भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १९७ यहाँ यदि यह कहा जाय कि जो द्रव्य अग्नि को दीप्त नहीं कर सकता वह आम को कैसे पचा सकता है ? तो इसका उत्तर यह है कि—पाचन द्रव्य बिना अग्नि को दीप्त किये ही आम को पचाता है जैसे-दमचूल्हे में स्थित कोयले की अग्नि अन्न को पचाती है किन्तु दीपक की भाँति चारों ओर प्रकाश नहीं करती, वैसे ही पाचन द्रव्य को भी दीपन में असमर्थ समझना चाहिये ॥२१३॥ अथ शमनमाह- न शोधयति यद्दोषान्समान्नोदीरयत्यपि । समीकरोति विषमाञ्छमनं तद्यथाऽमृता ।। २१४।। 'शमन' गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य-दोषों का शोधन नहीं करता और समभाव में स्थित दोषों को बढ़ाता भी नहीं है एवं विषमभाव में स्थित दोषों को समभाव में स्थित करता है वही 'शमन' गुण युक्त द्रव्य कहलाता है, जैसे-गुरुचि (गिलोय) ॥२१४॥ यद् द्रव्यं दोषत्रयं न शोधयति, नोर्ध्वाधोमार्गाभ्यामानयति, समान्दोषान् नोदीरयति न वर्धयति (च१) शमनं तत् ।।२१४।। यहाँ 'यद्दोषान् न शोधयति' इन पदों से 'जो द्रव्य वातादि तीनों दोषों का शोधन नहीं करता अर्थात् ऊपर (मुखादि) और नीचे (गुदादि) मार्गों से बाहर नहीं निकालता है' और 'समान्नोदीरयत्यपि' इन पदों से 'समभाव में स्थित दोषों को बढ़ाता भी नहीं है' एवं 'शमनं तद्' इन पदों से वह शमन गुण युक्त कहलाता है यह अर्थ समझना चाहिये ॥२१४॥ अथानुलोमनमाह- कृत्वा पाकं मलानां च भित्त्वा बन्धमधो नयेत् । तच्चानुलोमनं ज्ञेयं यथा प्रोक्ता हरीतकी ।। २१५।। 'अनुलोमन' गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य मलों का परिपाक करके बन्ध (वायु वे बन्ध) भेदन करके नीचे को ले जावे वह 'अनुलोमन' गुण युक्त कहलाता है। जैसे-हर्रा ॥२१५॥ मलानामपक्वानां वातपित्तश्लेष्मणां, बन्धं=वायुबन्धं भित्त्वा, अधो नयेत्=मलानधः पातयति । यहाँ 'मलानाम्' से 'मलों का अर्थात् अपरिपक्व वात, पित्त और कफ का' तथा 'बन्धं भित्त्वा' से 'बन्ध का अर्थात् वायु के बन्ध का भेदन करके' और 'अधो नयेत्' से 'नीचे को ले जावे अर्थात् मलों को नीचे गिरावे' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२१५॥ अथ स्रसनमाह- पक्तव्यं यदपक्त्वैव श्लिष्टं कोष्ठे मलादिकम् । नयत्यधः स्रंसनं तद्यथा स्यात्कृतमालकम् ।। २१६ ।। 'स्रंसन' गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य कोष्ठस्थित पकने योग्य मलादिकों को बिना पकाये ही नीचे को फेंक देवे वह 'स्रंसन' गुण युक्त द्रव्य कहलाता है। जैसे—धनबहेरा ॥२१६॥ ❖ मलादिकम् आदिशब्दात् कफपित्ते । कृतामलः=धनबहेरा (२सोंदालवा) इति लोके ।। २१६ ।। यहाँ 'मलादिकम्' पद में स्थित 'आदि' शब्द से 'कफ और पित्त' का भी ग्रहण करना चाहिये और 'कृतमाल' पद से 'धनबहेरा' जिसे लोक में 'सोंदालवा' कहते हैं उसका ग्रहण करना चाहिये ॥२१६॥ १. क्वचिन्नास्ति । २. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।
१९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ भेदनमाह- मलादिकमबद्धं यद्बद्धं वा पिण्डितं मलैः । भित्त्वाऽधः पातयति यद्भेद नं कटुकी यथा ।।२१७।। ‘भेदन’ गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य शिथिल अथवा गाढे एवं मलों से पिण्डाकार को प्राप्त हुये मलादि का भेदन करके नीचे गिराता है वह ‘भेदन’ गुण युक्त द्रव्य कहलाता है। जैसे—कटुकी ॥२१७॥ अबद्धं=शिथिलं, बद्धं=गाढं, मलैः=दोषैस्तत्रापि वातैः, बहुत्वमाधिक्यबोधनार्थ तैः पिण्डितं=गुटिकीकृतम् ।।२१७।। यहाँ ‘अबद्ध’ से शिथिल और ‘बद्ध’ से ‘गाढे’ एवं ‘मलैः’ से ‘दोषों से उसमें भी विशेष कर वायु से’ यह अर्थ समझना चाहिये। यहाँ ‘मलैः’ पद में जो बहुवचन का निर्देश किया है वह अधिकता का बोध कराने के लिये है, अतः ‘मलों से अर्थात् अधिक वायु से ‘पिण्डित’ (गुटिकागोली) की भाँति आकार को प्राप्त हुये’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥२१७॥ अथ रेचनमाह- विपक्वं यदपक्वं वा मलादि द्रवतां नयेत् । रेचयत्यपि तज्ज्ञेयं रेचनं त्रिवृता यथा ।।२१८।। ‘रेचन’ गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य पक्व अथवा अपक्व मलादिकों को द्रवीभूत (पतला) करके रेचन कराता है वह ‘रेचन’ गुण युक्त द्रव्य कहलाता है। जैसे—निसोथ ॥२१८॥ ❖ रेचयत्यपि=अधः पातयति च । त्रिवृता=पनिलर१ इति लोके ।।२१८।। यहाँ ‘रेचयत्यपि’ से नीचे गिराता है अर्थात् रेचन करता है’ तथा ‘त्रिवृता’ से ‘तेओडि अथवा पनिलर’ नाम से लोक प्रसिद्ध द्रव्य का ग्रहण करना चाहिये ॥२१८॥ अथ वमनमाह- अपक्वं पित्तश्लेष्माणं २बलादूर्ध्वं नयेत्तु यत् । वमनं तद्धि विज्ञेयं मदनस्य फलं यथा ।।२१९।। ‘वमन’ गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य अपक्व पित्त, कफ अन्न को बलपूर्वक ऊपर की ओर ले जाता है उसे ‘वमन’ गुण युक्त द्रव्य जानना चाहिये । जैसे—मयनफल ॥२१९॥ ❖ ऊर्ध्वं नयेन्मुखमार्गेण बहिष्कुर्यात् । मदनस्य फलं ‘मयनफल’ इति लोके ।।२१९।। यहाँ ‘ऊर्ध्वं नयेत्’ से ‘ऊपर की ओर लेजावे अर्थात् मुख के रास्ते से बाहर कर देवे’ तथा ‘मदनस्य फलम्’ से लोकप्रसिद्ध ‘मयनफल’ को ग्रहण करना चाहिये ॥२१९॥ अथ देहसंशोधनमाह- स्थानाद्बहिर्नयेदूर्ध्वमधो वा मलसञ्चयम् । देहसंशोधनं तत्स्याद् देवदालीफलं यथा ।।२२०।। ‘देहसंशोधन’ गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य सञ्चित हुये मल को उसके रहने के स्थान से ऊपर अथवा नीचे के मार्ग से निकाल कर बाहर कर देवे वह ‘देह संशोधन’ गुण युक्त द्रव्य कहलाता है। जैसे—देवदाली का फल (घघरवेल) ॥२२०॥ ❖ देवदाली ‘सोनैआ’ इति लोके ।।२२०।। यहाँ ‘देवदाली’ से लोक प्रसिद्ध ‘सोनैआ’ का ग्रहण करना चाहिये ॥२२०॥ १. ‘तेओडि’ इति पाठा. । २. ‘नयत्यूर्ध्वमि’ति पाठा. ।
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १९९ अथ ग्राह्याह- दीपनं पाचनं यत्स्यादुष्णत्वाद् द्रवशोषकम्। ग्राहि तच्च यथा शुण्ठी जीरकं गजपिप्पली ।।२२१।। ग्राही गुण युक्त द्रव्य—जो दीपन तथा पाचन हो एवं उष्ण होने से द्रवपदार्थों का शोषण करने वाला हो वह ग्राही गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—सोंठ, जीरा और गजपीपल ॥२२१॥ अथ स्तम्भनमाह- रौक्ष्याच्छैत्यात्कषायत्वाल्लघुपाकाच्च यद्भवेत्। वातकृत्स्तम्भनं तत्स्याद्यथा वत्सकटुण्डुकौ ।।२२१।। स्तम्भन गुण युक्त द्रव्य—जो रूक्ष, शीतल, कषाय रस युक्त तथा लघुपाकी (शीघ्र पचनेवाला) होने से वातकारक होता है वह 'स्तम्भन' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—कुरैआ और सोनापाठा ॥२२२॥ ❖ वातकृत्=प्रतिलोमवातकृत्। स्तम्भनमधोगामि मलादीनाम्। वत्सकः (कुरैआ) टुण्डुकः (सोनापाठा) ।।२२२।। यहाँ 'वातकृत्' से 'वायुकारक अर्थात् अधोगामी वायु का प्रतिलोम करनेवाला अर्थात् ऊर्ध्वगामी करने वाला एवं ऊर्ध्वगामी को अधोगामी करने वाला' तथा 'स्तम्भन' पद से 'अधोगामी मलादि को रोकने वाला' और 'वत्सक' से 'कुरैआ' एवं 'टुण्डुक' से 'सोनापाठा' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२२२॥ अथ छेदनमाह- श्लिष्टान्कफादिकान्दोषानुन्मूलयति यद्बलात्। छेदनं तद्यथा क्षारा मरिचानि शिलाजतु ।।२२३।। 'छेदन' गुण युक्त द्रव्य—जो चिपके हुये कफादि दोषों को बलपूर्वक जड़ से अलग कर दे वह 'छेदन' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—क्षारपदार्थ, मरिच और शिलाजीत ॥२२३॥ ❖ क्षाराः=यवक्षारादयः ।।२२३।। यहाँ 'क्षार' से 'जवाखार' आदि का ग्रहण करना चाहिये ॥२२३॥ अथ लेखनमाह- धातून्मलान् वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत्। लेखनं तद्यथा क्षौद्रं नीरमुष्णं वचा यवाः ।।२२४।। 'लेखन' गुण युक्त द्रव्य—जो देह के धातुओं तथा मलों को सुखा कर उल्लेखन करे अर्थात् कृश कर दे वह 'लेखन' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—शहद, गरम जल, वच तथा इन्द्रयव ॥ ❖ उल्लेखयेत्कृशीकुर्यात्। लेखनं=कृशीकारकम्। क्षौद्रं=मधु। यवाः=इन्द्रयवाः ।।२२४।। यहाँ 'उल्लेखयेत्' से 'उल्लेखन करे अर्थात् कृश कर दे', 'लेखन' से 'जो कृश न हो उसे कृश कर देने वाला', 'क्षौद्र' से 'शहद' और 'यव' से 'इन्द्रयव' अर्थ समझना चाहिये ॥२२४॥ अथ वाजीकरमाह- यस्माद् द्रव्याद्भवेत्स्त्रीषु हर्षो वाजीकरं हि तत्। यथाऽश्वगन्धा मुसली शर्करा च शतावरी ।।२२५।। 'वाजीकर' गुण युक्त द्रव्य—जिस द्रव्य के सेवन से स्त्री के विषय में हर्ष हो वह 'वाजीकर' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—असगन्ध, मुसली, शक्कर और शतावर ॥२२५॥ ❖ हर्षो=रन्तुं समुत्साहः ।।२२५।। यहाँ 'स्त्री के विषय में हर्ष अर्थात् स्त्री के साथ सम्भोग करने में उत्साह' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२२५॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
२०० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ शुक्रलमाह- यस्माच्छुक्रस्य वृद्धिः स्याच्छुक्रलं हि तदुच्यते । यथा नागबलाऽऽद्याः स्युर्बीजं च कपिकच्छुजम् ।। २२६।। 'शुक्रल' गुण युक्त द्रव्य—जिस द्रव्य के सेवन से शुक्र की वृद्धि हो वह 'शुक्रल' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—गुलशकरी आदि तथा केवाँच का बीज ॥२२६॥ नागबला=गुल १शकरी इति लोके ।।२२६।। यहाँ 'नागबला' से लोक प्रसिद्ध 'गुलशकरी' का ग्रहण करना चाहिये ॥२२६॥ अथ शुक्रस्य जनकं रेचकञ्चाह- दुग्धं भाषाश्च भल्लातफलमज्जामलानि च। एतानि जनकानि स्यू रेचकानि च रेतसः ।। २२७।। शुक्र के जनक तथा रेचक गुण युक्त पदार्थ—दूध, उड़द, भिलावे के फल की मींगी और आँवला ये सब शुक्र के जनक तथा रेचक भी हैं ॥२२७॥ ❖ जनकानि=प्रभावाच्छीघ्रमेव रसाद्युत्पादनपूर्वकं शुक्रं जनयन्ति । रेचकानि=आधिक्यात्प्रवर्तयन्ति च ।। २२७।। यहाँ 'जनकानि' पद से अपने प्रभाव से शीघ्र ही रस रक्तादि को उत्पन्न करके शुक्र को उत्पन्न करने वाले' और 'रेचकानि' पद से वीर्य की अधिकता कर देने से क्षरण कराने वाले यह अर्थ समझना चाहिये ॥२२७॥ अथ शुक्रस्य प्रवर्त्तकं रेचकं स्तम्भकं क्षयकारकञ्चाह- प्रवर्तिनी स्त्री शुक्रस्य रेचनं बृहतीफलम् । जातीफलं स्तम्भकं स्यात्कालिङ्गं क्षयकारि च ।। २२८।। शुक्र के प्रवर्त्तक (रेचक), स्तम्भक तथा क्षयकारक पदार्थ—'स्त्री'-शुक्र का प्रवर्त्तन (क्षरण) कराने वाली होती है। 'बड़ी भटकटैया'-रेचन अर्थात् क्षरण कराने वाली है। 'जायफल'—स्तम्भन करने वाला और कलीदा का फल अर्थात् 'तरबूज'—क्षयकारक होता है ॥२२८॥ ❖ स्त्री-स्मरणकीर्त्तनदर्शनसम्भाषणस्पर्शनचुम्बनालिङ्गननिधुवनैः समस्तर्व्यस्तैश्च शुक्रस्य प्रवर्तिनी प्रवृत्तिकारिणी२। रेचनं बृहतीफलम्, बृहत्कण्टकारीफलमपि शुक्रस्य रेचकं प्रवर्त्तकम् । कालिङ्गं- कालिन्दफलम्' ।। २२८।। यहाँ 'स्त्री शुक्रस्य प्रवर्त्तिनी' इन पदों से 'स्त्री-स्मरण, कीर्तन, दर्शन, सम्भाषण, स्पर्श, चुम्बन, आलिङ्गन और सम्भोग इन सब कर्मों को एक साथ करने से अथवा अलग-अलग चाहे जो कोई करने से शुक्र की प्रवर्त्तिनी अर्थात् प्रवर्त्तन (क्षरण) कराने वाली होती है'। 'रेचनं बृहती-फलम्' इन पदों से 'बड़ी भटकटैया का फल भी शुक्र का रेचक अर्थात् प्रवर्त्तक होता है' तथा 'कालिङ्गम्' पद से 'कलोंदा का फल अर्थात् तरबूज' ये अर्थ समझना चाहिये ॥२२८॥ अथ रसायनमाह- रसायनन्तु तज्ज्ञेयं यज्जराव्याधिनाशनम् । यथा हरीतकी दन्ती गुग्गुलुश्च शिलाजतु ।। २२९।। रसायन गुण युक्त पदार्थ—'रसायन' गुण युक्त पदार्थ उसे कहते हैं जो वृद्धावस्था तथा व्याधियों को दूर करने वाला हो। जैसे—हरैं, दन्ती, गूगल और शिलाजीत ॥२२९॥ · १. 'गोरक्षचाकुलिया' इति पाठा. । २. क्वचित् 'राजकर्कटी' क्वचिच्च 'कालिन्दीफलम्' इत्यपि पाठा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् २०९ अथ व्यवाय्याह- पूर्वं व्याप्याखिलं कार्यं ततः पाकञ्च गच्छति । व्यवायि तद् यथा भङ्गा फेनञ्चाहि समुद्भवम् ।।२३०।। 'व्यवायि' गुण युक्त पदार्थ—जो सेवन करने मात्र से ही सर्व प्रथम समस्त शरीर में अपनी क्रिया दिखाकर तदनन्तर परिपाक को प्राप्त होता है वह 'व्यवायि' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है । जैसे—भाँग या अफीम ।।२३०।। ❖ अन्यद् द्रव्यं पक्वं तद्¹ गुणं करोति । व्यवायि तु अपक्वमेव स्वगुणैः सकल शरीरं व्याप्य पाकं याति । अहिसमुद्भवं फेनम्=अफीम ।।२३०।। अन्य द्रव्य परिपक्व होने के बाद शरीर में अपना गुण दिखलाता है किन्तु 'व्यवायि' गुण युक्त द्रव्य विना परिपक्व हुये ही अपने गुणों से सारे शरीर में व्याप्त होकर बाद में परिपाक को प्राप्त करता है-अर्थात् परिपक्व होता है । यहाँ 'अहि समुद्भवं फेनम्' इस पदसे 'अफीम' का ग्रहण करना चाहिये ।।२३०।। अथ विकाश्याह- सन्धिबन्धांस्तु शिथिलान्यत्करोति विकाशि तत् । विशोष्यौजश्च धातुभ्यो यथा क्रमुककोद्रवौ ।।२३१।। 'विकाशि' गुण युक्त पदार्थ—को धातुओं से 'ओज' को सुखा कर दूर करता है तथा सन्धि-बन्धनों को शिथिल करता है वह 'विकाशि' गुण युक्त द्रव्य कहलाता है । जैसे—सुपारी या कोदो ।। ❖धातुभ्यः=सकलशरीरस्थेभ्यो वीर्येभ्यः । ओजः=उपधातुविशेषं विशोष्य । क्रमुकं=पूग-फलम् ।।२३१।। 'धातुभ्यः' अर्थात् सकल शरीर में स्थित वीर्य से, 'ओजः' अर्थात् उपधातु विशेष को सुखा कर, तथा 'क्रमुक' अर्थात् 'सुपारी' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२३१।। अथ मदकार्याह- बुद्धिं लुम्पति यद् द्रव्यं मदकारि तदुच्यते । तमोगुणप्रधानञ्च यथा मद्यं सुराऽऽदिकम् ।।२३२।। 'मदकारि' गुण युक्त पदार्थ—जो द्रव्य सेवन करने से बुद्धि का लोप कर दे वह तमोगुण प्रधान 'मदकारि' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है । जैसे—मद्य और सुरा आदि ।।२३२।। ❖ मदकारि=मादकम् ।।२३२।। यहाँ 'मदकारि' से 'मादक' अर्थ समझना चाहिये ।।२३२।। अथ विषमाह- व्यवायि च विकाशि स्याच्छ्लेष्मच्छेदि मदावहम् । आग्नेयं जीवितहरं योगवाहि स्मृतं विषम् ।।२३३।। 'विष' गुण युक्त पदार्थ—जो 'व्यवायि' विकाशी कफनाशक, मदकारक, आग्नेय, जीवन हरण करने वाला और योग वाही गुणों से युक्त होता है वह विष गुण युक्त पदार्थ कहलाता है अर्थात् विष में ये गुण होते हैं ।।२३३।। ❖ व्यवायि-सकलकायगुणव्यापनपूर्वकपाकगमनशीलम् । विकाशि-ओजःशोषणपूर्वकसन्धिबन्ध- शिथिलीकरणशीलम् । मदावहं-तमोगुणाधिक्येन बुद्धिविध्वंसकम् । आग्नेयम्=अधिकाग्निगुणम् । योगवाहि- संसर्गिगुणग्राहकम् । विषं लक्ष्यं, दृष्टान्तो वत्सनाभशक्तुकादिभिः ।।२३३।। यहाँ 'व्यवायि' से 'सम्पूर्ण शरीर में गुणों से व्याप्त होते हुये परिपाक को प्राप्त होनेवाला' 'विकाशि' से 'ओज को सुखाते हुये सन्धि बन्धनों को शिथिल कर देनेवाला', 'मदावहम्' से 'तमोगुण की अधिकता होने से बुद्धि का विध्वंस १. 'तद्गुणमिति पा. चिन्त्यम् ।
२०२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे करने वाला' 'आग्नेयम्' से 'अधिकता से अग्नि के गुणों से युक्त' और 'योगवाहि' से 'अपने संसर्गों के गुणों को ग्रहण करने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये। यहाँ 'विष' लक्ष्य है अतः इसका दृष्टान्त वत्सनाभ तथा सक्तुक आदि विषविशेष से समझना चाहिये ॥२३३॥ अथ प्रमाथ्याह- निजवीर्येण यद् द्रव्यं स्रोतोभ्यो दोषसञ्चयम्। निरस्यति प्रमाथि स्यात्तद्यथा मरिचं वचा ॥२३४॥ 'प्रमाथि' गुण युक्त पदार्थ—जो द्रव्य अपने वीर्य के द्वारा स्रोतों से सञ्चित हुये दोषों को दूर करता है वह 'प्रमाथि' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—मरिच, वच आदि ॥२३४॥ ❖ दोषाः=वातादयः ॥२३४॥ यहाँ 'दोष' पदसे 'वातादि' का ग्रहण करना चाहिये ॥२३४॥ अथाभिष्यन्द्याह- पैच्छिल्याद्गौरवाद् द्रव्यं रुद्ध्वा रसवहाः शिराः। धत्ते यद्गौरवं तत्स्यादभिष्यन्दि यथादधि ॥२३५॥ 'अभिष्यन्दि' गुण युक्त पदार्थ—जो द्रव्य पिच्छिल तथा गुरु होने से रस वहन करने वाली शिराओं के मुखों का अवरोध कर शरीर में गुरुता उत्पन्न करे, वह 'अभिष्यन्दि' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे दधि ॥२३५॥ ❖ गौरवं शरीरे¹ ॥२३५॥ यहाँ 'गौरवम्' पद से 'शरीर में गुरुता' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२३५॥ अथ विदाह्याह- विदाहि द्रव्यमुद्गारमम्लं कुर्यत्तथा तृषाम्। हृदि दाहं च जनयेत्पाकं गच्छति तच्चिरात् ॥२३६॥ 'विदाहि' गुण युक्त द्रव्य—'विदाही' गुण युक्त द्रव्य वह कहलाता है जिसके सेवन करने से खट्टी डकार आवे, प्यास लगे, हृदय में दाह हो एवं देर से हजम हो ॥२३६॥ अथ योगवाह्याह- गृह्णाति योगवाहि द्रव्यं संसर्गिवस्तुगुणान्। पच्यमानं यथैतन्मधुजलतैलाज्यसूतलोहादिः ॥२३७॥ 'योगवाही' गुण युक्त पदार्थ—जो द्रव्य अन्य किसी द्रव्य के साथ पचता हुआ उसी अपने संसर्गी द्रव्य के सम्पूर्ण को ग्रहण करता है, वही 'योगवाहि' गुण युक्त कहलाता है। जैसे—मधु-जल-तैल-घी-पारा और लोहा आदि ॥२३७॥ अथ वीर्यमाह, तत्र वाग्भटः- उष्णाशीतगुणोत्कर्षाद् बुधैर्वीर्यं द्विधा स्मृतम्। यत्सर्वमग्नीषोमीयं दृश्यते भुवनत्रयम् ॥२३८॥ द्रव्यगत वीर्य के भेद—संसार में उष्ण और शीत गुण अधिकता होने से द्रव्यों के वीर्य दो प्रकार के हैं क्योंकि तीनों लोक में सभी पदार्थ अग्नीषोमीय अर्थात् अग्निसम्बन्धी 'आग्नेय' तथा सोमसम्बन्धी 'सौम्य' दिखाई पड़ते हैं ॥२३८॥ अथ तद्गुणानाह- उष्णं वातकफौ हन्यात् पित्तं² तु तनुते जराम्। शीतं वातकफातङ्काङ्कुरुते पित्तहत्परम् ॥२३९॥ १. 'शरीरस्ये'ति पाठः। २. 'हन्याच्छीतमि'ति पाठः।
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् २०३ उष्ण तथा शीत वीर्यों के गुण—उष्णवीर्यवाला पदार्थ वात तथा कफ का नाश करता है और पित्त को बढ़ाता है एवं वृद्धावस्था को करता है और शीतवीर्य वाला पदार्थ वात तथा कफ सम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करता है तथा पित्त को सर्वथा नाश करता है ॥२३९॥ अन्यच्च— तत्रोष्णं भ्रमतृड्ग्लानिस्वेददाहाशुपाकताम्। शमञ्च वातकफयोः करोति शिशिरं पुनः। ह्लादनं जीवनं स्तम्भं प्रसादं रक्तपित्तयोः ॥२४०॥ वीर्य सम्बन्धी गुणों के सम्बन्ध में अन्य वचन यह भी है कि—उष्णवीर्य वाला पदार्थ भ्रम, प्यास, ग्लानि, स्वेद और दाह को उत्पन्न एवं शीघ्र पाक करता है तथा वात और कफ का शमन करता है और शीतवीर्य वाला पदार्थ आह्लादजनक, जीवन के लिये हितकारी, स्तब्धताकारक तथा रक्तपित्त को निर्मल करने वाला होता है ॥२४०॥ अथ विपाकमाह— जाठरेणाग्निना योगाद्यदुदेति रसान्तरम्। रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥२४१॥ विपाक के लक्षण—मधुरादि छः रसयुक्त पदार्थों में जठराग्नि के द्वारा परिपाक होने पर जो दूसरे प्रकार के रसों का उदय होता है वही 'विपाक' नाम से कहा जाता है ॥२४१॥ अथ मधुरादिरसयुक्तपदार्थानां विपाकरसानाह— मिष्टः पटुश्च मधुरमम्लोऽम्लं पच्यते रसः। कटुतिक्तकषायाणां पाकःस्यात्प्रायशः कटुः ॥१४२॥ मधुरादि रसों का विपाक सम्बन्धी रस—मधुर और लवण रस युक्त पदार्थ का विपाक मधुर होता है और अम्ल रस का विपाक अम्ल होता है एवं कटु, तिक्त तथा कषाय रस का विपाक प्रायः करके कटु होता है ॥२४२॥ ❖ तथा च वाग्भटः— त्रिधा रसानां पाकः स्यात्स्वाद्वम्लकटुकात्मकः। प्रायः पदेन व्रीहिः स्यात्स्वादुरम्लो विपाकतः ।। शिवा कषाया मधुरा पाके, शुण्ठी कटुका मधुरपाकेत्यादि ।।२४२।। विपाक के सम्बन्ध में 'वाग्भट' का मत—मधुर, अम्ल तथा कटु रस भेद से विपाक तीन प्रकार का होता है और 'कटु, तिक्त तथा कषाय रस का विपाक प्रायः करके कटु होता है' इस जगह जो 'प्रायः' पद है उससे यह समझना चाहिये कि बहुत से स्थल पर उक्त नियम का व्यभिचार (नियमानुसार न होना) भी देखा जाता है। जैसे—व्रीहि (धान्य) मधुर रस युक्त है तथापि इसका नियमानुसार मधुर न होकर अम्ल ही विपाक होता है और हरड़ कषाय रस युक्त है, किन्तु विपाक मधुर होता है एवं सोंठ कटुरस युक्त हैं किन्तु विपाक मधुर होता है इत्यादि बातें और भी यहाँ समझना चाहिये ॥२४२॥ अथ विपाकानां गुणानाह— श्लेष्मकृन्मधुरः पाको वातपित्तहरो मतः। अम्लस्तु कुरुते पित्तं वातश्लेष्मगदापहः ॥२४३॥ कटुः करोति पवनं कफं पित्तञ्च नाशयेत्। विशेष एवं रसतो विपाकानां निदर्शितः ॥२४४॥ मधुरादि विपाकों के गुण—मधुरविपाक—कफकारक और वात पित्त को हरण करने वाला होता है। अम्लविपाक— पित्तकारक और वात तथा कफ सम्बन्धी रोगों का नाशक होता है और कटुविपाक—वातकारक एवं कफ तथा पित्त का नाशक होता है। यही विपाकसम्बन्धी रसों की विशेषता है ॥२४३-२४४॥ १. 'तुल्यमपी'ति पाठान्तरं चिन्त्यम्।
२०४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ प्रभावमाह- रसादिसाम्ये यत्कर्म विशिष्टं तत्प्रभावजम् । दन्ती रसाद्यैस्तुल्यापि१ चित्रकस्य विरेचनी ।। २४५ ।। मधूकस्य च मृद्वीका घृतं क्षीरस्य दीपनम् । प्रभावस्तु यथा धात्री लकुचस्य रसादिभिः ।। २४६ ।। समाऽपि कुरुते दोषत्रितयस्य विनाशनम् ।। २४७ ।। प्रभाव के लक्षण—रसादि से तुल्यता होने पर भी किसी-किसी पदार्थों में जो कर्मों की विशेषता अर्थात् कर्मों की भिन्नता दिखाई पड़ती है वह प्रभावज अर्थात् उन्हीं पदार्थों के प्रभाव से उत्पन्न समझना चाहिये । जैसे—चीता के रसादि समान रसवाला होने पर भी दन्ती विरेचन (दस्तावर) होती है किन्तु चीता नहीं होता है । तथा महुए के फूल के साथ मुनक्के के एवं दूध के साथ घृत के रसादि की तुल्यता होने पर भी मुनक्का और घृत अग्नि का दीपक होता है किन्तु महुआ का फूल तथा दूध दीपक नहीं होता । लकुच अर्थात् बड़हर के रसादि के साथ आँवले की तुल्यता होने पर भी वह त्रिदोष का नाशक होता है किन्तु बड़हर नहीं होता तथा इस प्रकार की जो कर्मों में भिन्नता होती है, वह द्रव्यों के प्रभाववश से ही होती है, ऐसा समझना चाहिये ।। २४५-२४७ ।। क्वचित्तकेवलं द्रव्यं कर्म कुर्यात्प्रभावतः । ज्वरं हन्ति शिरोबद्धा सहदेवीजटा यथा ।। २४८ ।। किसी-किसी स्थल में द्रव्य स्वयं ही कर्म करता है तथा किसी-किसी स्थल में प्रभाव में प्रभाव द्वारा कर्म करता है । जैसे—सहदेवी की जड़, शिर में बाँधने से ज्वर को दूर करती है ।। २४८ ।। तथा नानौषधियोगेषु फलं प्रति स्वभाव एव आश्रवणीयो न तु यत्र रसादिरूपहेतुविचारः कर्त्तव्यः । यत आह सुश्रुतः- अमीमांस्यान्यचिन्त्यानि१ प्रसिद्धानि स्वभावतः । आगमेनोपयोज्यानि भेषजानि विचक्षणैः ।। प्रत्यक्षलक्षणफलाः प्रसिद्धाश्च स्वभावतः । नौषधीहेतुभिर्विद्वानपरीक्षेत कदाचन ।। २४८ ।। जहाँ अनेक प्रकार की ओषधियों का योग होने से जो फल होता है, वहाँ पर उस फल के होने में उन ओषधियों के योग के स्वभाव को ही हेतु समझना चाहिये न कि उन ओषधियों के रसादि को हेतु समझना चाहिये । क्योंकि 'सुश्रुत' में भी कहा है कि—जितने सम्पूर्ण गुण ओषधियों के प्रसिद्ध हैं, वे सब स्वभावतः हैं अतः उनके प्रयोग के विषय में कोई मीमांसा (विचार) तथा चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है । विद्वान् को चाहिये कि जैसा शास्त्र में ओषधियों के योगों का उपदेश किया गया है उसी के अनुसार वे प्रयोग करें और उन्हें यह भी करना चाहिये कि ओषधियाँ स्वभावतः प्रसिद्ध होती हैं क्योंकि उनके लक्षण तथा फल प्रत्यक्ष हैं । अत एव ओषधियों के योगों में उनके रसादिकों को हेतु मान कर उनकी कभी वे परीक्षा न करें ।। २४८ ।। विरुद्धगुणसंयोगे भूयसाऽल्पं हि जीयते ।। रसं विपाकस्तौ वीर्यं प्रभावस्तान्यपोहति ।। २४९ ।। इति मिश्रप्रकरणे मिश्रवर्गः प्रथमः समाप्तः ।। १ ।। परस्पर विरुद्ध गुण युक्त ओषधियों का संयोग होने पर जो ओषधि प्रबल होती है, वह दुर्बल को दबा लेती है । जैसे—विपाक-रस को दबा लेता है और वीर्य-रस तथा विपाक इन दोनों को दबा लेता है एवं प्रभाव-रस विपाक तथा वीर्य इन तीनों को ही दबा लेता है ।। २४९ ।। इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी' भाषाटीकायां षष्ठममिश्रप्रकरणम् समाप्तम् ।। ६ ।। १. 'अमी सामान्ये'ति पाठान्तरं प्रामादिकम् ।
भावप्रकाशनिघण्टुः
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अथ हरीतक्यादिवर्गः रसगुणवीर्यविपाकप्रभावाणां स्वरूपाण्यभिधाय कुत्र द्रव्ये के रसगुणवीर्यविपाकप्रभावाः सन्तीति बोधयितुं द्रव्यगतान् रसगुणवीर्यविपाकप्रभावानाह। तत्र प्रथमं हरीतक्या उत्पत्तिनामलक्षणगुणानाह दक्षं प्रजापतिं स्वस्थमश्विनौ वाक्यमूचतुः । कुतो हरीतकी जाता तस्यास्तु कति जातयः ।।१।। रसाः कति समाख्याताः कति चोपरसाः स्मृताः । नामानि कति चोक्तानि किं वा तासां च लक्षणम् ।।२।। के च वर्णा गुणाः के च का च कुत्र प्रयुज्यते । केन द्रव्येण संयुक्ता कांश्च रोगान्व्यपोहति ।।३।। प्रश्नमेतद्यथा पृष्टं भगवन्वक्तुमर्हसि । अश्विनीर्वचनं श्रुत्वा दक्षो वचनमब्रवीत् ।।४।। पपात बिन्दुर्मेदिन्यां शक्रस्य पिबतोऽमृतम् । ततो दिव्यात्समुत्पन्ना सप्तजातिर्हरीतकी ।।५।। रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव के स्वरूपों को कहकर किस द्रव्य में कौन रस, कौन गुण तथा कैसा वीर्य, विपाक एवं प्रभाव रहता है, इन सबको बताने के लिये प्रत्येक द्रव्यगत रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव का वर्णन करते हैं। उसमें प्रथम हरीतकी (हरड़) की उत्पत्ति, नाम, लक्षण तथा गुणों को कहते हैं— एक समय स्थिर चित्त से बैठे हुए भगवान् दक्ष प्रजापति से दोनों अश्विनीकुमारों ने यह बात कही कि-हे भगवान् ! हरीतकी (हरड़) कहाँ से उत्पन्न हुई ? और उसकी कितनी जातियाँ हैं ? तथा उसमें प्रधान रूप से कौन-कौन रस और कौन-कौन उपरस कहे हुये हैं ? एवं उसके कितने नाम कहे हुये हैं ? और उन सबों के क्या-क्या लक्षण हैं ? और उनका वर्ण कैसा है ? उनमें गुण कौन-कौन हैं ? और किस जाति के हरड़ का किस कार्य में प्रयोग किया जाता है ? तथा किन द्रव्यों के साथ संयोग होने पर किन रोगों को दूर करती हैं ? इन उपर्युक्त प्रश्नों का जैसा मैने पूछा है वैसा ही आपको उत्तर देना उचित है । इस प्रकार से दोनों अश्विनीकुमारों के वचनों को सुन कर दक्षप्रजापति ने यह कहा कि-एक समय अमृत पान करते हुए भगवान् इन्द्र के मुख से दैवात् एक बूँद अमृत पृथ्वी पर गिर पड़ा तब उसी दिव्य अमृत बिन्दु से सात जाति वाली हरीतकी उत्पन्न हुई । [१-५] अथ हरीतकीनामान्या हरीतक्यभया पथ्या कायस्था पूतनाऽमृता । हैमवत्यव्यथा चापि चेतकी श्रेयसी शिवा ।।६।। वयस्था विजया चापि जीवन्ती रोहिणीति च ।।७।। हरीतकी के नाम—हरीतकी, अभया, पथ्या, कायस्था, पूतना, अमृता, हैमवती, अव्यथा, चेतकी, श्रेयसी, शिवा, वयस्था, विजया, जीवन्ती तथा रोहिणी ये सब 'हरीतकी' के नाम हैं। [६-७] अथ हरीतक्याः सप्तभेदानाह विजया रोहिणी चैव पूतना चामृताऽभया । जीवन्ती चेतकी चेति पथ्यायाः १सप्तजातयः ।।८।। हरीतकी के भेद—(१) विजया, (२) रोहिणी, (३) पूतना, (४) अमृता, (५) अभया, (६) जीवन्ती, (७) चेतकी ये हरीतकी की सात जातियाँ (भेद) हैं। [८] १. 'विज्ञेया' इति पा.।
२०८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ सप्तजातेर्हरीतक्या उत्पत्तिस्थानान्याह [१विन्ध्याद्रौ विजया हिमाचलभवा स्याच्चेतकी पूतना सिन्धौ स्यादथ रोहिणी निगदिता जाता प्रतिष्ठानके। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । चम्पायाममृताऽभया च जनिता देशे सुराष्ट्राह्वये जीवन्तीति हरीतकी निगदिता सप्त प्रभेदा बुधैः ।।१।।] हरीतकी के उत्पत्तिस्थान—विन्ध्य पर्वत पर विजया, हिमालय पर चेतकी, सिन्धु देश में पूतना, प्रत्येक स्थानों में रोहिणी, चम्पा देश में अमृता तथा अभया एवं सोरठ देश में जीवन्ती जाति की हरीतकी के उत्पन्न होने से उक्त प्रकार के सात भेद विद्वानों ने कहे हैं ।।१।। अथ तेषां पृथगलक्षणान्याह अलाबुवृत्ता विजया वृत्ता सा रोहिणी स्मृता। पूतनाऽस्थिमती सूक्ष्मा कथिता मांसलाऽमृता ।।९।। पञ्चरेखाऽभया प्रोक्ता जीवन्ती स्वर्णवर्णिनी। त्रिरेखा चेतकी ज्ञेया सप्तानामियमाकृतिः ।।१०।। सात प्रकार की हरीतकी के पृथक्-पृथक् लक्षण—'विजया' हरीतकी लौकी की भाँति गोल, 'रोहिणी' का आकार गोल, 'पूतना' की गुठली बड़ी तथा आकार सूक्ष्म, 'अमृता' हरीतकी मांसल (गूदेदार), 'अभया' पाँच रेखाओं से युक्त, 'जीवन्ती' सोने के समान रङ्ग वाली और 'केतकी' तीन रेखाओं से युक्त होती है। इस प्रकार सातों प्रकार की हरीतकी के ये आकार हैं। [९-१०] अथ हरीतकीप्रयोगानाह विजया सर्वरोगेषु रोहिणी व्रणरोहिणी। प्रलेपे पूतना योज्या शोधनार्थेऽमृता हिता ।।११।। अक्षिरोगेऽभया शस्ता जीवन्ती सर्वरोगहृत् । चूर्णार्थे चेतकी शस्ता यथायुक्तं प्रयोजयेत् ।।१२।। चेतकी द्विविधा प्रोक्ता श्वेता कृष्णा च वर्णतः । षडङ्गुलायता शुक्ला कृष्णा त्वेकाङ्गुला स्मृताः ।।१३।। काचिदास्वादमात्रेण काचिद्गन्धेन भेदयेत्। काचित्स्पर्शेन दृष्ट्याऽन्या चतुर्द्धा भेदयेच्छिवा ।।१४।। चेतकीपादपच्छायामुपसर्पन्ति ये नराः। भिद्यन्ते तत्क्षणादेव पशुपक्षिमृगादयः ।।१५।। चेतकी तु धृता हस्ते यावत्तिष्ठति देहिनः । तावद्भिद्येत वेगाैस्तु प्रभावात्रात्र संशयः ।।१६।। नृपाणां सुकुमाराणां कृशानां भेषजद्विषाम्। चेतकी परमा शस्ता हिता सुखविरेचनी ।।१७।। सप्तानामपि जातीनां प्रधाना विजया स्मृता। सुखप्रयोगा सुलभा सर्वरोगेषु शस्यते ।।१८।। हरीतकी के प्रयोग—'विजया' हरीतकी का प्रयोग सभी रोगों में होता है। 'रोहिणी' व्रण पूरण करनेवाली होती है। 'पूतना' का प्रलेप के लिये प्रयोग करना चाहिये। 'अमृता' शोधन कर्म के लिये हितकर है। आँख के रोगों में 'अभया' उत्तम होती है और 'जीवन्ती' सम्पूर्ण रोगों का हरण करने वाली होती है। एवं चूर्ण के लिये 'चेतकी' उत्तम होती है। अतः जिस जाति की हरीतकी का जहाँ जिन रोगों में प्रयोग करना कहा हुआ है, उसका वहाँ पर प्रयोग करना चाहिये। 'चेतकी' श्वेत और कृष्ण दो प्रकार की होती है। उनमें शुक्ल वर्ण वाली छः अङ्गुल की तथा कृष्ण वर्ण वाली एक अङ्गुल की लम्बी होती है। इनमें कोई हरीतकी खाने मात्र से, कोई सूँघने से, कोई स्पर्श करने से तथा कोई देखने मात्र से ही मल का भेदन करती हैं अर्थात् दस्त साफ होता है। इस प्रकार हरीतकी चार प्रकार से दस्त कराती है। जो मनुष्य चेतकी जाति की हरड़ के पेड़ की छाया के नीचे पहुँच जाते हैं, उनको उसी समय दस्त आने लगता है। यहाँ तक कि पशु,
हरीतक्यादिवर्गः २०९ पक्षी, मृगादि की भी यही दशा हो जाती है और 'चेतकी' हरड़ को जब तक प्राणी अपने हाथ में धारण किये रहता है, तब तक उसके प्रभाव से उसे वेग से दस्त होता रहता है, इसमें सन्देह नहीं है। जो राजा हैं तथा सुकुमार या कृश हैं किंवा विरेचक औषध खाने से भागनेवाले हैं, उनके लिये 'चेतकी' हरड़ परम हितकारी एवं उत्तम होती है। क्योंकि वह सुखपूर्वक दस्त लाती है। पूर्वोक्त सात जातियों में 'विजया' जाति की जो हरीतकी होती है, वही औरों की अपेक्षा प्रधान है क्योंकि सुलभ होने से उसका प्रयोग सुखपूर्वक होता है तथा वह सभी रोगों में देने के लिये भी उत्तम होती है। [११-१८] अथ हरीतकीगुणानाह हरीतकी पञ्चरसाऽलवणा तुवरा परम्। रूक्षोष्णा दीपनी मेध्या स्वादुपाका रसायनी ।।१९।। चक्षुष्या लघुरायुष्या बृंहणी चानुलोमिनी। श्वासकासप्रमेहार्शः कुष्ठशोथोदरक्रिमीन् ।।२०।। वैस्वर्यग्रहणीरोगविबन्धविषमज्वरान् । गुल्माध्मानतृषार्छर्दिहिक्काकण्डूहृदामयान् ।।२१।। कामलां शूलमानाहं प्लीहानञ्च यकृत्तथा। अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रञ्च मूत्राघातञ्च नाशयेत् ।।२२।। हरीतकी के गुण-हरड़ में लवण रस से भिन्न पाँच (मधुर, अम्ल, कटु, कषाय, तिक्त) रस रहते हैं किन्तु औरों की अपेक्षा कषाय रस ही अधिक रहता है। हरीतकी रूक्ष, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, मेधा (धारणाशक्ति) के लिये हितकारी, मधुर विपाकवाली, रसायन (वृद्धावस्था तथा व्याधियों को दूर करनेवाली), नेत्रों के लिये हितकर, पचने में लघु (जल्दी पचने वाली), आयुवर्धक, बृंहण (शरीर में मांसादि की वृद्धि करने वाली) और अनुलोमन (मलादि को नीचे की ओर प्रेरित करने वाली) होती है। इसके सेवन से श्वास, कास, प्रमेह, बवासीर, कुष्ठ, शोथ, पेट के कृमि (अथवा उदर सम्बन्धी रोग और कृमि), स्वरभेद (आवाज की खराबी), ग्रहणी सम्बन्धी रोग तथा विबन्ध (मलमूत्रादि की विबद्धता अर्थात् रुक जाना), विषमज्वर, गुल्म, उदराध्मान, तृषा, वमन, हिचकी, खुजली, हृद्रोग, कामला, शूल, आनाह, प्लीहा, यकृत्, अश्मरी (पथरी), मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्राघात ये सब रोग दूर होते हैं। [१९-२२] अथ हरीतक्याः प्रभावनिबन्धनं दोषहन्तृत्वं न तु रसनिबन्धनमित्याह स्वादुतिक्तकषायत्वात्पित्तहृत्कफहृत्त सा। कटुतिक्तकषायत्वादम्लत्वाद्वातहृच्छिवा ।।२३।। पित्तकृत्कटुकाम्लत्वाद्वातकृन्न कथं शिवा ।।२४।। प्रभावाद्वोषहन्तृत्वं सिद्धं यत्तत्प्रकाश्यते। हेतुभिः शिष्यबोधार्थं नापूर्वं क्रियतेऽधुना ।।२५।। कर्मान्यत्वं गुणैः साम्यं दृष्टमाश्रयभेदतः। यतस्ततो नेति चिन्त्यं धात्रीलकुचयोर्यथा ।।२६।। हरीतकी का प्रभाव-हरड़ में मधुर, तिक्त और कषाय रस रहता है, अतएव यह पित्तनाशक और कटु तिक्त तथा कषाय रस होने से कफनाशक है तथा अम्ल रस होने से वायु का भी शमन करती है। अब यहाँ पर यह प्रश्न होता है कि जब हरड़ में कटु तथा अम्ल रस है, तब क्यों नहीं यह पित्त तथा वातकारक होती है ? इसका उत्तर यह है कि- यहाँ पर जो हरड़ तीनों दोषों को दूर करती है वह इसके प्रभाव से ही सिद्ध है किन्तु फिर भी जो ऊपर हेतुओं का निर्देश करते हुये 'दोषों का नाश करना' बताया गया वह शिष्यों को समझाने के लिये, क्योंकि यह (दोषों का नाश करना) कोई अपूर्व बात नहीं कही गई, बल्कि जो कही गई वह उसके प्रभाव से पहले से ही सिद्ध थी। तात्पर्य यह है कि वस्तुतः हरड़ जो दोषों का नाश करती है वह अपने प्रभाव से ही करती है। फिर जो पूर्व में यह कहा गया है कि- 'मधुरादि रस होने से पित्तनाशक, कटु तिक्तादि रस होने से कफनाशक एवं अम्ल रस होने से वातनाशक', वह केवल शिष्यों को समझाने के लिये अर्थात् 'इन-इन रसों को दूर करने की शक्ति रहती है', शिष्यों को यही बात समझाने के लिये हेतुओं का निर्देश करते हुये हरड़ की त्रिदोषनाशकता बताई गई और जब कि-समान गुणों से युक्त होते हुये भी आश्रय भेद से द्रव्यों के कर्म में भिन्नता देखी जाती है तब हरड़ में स्थित जो कटु तथा अम्ल रस हैं, वह क्यों नहीं पित्त तथा वात २७ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
२१० भावप्रकाशनिघण्टुः को उत्पन्न करता है। इस विषय में हेतु विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है अर्थात् विचार करना व्यर्थ है क्योंकि वह सब बातें प्रभाव से होती हैं न कि रसादि हेतुओं से, अम्ल और कटु रस पित्त वात का जनक होने पर भी आश्रय विशेष में कर्म विशेष करने वाले होते हैं जैसे कि आँवला तथा बड़हर ये दोनों यद्यपि रसादिकों में तुल्य हैं किन्तु फल खाने (गुणों) में तुल्य नहीं हैं। इसी भाँति हरड़ की त्रिदोषनाशकता के विषय में भी समझना चाहिये। [२३-२६] अथ हरीतक्यां तद्रसादीनां स्थानान्याह पथ्याया मज्जनि स्वादुः स्नात्वामम्लो व्यवस्थितः। वृन्ते तिक्तस्त्वचि कटूरस्थिस्थस्तुवरो रसः ।।२७।। हरड़ में रसों के रहने के स्थान-हरड़ की मींगी में मधुर रस, रेशों में आम्लरस, वृन्त (ठेपी) में तिक्तरस, छिल्के में कटु रस और गुठली में कषाय रस रहता है। [२७] अथोत्तमहरीतक्या लक्षणान्याह नवा स्निग्धा घना वृत्तागुर्वी क्षिप्ता च याऽम्भसि। निमज्जेत्सा प्रशस्ता चकथिताऽतिगुणप्रदा ।।२८।। नवादिगुणयुक्तत्वं तथैवात्र द्विकर्षता। हरीतक्याः फले यत्र द्वयं तच्छ्रेष्ठमुच्यते ।।२९।। उत्तम हरड़ के लक्षण-जो हरड़ नवीन, स्निग्ध, घन (ठोस), गोल और गुरु (वजनदार) हो तथा जल में डालने पर डूब जाय वह उत्तम और अत्यन्त गुणकारी मानी जाती है। जिस हरीतकी के फल में पूर्वोक्त नूतनता आदि सम्पूर्ण गुण हों एवं तौल भी उसका दो कर्ष अर्थात् दो बहेड़े के बराबर हो वह उत्तम कही जाती है। [२८-२९] अथ हरीतक्याः प्रयोगभेदेन फलभेदानाह चर्व्विता वर्द्धयत्यग्निं पेषिता मलशोधिनी। स्विन्ना संग्राहिणी पथ्या भृष्टा प्रोक्ता त्रिदोषनुत् ।।३०।। उन्मीलिनी बुद्धिबलेन्द्रियाणां निर्मूलिनी पित्तकफानिलानाम्। विस्रंसिनी मूत्रशकृन्मलानां हरीतकी स्यात् सह भोजनेन ।।३१।। अन्नपानकृतान्दोषान्वात्पित्तकफोद्भवान् । हरीतकी हरत्याशु भुक्तस्योपरि योजिता ।।३२।। लवणेन कफं हन्ति पित्तं हन्ति सशर्करा। घृतेन वातजान् रोगान्सर्वरोगान्गुडान्विता ।।३३।। हरीतकी के प्रयोग भेद से गुण भेद-हरीतकी यदि चबा कर खाई जाय तो जठराग्नि की वृद्धि करती है, शिला पर पीस कर खाई जाय तो मल शोधन करती है, उबाल कर खाई जाय तो मल रोकती है, भून कर खाई जाय तो त्रिदोष को दूर करती है और भोजन के साथ सेवन करने से बुद्धि, बल तथा इन्द्रियों को विकसित करने वाली, पित्त, कफ तथा वायु को नष्ट करने वाली एवं मूत्र, विष्ठा तथा मल पदार्थों का विरेचन करने वाली होती है। यदि वही हरतकी भोजन कर चुकने के बाद ऊपर से खाई जाय तो अन्न तथा पान सम्बन्धी दोषों का एवं वात पित्त तथा कफ से उत्पन्न होने वाले विकारों को शीघ्र हरने वाली होती है। सेंधा नमक के साथ खाने से कफ, शक्कर के साथ खाने से पित्त, घृत के साथ खाने से वात सम्बन्धी रोग और गुड़ के साथ खाने से समस्त व्याधियों को दूर करने वाली होती है। [३०-३३] अथ रसायनगुणार्थिनां कृते हरीतकीप्रयोगविधिमाह सिंधूत्थशर्कराशुण्ठीकणामधुगुडैः क्रमात्। वर्षादिष्वभया प्राश्या रसायनगुणैषिणा ।।३४।। हरीतकी का रासायनिक प्रयोग-जो रसायन के गुणों को प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं उन्हें चाहिए कि वे वर्षा आदि छः ऋतुओं में क्रम से सेंधानमक, शक्कर, सोंठ, पीपल, मधु और गुड़ के साथ हरीतकी का सेवन करें, अर्थात् वर्षा ऋतु में सेंधानमक के साथ, शरद ऋतु में शक्कर के साथ, हेमन्त ऋतु में सोंठ के साथ, शिशिर ऋतु में पीपल
हरीतक्यादिवर्गः २११ के साथ, वसन्त ऋतु में मधु के साथ एवं ग्रीष्म ऋतु में गुड़ के साथ हरीतकी सेवन करने से रसायन के फल की प्राप्ति होती है । [३४]
अथ हरीतकी भक्षणानर्हजनानाह
अध्वातिखिन्नो बलवर्जितश्च रूक्षः कृशो लङ्घनकर्शितश्च । पित्ताधिको गर्भवती च नारी विमुक्तरक्तस्त्वभयां न खादेत् ।। ३५ ।। हरीतकी सेवन करने के अयोग्य व्यक्ति—रास्ता चलने से थके हुए, बल रहित, रूक्ष, कृश, उपवास किए अधिक पित्तवाले व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री एवं जिसे रक्तमोक्षण कराया गया हो उन सबों को हरीतकी का सेवन नहीं करना चाहिये । [३५] १. हरीतकी हिं०—हर, हरड, हरें, हड़, हर्ड, हरैं, हरर । बं०—हरीतकी, बालहरीतकी, हरीतकी गाछ नराँ । म०—हरडा, हिरडा, हरडे, हर्तकी, हरडी, बालहरडी । गु०—हरडे, हिमज । ते०—करकचेट्टु, करकाप्प, करक्वाय । ता०— कडुक्याय, करकैया, कडुकेमरम । क०—अणिलेय, अणिले, अनिलैकाय । उड़ि०—कर्रथा, हरिडा करेड़ा । द०—हलरा, कलरा । मा०—हरडे । पं०—हड, हरड । आसा०—हिलिखा, सिल्लिका । लिपचा०—सिलिम । सिकम०—हन, सिलिमकंग, सिलिमकुंग । मैसूर—अलले । कच्छार—होरतकी । फा०—हलेलज अस्फुर, हलैलै जर्द, हलैलाह, हलेलह जर्द । अ०—अहलीलज़, एहलीलज़-कावली, अहलीलज़ अस्फुर, जहलीलज़, अस्वद, हलेलज़ अस्फुर । अं०—Myrobalans (माइरोबेलन्स), Chebulic Myrobalans (चेब्यूलिक माइरोबेलन्स) । ले०—(१) Terminalia chebula Retz (टर्मिनेलिया चेब्युला) । (२) Terminalia citrina Roxb (टर्मिनेलिया सिट्रिना) । Fam. Combretaceae (कॉम्ब्रिटेंसी) । हरीतकी—अत्यन्त सुगमता से सर्वत्र प्राप्त होने वाली किन्तु विविध गुण सम्पन्न औषधि का फल है । इसका वृक्ष हमारे देश के प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाया जाता है । यह उत्तर भारत में बहुलता से उत्पन्न होती है । कुमाऊँ से बंगाल तक, आसाम, ब्रह्मा तथा दक्षिण में मद्रास प्रान्त, कोयम्बटूर, कनारा, पश्चिमघाट के पूर्वीय प्रान्तों में, गञ्जाम, गोदावरी की तलहटी, सतपुरा पहाड़, गुजरात, बम्बई प्रान्त के घाटों के पास ऊँचे जंगलों में, कोंकण, मलावार, विन्ध्याचल पहाड़, हिमालय पहाड़ एवं काबुल की ओर इसके वृक्ष अधिकता से देखने में आते हैं । इसका वाटिकाओं में भी रोपण करते हैं । प्रायः इसका वृक्ष मध्यमाकार का होता है किन्तु कहीं-कहीं बड़े-बड़े वृक्ष भी देखने में आते हैं । नर्मदा के दक्षिण के वृक्ष १०० फीट तक ऊँचे होते हैं किन्तु उत्तर भारत में उत्पन्न हुए वृक्ष इतने बड़े नहीं होते । हरीतकी के वृक्ष वट, पीपल आदि वृक्षों की तरह दीर्घायु नहीं होते हैं, बल्कि कालान्तर में सूख कर गिर जाया करते हैं । इसकी छाल कालापन युक्त भूरे रंग की चौथाई इञ्च तक मोटी होती है । लकड़ी-पक्की और बहुत मजबूत होती है । इमारत के काम के लिये अच्छी समझी जाती है । यह किञ्चित् हरापान या पीलापन युक्त भूरे रंग के साथ खाकी रंग की होती है । टहनियों पर पत्ते सघन नहीं रहते, बल्कि न्यूनाधिक विपरीत रहते हैं । पत्ते-अड़ूसे के पत्तों से कुछ चौड़े महुवे के पत्तों के समान, ४ से आठ इञ्च तक लम्बे, किञ्चित् अंडाकार, नोकदार, सफेदी युक्त हरे और चमकदार होते हैं तथा स्पर्श में खुरदरे जान पड़ते हैं । वृन्त-एक इंच से कम एवं उसके अग्र भाग के ऊपरी पृष्ठ पर दो या अधिक सूक्ष्म ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं । वसन्त ऋतु में पुराने पत्ते गिर कर नवीन पत्ते निकल आते हैं । फूल-बारीक आम की मंजरी के समान दिखाई देते हैं । और वे देखने में सफेदी मायल या कुछ पीले रंग के होते हैं तथा उनमें दुर्गन्ध आती है । फल-किञ्चित् लम्बाई युक्त गोलाकार होते हैं, सूखते सूखते छिलके सिकुड़ जाते हैं और पाँच कोणाकार या पाँच रेखा युक्त दिखाई देने लगते हैं । शकल सूरत, आकार और डील-डौल एवं छोटे-बड़े, लम्बे, गोल इत्यादि भेदों से फल कई प्रकार के देखने में आते हैं ।
२१२ भावप्रकाशनिघण्टुः पूर्व बंगाल, आसाम और ब्रह्मा में एक अन्य जाति पाई जाती है जिसे लेटिन में Terminalia citrina Roxb. (टर्मिनेलिया सिट्रिना) कहते हैं । इसका वृक्ष ८० फीट तक ऊँचा होता है । इसके फल दो इंच तक लम्बे होते हैं । हरीतकी के फल पूर्ण पकने तक वृक्ष में बहुत कम ठहरते हैं । प्रायः कच्ची अवस्था में ही गिर जाया करते हैं । पका फल उत्तम समझा जाता है । उत्तम फल वह है जो नया हो और चिकना, गोल, भारी, तौल में कम-से-कम तोले से भी अधिक हो तथा पानी में डालने से डूब जाय । अपक्व अवस्था के छोटे, काले, द्राक्ष के समान फल मिलते हैं । यह बड़े हरें की अपेक्षा बहुत छोटे होते हैं । इन्हें हिन्दी में जंगी हरड़ एवं मराठी में बालहिरडा कहा जाता है । इनका स्वाद अधिक कसैला तथा कड़ुआ होता है । किसी किसी वाटिका में हरीतकी का वृक्ष नमूने की तरह देखने में आता है । वर्षा ऋतु में हरीतकी के छिलके को सुगमता से दूर कर गुठलियों को भूमि पर फेंक देने से ही कोई कोई बीज अङ्कुरित होकर पौधे के रूप में बढ़ते हैं । पतझड़ में पुराने पत्ते गिर जाने से चैत के महीने में प्रायः इसके पौधे सूखे से दिखाई देते हैं । उस समय से ज्येष्ठ तक पौधों को पानी से कभी-कभी सींचना होता है । बरसात का पानी पड़ने पर नवीन पत्ते निकल आते हैं और पौधे हरे-भरे हो जाते हैं । उसी समय उनको उठाकर स्थायी रूप से इष्ट जगह पर रोपण करना चाहिये । बरसात का पानी जमा होकर जहाँ पर तर मिट्टी जमा होती है उस जगह पर रोपण किया हुआ पौधा सतेज होता है । साधारण वृक्षों की तरह परिचर्या करने से ही इसके वृक्ष तैयार हो जाते हैं । आयुर्वेद में हरीतकी की जो सात जातियाँ कही गई हैं उनके आकार तथा रङ्ग-रूप और गुण भी भिन्न-भिन्न होते हैं । आयुर्वेद में प्रत्येक जाति की हरड़ के गुणों का वर्णन बहुत ही विचारपूर्वक किया गया है, परन्तु आजकल के पाश्चात्य विद्वान् लोग केवल दो ही प्रकार की हरीतकी को ग्राह्य मानते हैं । शेष जाति की हरीतकियों में यद्यपि प्रकार भेद मानते हैं, परन्तु गुणों में कुछ भेद नहीं मानते । इस संबंध में विशेष अनुसन्धान की आवश्यकता है । रासायनिक संगठन-पक्व हरीतकी में करीब ३० प्रतिशत कसैला द्रव्य होता है जो चेब्यूलीनिक एसिड के कारण है । इसके अतिरिक्त टैनिक एसिड २०-४० प्रतिशत, गैलिक एसिड, राल आदि द्रव्य हैं । इसका विरेचक द्रव्य एन्थ्राक्विनोन के समान है । बालहरड़ में एक हरे रंग की तैलीय राल मिलती है जिसे कभी-कभी माइरोबैलानिन् कहा जाता है । गुण और प्रयोग-हरीतकी श्रेष्ठ मृदु विरेचक द्रव्य है । इससे किसी प्रकार की हानि नहीं होती । शरीर की सभी क्रियाएँ इसके सेवन से सुधरती हैं । इसका उपयोग जीर्ण ज्वर, अतिसार, रक्तातिसार, अर्श, नेत्र रोग, अजीर्ण, प्रमेह, पाण्डु आदि में लाभकर होता है । जीर्ण कास, अर्श आदि में अगस्त्य हरीतकी एवं व्याघ्री हरीतकी आदि योगों के रूप में भी इसका व्यवहार किया जाता है । हरीतकी अच्छा व्रण रोपक है । मुखव्रण, पुराने घावों तथा अर्श में इसका लेप लाभप्रद है । दंत मञ्जन के लिये इसका महीन चूर्ण उपयोगी है । बाल हरीतकी-यह मृदु विरेचक है । जीर्ण विबन्ध एवं अर्श में इसका अच्छा उपयोग होता है । मात्रा-चूर्ण दो से चार माशा । अथ विभीतकस्य नामानि गुणाँश्चाह विभीतकस्त्रिलिङ्गः स्यादक्षः १ कर्षलस्तु सः । कलिद्रुमो भूतवासस्तथा कलियुगालयः ।।३५।। विभीतकं स्वादुपाकं कषायं कफपित्तनुत् । उष्णवीर्यं हिमस्पर्शं भेदनं कासनाशनम् ।।३६।। १. ‘स्यान्नाक्षः’ इति पाठा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammpmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २१३ रूक्षं नेत्रहितं केश्यं कृमिवैस्वर्यनाशनम् । बिभीतमज्जातृट्छर्दिकफवातहरी लघुः ।। कषायो मदकृच्चाथ धात्रीमज्जाऽपि तद्गुणः ।। ३७ ।। बहेड़े के नाम तथा गुण-विभीतक, (यह शब्द तीनों लिङ्गों में होता है), अक्ष, कर्षफल, कलिद्रुम, भूतवास और कलियुगालय ये सब संस्कृत नाम बहेड़े के हैं। बहेड़ा-मधुर विपाकवाला, कषाय रसयुक्त, कफ व पित्त का नाशक, उष्णवीर्यवाला, शीतस्पर्श वाला, मल का भेदन करने वाला, कास का नाशक, रूक्ष, नेत्र तथा बालों के लिये हितकर, कृमि तथा स्वरभेद को दूर करने वाला होता है। बहेड़े की मींगी-प्यास, वमन और कफ एवं वायु का नाश करने वाली, लघुपाकी, कषाय रस युक्त और मदकारक होती है। इसी भाँति आँवले की मींगी के भी ये ही सब गुण हैं। [३५-३७] २. बहेड़ा हिं०-बहेड़ा, फिनास, भैरा, बहेरा। बं०-बयड़ा, बोहेरा, बेहरी, बहेड़ा। म०-बेहड़ा, बेहाड़ा, धाटींग, बहेला, बहड़ा। गु०-बेहेड़ा, बेड़ा। क०-तोड़े, तोरै, तारेकायि। ते०-तडिट्टेटु, बल्ला, ताड़िा, तनिक्काय, तनि, तन्द्रा, तोन्दी। ता०-अक्कम, तन्री, तनितांडी, तोअण्डी, तोखांडी, तंरिक्कय, तनी, कट्टुटुएलुपय। मा०-बहेड़ा। पं०- बहेड़ा। मु०-बहेड़ा। फा०-बलेले, बलेला, बलैलाह। अ०-बलेलज। अं०-Beleric Myrobalans; (बेलेरिक् मैरोबेलन्स्) । Beddanut (बेड्डानट)। ले०-Terminalia belerica Roxb. (टर्मिनेलिया बेलेरिका)। Fam. Combretaceae (कॉम्ब्रिटेंसी) । हमारे देश के प्रायः सब प्रान्तों में बहेड़े का वृक्ष देखने में आता है, विशेष कर नीची पहाड़ियों पर अधिक पाया जाता है। यह जंगल, पहाड़ तथा ऊँची भूमि में उत्पन्न होता है। वृक्ष-बहुत विशाल हुआ करता है। ऊँचाई ६० से १०० फीट तक होती है। स्तम्भ मोटा, सीधा, खड़ा, गोलाकार होता है। छाल-आधा इञ्च तक मोटी, कालापन युक्त या नीलापन युक्त खाकी रंग की होती है। लकड़ी-हलकी खाकी या किञ्चित् पीलापन युक्त होती है। शाखायें प्रायः छः से दस फीट लम्बी होती है किन्तु कभी-कभी २० फीट लम्बी शाखायें भी देखने में आती हैं। पत्ते-महुवे के पत्तों के समान तीन से आठ इञ्च तक लम्बे तथा दो-तीन इञ्च चौड़े होते हैं। ये विषमवर्ती प्रायः छोटी-छोटी टहनियों के अन्त में सघन रहते हैं। प्रायः पतझड़ में इसके सब पत्ते गिर जाते हैं और चैत तक नवीन पत्ते निकल आते हैं। फूल-तीन से छः इञ्च तक लम्बी सीकों पर नन्हें फूलों की मञ्जरियाँ आती हैं। ये मैले खाकी या फीके हरे रंग के होते हैं। फल-एक इञ्च लम्बा, गोल और अण्डाकार होता है। पतझड़ में जब इसके पुराने पत्ते गिर जाते हैं और नवीन पत्ते आते रहते हैं, प्रायः उसी समय फूल भी आते हैं। शीतकाल के प्रारम्भ में उस पर फल लग जाते हैं और अगहन-पूस तक पक जाते हैं। वृक्ष से बबूल के गोंद के समान एक प्रकार का गोंद निकलता है। फलों की मोंगी से तेल निकाला जाता है। किसी-किसी वाटिका में बहेड़े का वृक्ष देखने में आता है। वर्षा के प्रारम्भ में छिलके रहित गुठलियों को भूमि पर फेंक देने से ही वे अङ्कुरित हो पौधे के रूप में परिणत होती हैं। इसकी परिचर्या हरीतकी के पौधों के समान करनी चाहिये। रासायनिक संगठन-इसके फल में १७% टैनिन द्रव्य रहता है तथा इसकी मींगी में २५% तक हलके पीले रंग का तैल रहता है। इसके अतिरिक्त राल, सैपोनिन आदि द्रव्य रहते हैं। गुण और प्रयोग-बहेड़े का विशेष उपयोग त्रिफले के रूप में होता है। इसका अर्ध पक्व फल विरेचक और पूरा पका हुआ या सूखा फल संकोचक माना जाता है। इसका उपयोग खाँसी, गले के रोग, स्वरभंग, ज्वर, उदर, प्लीहावृद्धि, अर्श, अतिसार, कुष्ठ आदि रोगों में होता है। यह मस्तिष्क के लिये बल्य है। नेत्र पर इसका लेप लाभकारी है।
२१४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसकी मज्जा वेदनास्थापक, शोथघ्न और कुछ मदकारी है। मज्जा का तेल बालों के लिये अत्यन्त पौष्टिक, रंजक एवं कण्डूघ्न और दाहशामक है। मज्जा अथवा छिलके को भून कर मुख में रखने से खाँसी में बहुत लाभ होता है। मात्रा— चूर्ण तीन से नौ माशा। अथामलक्या नामानि गुणाँश्चाह वयस्यामलकी वृष्या जातीफलरसं शिवम् । धात्रीफलं श्रीफलं च तथामृतफलं स्मृतम् ।। त्रिष्वामलकमाख्यातं धात्री तिष्यफलाऽमृता ।।३८।। हरीतकीसमं धात्रीफलं किन्तु विशेषतः। रक्तपित्तप्रमेहघ्नं परं वृष्यं रसायनम् ।।३९।। हन्ति वातं तदम्लत्वात्पित्तं माधुर्यशैत्यतः। कफं रूक्षकषायत्वाफलं धात्र्यास्त्रिदोषजित् ।।४०।। यस्य यस्य फलस्येह वीर्यं भवति यादृशम् । तस्य तस्यैव वीर्येण मज्जानमपि निर्दिशेत् ।।४१।। आँवले के नाम तथा गुण— वयस्या, आमलकी, वृष्या, जातीफलरसा, शिव, धात्रीफल, श्रीफल और अमृत फल ये सब आँवले के नाम हैं। आमलक (यह शब्द तीनों लिङ्गों में होता है), धात्री, तिष्यफला, अमृता ये भी आँवले के संस्कृत नाम हैं। हरड़ के जो-जो गुण हैं, वे ही आँवले के भी हैं। किन्तु विशेष यह है कि—यह रक्तपित्त तथा प्रमेह का नाशक है और अत्यन्त वृष्य (वीर्य के लिये हितकर) एवं रसायन है। आमला— अम्ल रस युक्त होने से वायु को तथा मधुर रस युक्त और शीतल होने से पित्त को दूर करता है और रूक्ष तथा कषाय रस युक्त होने से कफ को दूर करता है। अतएव यह त्रिदोषनाशक है। यहाँ सर्वत्र यह समझना चाहिये कि जिन-जिन फलों का गुण जैसा उष्ण या शीतवीर्य हो उन-उन फलों की मींगी का भी गुण वैसा ही उष्ण या शीतवीर्य होता है। [३८-४१] ३. आमला हिं०— आमला, आँवला, आँवडा, आँवरा, औंड़ा, औरा। बं०— आमला, आमरो, अमला, आमलकी। म०— आवले, आवली, आवलकाठी। पं०— आमला, अम्बुल, अम्बलो। मा०— आँवला। गु०— आँवला, आमला, आमली। क०— नेल्लि, नेल्लिकायि। ते०— उसरिकाय, उसरिक। उ०— अण्डा। आसा०— अमला, आमलकी। गारो०— 'अम्बरी। ता०— नेल्लिमंरं, नेल्लिकाय। ब्रह्मा०— शब्जु, जिफियूसी। फा०— आमलज, आमलज्, आमलय, आमलह, आमलाह, आम्लझ। अ०— आमजब्ज। अं०— Emblic Myrobalan (एम्ब्लिक् मैरोबेलन्); Indian gooseberry (इण्डियन गूसबेरी)। ले०— Phyllanthus emblica Linn. (फाइलेन्थस एम्ब्लिका); Emblica officinalis Gaertn. (एम्ब्लिका ऑफि सेनेलिस्)। Fam. Euphorbiaceae (यूफर्बियेसी)। आमला भारतवर्ष के प्रायः सब उष्ण प्रदेशों में बागी और जंगली दोनों प्रकार का पाया जाता है। विशेष कर उत्तर भारत, अवध, विहार और पूर्वी देशों में इसकी उपज अधिक है। हिमालय पहाड़ के नीचे जम्बू से पूर्व की ओर तथा दक्षिण की ओर सिलोन तक उत्पन्न होता है। तथा चीन एवं मलयद्वीप में भी मिलता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का सुहावना होता है, किन्तु जंगली वृक्ष ऊँचे कद का बड़ा होता है। छाल-चौथाई इञ्च मोटी हलके खाकी रङ्ग की एवं छिलकेदार होती है। लकड़ी-लाल रङ्ग की और मजबूत होती है। इसमें सार भाग नहीं होता है। पत्ते— छोटे-छोटे इमली के पत्तों के समान और फूल— लाई के दानों के समान हरापन युक्त पीले रङ्ग के गुच्छों में शाखाओं से सटे रहते हैं। वसन्त ऋतु में जब इसके पुराने पत्ते झड़ जाते हैं तब वृक्ष पत्रशून्य दिखाई पड़ता है। उसी समय यह फूलता है और नवीन पत्ते निकलते हैं। फूलों में नींबू के फूल के समान मन्द सुगन्ध आती है। फल— डालियों में सटे हुये दिखाई देते हैं। वे गोल चमकदार और छः रेखाओं से युक्त होते हैं। कच्ची अवस्था में हरे, पकने पर हरापन युक्त किञ्चित् पीले या सुर्ख और सूखने पर काले रङ्ग के होकर फाँकें पृथक्-पृथक् हो जाती हैं और साथ ही गुठली भी फट जाती है। उनसे त्रिकोणाकार छोटे-छोटे बीज निकलते हैं। बीजों से तेल निकलता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २१५ बीज से ही इसके पौधे उत्पन्न होते हैं और थोड़े ही यत्न से साधारण वृक्षों की भाँति प्रायः दूमट मिट्टी में इसके वृक्ष सतेज होते हैं। प्रायः वाटिकाओं में कलमी आमले के वृक्ष रोपित किये जाते हैं। जङ्गली के फल एक तोले तक और बागी कलमी आँवले के पाँच तोले से अधिक भी देखने में आते हैं। बनारसी आँवले सर्वोत्तम समझे जाते हैं। किन्तु जितने आँवलों की यहाँ खपत होती है उतने उत्पन्न नहीं होते। खटिक लोग दूसरी जगह से मँगाकर बेचते हैं। पके फल बहुत कम मिलते हैं। प्रायः कच्ची अवस्था में ही तोड़कर बेंच लेते हैं। रासायनिक संगठन-रासायनिक दृष्टि से इसके टैनिन में गैलिक एसिड, एलाइगिक एसिड और ग्लूकोज होता है। इसमें विटामिन 'सी' तथा 'पेक्टिन बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है। 'विटामिन सी' की मात्रा १०० ग्रा. में ६००- ९२१ मि० ग्रा० तक पाई जाती है। आँवला के सूखे चूर्ण में भी 'विटामिन सी' पर्याप्त मात्रा में होती है क्योंकि इसके अन्दर का टैनिन 'सी' को नष्ट नहीं होने देता। गुण और प्रयोग-आँवला एक अत्यंत महत्त्व की औषधि है। इसका बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है। इसका ताजा फल रसायन, वृष्य, रक्तपित्त को दूर करने वाला, शीतल, मृदु विरेचक, मूत्रल एवं यकृत् की क्रिया ठीक करने वाला है। इसका सूखा फल ग्राही, शीतल, दीपन एवं रक्तस्रावरोधक है। रसायन के लिये एक विशिष्ट प्रकार की विधि से सेवन करने का विधान चरक में किया गया है। ताजे सूखे आँवले के चूर्ण को लेकर उसको ताजे आँवले के रस की भावना देकर सुखाना चाहिए। यह जितनी अधिक बार दी जायेगी उतना ही गुणकारक होगा। कम-से-कम २१ भावना देकर सुखाकर रखना चाहिये। इस चूर्ण की ३ से ६ माशा की मात्रा गोघृत तथा मधु (असमान मात्रा) के साथ दिन में दो बार लेनी चाहिये। इसी प्रकार च्यवनप्राश का भी उपयोग किया जा सकता है। इसके सेवन से शरीर की सभी क्रियाएँ सुधरकर शरीर पुष्ट एवं बलवान् बनता है। स्मृति, मेधा, कांति बढ़ती है। श्वास, कास, क्षय, पांडु, अग्निमान्द्य, वीर्य दोष आदि दूर होते हैं। आँवला एवं हल्दी का क्वाथ बस्तिशोथ एवं पित्त प्रकोपजन्य व्याधि में उपयोगी है। आँवले का रस मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, पित्तजशूल, कामला, हिक्का, वमन, जीर्ण विबन्ध में मिश्री मिलाकर शर्बत के रूप में बहुत लाभदायक है। प्रशीताद (Scurvy) रोग में भी यह बहुत उपयोगी है। आँवले का चूर्ण अर्श, अतिसार, संग्रहणी, अत्यार्तव एवं प्रतिश्याय में उपयोगी है। पेड़ पर ही लगे हुये आँवलों को चीरने से जो रस निकलता है उससे आँख धोने से अक्षिशोथ दूर होता है। उसी प्रकार इसके बीजों की मींगी के क्वाथ से आँख धोने से आँखों का दर्द दूर होता है। अक्षिप्रक्षालन के लिये रातभर जल में भिगोये आँवले के चूर्ण का पानी भी उपयोगी है। लोह भस्म के साथ आँवले का उपयोग पाण्डु, कामला में विशेष लाभकर होता है। आँवले के पत्तों का क्वाथ मुख व्रण में लाभदायी है। इसके कोमल पत्तों को छाछ के साथ देने से अजीर्ण और अतिसार में लाभ होता है। आँवले का बस्तिप्रदेश पर लेप मूत्रावरोध में, एवं गर्भाशय मुख पर रक्त प्रदर में उपयोगी है। आँवले का विशेष उपयोग च्यवनप्राश, आमलकीरसायन, त्रिफला एवं धात्री लौह में किया गया है। मात्रा-चूर्ण ३ माशे से १ तोला तक। अथ त्रिफलाया लक्षणनामगुणानाह पथ्याबिभीतधात्रीणां फलैः स्यात्त्रिफला समैः । फलत्रिकञ्च त्रिफला सा वरा च प्रकीर्तिता ।।४२।। त्रिफला कफपित्तघ्नी मेहकुष्ठहरा सरा । चक्षुष्या दीपनी रुच्या विषमज्वरनाशिनी ।।४३।।
२१६ भावप्रकाशनिघण्टुः त्रिफला के लक्षण, नाम तथा गुण- हरड़, बहेड़ा और आँवला इन तीनों के फल यदि समान भाग से एकत्र किये जायँ तो यही त्रिफला कहलाता है। इसके फलत्रिक और वरा ये भी नामान्तर हैं। त्रिफला- कफ तथा पित्त को नाश करनेवाला एवं प्रमेह व कुष्ठ को दूर करनेवाला, दस्तावर, नेत्रों के लिये हितकर, अग्निदीपक, रुचिकारक एवं विषम ज्वर को नाश करने वाला होता है। [४२-४३] त्रिफला आजकल विद्वान् यद्यपि हरड़, बहेड़ा और आँवला-इन तीनों को एक साथ मिलाकर त्रिफला मानते हैं तो भी इनके सम भाग होने में मतभेद है। कोई एक भाग हरड़, दो भाग बहेड़ा और तीन भाग आँवला एवं कोई एक भाग हरड़, दो भाग बहेड़ा और चार भाग आँवला को त्रिफला कहते हैं। एक हरड़, दो बहेड़े और चार आँवले को भी बहुत लोग त्रिफला मानते हैं। उसी प्रकार एक हरड़ से एक भाग हरड़, दो बहेड़ा से दो भाग बहेड़ा और चार आँवले से चार भाग आँवले समझते हैं किन्तु यदि एक हरड़, दो बहेड़े और चार आंवले (बनारसी बड़े आँवले से भिन्न) लिये जायें तो ये प्रायः समभाग ही होते हैं। अथ शुण्ठ्यानामानि गुणाँश्चाह शुण्ठी विश्वा च विश्वञ्च नागरं विश्वभेषजम् । ऊषणं कटुभद्रञ्च शृङ्गवेरं महौषधम् ।।४४।। शुण्ठी रुच्यामवातघ्नी पाचनी कटुका लघुः । स्निग्धोष्णा मधुरा पाके कफवातविबन्धनुत् ।।४५।। वृष्या ^१स्वर्य्यावमिश्वासशूलकासहृदामयान् । हन्ति श्लीपदशोथार्श आनाहोदरमारुतान् ।।४६।। आग्नेयगुणभूयिष्ठात् ^२ तोयांशपरिशोषि यत् । संगृह्णाति मलं तत्तु ग्राहि शुण्ठ्यादयो यथा ।।४७।। विबन्धभेदिनी या तु सा कथं ग्राहिणी भवेत् । शक्तिर्विबन्धभेदे स्याद्गतो न मलपातनो ।।४८।। सोंठ के नाम तथा गुण- शुण्ठी, विश्वा, विश्व, नागर, विश्वभेषज, ऊषण, कटुभद्र, शृङ्गवेर और महौषध ये सब संस्कृत नाम सोंठ के हैं। सोंठ- रुचिकारक, आमवातनाशक, पाचक, कटुरस-युक्त, लघुपाकी, स्निग्ध, उष्णवीर्य, विपाक में मधुर रस युक्त, कफ, वात और विबन्ध (विबद्धता) को दूर करने वाली, वृष्य, स्वर के लिये हितकारी, वमन, श्वास, शूल, कास, हृद्रोग, श्लीपद, शोथ, बवासीर, आनाह और उदर की वायु इन सबों को दूर करती है और जो द्रव्य अधिकतर अग्नि सम्बन्धी गुणों से युक्त होने से जलीय अंश को सूखाने वाला तथा मल का संग्राहक अर्थात् पतले मल के जलीय भाग को सुखाकर गाढ़ा करने वाला होता है वह 'ग्राही' कहलाता है, जैसे कि-सोंठ आदि। अब यहाँ पर प्रश्न उपस्थित होता है कि- जो सोंठ विबन्ध (बंधे हुये मल) का भेदन करने वाली होती है वह कैसे ग्राही होगी ? क्योंकि अभी अपने ग्राही द्रव्य का 'मल को गाढ़ा करना' लक्षण बतलाया है। इसका उत्तर यह है कि- इस द्रव्य का यह प्रभाव है कि- यह विबंध (मलबद्धता) के दूर करने में तो समर्थ होती है, किन्तु मल के गिराने में नहीं होती है क्योंकि आश्रय भेद से द्रव्यों के कर्मों में भी प्रभाववश भिन्नता हो ही जाती है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। [४४- ४८] ४. सोंठ हिं०- सोंठ, सौंठ, सूंठ, सिंघी। बं- शुंठ, शुण्ठि, सुंट। मा०-सूंठ। सिंहली०-वेलिच इङ्गरु। गु०-शुंठ्य, सुंठ-सूंठ। क०-शुंठि, शोंठि, ओणसुठि, वेनंशुठी। ते०-शोंठी, सोंठी, सोंटि। ता०-शुक्कु। प०-सुंड। १. 'स्वर्ये'ति पाठः। २. 'भूयिष्ठमि'ति पाठः। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA