भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 243, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें१९२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ कोठो=वरटी कृतदंशशोघवत् । पलितं केशशुक्लता । खालित्यं शिरसि केशनाशः ॥१८४॥ यहाँ 'कोठ' से 'बरटी (बर्रै) के डंक मारने जैसा शोथ हो जाना'। 'पलित' से 'बालों का सफेद हो जाना'। 'खालित्य' से 'सिर के बालों का झड़ जाना' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१८४॥ अथ कटुरसस्य गुणानाह- कटुरुष्णश्च तीक्ष्णश्च विशदो वातपित्तकृत् । श्लेष्महल्लघुराग्नेयः कृमिकण्डूविषापहः ॥१८४॥ १शुक्रस्तन्यहरश्चापि मेदःस्थौल्यापकर्षणः । अश्रुदो नासिकाऽऽस्याक्षिजिव्हाऽग्रोद्वेजको मतः ॥१८५॥ दीपनः पाचनो रुच्यो नासिकाशोषणो भृशम् । क्लेदमेदोवसामज्जशकृन्मूत्रोपशोषणः ॥१८६॥ स्रोतःप्रकाशको रूक्षो मेध्यो वर्चोविबन्धकृत् ।। १८७।। कटुरस के गुण-कटुरस उष्ण और तीक्ष्ण, वीर्य, विशद, वात तथा पित्तकारक, कफनाशक, लघु, आग्नेय (अग्नि का अधिक भाग वाला), कृमि, खुजली और विष को दूर करने वाला, वीर्य तथा स्तनों में दुग्ध को नष्ट करने वाला, मेद तथा स्थूलता का हरण करने वाला, आँखों में आँसू लाने वाला नासिका, मुख, नेत्र तथा जिह्वा के अग्रभाग में उद्वेग पैदा करनेवाला, दीपन, पाचन, रुचिकारक, नाक को अत्यन्त सुखाने वाला, क्लेद, मेद, वसा (चर्बी), मज्जा, विष्ठा तथा मूत्र को सुखाने वाला, स्रोतों को स्वच्छ करने वाला, रूक्ष, मेधाशक्ति के लिये हितकर अर्थात् बढ़ाने वाला और मल का अवरोधक होता है ॥१८४-१८७॥ ❖ आग्नेयः = अधिकाग्न्यंशः । मेध्यो मेधाय हितः । वर्चोविबन्धकृत् = मलबन्धं करोति ।।१८४-१८७।। यहाँ 'आग्नेय' से 'अग्नि का अधिक भागवाला' । 'मेध्य' से 'मेधाशक्ति के लिये हितकर' । 'वर्चोविबन्धकृत्' से 'मल का बाँधने वाला अर्थात् अवरोधक' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१८४-१८७॥ अथातियुक्तस्य कटुरसस्य गुणानाह- सोऽतियुक्तो भ्रान्तिदाहमुखतालुवोष्ठशोषकृत् । कण्ठादिपीडामूर्च्छाऽन्तर्दाहदो बलकान्तिहृत् ।। १८८ ।। कटुरस के अत्यन्त सेवन से हानि-कटुरस अत्यन्त सेवन करने से भ्रम और दाह करने वाला एवं मुख, तालु तथा ओष्ठ को सुखाने वाला, कण्ठ आदि में पीड़ा करने वाला और मूर्छा तथा अन्तर्दाह (शरीर के भीतर दाह) भी करने वाला तथा बल और कान्ति को हरण करनेवाला होता है ॥१८८॥ अथ तिक्तरसस्य गुणानाह- तिक्तः शीतस्तृष्णामूर्च्छाज्वरपित्तकफाञ्जयेत् । कृमिकुष्ठविषोत्क्लेददाहरक्तगदापहः ।। १८९ ।। रुच्यः स्वयमरोविष्णुः कण्ठस्तन्यविशोधनः । वातलोऽग्निकरो नासाशोषणो रूक्षणो लघुः ।।१९०।। तिक्तरस के गुण-तिक्तरस शीतवीर्य, प्यास, मूर्छा, ज्वर, पित्त तथा कफ को दूर करनेवाला, कृमि, कोढ़, विष, उत्क्लेद (जी मचलाना) दाह तथा रुधिर सम्बन्धी रोगों को दूर करनेवाला रुच्य, स्वयं रुचिकर नहीं लगनेवाला, कण्ठस्वर तथा दूध को शुद्ध करनेवाला, वायु का उत्पादक, अग्निको बढ़ानेवाला, नासिका को सुखानेवाला, रूक्ष तथा लघु होता है ।। १८९-१९०।। ❖ रुच्यः = अन्येषु वस्तुषुरुचिमुत्पादयति । स्वयमरोचिष्णुः = यथा निम्बः स्वयं न रोचते अन्येषु वस्तुषु रुचिं करोति ।। १८९-१९०।। १. 'रूक्ष' इति पाठा. ।