भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 262, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः २११ के साथ, वसन्त ऋतु में मधु के साथ एवं ग्रीष्म ऋतु में गुड़ के साथ हरीतकी सेवन करने से रसायन के फल की प्राप्ति होती है । [३४]
अथ हरीतकी भक्षणानर्हजनानाह
अध्वातिखिन्नो बलवर्जितश्च रूक्षः कृशो लङ्घनकर्शितश्च । पित्ताधिको गर्भवती च नारी विमुक्तरक्तस्त्वभयां न खादेत् ।। ३५ ।। हरीतकी सेवन करने के अयोग्य व्यक्ति—रास्ता चलने से थके हुए, बल रहित, रूक्ष, कृश, उपवास किए अधिक पित्तवाले व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री एवं जिसे रक्तमोक्षण कराया गया हो उन सबों को हरीतकी का सेवन नहीं करना चाहिये । [३५] १. हरीतकी हिं०—हर, हरड, हरें, हड़, हर्ड, हरैं, हरर । बं०—हरीतकी, बालहरीतकी, हरीतकी गाछ नराँ । म०—हरडा, हिरडा, हरडे, हर्तकी, हरडी, बालहरडी । गु०—हरडे, हिमज । ते०—करकचेट्टु, करकाप्प, करक्वाय । ता०— कडुक्याय, करकैया, कडुकेमरम । क०—अणिलेय, अणिले, अनिलैकाय । उड़ि०—कर्रथा, हरिडा करेड़ा । द०—हलरा, कलरा । मा०—हरडे । पं०—हड, हरड । आसा०—हिलिखा, सिल्लिका । लिपचा०—सिलिम । सिकम०—हन, सिलिमकंग, सिलिमकुंग । मैसूर—अलले । कच्छार—होरतकी । फा०—हलेलज अस्फुर, हलैलै जर्द, हलैलाह, हलेलह जर्द । अ०—अहलीलज़, एहलीलज़-कावली, अहलीलज़ अस्फुर, जहलीलज़, अस्वद, हलेलज़ अस्फुर । अं०—Myrobalans (माइरोबेलन्स), Chebulic Myrobalans (चेब्यूलिक माइरोबेलन्स) । ले०—(१) Terminalia chebula Retz (टर्मिनेलिया चेब्युला) । (२) Terminalia citrina Roxb (टर्मिनेलिया सिट्रिना) । Fam. Combretaceae (कॉम्ब्रिटेंसी) । हरीतकी—अत्यन्त सुगमता से सर्वत्र प्राप्त होने वाली किन्तु विविध गुण सम्पन्न औषधि का फल है । इसका वृक्ष हमारे देश के प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाया जाता है । यह उत्तर भारत में बहुलता से उत्पन्न होती है । कुमाऊँ से बंगाल तक, आसाम, ब्रह्मा तथा दक्षिण में मद्रास प्रान्त, कोयम्बटूर, कनारा, पश्चिमघाट के पूर्वीय प्रान्तों में, गञ्जाम, गोदावरी की तलहटी, सतपुरा पहाड़, गुजरात, बम्बई प्रान्त के घाटों के पास ऊँचे जंगलों में, कोंकण, मलावार, विन्ध्याचल पहाड़, हिमालय पहाड़ एवं काबुल की ओर इसके वृक्ष अधिकता से देखने में आते हैं । इसका वाटिकाओं में भी रोपण करते हैं । प्रायः इसका वृक्ष मध्यमाकार का होता है किन्तु कहीं-कहीं बड़े-बड़े वृक्ष भी देखने में आते हैं । नर्मदा के दक्षिण के वृक्ष १०० फीट तक ऊँचे होते हैं किन्तु उत्तर भारत में उत्पन्न हुए वृक्ष इतने बड़े नहीं होते । हरीतकी के वृक्ष वट, पीपल आदि वृक्षों की तरह दीर्घायु नहीं होते हैं, बल्कि कालान्तर में सूख कर गिर जाया करते हैं । इसकी छाल कालापन युक्त भूरे रंग की चौथाई इञ्च तक मोटी होती है । लकड़ी-पक्की और बहुत मजबूत होती है । इमारत के काम के लिये अच्छी समझी जाती है । यह किञ्चित् हरापान या पीलापन युक्त भूरे रंग के साथ खाकी रंग की होती है । टहनियों पर पत्ते सघन नहीं रहते, बल्कि न्यूनाधिक विपरीत रहते हैं । पत्ते-अड़ूसे के पत्तों से कुछ चौड़े महुवे के पत्तों के समान, ४ से आठ इञ्च तक लम्बे, किञ्चित् अंडाकार, नोकदार, सफेदी युक्त हरे और चमकदार होते हैं तथा स्पर्श में खुरदरे जान पड़ते हैं । वृन्त-एक इंच से कम एवं उसके अग्र भाग के ऊपरी पृष्ठ पर दो या अधिक सूक्ष्म ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं । वसन्त ऋतु में पुराने पत्ते गिर कर नवीन पत्ते निकल आते हैं । फूल-बारीक आम की मंजरी के समान दिखाई देते हैं । और वे देखने में सफेदी मायल या कुछ पीले रंग के होते हैं तथा उनमें दुर्गन्ध आती है । फल-किञ्चित् लम्बाई युक्त गोलाकार होते हैं, सूखते सूखते छिलके सिकुड़ जाते हैं और पाँच कोणाकार या पाँच रेखा युक्त दिखाई देने लगते हैं । शकल सूरत, आकार और डील-डौल एवं छोटे-बड़े, लम्बे, गोल इत्यादि भेदों से फल कई प्रकार के देखने में आते हैं ।