भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 244, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १९३ यहाँ 'रुच्य' से 'अन्य वस्तुओं में रुचि उत्पन्न करनेवाला'। 'स्वयमरोचिष्णुः' से 'स्वयं रुचिकर नहीं लगनेवाला अर्थात् जैसे नीम स्वयं रुचिकर नहीं होता है तथा अन्य वस्तुओं में रुचि उत्पन्न करता है' - यह अर्थ समझना चाहिये ॥१९८९-१९९०॥ अथातियुक्तस्य तिक्तस्य गुणानाह- सोऽतियुक्तः शिरःशूलमन्यास्तम्भभ्रमार्तिकृत् । कम्पमूर्च्छातृषाकारी बलशुक्रक्षयप्रदः ॥१९९१॥ तिक्तरस के अत्यन्त सेवन करने से हानि तिक्तरस अत्यन्त सेवन करने से सिर में दर्द, मन्यास्तम्भ (मन्यानामक शिराओं का जकड़ जाना) श्रम, पीड़ा, कम्प, मूर्च्छा तथा प्यास उत्पन्न करने वाला और बल तथा शुक्र का क्षय करनेवाला होता है ॥१९९१॥ अथ कषायरसस्य गुणानाह- कषायो रोपणो ग्राही स्तम्भनः शोधनस्तथा । लेखनः पीडनः सौम्यः शोषणो वातकोपनः ॥१९९२॥ कफशोणितपित्तघ्नो रूक्षः शीतो लघुर्मतः । त्वक्प्रसाधन आमस्य स्तम्भनो विशदो मतः ।। जिह्वाया जाड्यकृत्कण्ठस्रोतसां च विबन्धकृत् ॥१९९३॥ कषाय रस के गुण—कषाय रस घाव को भरनेवाला, मलबद्ध करनेवाला तथा स्तम्भन, शोधन, लेखन, पीडन, सौम्य, शोषण तथा वात को कुपित करनेवाला, कफ और रुधिर को नष्ट करनेवाला एवं रूक्ष, शीतवीर्य, लघु और त्वचा को साफ करने वाला, आम को रोकने वाला, विशद, जिह्वा की जड़ता को करने वाला और कण्ठ तथा स्रोतों में विबन्धता करनेवाला होता है ॥१९९२-१९९३॥ ❖ रोपणो व्रणस्य । स्तम्भनो गात्राणाम् । शोधनो व्रणस्य । लेखनो व्रणादुत्पन्नमांसस्य । पीडनो हृदयस्य वातकारित्वात् । सौम्यः=सोमादुत्पन्नः । शोषणो व्रणमज्जादीनाम् ॥१९९२-१९९३॥ यहाँ 'रोपण' से 'व्रण (घाव) को भरनेवाला'। 'स्तम्भन' से शरीर के अवयवों को जकड़ने वाला'। 'शोधन' से 'व्रण को शुद्ध करनेवाला'। 'लेखन' से 'क्षत (घाव) आदि में विकार युक्त उभरे हुए मांसों को छीलनेवाला'। 'पीडन' से 'वायुकारक होने से हृदय में पीड़ा करनेवाला'। 'सौम्य' से 'सोम पदार्थ से उत्पन्न होनेवाला' और 'शोषण' से 'व्रण तथा मज्जा आदि का सुखाने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१९९२-१९९३॥ अथातियुक्तस्य कषायस्य गुणानाह- सोऽतियुक्तो ग्रहाध्मानहृत्पीडाक्षेपणादिकृत् ॥१९९४॥ कषायरस के अत्यन्त सेवन करने से दोष—कषायरस अत्यन्त सेवन करने से ग्रह (अङ्गों का जकड़ना), आध्मान (अफारा), हृदय में पीड़ा और आक्षेपादि रोगों को उत्पन्न करनेवाला होता है ॥१९९४॥ अथ मधुरादीनामपरान् विशेषानाह- मधुरं श्लेष्मलं प्रायो जीर्णशालियवादृते । मुद्गाद्रोधूमतः क्षौद्रात्सिताया जाङ्गलामिषात् ।।१९९५।। अम्लं पित्तकरं प्रायो विना धात्रीं च दाडिमीम् । लवणं प्रायशो द्वेषि नेत्रयोः सैन्धवं विना ।।१९९६।। प्रायः कटु तथा तिक्तमवृष्यं वातकोपनम् । शुण्ठी कृष्णारसोनानि पटोलममृतां विना ।।१९९७।। मधुरादि रसों की अन्य विशेषता—मधुररसयुक्त पदार्थ प्रायः करके कफकारक होते हैं परन्तु उनमें पुराना शालि धान्य का चावल, जब, मूँग, गेहूँ, शहद, साफ शक्कर और जङ्गली जीवों के मांस कफकारक नहीं होते हैं। अम्लरसयुक्त १६ भाव. I