भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे द्रव्यों के अन्तर्गत रहनेवाले पञ्च पदार्थों के कर्म-द्रव्यों में (१) रस, (२) गुण, (३) वीर्य, (४) विपाक तथा (५) शक्ति इस प्रकार से पाँच पदार्थ रहते हैं और अपने-अपने कर्मों को करते हैं ॥१६९॥ तत्र (रसा) वाग्भटः- रसाः स्वाद्वम्ललवणतिक्तोषणकषायकाः । षड्द्रव्यमाश्रितास्ते च यथापूर्वं बलावहः ।।१७०।। उसमें प्रथम 'रस' के विषय में 'वाग्भट' का मत है कि-(१) मधुर, (२) खट्टा, (३) नमकीन, (४) तीता, (५) कड़वा और (६) कसैला इस प्रकार से छः रस योग्यतानुसार द्रव्यों में रहते हैं और ये पूर्व-पूर्व एक की अपेक्षा दूसरे बलकारक होते हैं अर्थात् कषाय की अपेक्षा कटु और कटु की अपेक्षा तिक्त, तिक्त की अपेक्षा मधुर रस अधिक बलकारक होता है ॥१७०॥ ❖ ऊषणः=कटुः ॥१७०॥ यहाँ 'ऊषण' पद से 'कटु' समझना चाहिये ॥१७०॥ तत्राद्या मारुतं घ्नन्ति त्रयस्तिक्तादयः कफम्। कषायतिक्तमधुराः पित्तमन्ये तु कुर्वते ।।१७१।। ये रसा वातशमना भवन्ति यदि तेषु वै। रौक्ष्यलाघवशैत्यानि न ते हन्युः समीरणम् ।।१७२।। ये रसाः पित्तशमना भवन्ति यदि तेषु वै। तीक्ष्णोष्णलघुताश्चैव नैते तत्कर्मकारिणः ।।१७३।। ये रसाः श्लेष्मशमना भवन्ति यदि तेषु वै। स्नेहगौरवशैत्यानि न ते हन्युः कफं तदा ।।१७४।। मधुरादि छः प्रकार के रसों में प्रथम जो मधुर, अम्ल तथा लवण ये तीन रस हैं वे सेवन करने से वायु को नष्ट करते हैं और शेष जो तिक्त, कटु और कषाय तीन रस हैं वे कफ को दूर करते हैं एवं कषाय, तिक्त और मधुर ये तीन रस पित्त को दूर करते हैं। जो-जो रस वातादि को नष्ट करते हैं उनसे भिन्न अवशिष्ट जो रस हैं, वे वातादि की वृद्धि करते हैं अर्थात् मधुर, अम्ल, लवण रस यदि वायु को नष्ट करते हैं तो अवशिष्ट तिक्त, कटु, कषाय, रस वायु की वृद्धि करते हैं एवं तिक्त, कटु, कषाय रस यदि कफ को नष्ट करते हैं तो अवशिष्ट मधुर, अम्ल, लवण रस कफ की वृद्धि करते हैं। इसी कषाय, तिक्त, मधुर रस यदि पित्त को नष्ट करते हैं तो अवशिष्ट अम्ल, लवण, कटु रस पित्त की वृद्धि करते हैं। जो रस वात को शमन करने वाले हैं उनमें यदि रूक्षता, लघुता तथा शीतलता ये गुण हों तो वे वायु को नाश करने में नहीं समर्थ होते हैं। जो रस पित्त के शमन करने वाले हैं उनमें यदि तीक्ष्णता, उष्णता तथा लघुता ये गुण हों तो वे पूर्वोक्त कर्म अर्थात् पित्तनाश करने में नहीं समर्थ होते हैं एवं जो रस कफ के शमन करने वाले हैं उनमें यदि स्नेह, गुरुता तथा शीतलता हो तो वे कफ के नाश करने में नहीं समर्थ होते हैं ॥१७-१७४॥ अथ मधुररसस्य गुणानाह- मधुरो हि रसः शीतो धातुस्तन्यबलप्रदः । अक्ष्यो वातपित्तघ्नः कुर्यात्स्थौल्यमलक्रिमीन् ।।१७५।। विषघ्नः पिच्छिलश्चापि स्निग्धः प्रीत्यायुषोर्हितः । बालवृद्धक्षतक्षीणवर्णकेशेन्द्रियौजसाम् ।।१७६।। प्रशस्तो बृंहणः कण्ठ्यो गुरुः सन्धानकृन्मतः ।।१७७।। मधुर रस के गुण-मधुर रस शीतवीर्य, धातुवर्धक, स्तनों में दुग्ध की वृद्धि करने वाला, बलकारक, आँखों के लिये हितकर, वात पित्त को नष्ट करने वाला, शरीर में स्थूलता, मल तथा कृमि को उत्पन्न करने वाला, विषनाशक, पिच्छिल, स्निग्ध, प्रीतिजनक और आयु के लिये हितकर अर्थात् आयुवर्धक है एवं बालक, वृद्ध, क्षत (घाव) होने से १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. 'रसेषु प्रवरश्चापी'ति पाठा.। तथा च पाठोऽयमन्ते क्वचिल्लभ्यते।