भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १९१ क्षीण हुये व्यक्तियों के लिये तथा वर्ण, केश, इन्द्रिय और ओज के लिये भी हितकर हैं तथा बृंहण (शरीर की वृद्धि करने वाला), कण्ठस्वर के लिये हितकर, गुरु और टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाला होता है ।।१७५-१७७।। अथातियुक्तस्य मधुररसस्य गुणानाह- सोऽतियुक्तो ज्वरश्वासगलगण्डाबुर्दकृमीन्। स्थौल्याग्निमान्द्यमेहांश्च कुर्यान्मेदःकफामयान् ।।१७८।। मधुर रस के अत्यन्त सेवन से हानि—यदि मधुर रस का अत्यन्त सेवन किया जाय तो वह ज्वर, श्वास, गलगण्ड, अर्बुद, कृमि, स्थूलता, अग्नि की मन्दता, प्रमेह, मेद और कफ सम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करता है ।।१७८।। अथाम्लस्य गुणानाह- रसोऽम्लः पाचनो रुच्यः पित्तश्लेष्मास्रदो लघुः । लेखितोष्णो बहिः शीतः क्लेदनः पवनापहः ।।१७९।। स्निग्धस्तीक्ष्णः सरः शुक्रविबन्धानाहदॄष्टिहा । हर्षणो रोमदन्तानामक्षिभ्रूविनिकोचनः ।।१८०।। अम्ल रस के गुण—अम्ल रस पाचक, रुचिकारक, पित्त, कफ और रुधिर को दूषित करने वाला, लघु, लेखन अर्थात् जमे हुये कफादि को हटानेवाला, उष्ण, बहिःशीत (स्पर्श में शीतल), क्लेद उत्पन्न करने वाला, वायुनाशक, स्निग्ध, तीक्ष्णवीर्य तथा दस्तावर है और वीर्य, विबन्ध (मलादि की विबद्धता), आनाह और दृष्टि को नष्ट करने वाला, रोम तथा दाँतों को हर्षित करने वाला अर्थात् रोमाञ्च तथा दाँत खट्टा करने वाला और नेत्र तथा भौहों को संकुचित करने वाला होता है ।।१७९-१८०।। ❖ लेखितः=लेखनः। बहिःशीतः=स्पर्शे शीतः । विनिकोचनः=सङ्कोचनः ।।१७९-१८०।। यहाँ 'लेखित' से 'लेखत' । 'बहिःशीत' से 'स्पर्श में शीतल' तथा 'विनिकोचन' से 'सङ्कुचित करने वाला' । यह अर्थ समझना चाहिये ।।१७९-१८०।। अथातियुक्तस्याम्लस्य गुणानाह- सोऽतियुक्तो भ्रमं कुर्यात्तृड्दाहतिमिरज्वरान् । कण्डूपाण्डुत्ववीसर्पशोथस्फोटकुष्ठकृत् ।।१८१।। अम्ल रस के अत्यन्त सेवन से हानि—अम्ल रस अत्यन्त सेवन करने से भ्रम, प्यास, दाह, तिमिर (नेत्रसम्बन्धी रोग), ज्वर, खुजली, पाण्डुता, वीसर्प, शोथ (सूजन), विस्फोट और कुष्ठ (कोढ़) रोग उत्पन्न होता है ।।१८१।। अथ लवणस्य गुणानाह- लवणः शोधनो रुच्यः पाचनः कफपित्तदः । पुंस्त्ववातहरः कायशैथिल्यमृदुताकरः ।। बलघ्न१ आस्यजलदः कपोलगलदाहकृत् ।।१८२।। लवण रस के गुण—लवण रस शोधन, वमन तथा विरेचन के द्वारा शरीर को शुद्ध करनेवाला, रुचिकारक, पाचन, कफ तथा पित्त का उत्पादक, पुरुषत्व (रतिशक्ति) तथा वात को नष्ट करने वाला, शरीर में शिथिलता तथा मृदुता को उत्पन्न करने वाला, बलनाशक, मुख में जल बढ़ाने वाला, कपोल तथा गले में दाह करने वाला होता है ।।१८२।। अथातियुक्तस्य लवणस्य गुणानाह- सोऽतियुक्तोऽक्षिपाकास्रपित्तकोठक्षतादिकृत् । वलीपलितखालित्यकुष्ठवीसर्पतृट्प्रदः ।।१८३।। लवण रस के अत्यन्त सेवन से हानि—लवण रस का अत्यन्त सेवन नेत्रपाक, रक्तपित्त, कोठ और क्षत आदि रोगों को करनेवाला, बली (शरीर में सिलवट पड़ जाना), पलित, खालित्य, कोढ़, वीसर्प तथा प्यास को उत्पन्न करनेवाला होता है ।।१८३।। १. ‘चक्षुर्नासास्ये' ति पाठा. ।