भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः २१५ बीज से ही इसके पौधे उत्पन्न होते हैं और थोड़े ही यत्न से साधारण वृक्षों की भाँति प्रायः दूमट मिट्टी में इसके वृक्ष सतेज होते हैं। प्रायः वाटिकाओं में कलमी आमले के वृक्ष रोपित किये जाते हैं। जङ्गली के फल एक तोले तक और बागी कलमी आँवले के पाँच तोले से अधिक भी देखने में आते हैं। बनारसी आँवले सर्वोत्तम समझे जाते हैं। किन्तु जितने आँवलों की यहाँ खपत होती है उतने उत्पन्न नहीं होते। खटिक लोग दूसरी जगह से मँगाकर बेचते हैं। पके फल बहुत कम मिलते हैं। प्रायः कच्ची अवस्था में ही तोड़कर बेंच लेते हैं। रासायनिक संगठन-रासायनिक दृष्टि से इसके टैनिन में गैलिक एसिड, एलाइगिक एसिड और ग्लूकोज होता है। इसमें विटामिन 'सी' तथा 'पेक्टिन बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है। 'विटामिन सी' की मात्रा १०० ग्रा. में ६००- ९२१ मि० ग्रा० तक पाई जाती है। आँवला के सूखे चूर्ण में भी 'विटामिन सी' पर्याप्त मात्रा में होती है क्योंकि इसके अन्दर का टैनिन 'सी' को नष्ट नहीं होने देता। गुण और प्रयोग-आँवला एक अत्यंत महत्त्व की औषधि है। इसका बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है। इसका ताजा फल रसायन, वृष्य, रक्तपित्त को दूर करने वाला, शीतल, मृदु विरेचक, मूत्रल एवं यकृत् की क्रिया ठीक करने वाला है। इसका सूखा फल ग्राही, शीतल, दीपन एवं रक्तस्रावरोधक है। रसायन के लिये एक विशिष्ट प्रकार की विधि से सेवन करने का विधान चरक में किया गया है। ताजे सूखे आँवले के चूर्ण को लेकर उसको ताजे आँवले के रस की भावना देकर सुखाना चाहिए। यह जितनी अधिक बार दी जायेगी उतना ही गुणकारक होगा। कम-से-कम २१ भावना देकर सुखाकर रखना चाहिये। इस चूर्ण की ३ से ६ माशा की मात्रा गोघृत तथा मधु (असमान मात्रा) के साथ दिन में दो बार लेनी चाहिये। इसी प्रकार च्यवनप्राश का भी उपयोग किया जा सकता है। इसके सेवन से शरीर की सभी क्रियाएँ सुधरकर शरीर पुष्ट एवं बलवान् बनता है। स्मृति, मेधा, कांति बढ़ती है। श्वास, कास, क्षय, पांडु, अग्निमान्द्य, वीर्य दोष आदि दूर होते हैं। आँवला एवं हल्दी का क्वाथ बस्तिशोथ एवं पित्त प्रकोपजन्य व्याधि में उपयोगी है। आँवले का रस मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, पित्तजशूल, कामला, हिक्का, वमन, जीर्ण विबन्ध में मिश्री मिलाकर शर्बत के रूप में बहुत लाभदायक है। प्रशीताद (Scurvy) रोग में भी यह बहुत उपयोगी है। आँवले का चूर्ण अर्श, अतिसार, संग्रहणी, अत्यार्तव एवं प्रतिश्याय में उपयोगी है। पेड़ पर ही लगे हुये आँवलों को चीरने से जो रस निकलता है उससे आँख धोने से अक्षिशोथ दूर होता है। उसी प्रकार इसके बीजों की मींगी के क्वाथ से आँख धोने से आँखों का दर्द दूर होता है। अक्षिप्रक्षालन के लिये रातभर जल में भिगोये आँवले के चूर्ण का पानी भी उपयोगी है। लोह भस्म के साथ आँवले का उपयोग पाण्डु, कामला में विशेष लाभकर होता है। आँवले के पत्तों का क्वाथ मुख व्रण में लाभदायी है। इसके कोमल पत्तों को छाछ के साथ देने से अजीर्ण और अतिसार में लाभ होता है। आँवले का बस्तिप्रदेश पर लेप मूत्रावरोध में, एवं गर्भाशय मुख पर रक्त प्रदर में उपयोगी है। आँवले का विशेष उपयोग च्यवनप्राश, आमलकीरसायन, त्रिफला एवं धात्री लौह में किया गया है। मात्रा-चूर्ण ३ माशे से १ तोला तक। अथ त्रिफलाया लक्षणनामगुणानाह पथ्याबिभीतधात्रीणां फलैः स्यात्त्रिफला समैः । फलत्रिकञ्च त्रिफला सा वरा च प्रकीर्तिता ।।४२।। त्रिफला कफपित्तघ्नी मेहकुष्ठहरा सरा । चक्षुष्या दीपनी रुच्या विषमज्वरनाशिनी ।।४३।।