भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 245

१९४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पदार्थ प्रायः करके पित्तकारक होते हैं, अत एव आमला और अनार को छोड़कर शेष अम्लरसयुक्त सभी पदार्थ पित्तकारक होते हैं। लवणरसयुक्त पदार्थों में सैन्धव (सेंधानमक) को छोड़कर प्रायः करके अन्य सभी नेत्रों के लिये अहितकर होते हैं। प्रायः करके कटु तथा तिक्तरसयुक्त पदार्थ अवृष्य (वीर्य के लिये अहितकर) और वात को कुपित करने वाले होते हैं, किन्तु उनमें सोंठ, पीपल, लहसुन, परवल और गुरुच अवृष्य तथा वात को कुपित करने वाले नहीं होते हैं ॥१९५-१९७॥ (१उक्तं च) चरकेऽपि- पिप्पली नागरं वृष्य कटु चावृष्यमुच्यते । प्रायशः स्तम्भनं प्रोक्तं कषायमभयां विना ।।१९८।। सामान्येनात्र निर्दिष्टा गुणाः षड्रससम्भवाः । रसानां योगतस्तु स्यादन्य एव गुणोदयः ।।१९९।। संयोगाद्विषतां याति सममाज्येन माक्षिकम् । अमृतत्वं विषं याति सर्पदष्टस्य वै यथा ।।२०० ।। इसी सम्बन्ध में 'चरक' ने भी कहा है कि-कटुरसयुक्त पदार्थों में पीपल और सोंठ वृष्य (वीर्य के लिये हितकर) है तथा शेष अवृष्य (वीर्य के लिये अहितकर) है । कषायरसयुक्त पदार्थों में हर्रे को छोड़कर शेष पदार्थ शरीर को स्तम्भन करने वाले होते हैं। यहाँ सामान्यरूप से इस प्रकार मधुरादि छः प्रकार के रसों के गुणों का निर्देश किया गया, किन्तु इनमें विशेषता यह है कि इन्हीं रसों का परस्पर योग होने से अन्य प्रकार के ही गुणों का उदय हो जाता है। जैसे समभाग में घृत तथा मधु का योग होने से उन दोनों का विष के तुल्य हो जाता है और सर्प के काटने पर विष देना अमृत की भाँति गुणकारी हो जाता है ॥१९८-२००॥ आकाशादिसम्बन्धिद्रव्यगुणानाह- लघुर्गुरुस्तथा स्निग्धो रूक्षस्तीक्ष्ण इति क्रमात् । नभोभूवारिवातानां वह्नेरेते गुणाः स्मृताः ।।२०१।। द्रव्यों में आकाशादि पाँच महाभूत सम्बन्धी गुण-द्रव्यों में आकाश, पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि सम्बन्धी क्रम से लघु, गुरु, स्निग्ध, रूक्ष तथा तीक्ष्ण ये गुण होते हैं। अर्थात्-आकाश के गुण लघु, पृथ्वी के गुण गुरु, जल के गुण स्निग्ध, वायु के गुण रूक्ष एवं अग्नि के गुण तीक्ष्ण होते हैं ॥२०१॥ अथ लघ्वादिगुणवतां द्रव्याणां गुणानाह- लघु पथ्यं परं प्रोक्तं कफघ्नं शीघ्रपाकि च ।।२०२।। लघ्वादि गुणों से युक्त द्रव्यों के गुण-लघु गुणयुक्त द्रव्य अत्यन्त पथ्य (हितकर), कफनाशक तथा शीघ्र पचनेवाला होता है ॥२०२॥ ❖ लघु=द्रव्यम् । एवं गुर्वादि । तथा चोक्तम्- गुर्वादयो गुणा द्रव्ये पृथिव्यादौ रसाश्रये । रसेषु व्यपदिश्यन्ते साहचर्योपचारतः ।।२०२।। यहाँ 'लघु' पद का 'लघुगुण युक्त द्रव्य' अर्थ समझना चाहिये । इसी प्रकार से 'गुरु' आदि का भी अर्थ समझना चाहिये और इसके प्रमाण में अन्यत्र कहा भी है कि-रस के आश्रय पृथिव्यादि द्रव्यों में गुरु आदि गुण रहते हैं अत एव रस के साहचर्य (साथ-साथ रहने) से उसी के भाँति ये भी समझे जाते हैं अर्थात् जैसे अम्लादि रस कहने से अम्ल युक्त पदार्थ समझे जाते हैं वैसे ही गुरु आदि कहने से गुरु आदि गुणयुक्त पदार्थ समझे जाते हैं ॥२०२॥ गुरु वातहरं पुष्टिश्लेष्मकृच्चिरपाकि च। स्निग्धं वातहरं श्लेष्मकारि वृष्यं बलावहम् ।। रूक्षं समीरणकरं परं कफहरं मतम् ।।२०३।। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA