भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः २२३ प्रयोग करने से यह सिद्ध हुआ है कि चतुरूषण ५ से ३० रत्ती की मात्रा में दिन में दो बार न केवल खाँसी, प्रतिश्याय, स्वरभंग में उपयोगी है बल्कि उदरशूल, आध्मान आदि में भी बहुत उपयोगी है। अथ चव्यनामगुणानाह भवेच्चव्यं तु चविका कथता सा तथोषणा। कणामूलगुणं चव्यं विशेषाद् गुदजापहम्।।६७।। चव्य के नाम तथा गुण-चव्य, चविका और ऊषण ये तीन संस्कृत नाम 'चव्य' के हैं। जो-जो गुण 'पिपरामूल' के कह आये हैं वे ही सब 'चव्य' के भी होते हैं। केवल विशेषता यह है कि-यह अर्श (बवासीर) का नाशक होता है। [६७] ९. चव्य हिं०-चव्य, चाब, चाभ, चब। बं०-चेअर, चई, चोई। म०-चवक, कंकल, चाबचीनी। गु०-चवक, ते०-सेवामु, चैकाणी, चव्यमु। ता०-चव्यं। ले०-Piper chaba Hunter (पाइपर चब हण्टर); Piper officinarum Cas D. C. (पाइपर ऑफिसिनेरम्)। Fam. Piperaceae (पाइपेरेसी)। चव्य के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। भावप्रकाशकार आगे गजपिप्पली के वर्णन में लिखते हैं कि विद्वानों ने चव्य के फल को गजपिप्पली कहा है। अर्वाचीन विद्वानों ने गजपिप्पली एवं चव्य ये दो अलग वनस्पतियाँ मानी हैं। और यही कारण है कि ये दोनों द्रव्य संदिग्ध की श्रेणी में आ गये हैं। अधिकांश विद्वानों ने जिन दो द्रव्यों को माना है उन्हीं का यहाँ वर्णन किया जा रहा है। पाइपर चबा को चव्य कहा गया है। भारत के अनेक प्रान्तों में यह लगाई हुई मिलती है। यह वनस्पति जावा, सुमात्रा, मलाया आदि देशों में विशेष रूप से उत्पन्न होती है। इसके फल तथा कांड का उपयोग किया जाता है। संभवतः यह फल सिंगापुर के रास्ते कलकत्ते में आकर बड़ी पीपर के नाम से बिकता है। यह लता जाति की वनस्पति बहुत दृढ़ होती है। इस पर किसी प्रकार के रोम इत्यादि नहीं होते। इसकी शाखायें- वृक्षों को डालियों से खूब लिपटती हुई बढ़ती है और सूखने पर पीलापन युक्त सफेद रङ्ग की हो जाती हैं। पत्ते-५- ७ इञ्च लम्बे तथा २-२।। से ३।। इञ्च तक चौड़े, आयताकार, अण्डाकार और किंचित् नुकीले होते हैं, सूखने पर फीके या पीलापन युक्त सफेद रंग के हो जाते हैं। उनके ऊपर का भाग चमकदार होता है। इन