ्येत प्रदेयं काश्मरीफलम् ।।१४९।। तयोरभावे कुसुमं २मधूकस्य मतं बुधैः । लवङ्गकुसुमं देयं नखस्याभावतः पुनः ।।१५०।। कस्तूर्यभावे कङ्कोलं क्षेपणीयं विदुर्बुधाः । कङ्कोलस्याप्यभावे तु जातीपुष्पं प्रदीयते ।।१५१।। सुगन्धिमुस्तकं देयं कर्पूराभावतो बुधैः । कर्पूराभावतो देयं ग्रन्थिपर्णं विशेषतः ।।१५२।। कुङ्कुमाभावतो दद्यात्कुसुम्भकुसुमं नवम् । श्रीखण्डचन्दनाभावे कर्पूरं देयमिष्यते ।।१५३।। अभावे त्वेतयोर्वैद्यः प्रक्षिपेद्रक्तचन्दनम् । रक्तचन्दनकाभावे नवोशीरं विदुर्बुधाः ।।१५४।। मुस्ता चातिविषाभावे शिवाऽभावे शिवा मता । अभावे नागपुष्पस्य पद्मकेशरमिष्यते ।।१५५।। अम्लवेत (अमलतास) के अभाव में चुक्र और 'दाख' के अभाव में गाम्भारी का फल तथा उन दोनों के अभाव में महुए का फूल देना चाहिये । नख नामक ओषधि के अभाव में लवङ्ग का फूल, कस्तूरी के अभाव में कङ्कोल और कङ्कोल के अभाव में चमेली का फूल देना चाहिये । कपूर के अभाव में सुगन्धमोथा या विशेष कर कपूर के अभाव में ग्रन्थिपर्ण (गठौना) देना चाहिये । इसी प्रकार केसर के अभाव में कुसुम का नवीन फल, सफेद चन्दन के अभाव में कर्पूर और इन दोनों (सफेद चन्दन और कर्पूर) के अभाव में लाल चन्दन, लाल चन्दन के अभाव में नवीन खस, अतीस के अभाव में मोथा, हरड़ के अभाव में आँवला और नागकेशर के अभाव में कमल का केशर देना चाहिये ।।१४९-१५५।। मेदाजीवककाकोलीऋद्धिद्वन्द्वेऽपि वाऽसति । वरीविदार्यश्वगन्धावाराहीश्च क्रमात् क्षिपेत् ।। मेदा और महामेदा के अभाव में शतावरी, जीवक और ऋषभक के अभाव में विदारीकन्द, काकोली और क्षीरकाकोली के अभाव में असगन्ध और ऋद्धि तथा वृद्धि के अभाव में बाराहीकन्द डालना चाहिये ।।१५६।। १. 'सम्यग् दार्वा'ति पाठः । २. 'बन्धूकस्ये'ति पाठः ।