भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे दुःखोत्पादक तथा रक्त के अत्यन्त स्राव आदि का करने वाला होता है, एवं मूर्च्छा, प्यास, पसीना और दाह इन सबों को भी करने वाला होता है' और 'पाचनः' पद का 'व्रण आदि का पकाने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये। यहाँ पर मृदु तथा कर्कश गुण युक्त पदार्थों का अन्य गुण युक्त पदार्थों की भाँति वर्णन करने का यह कारण है कि 'वे प्रसिद्ध हैं' यह और भी समझ लेना चाहिये ॥२०८॥ स्थूलः स्थौल्यकरो देहे स्रोतसामवरोधकृत् ।।२०९।। देहस्य सूक्ष्मच्छिद्रेषु विशेद्यत्सूक्ष्ममुच्यते। द्रवः क्लेदकरो व्यापी शुष्कस्तद्विपरीतकः ।।२१०।। आशुराशुकरी देहे धावत्यम्भसि तैलवत्। मन्दः सकलकार्येषु शिथिलोऽल्पोऽपि कथ्यते ।।२११।। स्थूल गुण युक्त पदार्थ—शरीर में स्थूलता उत्पन्न करने वाला तथा सम्पूर्ण स्रोतों का अवरोध करने वाला होता है। सूक्ष्म गुण युक्त पदार्थ-वह कहलाता है जो शरीर के सूक्ष्मछिद्रों में भी प्रवेश कर सकता हो अर्थात् अपना गुण प्रकाशित कर सकता हो। द्रवेगुण युक्त पदार्थ-शरीर में आर्द्रता करने वाला तथा व्याप्त होने वाला होता है। शुष्क गुण युक्त पदार्थ-पूर्वोक्त द्रवे गुण युक्त पदार्थ के विपरीत गुण वाला होता है। आशु गुण युक्त पदार्थ—शरीर में शीघ्र कार्य करने वाला होता है अर्थात् जल में डाले हुये तैल की भाँति थोड़ी देर में सम्पूर्ण शरीर में दौड़ने (फैलने) वाला होता है। मन्द गुण युक्त पदार्थ-सम्पूर्ण कार्यों में शिथिलता करने वाला होता है तथा यही अल्प गुण युक्त पदार्थ भी कहलाता है ॥२०९-२११॥ अथ गुणप्रस्तावादीपनादयो गुणाः सलक्षणाः (१उच्यन्ते) तत्रादौ दीपनमाह- पचेन्नाम वह्निकृद्द्दीपनं तद्यथा मिसिः ।।२१२।। दीपन पदार्थ के लक्षण और गुण—जो द्रव्य अग्नि को दीप्त करने वाला हो किन्तु आम को पचाने वाला न हों वह 'दीपन' गुण युक्त कहलाता है। जैसे—जटामांसी ॥२१२॥ ❖ वह्निकृत्=वह्निदीप्तिकृत्। ननु यद्वह्निं प्रदीपयति तदामं कथं न पचेदित्याशङ्कायामुच्यते, दीपनद्रव्यं तावन्तं वह्निं प्रदीपयति यद्२ अन्ने भोक्तुमिच्छामुत्पादयति, न त्वामं पक्तुं क्षमम्, यथा-सूक्ष्मदीपाग्निः उद्योतं करोति न तु बृहत्स्थालीस्थान् तण्डुलान् ओदनं कर्तुं क्षमः ।।२१२।। यहाँ 'वह्निकृत्' पद से 'अग्नि को दीप्त करने वाला' अर्थ समझना चाहिये। अब यहाँ यदि यह कहा जाय कि— जो द्रव्य अग्नि को प्रदीप्त करने वाला हो वह क्यों नहीं आम को पचाने वाला भी होता ? इसका उत्तर यह है कि दीपन गुण युक्त द्रव्य उतनी ही अग्नि को प्रदीप्त करता है जितने से अन्न खाने की इच्छा उत्पन्न हो, न कि आम को पचाने में भी समर्थ हो। जैसे कि सूक्ष्म रूप से जलती हुई अग्नि प्रकाश करती है किन्तु भारी बटुलोई में रखे हुये चावलों को पकाकर भात बनाने में समर्थ नहीं होती, इसी भाँति दीपन द्रव्य को भी आम के पचाने में असमर्थ समझना चाहिये ॥२१२॥ अथ पाचनमाह- पचत्यामं न वह्निं च कुर्याद्यत्तद्धि पाचनम्। नागकेशरवद्विद्याच्चित्रो दीपनपाचनः ।।२१३।। 'पाचन' गुण युक्त द्रव्य—पाचन गुण युक्त द्रव्य वह कहलाता है जो नागकेशर की भाँति आम को पचाता हो किन्तु अग्नि को प्रदीप्त न करता हो। 'चीता' को तो दीपन, पाचन इन दोनों गुणों से युक्त समझना चाहिये ॥२१३॥ ❖ ननु यद्वह्निं न दीपयति तदामं कथं पचतीत्याशङ्कायामाह-पाचनं वह्निदीप्तिमकुर्वाणमप्यामं पचति। यथाऽग्न्याधानीस्थोऽङ्गारसमूहोऽन्नं पचति। न तु दीपवत्सर्वतः प्रदीपयति ।।२१३।। १. कोष्ठस्थः पाठष्टीकाकृता स्थापितः। २. 'यथे'ति पाठः क्वाचित्कः। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA