भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 246, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १९५ तीक्ष्णं पित्तकरं प्रायो लेखनं कफवातहृत् । सुश्रुते तु गुणा एते विंशतिस्तान्ब्रुवे शृणु ।।२०४।। गुरुर्लघुः स्निग्धरूक्षौ तीक्ष्णः श्लक्ष्णः स्थिरः सरः । पिच्छिलो विशदः शीत उष्णश्च मृदुकर्कशौ । स्थूलः सूक्ष्मो द्रवः शुष्क आशुर्मन्दः स्मृता गुणाः ।।२०५।। गुरु गुणयुक्त पदार्थ—गुरु पदार्थ वातनाशक, पुष्टि तथा कफ कारक और देर में पचने वाला होता है । स्निग्धगुण युक्त पदार्थ—वातनाशक, कफकारक, वृष्य (वीर्य के लिये हितकर) तथा बलदायक होता है। रूक्ष गुण युक्त पदार्थ— अत्यन्त वातकारक तथा कफनाशक होता है । तीक्ष्णगुण युक्त पदार्थ—प्रायः करके पित्तकारक, लेखन और कफ तथा वात का हरण करने वाला होता है। 'सुश्रुत' में बीस प्रकार के ये गुण कहे हुये हैं—(१) गुरु, (२) लघु, (३) स्निग्ध, (४) रूक्ष, (५) तीक्ष्ण, (६) श्लक्ष्ण, (७) स्थिर, (८) सर, (९) पिच्छिल, (१०) विशद, (११) शीत, (१२) उष्ण, (१३) मृदु, (१४) कर्कश, (१५) स्थूल, (१६) सूक्ष्म, (१७) द्रव, (१८) शुष्क, (१९) आशु और (२०) मन्द ।।२०३-२०५।। तत्र गुरुल्घुस्निग्धरूक्षतीक्ष्णगुणा उक्ता एव । (अन्येषान्वाह१—) श्लक्ष्णः स्नेहं विनाऽपि स्यात्कठिनोऽपि हि चिक्कणः ।।२०६।। पूर्वोक्त २० गुणों में गुरु, लघु, स्निग्ध, रूक्ष तथा तीक्ष्ण गुणों का वर्णन हो चुका है अब अन्य गुणों का वर्णन इस प्रकार हैं—श्लक्ष्ण गण युक्त पदार्थ—स्नेह के बिना तथा कठिन होते हुये भी चिक्कन होता है अर्थात् स्नेह गुण युक्त न होते हुये तथा कठिन होते हुये भी यदि उसमें श्लक्ष्ण गुण हो तो वह चिक्कन होता है ।।२०६।। स्थिरो वातमलस्तम्भी सरस्तेषां प्रवर्तकः । पिच्छिलस्तन्तुलो बल्यः सन्धानः श्लेष्मलो गुरुः ।।२०७।। स्थिर गुण युक्त पदार्थ—वायु और मल का स्तम्भन करने वाला होता है । सरगुण युक्त पदार्थ—वात और मल का प्रवर्त्तन करने वाला होता है । पिच्छिलगुण युक्त पदार्थ—तन्तुल (रेसे युक्त), बलकारक, सन्धानकारक, कफप्रद तथा गुरु होता है ।।२०७।। ❖ सन्धानो भग्नस्य ।।२०७।। यहाँ 'सन्धान' से 'टूटे हुये हड्डियों को जोड़ने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२०७।। क्लेदच्छेदकरः ख्यातो विशदो व्रणरोपणः । शीतस्तु ह्लादनः स्तम्भी मूर्च्छातृट्स्वेददाहनुत् । उष्णो भवति शीतस्य विपरीतश्च पाचनः ।।२०८।। विशदगुण युक्त पदार्थ—क्लेद (आर्द्रता) को दूर करने में तथा व्रण को पूरा करने में प्रसिद्ध है । शीत गुण युक्त पदार्थ—सुख उत्पन्न करनेवाला, रक्त के अत्यन्त स्राव आदि को रोकनेवाला, मूर्च्छा, प्यास, पसीना और दाह इन सबों को दूर करने वाला होता है । उष्ण गुण युक्त पदार्थ—पूर्वोक्त शीत गुण युक्त पदार्थ के विपरीत गुण वाला होता है और व्रणादि को पकाने वाला होता है ।।२०८।। ❖ ह्लादनः=सुखजनकः, स्तम्भी=रक्तातिप्रवृत्त्यादीनाम् । उष्णः=शीतस्य विपरीत-स्तेन असुखजनकः । रक्तातिप्रवृत्त्यादीनामस्तम्भनः । मूर्च्छातृट्स्वेददाहकृत् । पाचनो व्रणादीनाम् ।। मृदुकर्कशौ प्रसिद्धौ ।।२०८।। यहाँ 'ह्लादन' पद का 'सुख उत्पन्न करने वाला' । 'स्तम्भी' पद का 'रक्त के अत्यन्त स्राव आदि को रोकने वाला' । 'उष्णः शीतस्य विपरीत:' पदों का उष्ण गुण युक्त तथा शीत गुण युक्त पदार्थ के विपरीत गुण वाला होता है अतः १. कोष्ठस्थः पाठः क्वचित्कः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA