भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १९७ यहाँ यदि यह कहा जाय कि जो द्रव्य अग्नि को दीप्त नहीं कर सकता वह आम को कैसे पचा सकता है ? तो इसका उत्तर यह है कि—पाचन द्रव्य बिना अग्नि को दीप्त किये ही आम को पचाता है जैसे-दमचूल्हे में स्थित कोयले की अग्नि अन्न को पचाती है किन्तु दीपक की भाँति चारों ओर प्रकाश नहीं करती, वैसे ही पाचन द्रव्य को भी दीपन में असमर्थ समझना चाहिये ॥२१३॥ अथ शमनमाह- न शोधयति यद्दोषान्समान्नोदीरयत्यपि । समीकरोति विषमाञ्छमनं तद्यथाऽमृता ।। २१४।। 'शमन' गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य-दोषों का शोधन नहीं करता और समभाव में स्थित दोषों को बढ़ाता भी नहीं है एवं विषमभाव में स्थित दोषों को समभाव में स्थित करता है वही 'शमन' गुण युक्त द्रव्य कहलाता है, जैसे-गुरुचि (गिलोय) ॥२१४॥ यद् द्रव्यं दोषत्रयं न शोधयति, नोर्ध्वाधोमार्गाभ्यामानयति, समान्दोषान् नोदीरयति न वर्धयति (च१) शमनं तत् ।।२१४।। यहाँ 'यद्दोषान् न शोधयति' इन पदों से 'जो द्रव्य वातादि तीनों दोषों का शोधन नहीं करता अर्थात् ऊपर (मुखादि) और नीचे (गुदादि) मार्गों से बाहर नहीं निकालता है' और 'समान्नोदीरयत्यपि' इन पदों से 'समभाव में स्थित दोषों को बढ़ाता भी नहीं है' एवं 'शमनं तद्' इन पदों से वह शमन गुण युक्त कहलाता है यह अर्थ समझना चाहिये ॥२१४॥ अथानुलोमनमाह- कृत्वा पाकं मलानां च भित्त्वा बन्धमधो नयेत् । तच्चानुलोमनं ज्ञेयं यथा प्रोक्ता हरीतकी ।। २१५।। 'अनुलोमन' गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य मलों का परिपाक करके बन्ध (वायु वे बन्ध) भेदन करके नीचे को ले जावे वह 'अनुलोमन' गुण युक्त कहलाता है। जैसे-हर्रा ॥२१५॥ मलानामपक्वानां वातपित्तश्लेष्मणां, बन्धं=वायुबन्धं भित्त्वा, अधो नयेत्=मलानधः पातयति । यहाँ 'मलानाम्' से 'मलों का अर्थात् अपरिपक्व वात, पित्त और कफ का' तथा 'बन्धं भित्त्वा' से 'बन्ध का अर्थात् वायु के बन्ध का भेदन करके' और 'अधो नयेत्' से 'नीचे को ले जावे अर्थात् मलों को नीचे गिरावे' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२१५॥ अथ स्रसनमाह- पक्तव्यं यदपक्त्वैव श्लिष्टं कोष्ठे मलादिकम् । नयत्यधः स्रंसनं तद्यथा स्यात्कृतमालकम् ।। २१६ ।। 'स्रंसन' गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य कोष्ठस्थित पकने योग्य मलादिकों को बिना पकाये ही नीचे को फेंक देवे वह 'स्रंसन' गुण युक्त द्रव्य कहलाता है। जैसे—धनबहेरा ॥२१६॥ ❖ मलादिकम् आदिशब्दात् कफपित्ते । कृतामलः=धनबहेरा (२सोंदालवा) इति लोके ।। २१६ ।। यहाँ 'मलादिकम्' पद में स्थित 'आदि' शब्द से 'कफ और पित्त' का भी ग्रहण करना चाहिये और 'कृतमाल' पद से 'धनबहेरा' जिसे लोक में 'सोंदालवा' कहते हैं उसका ग्रहण करना चाहिये ॥२१६॥ १. क्वचिन्नास्ति । २. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।