भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८९ ❖ वरी=शतावरी ।।१५६।। यहाँ 'वरी' से 'शतावरी' का ग्रहण करना चाहिये ।।१५६।। वाराह्याश्च तथाऽभावे चर्मकारालुको मतः । वाराहीकन्द संज्ञस्तु पश्चिमे गृष्टिसंज्ञकः ।।१५७।। वाराहीकन्द एवान्यश्चर्मकारालुको मतः । अनूपसम्भवे देशे वराह इव लोमवान् ।।१५८।। भल्लातकासहत्वे तु रक्तचन्दनमिष्यते । भल्लाताभावतश्चित्रं नलश्चेक्षोरभावतः ।।१५९।। सुवर्णाभावतः स्वर्णमाक्षिकं प्रक्षिपेद् बुधः । श्वेतं तु माक्षिकं ज्ञेयं बुधै रजतवद् ध्रुवम् ।।१६०।। माक्षिकस्याप्यभावे तु प्रदद्यात्स्वर्णगैरिकम् । सुवर्णमथ वा रौप्यं मृतं यत्र न लभ्यते ।।१६१।। तत्र कान्तेन कर्माणि भिषक्कुर्याद्विचक्षणः । कान्ताभावे तीक्ष्णलोहं योजयेद्वैद्यसत्तमः ।।१६२।। अभावे मौक्तिकस्यापि मुक्ताशुक्तिं प्रयोजयेत् । मधु पत्र न लभ्येत तत्र जीर्णगुडो मतः ।।१६३।। मत्स्यण्ड्य भावतो दद्युर्भिषजः सितशर्कराम् । असम्भवे सितायास्तु बुधैः खण्डं प्रयुज्यते ।।१६४।। क्षीराभावे रसो मौद्गो मांसूरो वा प्रदीयते । अत्र प्रोक्तानि वस्तूनि यानि तेषु च तेषु च ।।१६५।। योज्यमेकतराभावे परं वैद्येन जानता । रसवीर्यविपाकाद्यैः समं द्रव्यं विचिन्त्य च ।।१६६।। युञ्ज्यात्त द्विधमन्यच्च द्रव्याणां तु रसादिवित् । योगे यदप्रधानं स्यात्तत्य प्रतिनिधिर्मतः ।।१६७।। यत्तु प्रधानं तस्यापि सदृशं नैव गृह्यते¹ । व्याधेरयुक्तं यद्द्रव्यं गणोक्तमपि तत्त्यजेत् ।। अनुक्तमपि युक्तं यद्योजयेत्तद्रसादिवित् ।।१६८।। वाराहीकन्द के अभाव में 'चर्मकारालु' लेना चाहिये। वाराहीकन्द को पश्चिम देश में गृष्टि (गैंठी) कहते हैं। वाराहीकन्द का ही दूसरा भेद 'चर्मकारालु' है। यह अनूपदेश में उत्पन्न होता है तथा इसके ऊपर सूअर की भाँति रोम होते हैं। भिलावा यदि सह्य न होता हो तो उसके स्थान पर लाल चन्दन डालना चाहिये। भिलावा के अभाव में चीता और ईंख के अभाव में नरसल, सोना के अभाव में सोनामाखी डालना चाहिये। रूपामाखी का गुण चाँदी की तरह होता है अतः चाँदी के अभाव में रूपामाखी डालना चाहिये। माक्षिक (सोनामाखी तथा रूपामाखी) के अभाव में स्वर्णगैरिक (पीलागेरू) डालना चाहिये। यदि स्वर्ण या चाँदी का भस्म न मिले तो बुद्धिमान् वैद्य कान्तलौह (उसके भस्म) ले और कान्तलौह के अभाव में तीक्ष्णलौह का एवं मोती के अभाव में मोती के सीप का प्रयोग करना चाहिये। जहाँ मधु न मिले वहाँ पुराने गुड़ से काम चलाना चाहिये। मिश्री के अभाव में सफेद चीनी का और शक्कर के अभाव में खाँड़ का प्रयोग करना चाहिये। दूध के अभाव में मूँग अथवा मसूर का जूस देना चाहिये। यहाँ जितने प्रतिनिधि द्रव्य जहाँ-जहाँ कहे गये हैं वहाँ-वहाँ जानकार वैद्य को एक के अभाव में दूसरे प्रतिनिधि द्रव्य का प्रयोग अवश्य करना चाहिये। जैसे दन्ती के अभाव में चित्रक और चित्रक के अभाव में दन्ती छोड़ना चाहिये। द्रव्यों तथा रसादिकों के जानने वाले वैद्यों को चाहिये कि वह इन प्रतिनिधि द्रव्यों के अतिरिक्त अन्य भी जो द्रव्य रस, वीर्य तथा विपाक आदि से समान हों उन्हें विचार कर एक के अभाव में दूसरे का प्रयोग करें। किसी ओषधि के योग में जो अप्रधान औषध हों उनका प्रतिनिधि दूसरा औषध ले लेवें और जो प्रधान हों उसी के समान रसवीर्यादि वाली दूसरी औषध न लेवे अर्थात् प्रधान औषध का प्रतिनिधि दूसरा औषध न लेवे। जो द्रव्य व्याधि के लिये अयोग्य हो वह यदि उस रोग सम्बन्धी द्रव्यों की गणना में रहे तथापि उस द्रव्य को उस योग से निकाल देना चाहिये और जो योग में न कहा हो किन्तु योग्य हो तो उस द्रव्य को जो द्रव्यगत रसादि के वेत्ता वैद्य हों वे अवश्य प्रयोग करें ।।१५७-१६८।। अथ द्रव्यगतपञ्चपदार्थकर्माण्यह- द्रव्ये रसो गुणो वीर्य विपाकः शक्तिरेव च । पदार्थाः पञ्च तिष्ठन्ति स्वं स्वं कुर्वन्ति कर्म च ।।१६९।। १. 'विविधे'ति पाठा.।