भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ भावप्रकाशनिघण्टुः पूर्व बंगाल, आसाम और ब्रह्मा में एक अन्य जाति पाई जाती है जिसे लेटिन में Terminalia citrina Roxb. (टर्मिनेलिया सिट्रिना) कहते हैं । इसका वृक्ष ८० फीट तक ऊँचा होता है । इसके फल दो इंच तक लम्बे होते हैं । हरीतकी के फल पूर्ण पकने तक वृक्ष में बहुत कम ठहरते हैं । प्रायः कच्ची अवस्था में ही गिर जाया करते हैं । पका फल उत्तम समझा जाता है । उत्तम फल वह है जो नया हो और चिकना, गोल, भारी, तौल में कम-से-कम तोले से भी अधिक हो तथा पानी में डालने से डूब जाय । अपक्व अवस्था के छोटे, काले, द्राक्ष के समान फल मिलते हैं । यह बड़े हरें की अपेक्षा बहुत छोटे होते हैं । इन्हें हिन्दी में जंगी हरड़ एवं मराठी में बालहिरडा कहा जाता है । इनका स्वाद अधिक कसैला तथा कड़ुआ होता है । किसी किसी वाटिका में हरीतकी का वृक्ष नमूने की तरह देखने में आता है । वर्षा ऋतु में हरीतकी के छिलके को सुगमता से दूर कर गुठलियों को भूमि पर फेंक देने से ही कोई कोई बीज अङ्कुरित होकर पौधे के रूप में बढ़ते हैं । पतझड़ में पुराने पत्ते गिर जाने से चैत के महीने में प्रायः इसके पौधे सूखे से दिखाई देते हैं । उस समय से ज्येष्ठ तक पौधों को पानी से कभी-कभी सींचना होता है । बरसात का पानी पड़ने पर नवीन पत्ते निकल आते हैं और पौधे हरे-भरे हो जाते हैं । उसी समय उनको उठाकर स्थायी रूप से इष्ट जगह पर रोपण करना चाहिये । बरसात का पानी जमा होकर जहाँ पर तर मिट्टी जमा होती है उस जगह पर रोपण किया हुआ पौधा सतेज होता है । साधारण वृक्षों की तरह परिचर्या करने से ही इसके वृक्ष तैयार हो जाते हैं । आयुर्वेद में हरीतकी की जो सात जातियाँ कही गई हैं उनके आकार तथा रङ्ग-रूप और गुण भी भिन्न-भिन्न होते हैं । आयुर्वेद में प्रत्येक जाति की हरड़ के गुणों का वर्णन बहुत ही विचारपूर्वक किया गया है, परन्तु आजकल के पाश्चात्य विद्वान् लोग केवल दो ही प्रकार की हरीतकी को ग्राह्य मानते हैं । शेष जाति की हरीतकियों में यद्यपि प्रकार भेद मानते हैं, परन्तु गुणों में कुछ भेद नहीं मानते । इस संबंध में विशेष अनुसन्धान की आवश्यकता है । रासायनिक संगठन-पक्व हरीतकी में करीब ३० प्रतिशत कसैला द्रव्य होता है जो चेब्यूलीनिक एसिड के कारण है । इसके अतिरिक्त टैनिक एसिड २०-४० प्रतिशत, गैलिक एसिड, राल आदि द्रव्य हैं । इसका विरेचक द्रव्य एन्थ्राक्विनोन के समान है । बालहरड़ में एक हरे रंग की तैलीय राल मिलती है जिसे कभी-कभी माइरोबैलानिन् कहा जाता है । गुण और प्रयोग-हरीतकी श्रेष्ठ मृदु विरेचक द्रव्य है । इससे किसी प्रकार की हानि नहीं होती । शरीर की सभी क्रियाएँ इसके सेवन से सुधरती हैं । इसका उपयोग जीर्ण ज्वर, अतिसार, रक्तातिसार, अर्श, नेत्र रोग, अजीर्ण, प्रमेह, पाण्डु आदि में लाभकर होता है । जीर्ण कास, अर्श आदि में अगस्त्य हरीतकी एवं व्याघ्री हरीतकी आदि योगों के रूप में भी इसका व्यवहार किया जाता है । हरीतकी अच्छा व्रण रोपक है । मुखव्रण, पुराने घावों तथा अर्श में इसका लेप लाभप्रद है । दंत मञ्जन के लिये इसका महीन चूर्ण उपयोगी है । बाल हरीतकी-यह मृदु विरेचक है । जीर्ण विबन्ध एवं अर्श में इसका अच्छा उपयोग होता है । मात्रा-चूर्ण दो से चार माशा । अथ विभीतकस्य नामानि गुणाँश्चाह विभीतकस्त्रिलिङ्गः स्यादक्षः १ कर्षलस्तु सः । कलिद्रुमो भूतवासस्तथा कलियुगालयः ।।३५।। विभीतकं स्वादुपाकं कषायं कफपित्तनुत् । उष्णवीर्यं हिमस्पर्शं भेदनं कासनाशनम् ।।३६।। १. ‘स्यान्नाक्षः’ इति पाठा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammpmu. Digitized by S3 Foundation USA