भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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२१४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसकी मज्जा वेदनास्थापक, शोथघ्न और कुछ मदकारी है। मज्जा का तेल बालों के लिये अत्यन्त पौष्टिक, रंजक एवं कण्डूघ्न और दाहशामक है। मज्जा अथवा छिलके को भून कर मुख में रखने से खाँसी में बहुत लाभ होता है। मात्रा— चूर्ण तीन से नौ माशा। अथामलक्या नामानि गुणाँश्चाह वयस्यामलकी वृष्या जातीफलरसं शिवम् । धात्रीफलं श्रीफलं च तथामृतफलं स्मृतम् ।। त्रिष्वामलकमाख्यातं धात्री तिष्यफलाऽमृता ।।३८।। हरीतकीसमं धात्रीफलं किन्तु विशेषतः। रक्तपित्तप्रमेहघ्नं परं वृष्यं रसायनम् ।।३९।। हन्ति वातं तदम्लत्वात्पित्तं माधुर्यशैत्यतः। कफं रूक्षकषायत्वाफलं धात्र्यास्त्रिदोषजित् ।।४०।। यस्य यस्य फलस्येह वीर्यं भवति यादृशम् । तस्य तस्यैव वीर्येण मज्जानमपि निर्दिशेत् ।।४१।। आँवले के नाम तथा गुण— वयस्या, आमलकी, वृष्या, जातीफलरसा, शिव, धात्रीफल, श्रीफल और अमृत फल ये सब आँवले के नाम हैं। आमलक (यह शब्द तीनों लिङ्गों में होता है), धात्री, तिष्यफला, अमृता ये भी आँवले के संस्कृत नाम हैं। हरड़ के जो-जो गुण हैं, वे ही आँवले के भी हैं। किन्तु विशेष यह है कि—यह रक्तपित्त तथा प्रमेह का नाशक है और अत्यन्त वृष्य (वीर्य के लिये हितकर) एवं रसायन है। आमला— अम्ल रस युक्त होने से वायु को तथा मधुर रस युक्त और शीतल होने से पित्त को दूर करता है और रूक्ष तथा कषाय रस युक्त होने से कफ को दूर करता है। अतएव यह त्रिदोषनाशक है। यहाँ सर्वत्र यह समझना चाहिये कि जिन-जिन फलों का गुण जैसा उष्ण या शीतवीर्य हो उन-उन फलों की मींगी का भी गुण वैसा ही उष्ण या शीतवीर्य होता है। [३८-४१] ३. आमला हिं०— आमला, आँवला, आँवडा, आँवरा, औंड़ा, औरा। बं०— आमला, आमरो, अमला, आमलकी। म०— आवले, आवली, आवलकाठी। पं०— आमला, अम्बुल, अम्बलो। मा०— आँवला। गु०— आँवला, आमला, आमली। क०— नेल्लि, नेल्लिकायि। ते०— उसरिकाय, उसरिक। उ०— अण्डा। आसा०— अमला, आमलकी। गारो०— 'अम्बरी। ता०— नेल्लिमंरं, नेल्लिकाय। ब्रह्मा०— शब्जु, जिफियूसी। फा०— आमलज, आमलज्, आमलय, आमलह, आमलाह, आम्लझ। अ०— आमजब्ज। अं०— Emblic Myrobalan (एम्ब्लिक् मैरोबेलन्); Indian gooseberry (इण्डियन गूसबेरी)। ले०— Phyllanthus emblica Linn. (फाइलेन्थस एम्ब्लिका); Emblica officinalis Gaertn. (एम्ब्लिका ऑफि सेनेलिस्)। Fam. Euphorbiaceae (यूफर्बियेसी)। आमला भारतवर्ष के प्रायः सब उष्ण प्रदेशों में बागी और जंगली दोनों प्रकार का पाया जाता है। विशेष कर उत्तर भारत, अवध, विहार और पूर्वी देशों में इसकी उपज अधिक है। हिमालय पहाड़ के नीचे जम्बू से पूर्व की ओर तथा दक्षिण की ओर सिलोन तक उत्पन्न होता है। तथा चीन एवं मलयद्वीप में भी मिलता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का सुहावना होता है, किन्तु जंगली वृक्ष ऊँचे कद का बड़ा होता है। छाल-चौथाई इञ्च मोटी हलके खाकी रङ्ग की एवं छिलकेदार होती है। लकड़ी-लाल रङ्ग की और मजबूत होती है। इसमें सार भाग नहीं होता है। पत्ते— छोटे-छोटे इमली के पत्तों के समान और फूल— लाई के दानों के समान हरापन युक्त पीले रङ्ग के गुच्छों में शाखाओं से सटे रहते हैं। वसन्त ऋतु में जब इसके पुराने पत्ते झड़ जाते हैं तब वृक्ष पत्रशून्य दिखाई पड़ता है। उसी समय यह फूलता है और नवीन पत्ते निकलते हैं। फूलों में नींबू के फूल के समान मन्द सुगन्ध आती है। फल— डालियों में सटे हुये दिखाई देते हैं। वे गोल चमकदार और छः रेखाओं से युक्त होते हैं। कच्ची अवस्था में हरे, पकने पर हरापन युक्त किञ्चित् पीले या सुर्ख और सूखने पर काले रङ्ग के होकर फाँकें पृथक्-पृथक् हो जाती हैं और साथ ही गुठली भी फट जाती है। उनसे त्रिकोणाकार छोटे-छोटे बीज निकलते हैं। बीजों से तेल निकलता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA