भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
हरीतक्यादिवर्गः २११ के साथ, वसन्त ऋतु में मधु के साथ एवं ग्रीष्म ऋतु में गुड़ के साथ हरीतकी सेवन करने से रसायन के फल की प्राप्ति होती है । [३४]
अथ हरीतकी भक्षणानर्हजनानाह
अध्वातिखिन्नो बलवर्जितश्च रूक्षः कृशो लङ्घनकर्शितश्च । पित्ताधिको गर्भवती च नारी विमुक्तरक्तस्त्वभयां न खादेत् ।। ३५ ।। हरीतकी सेवन करने के अयोग्य व्यक्ति—रास्ता चलने से थके हुए, बल रहित, रूक्ष, कृश, उपवास किए अधिक पित्तवाले व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री एवं जिसे रक्तमोक्षण कराया गया हो उन सबों को हरीतकी का सेवन नहीं करना चाहिये । [३५] १. हरीतकी हिं०—हर, हरड, हरें, हड़, हर्ड, हरैं, हरर । बं०—हरीतकी, बालहरीतकी, हरीतकी गाछ नराँ । म०—हरडा, हिरडा, हरडे, हर्तकी, हरडी, बालहरडी । गु०—हरडे, हिमज । ते०—करकचेट्टु, करकाप्प, करक्वाय । ता०— कडुक्याय, करकैया, कडुकेमरम । क०—अणिलेय, अणिले, अनिलैकाय । उड़ि०—कर्रथा, हरिडा करेड़ा । द०—हलरा, कलरा । मा०—हरडे । पं०—हड, हरड । आसा०—हिलिखा, सिल्लिका । लिपचा०—सिलिम । सिकम०—हन, सिलिमकंग, सिलिमकुंग । मैसूर—अलले । कच्छार—होरतकी । फा०—हलेलज अस्फुर, हलैलै जर्द, हलैलाह, हलेलह जर्द । अ०—अहलीलज़, एहलीलज़-कावली, अहलीलज़ अस्फुर, जहलीलज़, अस्वद, हलेलज़ अस्फुर । अं०—Myrobalans (माइरोबेलन्स), Chebulic Myrobalans (चेब्यूलिक माइरोबेलन्स) । ले०—(१) Terminalia chebula Retz (टर्मिनेलिया चेब्युला) । (२) Terminalia citrina Roxb (टर्मिनेलिया सिट्रिना) । Fam. Combretaceae (कॉम्ब्रिटेंसी) । हरीतकी—अत्यन्त सुगमता से सर्वत्र प्राप्त होने वाली किन्तु विविध गुण सम्पन्न औषधि का फल है । इसका वृक्ष हमारे देश के प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाया जाता है । यह उत्तर भारत में बहुलता से उत्पन्न होती है । कुमाऊँ से बंगाल तक, आसाम, ब्रह्मा तथा दक्षिण में मद्रास प्रान्त, कोयम्बटूर, कनारा, पश्चिमघाट के पूर्वीय प्रान्तों में, गञ्जाम, गोदावरी की तलहटी, सतपुरा पहाड़, गुजरात, बम्बई प्रान्त के घाटों के पास ऊँचे जंगलों में, कोंकण, मलावार, विन्ध्याचल पहाड़, हिमालय पहाड़ एवं काबुल की ओर इसके वृक्ष अधिकता से देखने में आते हैं । इसका वाटिकाओं में भी रोपण करते हैं । प्रायः इसका वृक्ष मध्यमाकार का होता है किन्तु कहीं-कहीं बड़े-बड़े वृक्ष भी देखने में आते हैं । नर्मदा के दक्षिण के वृक्ष १०० फीट तक ऊँचे होते हैं किन्तु उत्तर भारत में उत्पन्न हुए वृक्ष इतने बड़े नहीं होते । हरीतकी के वृक्ष वट, पीपल आदि वृक्षों की तरह दीर्घायु नहीं होते हैं, बल्कि कालान्तर में सूख कर गिर जाया करते हैं । इसकी छाल कालापन युक्त भूरे रंग की चौथाई इञ्च तक मोटी होती है । लकड़ी-पक्की और बहुत मजबूत होती है । इमारत के काम के लिये अच्छी समझी जाती है । यह किञ्चित् हरापान या पीलापन युक्त भूरे रंग के साथ खाकी रंग की होती है । टहनियों पर पत्ते सघन नहीं रहते, बल्कि न्यूनाधिक विपरीत रहते हैं । पत्ते-अड़ूसे के पत्तों से कुछ चौड़े महुवे के पत्तों के समान, ४ से आठ इञ्च तक लम्बे, किञ्चित् अंडाकार, नोकदार, सफेदी युक्त हरे और चमकदार होते हैं तथा स्पर्श में खुरदरे जान पड़ते हैं । वृन्त-एक इंच से कम एवं उसके अग्र भाग के ऊपरी पृष्ठ पर दो या अधिक सूक्ष्म ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं । वसन्त ऋतु में पुराने पत्ते गिर कर नवीन पत्ते निकल आते हैं । फूल-बारीक आम की मंजरी के समान दिखाई देते हैं । और वे देखने में सफेदी मायल या कुछ पीले रंग के होते हैं तथा उनमें दुर्गन्ध आती है । फल-किञ्चित् लम्बाई युक्त गोलाकार होते हैं, सूखते सूखते छिलके सिकुड़ जाते हैं और पाँच कोणाकार या पाँच रेखा युक्त दिखाई देने लगते हैं । शकल सूरत, आकार और डील-डौल एवं छोटे-बड़े, लम्बे, गोल इत्यादि भेदों से फल कई प्रकार के देखने में आते हैं ।
२१२ भावप्रकाशनिघण्टुः पूर्व बंगाल, आसाम और ब्रह्मा में एक अन्य जाति पाई जाती है जिसे लेटिन में Terminalia citrina Roxb. (टर्मिनेलिया सिट्रिना) कहते हैं । इसका वृक्ष ८० फीट तक ऊँचा होता है । इसके फल दो इंच तक लम्बे होते हैं । हरीतकी के फल पूर्ण पकने तक वृक्ष में बहुत कम ठहरते हैं । प्रायः कच्ची अवस्था में ही गिर जाया करते हैं । पका फल उत्तम समझा जाता है । उत्तम फल वह है जो नया हो और चिकना, गोल, भारी, तौल में कम-से-कम तोले से भी अधिक हो तथा पानी में डालने से डूब जाय । अपक्व अवस्था के छोटे, काले, द्राक्ष के समान फल मिलते हैं । यह बड़े हरें की अपेक्षा बहुत छोटे होते हैं । इन्हें हिन्दी में जंगी हरड़ एवं मराठी में बालहिरडा कहा जाता है । इनका स्वाद अधिक कसैला तथा कड़ुआ होता है । किसी किसी वाटिका में हरीतकी का वृक्ष नमूने की तरह देखने में आता है । वर्षा ऋतु में हरीतकी के छिलके को सुगमता से दूर कर गुठलियों को भूमि पर फेंक देने से ही कोई कोई बीज अङ्कुरित होकर पौधे के रूप में बढ़ते हैं । पतझड़ में पुराने पत्ते गिर जाने से चैत के महीने में प्रायः इसके पौधे सूखे से दिखाई देते हैं । उस समय से ज्येष्ठ तक पौधों को पानी से कभी-कभी सींचना होता है । बरसात का पानी पड़ने पर नवीन पत्ते निकल आते हैं और पौधे हरे-भरे हो जाते हैं । उसी समय उनको उठाकर स्थायी रूप से इष्ट जगह पर रोपण करना चाहिये । बरसात का पानी जमा होकर जहाँ पर तर मिट्टी जमा होती है उस जगह पर रोपण किया हुआ पौधा सतेज होता है । साधारण वृक्षों की तरह परिचर्या करने से ही इसके वृक्ष तैयार हो जाते हैं । आयुर्वेद में हरीतकी की जो सात जातियाँ कही गई हैं उनके आकार तथा रङ्ग-रूप और गुण भी भिन्न-भिन्न होते हैं । आयुर्वेद में प्रत्येक जाति की हरड़ के गुणों का वर्णन बहुत ही विचारपूर्वक किया गया है, परन्तु आजकल के पाश्चात्य विद्वान् लोग केवल दो ही प्रकार की हरीतकी को ग्राह्य मानते हैं । शेष जाति की हरीतकियों में यद्यपि प्रकार भेद मानते हैं, परन्तु गुणों में कुछ भेद नहीं मानते । इस संबंध में विशेष अनुसन्धान की आवश्यकता है । रासायनिक संगठन-पक्व हरीतकी में करीब ३० प्रतिशत कसैला द्रव्य होता है जो चेब्यूलीनिक एसिड के कारण है । इसके अतिरिक्त टैनिक एसिड २०-४० प्रतिशत, गैलिक एसिड, राल आदि द्रव्य हैं । इसका विरेचक द्रव्य एन्थ्राक्विनोन के समान है । बालहरड़ में एक हरे रंग की तैलीय राल मिलती है जिसे कभी-कभी माइरोबैलानिन् कहा जाता है । गुण और प्रयोग-हरीतकी श्रेष्ठ मृदु विरेचक द्रव्य है । इससे किसी प्रकार की हानि नहीं होती । शरीर की सभी क्रियाएँ इसके सेवन से सुधरती हैं । इसका उपयोग जीर्ण ज्वर, अतिसार, रक्तातिसार, अर्श, नेत्र रोग, अजीर्ण, प्रमेह, पाण्डु आदि में लाभकर होता है । जीर्ण कास, अर्श आदि में अगस्त्य हरीतकी एवं व्याघ्री हरीतकी आदि योगों के रूप में भी इसका व्यवहार किया जाता है । हरीतकी अच्छा व्रण रोपक है । मुखव्रण, पुराने घावों तथा अर्श में इसका लेप लाभप्रद है । दंत मञ्जन के लिये इसका महीन चूर्ण उपयोगी है । बाल हरीतकी-यह मृदु विरेचक है । जीर्ण विबन्ध एवं अर्श में इसका अच्छा उपयोग होता है । मात्रा-चूर्ण दो से चार माशा । अथ विभीतकस्य नामानि गुणाँश्चाह विभीतकस्त्रिलिङ्गः स्यादक्षः १ कर्षलस्तु सः । कलिद्रुमो भूतवासस्तथा कलियुगालयः ।।३५।। विभीतकं स्वादुपाकं कषायं कफपित्तनुत् । उष्णवीर्यं हिमस्पर्शं भेदनं कासनाशनम् ।।३६।। १. ‘स्यान्नाक्षः’ इति पाठा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammpmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २१३ रूक्षं नेत्रहितं केश्यं कृमिवैस्वर्यनाशनम् । बिभीतमज्जातृट्छर्दिकफवातहरी लघुः ।। कषायो मदकृच्चाथ धात्रीमज्जाऽपि तद्गुणः ।। ३७ ।। बहेड़े के नाम तथा गुण-विभीतक, (यह शब्द तीनों लिङ्गों में होता है), अक्ष, कर्षफल, कलिद्रुम, भूतवास और कलियुगालय ये सब संस्कृत नाम बहेड़े के हैं। बहेड़ा-मधुर विपाकवाला, कषाय रसयुक्त, कफ व पित्त का नाशक, उष्णवीर्यवाला, शीतस्पर्श वाला, मल का भेदन करने वाला, कास का नाशक, रूक्ष, नेत्र तथा बालों के लिये हितकर, कृमि तथा स्वरभेद को दूर करने वाला होता है। बहेड़े की मींगी-प्यास, वमन और कफ एवं वायु का नाश करने वाली, लघुपाकी, कषाय रस युक्त और मदकारक होती है। इसी भाँति आँवले की मींगी के भी ये ही सब गुण हैं। [३५-३७] २. बहेड़ा हिं०-बहेड़ा, फिनास, भैरा, बहेरा। बं०-बयड़ा, बोहेरा, बेहरी, बहेड़ा। म०-बेहड़ा, बेहाड़ा, धाटींग, बहेला, बहड़ा। गु०-बेहेड़ा, बेड़ा। क०-तोड़े, तोरै, तारेकायि। ते०-तडिट्टेटु, बल्ला, ताड़िा, तनिक्काय, तनि, तन्द्रा, तोन्दी। ता०-अक्कम, तन्री, तनितांडी, तोअण्डी, तोखांडी, तंरिक्कय, तनी, कट्टुटुएलुपय। मा०-बहेड़ा। पं०- बहेड़ा। मु०-बहेड़ा। फा०-बलेले, बलेला, बलैलाह। अ०-बलेलज। अं०-Beleric Myrobalans; (बेलेरिक् मैरोबेलन्स्) । Beddanut (बेड्डानट)। ले०-Terminalia belerica Roxb. (टर्मिनेलिया बेलेरिका)। Fam. Combretaceae (कॉम्ब्रिटेंसी) । हमारे देश के प्रायः सब प्रान्तों में बहेड़े का वृक्ष देखने में आता है, विशेष कर नीची पहाड़ियों पर अधिक पाया जाता है। यह जंगल, पहाड़ तथा ऊँची भूमि में उत्पन्न होता है। वृक्ष-बहुत विशाल हुआ करता है। ऊँचाई ६० से १०० फीट तक होती है। स्तम्भ मोटा, सीधा, खड़ा, गोलाकार होता है। छाल-आधा इञ्च तक मोटी, कालापन युक्त या नीलापन युक्त खाकी रंग की होती है। लकड़ी-हलकी खाकी या किञ्चित् पीलापन युक्त होती है। शाखायें प्रायः छः से दस फीट लम्बी होती है किन्तु कभी-कभी २० फीट लम्बी शाखायें भी देखने में आती हैं। पत्ते-महुवे के पत्तों के समान तीन से आठ इञ्च तक लम्बे तथा दो-तीन इञ्च चौड़े होते हैं। ये विषमवर्ती प्रायः छोटी-छोटी टहनियों के अन्त में सघन रहते हैं। प्रायः पतझड़ में इसके सब पत्ते गिर जाते हैं और चैत तक नवीन पत्ते निकल आते हैं। फूल-तीन से छः इञ्च तक लम्बी सीकों पर नन्हें फूलों की मञ्जरियाँ आती हैं। ये मैले खाकी या फीके हरे रंग के होते हैं। फल-एक इञ्च लम्बा, गोल और अण्डाकार होता है। पतझड़ में जब इसके पुराने पत्ते गिर जाते हैं और नवीन पत्ते आते रहते हैं, प्रायः उसी समय फूल भी आते हैं। शीतकाल के प्रारम्भ में उस पर फल लग जाते हैं और अगहन-पूस तक पक जाते हैं। वृक्ष से बबूल के गोंद के समान एक प्रकार का गोंद निकलता है। फलों की मोंगी से तेल निकाला जाता है। किसी-किसी वाटिका में बहेड़े का वृक्ष देखने में आता है। वर्षा के प्रारम्भ में छिलके रहित गुठलियों को भूमि पर फेंक देने से ही वे अङ्कुरित हो पौधे के रूप में परिणत होती हैं। इसकी परिचर्या हरीतकी के पौधों के समान करनी चाहिये। रासायनिक संगठन-इसके फल में १७% टैनिन द्रव्य रहता है तथा इसकी मींगी में २५% तक हलके पीले रंग का तैल रहता है। इसके अतिरिक्त राल, सैपोनिन आदि द्रव्य रहते हैं। गुण और प्रयोग-बहेड़े का विशेष उपयोग त्रिफले के रूप में होता है। इसका अर्ध पक्व फल विरेचक और पूरा पका हुआ या सूखा फल संकोचक माना जाता है। इसका उपयोग खाँसी, गले के रोग, स्वरभंग, ज्वर, उदर, प्लीहावृद्धि, अर्श, अतिसार, कुष्ठ आदि रोगों में होता है। यह मस्तिष्क के लिये बल्य है। नेत्र पर इसका लेप लाभकारी है।
२१४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसकी मज्जा वेदनास्थापक, शोथघ्न और कुछ मदकारी है। मज्जा का तेल बालों के लिये अत्यन्त पौष्टिक, रंजक एवं कण्डूघ्न और दाहशामक है। मज्जा अथवा छिलके को भून कर मुख में रखने से खाँसी में बहुत लाभ होता है। मात्रा— चूर्ण तीन से नौ माशा। अथामलक्या नामानि गुणाँश्चाह वयस्यामलकी वृष्या जातीफलरसं शिवम् । धात्रीफलं श्रीफलं च तथामृतफलं स्मृतम् ।। त्रिष्वामलकमाख्यातं धात्री तिष्यफलाऽमृता ।।३८।। हरीतकीसमं धात्रीफलं किन्तु विशेषतः। रक्तपित्तप्रमेहघ्नं परं वृष्यं रसायनम् ।।३९।। हन्ति वातं तदम्लत्वात्पित्तं माधुर्यशैत्यतः। कफं रूक्षकषायत्वाफलं धात्र्यास्त्रिदोषजित् ।।४०।। यस्य यस्य फलस्येह वीर्यं भवति यादृशम् । तस्य तस्यैव वीर्येण मज्जानमपि निर्दिशेत् ।।४१।। आँवले के नाम तथा गुण— वयस्या, आमलकी, वृष्या, जातीफलरसा, शिव, धात्रीफल, श्रीफल और अमृत फल ये सब आँवले के नाम हैं। आमलक (यह शब्द तीनों लिङ्गों में होता है), धात्री, तिष्यफला, अमृता ये भी आँवले के संस्कृत नाम हैं। हरड़ के जो-जो गुण हैं, वे ही आँवले के भी हैं। किन्तु विशेष यह है कि—यह रक्तपित्त तथा प्रमेह का नाशक है और अत्यन्त वृष्य (वीर्य के लिये हितकर) एवं रसायन है। आमला— अम्ल रस युक्त होने से वायु को तथा मधुर रस युक्त और शीतल होने से पित्त को दूर करता है और रूक्ष तथा कषाय रस युक्त होने से कफ को दूर करता है। अतएव यह त्रिदोषनाशक है। यहाँ सर्वत्र यह समझना चाहिये कि जिन-जिन फलों का गुण जैसा उष्ण या शीतवीर्य हो उन-उन फलों की मींगी का भी गुण वैसा ही उष्ण या शीतवीर्य होता है। [३८-४१] ३. आमला हिं०— आमला, आँवला, आँवडा, आँवरा, औंड़ा, औरा। बं०— आमला, आमरो, अमला, आमलकी। म०— आवले, आवली, आवलकाठी। पं०— आमला, अम्बुल, अम्बलो। मा०— आँवला। गु०— आँवला, आमला, आमली। क०— नेल्लि, नेल्लिकायि। ते०— उसरिकाय, उसरिक। उ०— अण्डा। आसा०— अमला, आमलकी। गारो०— 'अम्बरी। ता०— नेल्लिमंरं, नेल्लिकाय। ब्रह्मा०— शब्जु, जिफियूसी। फा०— आमलज, आमलज्, आमलय, आमलह, आमलाह, आम्लझ। अ०— आमजब्ज। अं०— Emblic Myrobalan (एम्ब्लिक् मैरोबेलन्); Indian gooseberry (इण्डियन गूसबेरी)। ले०— Phyllanthus emblica Linn. (फाइलेन्थस एम्ब्लिका); Emblica officinalis Gaertn. (एम्ब्लिका ऑफि सेनेलिस्)। Fam. Euphorbiaceae (यूफर्बियेसी)। आमला भारतवर्ष के प्रायः सब उष्ण प्रदेशों में बागी और जंगली दोनों प्रकार का पाया जाता है। विशेष कर उत्तर भारत, अवध, विहार और पूर्वी देशों में इसकी उपज अधिक है। हिमालय पहाड़ के नीचे जम्बू से पूर्व की ओर तथा दक्षिण की ओर सिलोन तक उत्पन्न होता है। तथा चीन एवं मलयद्वीप में भी मिलता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का सुहावना होता है, किन्तु जंगली वृक्ष ऊँचे कद का बड़ा होता है। छाल-चौथाई इञ्च मोटी हलके खाकी रङ्ग की एवं छिलकेदार होती है। लकड़ी-लाल रङ्ग की और मजबूत होती है। इसमें सार भाग नहीं होता है। पत्ते— छोटे-छोटे इमली के पत्तों के समान और फूल— लाई के दानों के समान हरापन युक्त पीले रङ्ग के गुच्छों में शाखाओं से सटे रहते हैं। वसन्त ऋतु में जब इसके पुराने पत्ते झड़ जाते हैं तब वृक्ष पत्रशून्य दिखाई पड़ता है। उसी समय यह फूलता है और नवीन पत्ते निकलते हैं। फूलों में नींबू के फूल के समान मन्द सुगन्ध आती है। फल— डालियों में सटे हुये दिखाई देते हैं। वे गोल चमकदार और छः रेखाओं से युक्त होते हैं। कच्ची अवस्था में हरे, पकने पर हरापन युक्त किञ्चित् पीले या सुर्ख और सूखने पर काले रङ्ग के होकर फाँकें पृथक्-पृथक् हो जाती हैं और साथ ही गुठली भी फट जाती है। उनसे त्रिकोणाकार छोटे-छोटे बीज निकलते हैं। बीजों से तेल निकलता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २१५ बीज से ही इसके पौधे उत्पन्न होते हैं और थोड़े ही यत्न से साधारण वृक्षों की भाँति प्रायः दूमट मिट्टी में इसके वृक्ष सतेज होते हैं। प्रायः वाटिकाओं में कलमी आमले के वृक्ष रोपित किये जाते हैं। जङ्गली के फल एक तोले तक और बागी कलमी आँवले के पाँच तोले से अधिक भी देखने में आते हैं। बनारसी आँवले सर्वोत्तम समझे जाते हैं। किन्तु जितने आँवलों की यहाँ खपत होती है उतने उत्पन्न नहीं होते। खटिक लोग दूसरी जगह से मँगाकर बेचते हैं। पके फल बहुत कम मिलते हैं। प्रायः कच्ची अवस्था में ही तोड़कर बेंच लेते हैं। रासायनिक संगठन-रासायनिक दृष्टि से इसके टैनिन में गैलिक एसिड, एलाइगिक एसिड और ग्लूकोज होता है। इसमें विटामिन 'सी' तथा 'पेक्टिन बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है। 'विटामिन सी' की मात्रा १०० ग्रा. में ६००- ९२१ मि० ग्रा० तक पाई जाती है। आँवला के सूखे चूर्ण में भी 'विटामिन सी' पर्याप्त मात्रा में होती है क्योंकि इसके अन्दर का टैनिन 'सी' को नष्ट नहीं होने देता। गुण और प्रयोग-आँवला एक अत्यंत महत्त्व की औषधि है। इसका बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है। इसका ताजा फल रसायन, वृष्य, रक्तपित्त को दूर करने वाला, शीतल, मृदु विरेचक, मूत्रल एवं यकृत् की क्रिया ठीक करने वाला है। इसका सूखा फल ग्राही, शीतल, दीपन एवं रक्तस्रावरोधक है। रसायन के लिये एक विशिष्ट प्रकार की विधि से सेवन करने का विधान चरक में किया गया है। ताजे सूखे आँवले के चूर्ण को लेकर उसको ताजे आँवले के रस की भावना देकर सुखाना चाहिए। यह जितनी अधिक बार दी जायेगी उतना ही गुणकारक होगा। कम-से-कम २१ भावना देकर सुखाकर रखना चाहिये। इस चूर्ण की ३ से ६ माशा की मात्रा गोघृत तथा मधु (असमान मात्रा) के साथ दिन में दो बार लेनी चाहिये। इसी प्रकार च्यवनप्राश का भी उपयोग किया जा सकता है। इसके सेवन से शरीर की सभी क्रियाएँ सुधरकर शरीर पुष्ट एवं बलवान् बनता है। स्मृति, मेधा, कांति बढ़ती है। श्वास, कास, क्षय, पांडु, अग्निमान्द्य, वीर्य दोष आदि दूर होते हैं। आँवला एवं हल्दी का क्वाथ बस्तिशोथ एवं पित्त प्रकोपजन्य व्याधि में उपयोगी है। आँवले का रस मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, पित्तजशूल, कामला, हिक्का, वमन, जीर्ण विबन्ध में मिश्री मिलाकर शर्बत के रूप में बहुत लाभदायक है। प्रशीताद (Scurvy) रोग में भी यह बहुत उपयोगी है। आँवले का चूर्ण अर्श, अतिसार, संग्रहणी, अत्यार्तव एवं प्रतिश्याय में उपयोगी है। पेड़ पर ही लगे हुये आँवलों को चीरने से जो रस निकलता है उससे आँख धोने से अक्षिशोथ दूर होता है। उसी प्रकार इसके बीजों की मींगी के क्वाथ से आँख धोने से आँखों का दर्द दूर होता है। अक्षिप्रक्षालन के लिये रातभर जल में भिगोये आँवले के चूर्ण का पानी भी उपयोगी है। लोह भस्म के साथ आँवले का उपयोग पाण्डु, कामला में विशेष लाभकर होता है। आँवले के पत्तों का क्वाथ मुख व्रण में लाभदायी है। इसके कोमल पत्तों को छाछ के साथ देने से अजीर्ण और अतिसार में लाभ होता है। आँवले का बस्तिप्रदेश पर लेप मूत्रावरोध में, एवं गर्भाशय मुख पर रक्त प्रदर में उपयोगी है। आँवले का विशेष उपयोग च्यवनप्राश, आमलकीरसायन, त्रिफला एवं धात्री लौह में किया गया है। मात्रा-चूर्ण ३ माशे से १ तोला तक। अथ त्रिफलाया लक्षणनामगुणानाह पथ्याबिभीतधात्रीणां फलैः स्यात्त्रिफला समैः । फलत्रिकञ्च त्रिफला सा वरा च प्रकीर्तिता ।।४२।। त्रिफला कफपित्तघ्नी मेहकुष्ठहरा सरा । चक्षुष्या दीपनी रुच्या विषमज्वरनाशिनी ।।४३।।
२१६ भावप्रकाशनिघण्टुः त्रिफला के लक्षण, नाम तथा गुण- हरड़, बहेड़ा और आँवला इन तीनों के फल यदि समान भाग से एकत्र किये जायँ तो यही त्रिफला कहलाता है। इसके फलत्रिक और वरा ये भी नामान्तर हैं। त्रिफला- कफ तथा पित्त को नाश करनेवाला एवं प्रमेह व कुष्ठ को दूर करनेवाला, दस्तावर, नेत्रों के लिये हितकर, अग्निदीपक, रुचिकारक एवं विषम ज्वर को नाश करने वाला होता है। [४२-४३] त्रिफला आजकल विद्वान् यद्यपि हरड़, बहेड़ा और आँवला-इन तीनों को एक साथ मिलाकर त्रिफला मानते हैं तो भी इनके सम भाग होने में मतभेद है। कोई एक भाग हरड़, दो भाग बहेड़ा और तीन भाग आँवला एवं कोई एक भाग हरड़, दो भाग बहेड़ा और चार भाग आँवला को त्रिफला कहते हैं। एक हरड़, दो बहेड़े और चार आँवले को भी बहुत लोग त्रिफला मानते हैं। उसी प्रकार एक हरड़ से एक भाग हरड़, दो बहेड़ा से दो भाग बहेड़ा और चार आँवले से चार भाग आँवले समझते हैं किन्तु यदि एक हरड़, दो बहेड़े और चार आंवले (बनारसी बड़े आँवले से भिन्न) लिये जायें तो ये प्रायः समभाग ही होते हैं। अथ शुण्ठ्यानामानि गुणाँश्चाह शुण्ठी विश्वा च विश्वञ्च नागरं विश्वभेषजम् । ऊषणं कटुभद्रञ्च शृङ्गवेरं महौषधम् ।।४४।। शुण्ठी रुच्यामवातघ्नी पाचनी कटुका लघुः । स्निग्धोष्णा मधुरा पाके कफवातविबन्धनुत् ।।४५।। वृष्या ^१स्वर्य्यावमिश्वासशूलकासहृदामयान् । हन्ति श्लीपदशोथार्श आनाहोदरमारुतान् ।।४६।। आग्नेयगुणभूयिष्ठात् ^२ तोयांशपरिशोषि यत् । संगृह्णाति मलं तत्तु ग्राहि शुण्ठ्यादयो यथा ।।४७।। विबन्धभेदिनी या तु सा कथं ग्राहिणी भवेत् । शक्तिर्विबन्धभेदे स्याद्गतो न मलपातनो ।।४८।। सोंठ के नाम तथा गुण- शुण्ठी, विश्वा, विश्व, नागर, विश्वभेषज, ऊषण, कटुभद्र, शृङ्गवेर और महौषध ये सब संस्कृत नाम सोंठ के हैं। सोंठ- रुचिकारक, आमवातनाशक, पाचक, कटुरस-युक्त, लघुपाकी, स्निग्ध, उष्णवीर्य, विपाक में मधुर रस युक्त, कफ, वात और विबन्ध (विबद्धता) को दूर करने वाली, वृष्य, स्वर के लिये हितकारी, वमन, श्वास, शूल, कास, हृद्रोग, श्लीपद, शोथ, बवासीर, आनाह और उदर की वायु इन सबों को दूर करती है और जो द्रव्य अधिकतर अग्नि सम्बन्धी गुणों से युक्त होने से जलीय अंश को सूखाने वाला तथा मल का संग्राहक अर्थात् पतले मल के जलीय भाग को सुखाकर गाढ़ा करने वाला होता है वह 'ग्राही' कहलाता है, जैसे कि-सोंठ आदि। अब यहाँ पर प्रश्न उपस्थित होता है कि- जो सोंठ विबन्ध (बंधे हुये मल) का भेदन करने वाली होती है वह कैसे ग्राही होगी ? क्योंकि अभी अपने ग्राही द्रव्य का 'मल को गाढ़ा करना' लक्षण बतलाया है। इसका उत्तर यह है कि- इस द्रव्य का यह प्रभाव है कि- यह विबंध (मलबद्धता) के दूर करने में तो समर्थ होती है, किन्तु मल के गिराने में नहीं होती है क्योंकि आश्रय भेद से द्रव्यों के कर्मों में भी प्रभाववश भिन्नता हो ही जाती है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। [४४- ४८] ४. सोंठ हिं०- सोंठ, सौंठ, सूंठ, सिंघी। बं- शुंठ, शुण्ठि, सुंट। मा०-सूंठ। सिंहली०-वेलिच इङ्गरु। गु०-शुंठ्य, सुंठ-सूंठ। क०-शुंठि, शोंठि, ओणसुठि, वेनंशुठी। ते०-शोंठी, सोंठी, सोंटि। ता०-शुक्कु। प०-सुंड। १. 'स्वर्ये'ति पाठः। २. 'भूयिष्ठमि'ति पाठः। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २१७ मला० - चुक्क । ब्रह्मी ० - गिन्सीखियाव । फा० - जञ्जबील, जजबीलखुश्क । अ० - जञ्जबिले आविस । अं० - Dry Zingiber (ड्राइजिझिबेर) Ginger (जिंजर) । ले० - Zingiber officinale Roscoe (जिंजिबेर ऑफिसिनेल) । Fam. Zingiberaceae (जिंजिबरेसी) । सुखाई आदी को सोंठ कहते हैं । सुखाने की विधि के अनुसार इसके स्वरूप में अंतर पाया जाता है । आदी को खूब स्वच्छ कर पानी या दूध में उबाल कर सुखाते हैं । प्रायः सोंठ दो प्रकार की होती है एक रक्ताभ भूरी और दूसरी सफेद । चूने के साथ शोधन करने से यह सफेद तथा टिकाऊ हो जाती है । जिनमें रेशे बहुत कम होते हैं, वह अच्छी समझी जाती है । रासायनिक संगठन-सोंठ में १-३% उडन शील तैल रहता है । जिंजेरोल तथा शोगोल नामक इसमें कटु द्रव्य है । इसके अतिरिक्त इसमें रेजिन तथा स्टार्च रहता है । अच्छी सोंठ में राख ६% से अधिक नहीं रहती जिसमें से जल में घुलनशील राख की मात्रा १.७% से कम न होनी चाहिये । इसमें मद्यसार में घुलनशील सत्त्व ४.५% से कम तथा जल में घुलनशील सत्त्व १०% से कम न होना चाहिये । गुण और प्रयोग-सोंठ यह अनेक रोगों में अन्य औषधियों के साथ उपयोग में आती है । सोंठ, मिरिच और पीपल तीनों मिलकर त्रिकटु कहलाती हैं जिसका बहुत व्यवहार होता है । सोंठ यह एक उत्तम पाचक, कफघ्न, वातहर एवं उत्तेजक सुगन्धित द्रव्य है । इससे उदरगत वायु के कारण होने वाले उदरशूल, हृच्छूल में लाभ होता है । इसके सेवन से पाचन क्रिया ठीक होकर उदर में वायु का सञ्चय नहीं होता । जीर्ण सन्धिवात में विशेषतः वृद्धों में इसके फांट का नित्य रात में प्रयोग लाभकारी होता है । यह उष्ण एवं वातहर होने से किसी भी प्रकार की पीड़ा में लाभकारी है गरम जल में सोंठ के चूर्ण का लेप शिरःशूल, वातनाड़ीशूल एवं दन्तशूल में उपयोगी है । पसीना अधिक होकर हाथ और पैरों में शीत आने पर इसके चूर्ण को रगड़ने से रक्ताभिसरण की क्रिया ठीक होकर शीत दूर होता है । यह कफघ्न होने के कारण इसका प्रयोग श्वास, कास, प्रतिश्याय, गले के रोग, स्वरभङ्ग इत्यादि में किया जाता है । इसके लिये इसका फांट बना कर लेना चाहिये । आमदोष दूर करने के लिये सोंठ के चूर्ण को घी के साथ सुबह लेना चाहिये । इससे आमातिसारजन्य शूल दूर होता है । गुड़ के साथ सोंठ का उपयोग अर्श, अजीर्ण, अतिसार, गुल्म, शोथ, प्रमेह, कामला आदि में किया जाता है । वल्य औषधियों के साथ सोंठ का उपयोग क्षतक्षीण एवं दुर्बल रोगियों के लिये उपयोगी है । विरेचक औषधियों के साथ सोंठ लेने से हल्लास, पेट में मरोड़ या ऐंठन नहीं होती । मात्रा-चूर्ण २ से ८ रत्ती । अथार्द्रकस्य नामानि गुणांश्चाह आर्द्रक श्रृङ्गवेरं स्यात्कटुभद्रंतथाऽऽर्द्रिका । आर्द्रिका भेदिनी गुर्वी तीक्ष्णोष्णा दीपनी मता ।।४९।। कटुका मधुरा पाके रूक्षा वातकफापहा । ये गुणाः कथिताः शुण्ठ्यास्तेऽपि सन्त्यार्द्रकेऽखिलाः ।।५०।। भोजनाग्रे सदा पथ्यं लवणाऽऽर्द्रकभक्षणम् । दाहे निदाघशरदोर्नैव पूजितमार्द्रकम् ।।५२।। अदरख के नाम तथा गुण-आर्द्रक, शृङ्गबेर, कटुभद्र और आर्द्रिका ये संस्कृत नाम अदरख के हैं । अदरख- मल को भेदन करने वाली, पाक में गुरु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, कटुरसयुक्त, विपाक में मधुर रसयुक्त, रूक्ष, वात तथा कफ को नष्ट करने वाली होती है और जितने गुण पूर्व में सोंठ के कह आये हैं, सभी गुण अदरख में भी रहते हैं और भोजन करने के प्रथम सर्वदा सेंधा नमक के साथ अदरख खाना हितकारी होता है । क्योंकि यह अग्नि को दीप्त करने वाला, रुचिकारक, जिह्वा तथा कण्ठ का शोधन करने वाला होता है । कुष्ठ, पाण्डुरोग, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, व्रण, ज्वर, दाह इन रोगों में एवं ग्रीष्म तथा शरद् ऋतुओं में अदरख खाना हितकर नहीं है । [४९-५२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
२१८ भावप्रकाशनिघण्टुः ५. अदरक हिं०-अदरख, आदी। बं०-आदा। पं०-अदरक, अद, अद्रक, आदा। म०-आले। ते०-अल्ल, अल्लम्। ब्रह्मी०-ख्येन, सेङ्ग, गिनसिन। गु०-आदु। क०-अल्ल, असिशोंठि, हसीसुण्ठी। मा०-आदो। ता०-शुक्क, इञ्जि। मल०-इञ्जी। सिंहली०-अमुडुङ्कुरु। फा०-अञ्जीबीले तर। अ०-जंजबीले रतव। अं०-Ginger root (जिञ्जर रूट)। ले०-Zingiber officinale (जिंजिबेर ऑफिसिनेल)। भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में अदरक की खेती की जाती है। अदरक का पौधा प्रायः एक हाथ ऊँचा होता है। इसके पत्ते बाँस के पत्तों के समान पर उनसे कुछ छोटे होते हैं। इसकी जड़ में जो कन्द होता है, उसी को अदरक कहते हैं। इसका फूल, फल बहुत कम देखने में आता है। किसी- किसी पुराने पौधे पर फूल आते हैं। फूलों का रङ्ग जामुनी रङ्ग का होता है। अदरक रेतीली भूमि में गोबर की खाद डाली हुई दुमट मिट्टी में अधिक उत्पन्न होती है। इसके लिये पर्याप्त वर्षा की आवश्यकता रहती है। गुण और प्रयोग-आर्द्रक के रस का उपयोग शहद के साथ विशेषकर श्वास, कास आदि कफ रोगों में अनुपान के लिये किया जाता है। भोजन के पूर्व सेंधानमक और आदी के सेवन से भूख बढ़ती है, जिह्वा एवं कण्ठ की शुद्धि होकर अन्न में रुचि भी बढ़ती है। आर्द्रक रस और प्याज का रस १, १ तोला लेने से उल्टी और जी मिचलाना दूर होता है। मलाबार में जलोदर रोग में इसका रस, तीव्र मूत्रनिःसारक रूप में दिया जाता है। इसकी मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाई जाती है जिससे मूत्र की मात्रा भी बढ़ती जाती है। लेकिन पुराने हृदय रोग एवम् वृक्कविकार (ब्राइट्स डिसौजा) में यह हानिकारक है। गुड़ के साथ इसका रस शीतपित्त में उपयोगी है। आदी का रस गुनगुना गरम करके कान में डालने से कर्णशूल दूर होता है। मात्रा-स्वरस ½-२ चम्मच। अथ पिप्पल्या नामानि गुणाँश्चाह पिप्पली मागधी कृष्णा वैदेही चपला कणा। उपकुल्योष्णा शौण्डी कोला स्यात्तीक्ष्णतण्डुला ।।५३।। पिप्पली दीपनी वृष्या स्वादुपाका रसायनी। अनुष्णा कटुका स्निग्धा वातश्लेष्महरो लघुः ।।५४।। पिप्पली रेचनी हन्ति श्वासकासोदरज्वरान्। कुष्ठप्रमेहगुल्मार्शः प्लीहशूलाममारुतान् ।।५५।। आर्द्रा कफप्रदा स्निग्धा शीतला मधुरा गुरुः। पित्तप्रशमनी सा तु शुष्का पित्तप्रकोपिणी ।।५६।। पिप्पली मधुसंयुक्ता मेदःकफविनाशिनी। श्वासकासज्वरहरी वृष्या मेध्याऽग्निवर्द्धिनी ।।५७।। द्विगुणः पिप्पलीचूर्णाद् गुडोऽत्र भिषजां मतः ।।५८।। पीपर के नाम तथा गुण-पिप्पली, मागधी, कृष्णा, वैदेही, चपला, कणा, उपकुल्या, ऊषणा, शौण्डी, कोला और तीक्ष्णतण्डुला ये सब संस्कृत नाम पीपर के हैं। पीपर-अग्निदीपक, वृष्य, पाक में मधुर रसयुक्त, रसायन, अनुष्ण (थोड़ी उष्ण), कटुरसयुक्त, स्निग्ध, वात तथा कफ नाशक, लघुपाकी और रेचक (दस्तावर) है। यह-श्वास, कास, उदररोग, ज्वर, कुष्ठ, प्रमेह, गुल्म, बवासीर, प्लीहा, शूल और आमवातनाशक है। कच्ची पीपर-कफकारी, स्निग्ध, शीतल, मधुर, गुरु और पित्त को शान्त करने वाली है। किन्तु सूखी पीपर-पित्त को कुपित करने वाली है। मधु (शहद) से युक्त पीपर-मेद, कफ, श्वास, कास और ज्वर का नाश करने वाली होती है एवं वृष्य, मेधा (धारणाशक्ति) के लिये हितकारी और अग्निवर्द्धक भी है। गुड़ से युक्त पीपर-जीर्णज्वर और अग्निमान्द्य में हितकर होती है-एवं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
हरितक्यादिवर्गः २९१ कास, अजीर्ण, अरुचि, श्वास, हृद्रोग, पाण्डुरोग तथा कृमिरोग को दूर करने वाली भी होती है। यहाँ पर अर्थात् पीपर के साथ गुड़ मिलाने में पीपर के चूर्ण के तोल से दूना गुड़ मिलाना चाहिए ऐसा वैद्यों का मत है। [५३-५८] ६. पीपल हिं०-पीपर, पीपल। बं०-पीपुल, पिपुल। म०-पिंपली। गु०-पीपर, लीड़ी पीपल, लिंडी पीपल। क०- हिप्पली। ते०-पिप्पलु, पिप्पलि, पिप्पल चेट्टु। ता०-तिप्पली। तु०-इप्पली। मला०-तिप्पली। ब्राह्मी- पौखीन। गोम०-हिपली। मा०-पीपल। फा०-पिलपिल दराज, फिल्फिल् दराज, पीपल दराज। अ०-दारफिल्फिल, डाल फिल्फिल्। अं०-Long pepper (लांग पीपर); Dried catkins (ड्राइड कॅटकिन्स)। ले०-Piper longum Linn (पाइपर लांगमं)। Chavica roxburghii (चविका रॉक्सवर्घाइ)। Fam. Piperaceae (पाइपरेसी)। पीपल-इस देश से गरम प्रान्तों में पूर्व नेपाल से आसाम, खासिया के पहाड़ों पर, बंगाल में, पश्चिम की ओर बम्बई तक तथा दक्षिण की ओर ट्रावनकोर तक पायी जाती है। सीलोन, मलावका तथा फिलीपाइन द्वीपों में भी यह पाई जाती है। पीपल लता जाति की वनौषधि का फल है। इसकी बेल-अन्य लताओं की भाँति अधिक विस्तार में नहीं बढ़ती किन्तु थोड़ी ही दूरी में फैलती है। जड़-कुछ मोटी और खड़ी सी होती है। उससे शाखाएँ निकल कर भूमि पर फैलती हैं। पत्ते-२।।-३।। इञ्च के घेरे में, गोलाकार, पान के पत्तों के आकार वाले कोमल होते हैं। ऊपर के पत्ते विनाल होते हैं। फलगुच्छ-१-१।। इञ्च लम्बे और कृष्णाभ होते हैं जिनमें अत्यन्त छोटे-छोटे फल लगे रहते हैं। एक दूसरी जाति की पीपल को पहाड़ी पीपल कहते हैं। इसका लेटिन नाम Piper sylvaticum Roxb. (पीपर सिलवेटिकम्) है। यह आसाम और बंगाल में अधिक उत्पन्न होती है। इसकी लता कई फीट तक बढ़ जाती है और सूखने पर आपस में लिपटी हुई मालूम होती है। पत्ते-पान के आकार वाले, उक्त पीपल के पत्तों से किञ्चित् बड़े होते हैं। फलगुच्छ-पौन से १।। इञ्च लम्बे गोल होते हैं। इसको बङ्गाल के कविराज अधिक व्यवहार में लाते हैं। पीपल छोटी और बड़ी-इसमें १% उड़न शील तैल रहता है जिसमें से करीब ५-६.४% पाइपरीन, पाइपरीडीन एवं एक कटु राल (चविसिन), स्टार्च और स्नेह आदि द्रव्य रहते हैं। गुण और प्रयोग-पीपल रसायन, सुगन्धि, दीपक, पाचक, उष्ण, वातहर और कफघ्न है। इसका उपयोग आनाह, अपचन, अग्निमान्द्य, उदरशूल, कास, श्वास, जीर्णज्वर, प्रसूतिज्वर, आमवात, गृध्रसी, कटिशूल, वातरक्त, अङ्गघात आदि रोगों में किया जाता है। (१) मधु के साथ इसका चूर्ण नये वा पुराने कास, श्वास, स्वरभङ्ग तथा हिचकी में उपयोगी है। (२) प्रसूतिज्वर में गर्भाशय शुद्धि के लिए इसका मधु के साथ अच्छा उपयोग होता है। (३) वर्धमान पिप्पली का उपयोग रसायन के लिए एवं अधोशाखाघात, पुरानी खाँसी, दमा, यक्ष्मा, प्लीहावृद्धि, उदर, अर्श आदि रोगों में बहुत लाभदायी है। इसके लिए प्रथम तीन दिन पीपल का फांट मधु अथवा शर्करा के साथ दिया जाता है फिर नित्य तीन पीपल बढ़ाई जाती है। इस प्रकार दसवें दिन ३० पीपल का फांट दिया जाता है। फिर इसी प्रकार तीन पीपल नित्य कम की जाती है। कुछ लोग आधा दूध आधा जल में उबालकर दूध शेष रहने पर उसी पीपल को खिलाकर ऊपर से वही दूध पिलाते हैं। इसके अतिरिक्त इसके चूर्ण को घृत और मधु के साथ उपयोग किया जा सकता है।
२२० भावप्रकाशनिघण्टुः (४) पीपल चौसठ प्रहर घोट कर उपयोग करने से जीर्ण ज्वर में विशेष लाभदायी होती है। (५) सोंठ एवं पीपल से सिद्ध तैल की मालिश गृध्रसी, कटिशूल तथा अधोशाखाघात में उपयोगी है। (६) त्रिकटु और सहिजन के बीज को अगस्तिमूल के रस से घोटकर उसका नस्य देने से बेहोशी, मूर्च्छा आदि दूर होती है। मात्रा-चूर्ण दो चार रत्ती। दर्पनाशक-जरेशक, बबूल का गोंद और इसबगोल। अथ मरीचस्य नामानि गुणाँश्चाह मरिचं वेल्लजं कृष्णमूषणं धर्मपत्तनम् ॥५९॥ मरिचं कटुकं तीक्ष्णं दीपनं कफवातजित् । उष्णं पित्तकरं रूक्षं श्वासशूलकृमीन्हरेत् ॥६०॥ तदार्द्रं मधुरं पाके नात्युष्णं कटुकं गुरु । किञ्चित्तीक्ष्णगुणं श्लेष्मप्रसेकि स्यादपित्तलम् ॥६१॥ मरिच के नाम तथा गुण-मरिच, वेल्लज, कृष्ण, ऊषण और धर्मपत्तन ये मरिच के संस्कृत नाम हैं। मरिच- कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, कफ तथा वायु को दूर करने वाला, उष्णवीर्य, पित्तकारक और रूक्ष है एवं श्वास, शूल तथा कृमिरोग को नष्ट करने वाला होता है। यदि यही गीला (कच्चा) हो तो-पाक में मधुर रस युक्त, थोड़ा उष्णवीर्य, कटुरस युक्त, पाक में गुरु, थोड़ा तीक्ष्ण गुण से युक्त, कफ को गिराने वाला और थोड़ा पित्तकारक होता है।[५९-६१] ७. मरिच हिं०-मरिच, मिरच, गोल मरिच, काली मरिच, दक्षिणी मरिच, गोल मिर्च, चोखा मिरच। बं०-मरिच, गोल मरिच, गोल मिरच, मुरिच, मोरिच। म०-मिरे, काली मिरी। क०-ओल्लेमेणसु। गु०-मरि, मरितीखा, मरी, कालमरी। ते०-मरिचमु, शव्यमु, मरियलु। ता०-मोलह शेव्वियम्। पं०-काली मरिच, गोल मिरिच। मा०-काली मरिच। मोटिया०-स्पोट। काश्मी०-मर्ज। सिन्धी०-गूलमिरीएँ। मला०-लइ, कुरु मुलक, कुरु मिलगु। अफ०-दारुगर्म। फा०-पिल्पिले अस्वद, फिलफिल् अस्वद, स्याह गिर्द, हलपिला गिर्द, फिल्फिल् स्याह। अ०- Black pepper फिलफिले अवीद, फिलफिल गिर्द, फिल् फिलस्सोदाय, पिल्पिले गिर्द। अं. (ब्लैक पेपर)। ले०- Piper nigrum, Linn. (पाइपर नाइग्रम् लिन)। Fam. Piperaceae (पाइपरेसी)। दक्षिण कोंकण, आसाम, मलाबार तथा मलाया और स्याम इसका उत्पत्ति स्थान है। दक्षिण भारत के उष्ण और आर्द्र भागों में त्रिवांकुर, मलाबार आदि खादर तथा गीली जमीन में यह अधिकता से उत्पन्न होती है। कच्छार, सिलहट, दार्जिलिंग, सहारनपुर और देहरादून के पास भी इसकी खेती की जाती है। वर्षा ऋतु में इसकी लता को पान के बेल के समान छोटे-छोटे टुकड़े कर बड़े-बड़े वृक्षों की जड़ में गाड़ देते हैं। ये लता रूप से बढ़ कर वृक्षों का सहारा पाने से उनके ऊपर चढ़ जाती हैं। पत्ते-५-७ इञ्च लम्बे तथा २-५ इञ्च चौड़े, गोलाकार, नुकीले तथा पान के पत्तों के आकार के होते हैं। फल-गुच्छों में लगते हैं। कच्ची अवस्था में फल हरे रङ्ग के होते हैं। उस अवस्था में चरपराहट कम होती है। जब पकने पर आते हैं तब उनका रङ्ग नारंग लाल हो जाता है। उसी समय तोड़ कर सुखा लेते हैं। सूखने पर काले रङ्ग के हो जाते हैं। पूरे पक जाने पर तोड़ने से चरपराहट कम हो जाती है। पूर्वी मरिच की अपेक्षा दक्षिणी मरिच अधिक गुणदायक है। दक्षिणी मरिच ऊपर से भूरी तथा भीतर से हरियाली युक्त सफेद होती है। यह अधिक तीक्ष्ण होती है। पूर्वी मरिच ऊपर से अधिक काली और भीतर सफेद होती है। अधिक पके फलों को जब वे पीले हो जाते हैं तब तोड़कर पानी में फुला कर छिलके दूर करके सुखा लेते हैं। उसी को सफेद मरिच कहते हैं। मरिच के ऊपरी छिलके में कटु द्रव्य अधिक रहता है इसलिये सफेद मरिच कम कटु रहती है। इस
हरीतक्यादिवर्गः २२१ सफेद मरिच को-बं० में ‘सादा मरिच’, म०–में ‘पांढरेमिरे, गु०– में ‘धोला मरी’, क०–में ‘विलेय मेणसु’ और ता०–में ‘मिलाओ’ कहते हैं। रासायनिक संगठन- इसमें उड़नशील, जल में न घुलनेवाला, पाइपरीन नामक एक रवेदार क्षाराभ ५-९%, पाइपेरीडीन ५%, चविसीन नामक कटुराल, एक अन्य हरे रंग की कटुराल ६%, उड़नशील तैल १-२.५%, स्टार्च ३०%, ईथर में घुलनशील न उड़ने वाला पदार्थ ६%, प्रोटोड ७% तथा लिगनिन, गोंद आदि कुछ अन्य द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग- मरिच का प्रयोग अनेक योगों में किया जाता है। यह सुगन्धित, उत्तेजक, पाचक, अग्निदीपक, रुचिकर, स्वेदकर, कफघ्न एवं कृमिहर है। इसका उत्तेजक प्रभाव आंत्र एवं मूत्र संस्थान की श्लेष्मल कला पर पड़ता है। इसके सेवन से मूत्र की मात्रा बढ़ती है और इसका उपयोग पुराने सुजाक में किया जाता है। इसके सेवन से आमाशयिक रस की वृद्धि होती है और पाचन की क्रिया सुधरती है। घृत के पाचन में यह विशेष उपयोगी है। इसका उपयोग आध्मान, अपचन, प्रवाहिका, आमाशय शैथिल्य आदि में अच्छा होता है। (१) प्रवाहिका में इसके सूक्ष्म चूर्ण को हींग एवं अफीम के साथ दिया जाता है। (२) स्याहजीरा एवं काली मिरच मधु के साथ नित्य सेवन से गुदा को श्लेष्मकला का संकोच होकर गुदभ्रंश एवं अर्श में बहुत लाभ होता है। (३) इसके पाइपरीन नामक क्षार के ज्वरघ्न गुण के कारण इसका उपयोग मलेरिया में क्वीनीन् के साथ अधिक प्रभावकारी है। (४) विसूचिका के प्रारम्भ में मरिच, अफीम तथा हींग तीनों समान मात्रा में लेकर २ रत्ती की मात्रा में प्रत्येक दो या चार घण्टे के बाद में देने से लाभ होता है। (५) खाँसी में मधु एवं घृत के साथ देने एवं दही के साथ सेवन करना चाहिये। अधिक मात्रा में मरिच के सेवन से उदरशूल, वमन, बस्ति एवं मूत्र मार्ग प्रदाह, उदर्द आदि विकार उत्पन्न होते हैं। बाह्य प्रयोग- अनेक चर्म विकारों में एवं वायु के विकारों में किया जाता है। (१) इससे सिद्ध तैल की मालिश आमवात, गठिया, अङ्गघात एवं कण्डू, पामा आदि में उपयोगी है। (२) घृत के साथ इसका लेप अर्श के मस्से पर करने से वातार्शशूल एवं शिथिलता दूर होती है। (३) फोड़े, फुन्सियों की आमावस्था में उनको बैठाने के लिए उन पर इसको पीस कर लगाया जाता है। (४) विषैले कीड़ों के काटने पर विनेगार (सिरका) के साथ इसको पीस कर लगाना चाहिये। (५) दही के साथ घिसकर इसके अञ्जन से अनेक नेत्र रोग जैसे रात्र्यंध, कण्डू आदि में लाभ होता है। (६) सर की दद्रु के कारण यदि सर के बाल झड़ गये हों तो इसे प्याज और नमक के साथ लगाने से लाभ होता है। इसी प्रकार इसका लेप शिरःशूल में भी उपयोगी है। (७) इसके क्वाथ से कुल्ला करने से दंतशूल दूर होता है एवं बढ़ी हुई उपजिह्वा में भी लाभ होता है। (८) इसका दंतमंजनों में भी व्यवहार होता है मात्रा- चूर्ण २-४ रत्ती। श्वेत मरिच- काली मरिच के समान ही गुण वाली लेकिन उससे कुछ हीन गुण होती है। इसका एक विशेष प्रयोग श्लीपद में शोथ के साथ बार-बार ज्वर के आक्रमण को रोकने के लिए किया जाता है। बचनाग एक भाग और
२२२ भावप्रकाशनिघण्टुः सफेदमरीच १५ भाग दूध में भिगोया जाता है । रोज दूध बदल दिया जाता है । इस प्रकार तीन दिन करने के बाद आदी के रस में घोटकर १ रत्ती की गोली बनाई जाती है । इसकी १ गोली दिन में ३ बार दी जाती है । अथ त्रिकटुकनामलक्षणगुणानाह विश्वोपकुल्या मरिचं त्रयं त्रिकटु कथ्यते । कटुत्रिकं तु त्रिकटु त्र्यूषणं व्योष उच्यते ।। ६२ ।। त्र्यूषणं दीपनं हन्ति श्वासकासत्वगामयान् । गुल्ममेहकफस्थौल्यमेदःश्लीपदपीनसान् ।। ६३ ।। त्रिकटु के लक्षण, नाम तथा गुण— सोंठ, पीपर तथा मरिच इन तीनों के योग को 'त्रिकटु' कहते हैं । कटुत्रिक, त्रिकटु, त्र्यूषण और व्योष ये संस्कृत नाम 'त्रिकटु' के हैं । त्रिकटु— अग्निदीपक होता है तथा श्वास, कास, चर्मसम्बन्धी रोग, गुल्म, मेह, कफ, स्थूलता, मेद, श्लीपद और पीनस इन सब रोगों को दूर करता है । [६२-६३] अथ पिप्पलीमूलस्य नामानि गुणांश्चाह ग्रन्थिकं पिप्पलीमूलमूषणं चटकाशिरः । दीपनं पिप्पलीमूलं कटूष्णं पाचनं लघु ।। ६४ ।। रूक्षं पित्तकरं भेदि कफवातोदरापहम् । आनाहप्लीहगुल्मघ्नं कृमिश्वासक्षयापहम् ।। ६५ ।। पिपरामूल के नाम तथा गुण— ग्रन्थिक, पिप्पलीमूल, ऊषण और चटकाशिर ये संस्कृत नाम 'पिपरामूल' के हैं । पिपरामूल— अग्निदीपक, कटुरस वाला, उष्णवीर्य, पाचक, लघु, रूक्ष, पित्तकारक, मल को भेदन करने वाला, कफ, वायु एवम् उदर सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला होता है । तथा आनाह, प्लीहा, गुल्म, कृमि, श्वास और क्षय इन सब रोगों को नष्ट करने वाला होता है । [६४-६५] ८. पिपलामूल हिं०— पीपलामूल, पीपरामूल । बं०— पिपुल मूल । म०— पिपली मूल, पिपलमूल, पिपला मूल । गु०— पीपरी मूलना गंडोडा, पीपली मूल, पीपरी मूल । क०— पिप्पलीयवरु, हिप्पलीयवेरु, हिप्पली मूल । ते०— मोडो, पिप्पली वेरु, पिप्ली दुम्प । पं०— पिप्पला मूल । मा०— पीपला मूल । ता०— पिप्पली मूल । फा०— फिलफिल्द्रे, फिलफिल् मूयह । अ०— फिल्फिलादराज, फिलफिले मोया । अं०— Piper root (पाइपर रूट) । ले०— Root of the Piper longum Linn. (रूट ऑफ दी पाइपर लॉङ्गम) । पीपल लता का गाँठदार जड़ को पीपलामूल कहते हैं । इसकी जगह कितने पंसारी पीपल लता की मोटी शाखाओं को छोटे-छोटे टुकड़े कर बेचते हैं । इसलिये अच्छी तरह देख भाल कर खरीदना चाहिये । गुण और प्रयोग— पीपला मूल पीपल के ही समान लेकिन कम गुण वाली है । यह पीपल से अधिक उत्तेजक है । डाक्टर देसाई के मतानुसार प्रसव होने में अधिक समय लग रहा हो तो पीपरामूल, ईश्वर मूल और हींग, पान के साथ खिलाना चाहिये जिससे पीड़ा बढ़कर प्रसव हो जाता है । प्रसव के पश्चात् तुरंत इसका फांट देने से आवल (अपरा) गिरने में सहायता होती है । अथ चतुरूषणस्य लक्षणगुणानाह— त्र्यूषणं सकणामूलं कथितं चतुरूषणम् । व्योषस्येव गुणाः प्रोक्ता अधिकाश्चतुरूषणे ।। ६६ ।। चतुरूषण के लक्षण, नाम तथा गुण— त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मरिच) में यदि पिपरामूल मिला दिया जाय तो इसे चतुरूषण कहते हैं । पहले जितने गुण त्रिकटु के कह आये हैं, वही सब गुण चतुरूषण में अधिक रूप से रहते हैं । [६६]
हरीतक्यादिवर्गः २२३ प्रयोग करने से यह सिद्ध हुआ है कि चतुरूषण ५ से ३० रत्ती की मात्रा में दिन में दो बार न केवल खाँसी, प्रतिश्याय, स्वरभंग में उपयोगी है बल्कि उदरशूल, आध्मान आदि में भी बहुत उपयोगी है। अथ चव्यनामगुणानाह भवेच्चव्यं तु चविका कथता सा तथोषणा। कणामूलगुणं चव्यं विशेषाद् गुदजापहम्।।६७।। चव्य के नाम तथा गुण-चव्य, चविका और ऊषण ये तीन संस्कृत नाम 'चव्य' के हैं। जो-जो गुण 'पिपरामूल' के कह आये हैं वे ही सब 'चव्य' के भी होते हैं। केवल विशेषता यह है कि-यह अर्श (बवासीर) का नाशक होता है। [६७] ९. चव्य हिं०-चव्य, चाब, चाभ, चब। बं०-चेअर, चई, चोई। म०-चवक, कंकल, चाबचीनी। गु०-चवक, ते०-सेवामु, चैकाणी, चव्यमु। ता०-चव्यं। ले०-Piper chaba Hunter (पाइपर चब हण्टर); Piper officinarum Cas D. C. (पाइपर ऑफिसिनेरम्)। Fam. Piperaceae (पाइपेरेसी)। चव्य के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। भावप्रकाशकार आगे गजपिप्पली के वर्णन में लिखते हैं कि विद्वानों ने चव्य के फल को गजपिप्पली कहा है। अर्वाचीन विद्वानों ने गजपिप्पली एवं चव्य ये दो अलग वनस्पतियाँ मानी हैं। और यही कारण है कि ये दोनों द्रव्य संदिग्ध की श्रेणी में आ गये हैं। अधिकांश विद्वानों ने जिन दो द्रव्यों को माना है उन्हीं का यहाँ वर्णन किया जा रहा है। पाइपर चबा को चव्य कहा गया है। भारत के अनेक प्रान्तों में यह लगाई हुई मिलती है। यह वनस्पति जावा, सुमात्रा, मलाया आदि देशों में विशेष रूप से उत्पन्न होती है। इसके फल तथा कांड का उपयोग किया जाता है। संभवतः यह फल सिंगापुर के रास्ते कलकत्ते में आकर बड़ी पीपर के नाम से बिकता है। यह लता जाति की वनस्पति बहुत दृढ़ होती है। इस पर किसी प्रकार के रोम इत्यादि नहीं होते। इसकी शाखायें- वृक्षों को डालियों से खूब लिपटती हुई बढ़ती है और सूखने पर पीलापन युक्त सफेद रङ्ग की हो जाती हैं। पत्ते-५- ७ इञ्च लम्बे तथा २-२।। से ३।। इञ्च तक चौड़े, आयताकार, अण्डाकार और किंचित् नुकीले होते हैं, सूखने पर फीके या पीलापन युक्त सफेद रंग के हो जाते हैं। उनके ऊपर का भाग चमकदार होता है। इन
२२४ भावप्रकाशनिघण्टुः 'गजपीपल' के नाम तथा गुण- 'चव्य' के फल का ही नाम 'गजपीपल' है ऐसा वैद्य लोग कहते हैं। कपिवल्ली, कोलवल्ली, श्रेयसी और वशिर ये सब संस्कृत नाम 'गजपीपल' के हैं। गजपीपल-कटुरसयुक्त, वात कफ नाशक, अग्निवर्धक और उष्ण वीर्य होती हैं तथा अतिसार, श्वास, कण्ठसम्बन्धी रोग और कृमि का भी नाश करती है। [६८-६९] १०. गजपीपल हिं०-गजपीपर, गजपीपल। बं०-गजपीपल। म०-गजपिपली, थोरपिपली। क०-अड्केबीलुबल्लि । गु०- मोटो पीपर। ते०-एनुगा पिप्पल। ता०-अनै तिप्पली। पं०-गजपीपल। सन्ताल०-दरे झपक। मल०-अतितिप्पली, अनैतिप्पली। ले०-Scindapsus officinalis, Schott (सिन्डेप्सस् ऑफिसिनेलिस् स्काट); Syn. Pothos officinalis Schott Melet (पोथोस् ऑफिसिनेलिस्)। Fam. Acaceae (अॅरासी) । इसकी लता आर्द्रसपाट मैदानों में हिमालय के प्रान्तों में सिकम से पूर्व की ओर बंगाल, चट्टगाँव, बह्मा तथा सिवालिक के जंगलों में शाल वृक्षों पर चढ़ी हुई पाई जाती हैं। इसका डंठल-गूदेदार एक इञ्च या इससे भी अधिक मोटा एवं गोल होता है। पत्ते-बड़े-बड़े, जैसे-५ से १० इञ्च तक लम्बे और २।। से ६ इञ्च तक चौड़े, अंडाकार, गाढ़े हरे होते है और शाखाओं पर विपरीत रहते हैं। पत्र- वृन्त ३ से ६ इञ्च लम्बा और अन्त का हिस्सा हाथ की कोहनी के समान होता है एवं तलवार की म्यान के समान दिखाई पड़ता है। इसके भीतर का हिस्सा पीले रङ्ग का होता है। फल-रसयुक्त, गूदेदार, लगभग ६ इञ्च लम्बा, १।-१॥ इञ्च व्यास में और नीचे की ओर लटका हुआ रहता है। इसका आगे का हिस्सा नोकदार होता है। इसके फल के आड़े कटे हुये सूखे टुकड़े बाजार में बिकते हैं। ये १ इञ्च व्यास के, १/४ इञ्च मोटे और भूरे रङ्ग के होते हैं। इनमें गन्ध नहीं रहती तथा उन्हें जल में भिगोकर रखने से ये फूल कर नरम हो जाते हैं। इनके बीच में बीज होते हैं और उनके चारों ओर चूने के सूई के समान दाने होते हैं। बीज-वृक्काकार, चिकने, गाँजे के बीज से बड़े और भूरे रङ्ग के होते हैं। इसके पत्ते का शाक बनाकर खाते हैं। गुण और प्रयोग-सूखा हुआ फल-तीक्ष्ण, पसीना लाने वाला, सुगन्धिकारक, वातहर, कृमिनाशक, उत्तेजक, पाचक एवं बल्य है। आमातिसार, श्वास और खाँसी में जब कफ की अधिकता रहती है तब इसका उपयोग किया जाता है। इसके फांट को देने से कफ ढीला होकर निकलता है। संताल लोग इसको आमवात, संधिवात आदि रोगों में स्थानीय लेप के रूप में लगाते हैं। इसका उपयोग सुगंधित द्रव्य के रूप में अन्य औषधियों के साथ किया जाता है। इसमें १४ १/२% राख, गोंद तथा एक क्षाराभ रहता है। मात्रा-फांट (१ में १०) २-६ ड्राम। अथ चित्रकस्य नामानि गुणाँश्चाह चित्रकोऽनलनामा च पाठी व्यालस्तथोषणः। चित्रकः कटुकः पाके वह्निकृत्पाचनो लघुः ॥७०॥ रूक्षोष्णो ग्रहणीकुष्ठशोथार्शः कृमिकासनुत् । वातश्लेष्महरो ग्राही वातघ्नः १ श्लेष्मपित्तहृत् ॥७१॥ 'चीता' के नाम तथा गुण-चित्रक, अनलनामा (अग्नि के जितने नाम हैं वे सब 'चीता' के भी होते हैं), पाठी, व्याल तथा ऊषण ये सब संस्कृत नाम चीता के हैं। चीता-पाक में कटुरस युक्त, अग्निवर्धक, पाचक, लघु (शीघ्र पचने वाला), रूक्ष और उष्ण वीर्य वाला है और यह ग्रहणी, कुष्ठ, शोथ, अर्श, कृमि तथा कास का नाशक होता है। तथा वात और श्लेष्मा को दूर करने वाला, ग्राही, वात और श्लेष्म एवं पित्त का नाशक होता है। [७०-७१] १. 'वातार्र्श' इति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरितक्यादिवर्गः २२५ ११. चित्रक हिं०-चीत, चीता, चित्रा, चित्रक, चित्ता, चितरक, चितउर । बं०-चिता, चितु । म०-चित्रक । क०- पेल्लीचित्रमूल, चित्रकमूल । पं०-चित्रा। ते०-अग्निमत, चित्रमूलं, तेल्लाचित्रा। ता०-पेंचीत्तर, कोदिवेल। उ०- धुवचिता गू०-चित्रो, चित्रा, पितरो । मला०-वेल्लाकोट्वेरि, कोटुबेलि । फा०-बेख बरंदा, बेख बरंदह, शीतरह, शीतरूह, शीतरक, बेखबुर्रिंदा । अ०-शितरज, शितरज़, शीतरज हिन्दी, शैतरज । अ०-Ceylon Leadwort, White Leadwort (सीलोन लेडवोर्ट, हाइट लेडवोर्ट)। ले०-Plumbago zeylanica Linn. (प्लम्बैगो झेलॅनिका) । (प्लम्बैजिनासी) । सफेद, लाल और नीले फूलों के भेद से चित्रक तीन प्रकार का होता है। कोई-कोई पीले फूल का भी चित्रक बतलाते हैं किन्तु इसका उल्लेख किसी पुस्तक में देखा नहीं जाता। सफेद फूल का चित्रक बहुत मिलता है और लाल फूल का कहीं-कहीं नमूने की तरह देखने में आता है और मिलता भी बहुत कम है। नीले फूल का चित्रक भी कम मिलता है जिससे नमूने की तरह भी बहुत कम ही वैद्य लोग देख पाये होंगे । सफेद चित्रक इस देश के प्रायः सब प्रान्तों की जङ्गली झाड़ियों में देखा जाता है विशेष कर संयुक्त प्रान्त, बिहार, बङ्गाल, दक्षिण भारत, सीलोन और कुमाऊँ के पहाड़ों में बहुत मिलता है। यह आप ही आप जङ्गली उत्पन्न होता है और कहीं-कहीं वाटिकाओं में भी मिलता है। इसका क्षुप-२ से ५ फुट तक ऊँचा होता है और बारहों मास मिलता है। गर्मी के दिनों में पत्ते प्रायः कम दिखाई पड़ते हैं किन्तु बरसात में हरे-भरे हो जाते हैं। कांड पर लम्बाई में धारियाँ होती हैं। पत्ते-विपरीत, १।।३।। इञ्च तक लम्बे, १ से १।। इञ्च चौड़े, अण्डाकार, नोकदार, चिकने, कोमल और मोगरा के समान होते हैं। फूल-जाड़े के दिनों में चमेली के फूल के समान अत्यन्त सफेद फूल आते हैं। फल-यव के आकार वाले लम्बे, कच्ची अवस्था में हरे, पकने पर धूसर रङ्ग के, सूक्ष्म तथा चिपचिपे रोवों से भरे रहते हैं जो तोड़ने से आपस में सट जाते हैं और स्पर्श से लसीले जान पड़ते हैं। इसकी छाल-कालापन लिये भूरे रंग की, खड़े बल में कटी हुई और उस पर थोड़ी सी छोटी गाँठें होती हैं। सूखी हुई जड़ तोड़ने से तुरंत टूट जाती है। इसका स्वाद तीता, कडुवा और जिह्वा को सूई चुभोने के समान मालूम होता है। इसकी जड़ औषधि के काम आती है। यह हमेशा ताजी प्रयोग करनी चाहिये क्योंकि बहुत पुरानी होने पर यह गुणहीन हो जाती है। रासायनिक संगठन-इसके मूल में प्लम्बॅजिन (Plumbagin) नामक एक रवेदार पदार्थ होता है। यह पीले रंग का, सुइयों के सदृश, दाहक एवं कटु पदार्थ है। यह मद्यसार एवं ईथर में अच्छी तरह घुल जाता है लेकिन उबलते हुए जल में बहुत थोड़ा घुलता है और गरम करने पर कुछ अंश में उड़नशील है। इसका द्रवणांक ७२. श० है। भारतवर्ष में प्राप्त होने वाली इसकी सभी जातियों में इसकी अधिक-से-अधिक मात्रा ०.९१% रहती है। सूखी जमीन में उत्पन्न होने वाले पुराने क्षुप में यह अधिक मात्रा में रहता है। गुण और प्रयोग-चित्रक में रहने वाला प्लम्बॅजिन अल्प मात्रा में केन्द्रीय वातनाड़ी संस्थान को उत्तेजित करता है लेकिन अधिक मात्रा में वह दाहजनक एवं सम्मोहक विष है जिससे श्वसनक्रिया बन्द होकर मृत्यु हो जाती है। चित्रकमूल-अग्निदीपक, गर्भाशय संकोचक, स्वेदजनक, कुष्ठहर, अर्शहर, रसायन, बात एवं कफहर है। इसका उपयोग मन्दाग्नि, अपचन, आध्मान, ज्वर, आमवात, आमातिसार, संग्रहणी, कुष्ठ, शोथ, पाण्डु एवं अर्श आदि रोगों में किया जाता है। अल्प मात्रा में यह पाचक संस्थान की श्लैष्मिक कला को उत्तेजित करके पाचक स्रावों की वृद्धि करता है जिससे भूख अच्छी लगती है। खाया हुआ जल्दी पचता है। अर्श में इसके प्रयोग से गुदवली की शिथिलता दूर होकर लाभ १८ भाव.I
२२६ भावप्रकाशनिघण्टुः होता है। गर्भाशय के ऊपर इसकी बहुत तीव्र संकोचक क्रिया होती है जिससे गर्भिणी में इसको किसी भी समय प्रयोग करने से एक दो प्रहर में गर्भपात हो जाता है लेकिन गर्भ हमेशा मृत ही होता है। गर्भपात के लिये आंतरिक प्रयोग के साथ-साथ इसको गर्भाशयमुख में प्रविष्ट करते हैं या इसका लेप करते हैं। इसके प्रयोग में यदि विशेष सावधानी न रक्खी जाय तो इससे रक्तस्राव, धातुनाश एवं कोथ आदि गंभीर उपद्रव उत्पन्न हो सकते हैं। अतः इसका प्रयोग गर्भिणी में कभी भी न करना चाहिये। विषम ज्वर में यकृत् प्लीहा वृद्धि होकर पाण्डु हो गया हो तो इसका सेवन करना चाहिये। सूतिका ज्वर में निर्गुण्डी के साथ इसके उपयोग से ज्वर कम होता है तथा दूषित आर्तव निकलकर मक्कलशूल भी दूर होता है। (१) अग्निमांद्य, अरोचक, अजीर्ण, अतिसार आदि में चित्रक, वायविडङ्ग एवं मुस्ता का प्रयोग करना चाहिये। (२) अर्श में इसे दही के साथ सेवन करना चाहिये। (३) यकृत् एवं प्लीहा वृद्धि में इसका क्षार मट्ठे के साथ उपयोगी है। (४) इसका उपयोग कुष्ठ, फिरङ्ग की द्वितीयावस्था आदि में लाभकारी है। चित्रक मूल बाह्य प्रयोग में तीव्र कृमिघ्न, दाहजनक एवं स्फोटोत्पादक है। आमवात, संधिशूल अङ्गघात आदि में इससे सिद्ध तैल की मालिश करने से लाभ होता है। प्लेग की गांठों पर गांठों को फोड़ने के लिये इसको काम में लाते हैं। श्वित्र एवं खालित्य में इसका लेप उपयोगी है। आमवातादि में स्फोटोत्पादन के लिये इसका लेप १५, २० मिनट से अधिक न रखना चाहिये। इससे उत्पन्न स्फोटों में पीड़ा बहुत होती है इसलिये जहाँ तक हो उसका प्रयोग न किया जाय। हानिकारक-फुफ्फुस के लिये मस्तगी एवं बबूल का गोंद तथा यकृत् के लिये गुलाब के फल एव चन्दन। मात्रा-१/२ से २ माशा। १२. लाल चीता हिं०-लाल चीत, लाल चीता, लालचित्रक, लाल चितउर इत्यादि। बं०-लालचिता, रक्तोचितो। म०- लालचित्रक। क०-क्रेम्पू, चित्रमूल। ते०-येर्राचित्रमूलम् ता०-शिवप्पु चित्रमूलम्, चित्तुरमोल, कोडिमूली। उ०- रक्तचिता, रकतचिता। मला०-चेक्कीकोटुवेरी। अं०-Rose coloured Leadwort (रोज .कलर्ड लेडवोर्ट) ले०-Plumbago rosea Linn. (प्लम्बैगो रोज़िया)। यह सिक्कम और खसिया की तराइयों में पाया जाता है। इसको वाटिकाओं में भी लगाते हैं परन्तु थोड़ी असावधानी से नष्ट हो जाता है इसका क्षुप-२-४ फूट ऊँचा, सदा हरा-भरा रहता है। गर्मी के दिनों में कुछ पुराने पत्ते सूखकर गिर जाते हैं। पत्ते-उक्त चित्रक के समान होते हैं। फूल-लाल और फल-सफेद चीते के समान लसीले होते हैं। लाल चित्रक गुणों में सफेद चित्रक की अपेक्षा अधि प्रभावशाली और तीव्र गुण सम्पन्न है, विशेष कर रुचिकारी, रसायन, शरीर को नवीन और स्थूल करने वाला, पारे को बाँधने वाला, लोहे को बेंधने वाला तथा कुष्ठ को नष्ट करने वाला है। इसकी थोड़ी मात्रा उत्तेजक तथा अधि मात्रा तीव्र मदकारी विष के समान हानिकारक होती है। [१२] १३. नीला चित्रक ले०-Plumbago capensis Thumb (प्लम्बैगो कॅपेनसिस थम्ब)। काले चित्रक का क्षुप-उक्त चित्रक के समान किन्तु पत्र चक्रिक क्रम में आते हैं। पुष्प सफेदी युक्त नीले रङ्ग के होते हैं। यद्यपि यह दक्षिण अफ्रीका का आदिवासी है तथापि बागों में लगाया हुवा मिलता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २२७ लोग यह भी कहते हैं कि नीले चित्रक के सेवन करने से बाल काले हो जाते हैं और यदि गौ इसके क्षुप को केवल सूँघ ले अथवा इसकी जड़ दूध में डाली जावे तो दूध का रङ्ग काला हो जाता है। परन्तु इसमें कहाँ तक सत्यता है परीक्षा करने से ही मालूम हो सकती है।
अथ पञ्चकोलस्य लक्षणगुणानाह
पिप्पली पिप्पलीमूलं चव्यचित्रकनागरैः । पञ्चभिः कोलमात्रं यत्पञ्चकोलं तदुच्यते ।। ७२ ।। पञ्चकोलं रसे पाके कटुकंरुचिकृन्मतम् । तीक्ष्णोष्णं पाचनं श्रेष्ठं दीपनं कफवातनुत् ।। गुल्मप्लीहोदरानाहशूलघ्नं पित्तकोपनम् ।। ७३ ।। 'पञ्चकोल' के लक्षण तथा गुण—पीपल, पिपरामूल, चव्य, चीता तथा सोंठ ये सब पाँच द्रव्य यदि कोलमात्र अर्थात् आधा-आधा तोला की मात्रा में एकत्र किये जायँ तो उसी को 'पञ्चकोल' कहते हैं। पञ्चकोल—स्वाद तथा पाक में कटुरस युक्त, रुचिकारक, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य होता है। तथा पाचक अत्यन्त अग्निदीपक, कफ-वातनाशक, गुल्म, प्लीहा, उदरसम्बन्धी रोग, आनाह और शूल का नाश करने वाला तथा पित्त को कुपित करने वाला होता है। [७२-७३] मात्रा—५-१५ र० दिन में दो बार।
अथ षडूषणस्य लक्षणगुणानाह
पञ्चकोलं समरिचं षडूषणमुदाहृतम् । पञ्चकोलगुणं तत्तु रूक्ष्मुष्णं विषापहम् ।। ७४ ।। 'षडूषण' के लक्षण तथा गुण—ऊपर कहे हुये 'पञ्चकोल' के पीपल आदि पाँचों द्रव्यों के साथ यदि छठाँ द्रव्य 'मरिच' भी सम भाग में मिला दिया जाय तो उसे 'षडूषण' कहते हैं। पञ्चकोल के जो गुण कह आये हैं वे ही सब 'षडूषण' के समझने चाहिये, अन्तर केवल इतना ही है कि यह रूक्ष, उष्ण तथा विषनाशक भी होता है। [७४]
अथ यवान्या नामानि गुणाँश्चाह
यवानिकोग्रगन्धा च ब्रह्मदर्भाऽजमोदिका ।। ७५ ।। सैवोक्ता दीप्यका दीप्या तथा स्याद्यवसाह्वया । यवानी पाचनी रुच्या तीक्ष्णोष्णा कटुका लघुः ।। ७६ ।। दीपनी च तथा तिक्ता पित्तला शुक्रशूलहृत् । वातश्लेष्मोदरानाहगुल्मप्लीहकृमिप्रणुत् ।। ७७ ।। 'अजवायन' के नाम तथा गुण—यवानिका, उग्रगन्धा, ब्रह्मदर्भा, अजमोदिका, दीप्यका, दीप्या और यवसाह्वया ये सब नाम 'अजवाइन' के हैं। अजवाइन—पाचक, रुचिकारक, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य, कटुरसयुक्त, परिपाक में लघु, अग्निदीपक, तिक्तरसयुक्त, पित्तवर्धक एवम् शुक्र तथा शूल की नाशक है। और यह वात, श्लेष्मा, उदर सम्बन्धी रोग, आनाह, गुल्म, प्लीहा तथा कृमि की भी नाशक है। [७५-७७]
१४. अजवायन (यवानी)
हिं०—अजवायन, अजवाइन, अजमायन, जवाइन, जवाय़न, अजवाँ, अजोवां। बं०—यमानी, यउयान, योयान्, जोवान्। मं०—ओँवा, उंबा। गु०—अजमा, यवान, जवाइन, अजमो। क०—वोम, ओमु। ते०—वामु, ओममी, ओममु, ओमा। ता०—अमन, ओमम्, ओमन। मा०—अजवाण। कच्छ०—वोह्रा। काश्मी०—जविन्द। फा०—नानुखा, झिनियानस नानख़्वाह, जीनान्। अ०—कमूमे 'मुलुकी, अमूसा, तोलिबउल खुब्जा अं०—The Bishop's weed (दी विशॉप्स् वीड); Ajova seeds (अजोवां सीड्स), Lovage (लोहाज)। ले०—Carum copticum Benth & Hook (करम् कोप्टिकम्); Syn. Trachyspermum ammi Linn. (ट्रीकीस्पर्मम् अम्मी लिन); Syn. Ptychotis ajawan DC (प्टिकोटिस् अजोवाँ)। Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
२२८ भावप्रकाशनिघण्टुः भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में हरसाल खेतों में यह बोई जाती है विशेषकर इन्दौर तथा हैदराबाद राज्य में यह अधिकता से होती है । यह अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पर्शिया, मिश्र और यूरोप आदि देशों में भी उत्पन्न होती है । इसका क्षुप-१ से ३ फुट तक ऊँचा, पत्ते-धनिये के पत्ते के समान कटीले, अनेक भागों में विभक्त, डालियों पर दूर-दूर आते हैं। फूल-छत्ते से, सफेद रंग के बारीक आते हैं। फल-नन्हें-नन्हें रहते हैं। छत्ते पकने पर फल निकाल लिए जाते हैं । इन्हीं फलों को अजवायन कहते हैं । ये फल-बहुत छोटे, दबे हुए, गोल अंडाकार, २ मि० मि० लम्बे, भूरे रंग के होते हैं इनकी ऊपरी सतह पर छोटी गाँठें एवं प्रत्येक अर्ध खण्ड पर पाँच धारियाँ होती हैं । इसमें अजवायन की विशिष्ट गंध होती है । रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील सुगन्धित तैल जिसे अजवाइन का तेल कहते हैं, २ से ३% पाया जाता है जिसमें से ४०-५०% थाइमॉल रहता है । इसमें पाये जाने वाला रवेदार पदार्थ स्टिअरोप्टिन, जिसे अजवाइन का फूल या अजवायन का सत् कहते हैं डॉक्टरों के थाइमॉल के समान होता है । इसके अतिरिक्त इसमें साइमोन, टरपेन आदि पदार्थ रहते हैं । गुण और प्रयोग-अजवायन, अग्निदीपक, पाचक, उष्ण, उद्वेष्टन, निरोधी, उत्तेजक, बल्य, कृमिघ्न, संक्रमण निरोधी, दुर्गन्धिनाशक एवं सड़न को दूर करने वाली है । इसका उपयोग अतिसार, कुपचन, अजीर्ण, उदरशूल, आध्मान, विसूचिका आदि रोगों में किया जाता है । इसमें सरसों और मिर्चा का तीतापन, चिरायते का कड़ुआपन एवं हींग का उद्वेष्टन निरोधी गुण तीनों एक साथ हैं । इसका उपयोग अनेक औषधियों विशेषतया एरंड तैल की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए किया जाता है । पुरानी खाँसी में जब कफ बहुत कम रहता है तब इसके प्रयोग से कफ ढीला होकर निकल जाता है । श्वास में गरम पानी के साथ इसका चूर्ण दिया जाता है या इसको चिलम में रखकर पीते हैं । अजवायन का चूर्ण और सेंधानमक अजीर्ण से उत्पन्न विकारों की घरेलू दवा है । (१) उदरशूल, आध्मान आदि विकारों में अजवायन, सेंधानमक, सोंचरनमक, यवक्षार, हींग और आँवला इनके चूर्ण को १/२ से १ माशा की मात्रा में मधु के साथ दिया जाता है । (२) शराबियों को मद्य की आदत छुड़ाने के लिये शराब पीने की इच्छा होने पर इसे चबाने को दिया जाता है । (३) बच्चों के रोगों में तथा हैजे में इसका अर्क बहुत उपयोगी है । (४) अजवायन का सत्-बहुत अच्छा कृमिघ्न, सड़न को दूर करने वाला, प्रतिदूषक पदार्थ है । इसका उपयोग घोल के रूप में व्रण प्रक्षालन के लिये किया जाता है । अजवायन का सत्, पेपरमिंट का सत् और कपूर तीनों मिलाने से एक तरल पदार्थ बनता है जिसका विसूचिका के प्रारम्भ में ३, ४ बूँद बतासे के साथ व्यवहार किया जाता है । इससे कै, दस्त कम होकर लाभ होता है । अमृतधारा जैसे प्रचलित पेटेण्ट योगों में ये ही औषधियाँ मूलतः रहती हैं । यह आंत्रिक कृमियों पर विशेषकर अंकुश कृमि में बहुत उपयोगी है । संधिशूल आदि में इसको लगाने से लाभ होता है । अजवायन का सत दंतशूल में उपयोगी है । (५) इसकी पुल्टिस बनाकर उदरशूल, आमवात, सन्धिशूल आदि में सेंका जाता है । विसूचिका में हाथ, पैरों को तथा श्वास और खाँसी में छाती को इससे सेंकने से लाभ होता है । (६) इसके पत्तों का रस कृमियों को मारने के लिये काम में आता है एवं पत्तों को पीसकर कीड़ों के काटे हुए स्थानों पर लगाया जाता है । पत्तों के अन्य गुण शाकवर्ग में देखें । मात्रा-चूर्ण-३ से ६ माशा, अर्क-१ से २ औंस, सत-१/४ से १ र० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २२९ अथ अजमोदाया नामानि गुणांश्चाह अजमोदा खराश्वा च मायूरो दीप्यकस्तथा¹। तथा ब्रह्मकुशा प्रोक्ता कारवीलो² चमस्तका ।।७८।। अजमोदा कटुस्तीक्ष्णा दीपनी कफवातनुत्। उष्णा विदाहिनी हृद्या वृष्या बलकरी लघुः ।। नेत्रामय ³कृमिच्छर्दिहिक्काबस्तिरुजो हरेत् ।।७९।। 'अजमोदा' (बड़ीअजवायन) के नाम तथा गुण-अजमोदा, खराश्वा, मायूरो, दीप्यक, ब्रह्मकुशा, कारवी और लोचमस्तका ये सब नाम 'अजमोदा' के हैं। अजमोदा-कटुरसयुक्त, तीक्ष्णवीर्य, अग्निदीपक, कफवातनाशक, उष्णवीर्य, विदाही, हृद्य (हृदय के लिये हितकर), वृष्य, बलकारक और परिपाक में लघु होती है और यह नेत्ररोग, कृमि, वमन, हिक्का (हिचकी) एवं बस्ति सम्बन्धी रोगों को नाश करने वाली होती है। [७८-७९] १५. अजमोदा हिं०-अजमोद, अजमोदा, अजमूदा, अजमोत। बं०-वनयमानी, रान्धुनी, अजमूद, चनु। गु०-बोडी अजमोद, अजमोद, बोडी अजमो। ते०-आजामोदा, वोमा, अशमदागां, वोमां, अजोदावोमरु। मध्य प्र०-रान्धुनी। पं०- भूतजटा। ता०-अशम, टागम, तागम, अशमता ओमान्। म०-अजमोदा वोवा, कोरंजा। क०-अजमोदा वोमा। फा०-करप्स। अ०-वज्रूल कर्प्स। अं०-Celery fruit (सेलेरी फ्रूट); Apii fructus (अप्पई फ्रक्टस्) ले०-Apium graveolens, Linn. (एपियम् ग्रॅविओलेन्स् लिन)। Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। यूरोप, अमेरिका तथा भारतवर्ष में इसकी खेती की जाती है। पञ्जाब तथा उत्तर प्रदेश में इसकी विशेष खेती होती है। यह उत्तर पश्चिमी हिमालय तथा पञ्जाब के पहाड़ी प्रान्तों में भी उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-२ से ३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-अनेक भागों में विभक्त, प्रत्येक भाग गहरे कटे किनारे वाले होते हैं। फूल-सफेद और छोटे छत्ते से होते हैं। फल-पीताभ, भूरा, गोलाभ अंडाकार, १ से १.५ मि० मि० चौड़ा, ०.५ मि० मि० मोटा एवं प्रत्येक अर्धखण्ड पर ५ गहरी धारियों से युक्त होता है। रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक हलके पीले रङ्ग का उड़नशील तैल १.५-३% पाया जाता है जिसमें एक विशेष प्रकार की इसकी गन्ध होती है। इसके अतिरिक्त इसमें गन्धक, ॲपोइल (Apoil) नामक एक विषैला पदार्थ, एक ग्लूकोसाइड ॲपोईन (Glucoside-Apiin), अल्ब्यू मिन्, गोंद और क्षार आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, पाचक, वातानुलोमक, उत्तेजक, वातशामक, बल्य, मूत्रल, गर्भाशय संकोचक एवं हृद्य है। घरेलू औषधि के रूप में इसका उपयोग आमवात, उदरशूल, आध्मान, वमन, हिक्का, कुपचन आदि रोगों में किया जाता है। इसको वातरक्त, कृमि, मूत्राशय के रोग और नष्टार्तव में काम में लाते हैं। इसके उद्वेष्टन निरोधी गुण के कारण श्वसनिका शोथ, श्वास एवं उदरशूल आदि विकारों में इसका व्यवहार किया जाता है। इसका पथरी के रोग में भी व्यवहार होता है। यकृत् और प्लीहा के रोगों में भी यह कुछ लाभदायी है। मसाले के रूप में भी व्यवहार होता है। यकृत् और प्लीहा के रोगों में भी यह कुछ लाभदायी है। मसाले के रूप में भी इसका व्यवहार किया जाता है। (१) इसका तैल उद्वेष्टन निरोधी, वातनाड़ियों के लिये बल्य एवं आमवाताभ संधिशोध में लाभदायी है। (२) इसका मूल रसायन एवं मूत्रल माना गया है और इसका उपयोग सर्वांग शोथ और शूल में किया जाता है। १. 'मयूर' इति पाठा० । २. 'च समस्तके'ति पाठा० । ३. 'कफे' पाठा० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
२३० भावप्रकाशनिघण्टुः (३) इसके मूल से बनी कॉफी मस्तिष्क एवं वातनाडियों के लिये बलदायक मानी गई है। (४) यह अपस्मार एवं गर्भिणी के लिये हानिकारक माना गया है। मात्रा-फल चूर्ण-१ से ४ माशा। १६. अजवायन जंगली (१) यह दो प्रकार की होती है जिनका अलग-अलग वर्णन नीचे संक्षेप में दिया गया है। सं०- वन्ययमानी ? म०-किरमिंजी अजवां। बं०-वनजोवान। ले०-Seseli indicum W. & A. (सिसिली इण्डिकम्) । Fam. Umbeillferae (अम्बेलीफेरी) । यह हिमालय के निचले भागों में देहरादून से लेकर गोरखपुर, बुन्देलखण्ड, आसाम, मध्य बंगाल तथा कारोमण्डल तक होती है। इसके क्षुप-वर्षांयु, ४ से १२ इञ्च तक ऊँचे, अनेक शाखा प्रशाखाओं से युक्त सघन देखने में आते हैं। पत्ते- विभक्त, कटे किनारे वाले और रोमश होते हैं। फूल-छत्ते से सफेदी युक्त गुलाबी रंग के, फल-बारीक छोटे-छोटे गोल, किञ्चित् लम्बे फीके पीले रंग के होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके फल प्रायः पशुओं के लिये औषधि के काम में अधिक आते हैं। यह उत्तेजक, दीपन, पाचन, शूलघ्न, आँतों के लिये हितकारी तथा विशेषरूप से गोल कृमि का नाशक है। इसके सेवन से पेट के आफरे में लाभ होता है और भूख बढ़ती है। मात्रा-१ से ३ माशा। १७. अजवायन जंगली (२) हिं०-वन अजवायन। पं०-माशो, रंगस्बुर, मरिज़ह। फा०-हाशा अं०-Wild Thyme (वाइल्ड थाइम्) । ले०-Thymus serpyllum Linn. (थाइमस् सर्पाइलम्) । Fam. Labiatae (लेविएटी) यह हिमालय के गरम प्रांतों में काश्मीर से कुमाऊँ तक एवं ईरान में होती है। यह क्षुप जाति की वनौषधि अनेक शाखा प्रशाखाओं से युक्त, सघन, कुछ रोमयुक्त, ६ से १२ इञ्च तक ऊँची और सुगन्धित होती है। पत्ते-अवॄन्त, इञ्च के अष्टमांश से चतुर्थांश के घेरे में किञ्चित् आयताकार अण्डाकार होते हैं और उन पर तैलीय धब्बे होते हैं। फूल-बारीक बैंगनी रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-बारीक और चिकने होते हैं। इस औषधि का पञ्चांग व्यवहार में आता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील सुगन्धित तैल ०.६%, टैनिन तथा गोंद पाया जाता है। इसमें थायमॉल (अजवायन का सत्) बहुत ही थोड़ी मात्रा में होता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, सड़न को दूर करने वाली, मूत्रजनन, उत्तेजक, आँखों के लिये हितकर, श्वास एवं कफहर, ग्राही, कृमिघ्न, व्रणशोधक और व्रणरोपक है। सड़न को दूर करने का इसका गुण बहुत स्पष्ट है। (१) इसका स्वरस, सिरका और मधु पुरानी खाँसी, श्वास, कुक्कुर खाँसी और घटसर्प तथा आंत्रिक व्रणों में दिया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA