भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः २१३ रूक्षं नेत्रहितं केश्यं कृमिवैस्वर्यनाशनम् । बिभीतमज्जातृट्छर्दिकफवातहरी लघुः ।। कषायो मदकृच्चाथ धात्रीमज्जाऽपि तद्गुणः ।। ३७ ।। बहेड़े के नाम तथा गुण-विभीतक, (यह शब्द तीनों लिङ्गों में होता है), अक्ष, कर्षफल, कलिद्रुम, भूतवास और कलियुगालय ये सब संस्कृत नाम बहेड़े के हैं। बहेड़ा-मधुर विपाकवाला, कषाय रसयुक्त, कफ व पित्त का नाशक, उष्णवीर्यवाला, शीतस्पर्श वाला, मल का भेदन करने वाला, कास का नाशक, रूक्ष, नेत्र तथा बालों के लिये हितकर, कृमि तथा स्वरभेद को दूर करने वाला होता है। बहेड़े की मींगी-प्यास, वमन और कफ एवं वायु का नाश करने वाली, लघुपाकी, कषाय रस युक्त और मदकारक होती है। इसी भाँति आँवले की मींगी के भी ये ही सब गुण हैं। [३५-३७] २. बहेड़ा हिं०-बहेड़ा, फिनास, भैरा, बहेरा। बं०-बयड़ा, बोहेरा, बेहरी, बहेड़ा। म०-बेहड़ा, बेहाड़ा, धाटींग, बहेला, बहड़ा। गु०-बेहेड़ा, बेड़ा। क०-तोड़े, तोरै, तारेकायि। ते०-तडिट्टेटु, बल्ला, ताड़िा, तनिक्काय, तनि, तन्द्रा, तोन्दी। ता०-अक्कम, तन्री, तनितांडी, तोअण्डी, तोखांडी, तंरिक्कय, तनी, कट्टुटुएलुपय। मा०-बहेड़ा। पं०- बहेड़ा। मु०-बहेड़ा। फा०-बलेले, बलेला, बलैलाह। अ०-बलेलज। अं०-Beleric Myrobalans; (बेलेरिक् मैरोबेलन्स्) । Beddanut (बेड्डानट)। ले०-Terminalia belerica Roxb. (टर्मिनेलिया बेलेरिका)। Fam. Combretaceae (कॉम्ब्रिटेंसी) । हमारे देश के प्रायः सब प्रान्तों में बहेड़े का वृक्ष देखने में आता है, विशेष कर नीची पहाड़ियों पर अधिक पाया जाता है। यह जंगल, पहाड़ तथा ऊँची भूमि में उत्पन्न होता है। वृक्ष-बहुत विशाल हुआ करता है। ऊँचाई ६० से १०० फीट तक होती है। स्तम्भ मोटा, सीधा, खड़ा, गोलाकार होता है। छाल-आधा इञ्च तक मोटी, कालापन युक्त या नीलापन युक्त खाकी रंग की होती है। लकड़ी-हलकी खाकी या किञ्चित् पीलापन युक्त होती है। शाखायें प्रायः छः से दस फीट लम्बी होती है किन्तु कभी-कभी २० फीट लम्बी शाखायें भी देखने में आती हैं। पत्ते-महुवे के पत्तों के समान तीन से आठ इञ्च तक लम्बे तथा दो-तीन इञ्च चौड़े होते हैं। ये विषमवर्ती प्रायः छोटी-छोटी टहनियों के अन्त में सघन रहते हैं। प्रायः पतझड़ में इसके सब पत्ते गिर जाते हैं और चैत तक नवीन पत्ते निकल आते हैं। फूल-तीन से छः इञ्च तक लम्बी सीकों पर नन्हें फूलों की मञ्जरियाँ आती हैं। ये मैले खाकी या फीके हरे रंग के होते हैं। फल-एक इञ्च लम्बा, गोल और अण्डाकार होता है। पतझड़ में जब इसके पुराने पत्ते गिर जाते हैं और नवीन पत्ते आते रहते हैं, प्रायः उसी समय फूल भी आते हैं। शीतकाल के प्रारम्भ में उस पर फल लग जाते हैं और अगहन-पूस तक पक जाते हैं। वृक्ष से बबूल के गोंद के समान एक प्रकार का गोंद निकलता है। फलों की मोंगी से तेल निकाला जाता है। किसी-किसी वाटिका में बहेड़े का वृक्ष देखने में आता है। वर्षा के प्रारम्भ में छिलके रहित गुठलियों को भूमि पर फेंक देने से ही वे अङ्कुरित हो पौधे के रूप में परिणत होती हैं। इसकी परिचर्या हरीतकी के पौधों के समान करनी चाहिये। रासायनिक संगठन-इसके फल में १७% टैनिन द्रव्य रहता है तथा इसकी मींगी में २५% तक हलके पीले रंग का तैल रहता है। इसके अतिरिक्त राल, सैपोनिन आदि द्रव्य रहते हैं। गुण और प्रयोग-बहेड़े का विशेष उपयोग त्रिफले के रूप में होता है। इसका अर्ध पक्व फल विरेचक और पूरा पका हुआ या सूखा फल संकोचक माना जाता है। इसका उपयोग खाँसी, गले के रोग, स्वरभंग, ज्वर, उदर, प्लीहावृद्धि, अर्श, अतिसार, कुष्ठ आदि रोगों में होता है। यह मस्तिष्क के लिये बल्य है। नेत्र पर इसका लेप लाभकारी है।