भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ भावप्रकाशनिघण्टुः 'गजपीपल' के नाम तथा गुण- 'चव्य' के फल का ही नाम 'गजपीपल' है ऐसा वैद्य लोग कहते हैं। कपिवल्ली, कोलवल्ली, श्रेयसी और वशिर ये सब संस्कृत नाम 'गजपीपल' के हैं। गजपीपल-कटुरसयुक्त, वात कफ नाशक, अग्निवर्धक और उष्ण वीर्य होती हैं तथा अतिसार, श्वास, कण्ठसम्बन्धी रोग और कृमि का भी नाश करती है। [६८-६९] १०. गजपीपल हिं०-गजपीपर, गजपीपल। बं०-गजपीपल। म०-गजपिपली, थोरपिपली। क०-अड्केबीलुबल्लि । गु०- मोटो पीपर। ते०-एनुगा पिप्पल। ता०-अनै तिप्पली। पं०-गजपीपल। सन्ताल०-दरे झपक। मल०-अतितिप्पली, अनैतिप्पली। ले०-Scindapsus officinalis, Schott (सिन्डेप्सस् ऑफिसिनेलिस् स्काट); Syn. Pothos officinalis Schott Melet (पोथोस् ऑफिसिनेलिस्)। Fam. Acaceae (अॅरासी) । इसकी लता आर्द्रसपाट मैदानों में हिमालय के प्रान्तों में सिकम से पूर्व की ओर बंगाल, चट्टगाँव, बह्मा तथा सिवालिक के जंगलों में शाल वृक्षों पर चढ़ी हुई पाई जाती हैं। इसका डंठल-गूदेदार एक इञ्च या इससे भी अधिक मोटा एवं गोल होता है। पत्ते-बड़े-बड़े, जैसे-५ से १० इञ्च तक लम्बे और २।। से ६ इञ्च तक चौड़े, अंडाकार, गाढ़े हरे होते है और शाखाओं पर विपरीत रहते हैं। पत्र- वृन्त ३ से ६ इञ्च लम्बा और अन्त का हिस्सा हाथ की कोहनी के समान होता है एवं तलवार की म्यान के समान दिखाई पड़ता है। इसके भीतर का हिस्सा पीले रङ्ग का होता है। फल-रसयुक्त, गूदेदार, लगभग ६ इञ्च लम्बा, १।-१॥ इञ्च व्यास में और नीचे की ओर लटका हुआ रहता है। इसका आगे का हिस्सा नोकदार होता है। इसके फल के आड़े कटे हुये सूखे टुकड़े बाजार में बिकते हैं। ये १ इञ्च व्यास के, १/४ इञ्च मोटे और भूरे रङ्ग के होते हैं। इनमें गन्ध नहीं रहती तथा उन्हें जल में भिगोकर रखने से ये फूल कर नरम हो जाते हैं। इनके बीच में बीज होते हैं और उनके चारों ओर चूने के सूई के समान दाने होते हैं। बीज-वृक्काकार, चिकने, गाँजे के बीज से बड़े और भूरे रङ्ग के होते हैं। इसके पत्ते का शाक बनाकर खाते हैं। गुण और प्रयोग-सूखा हुआ फल-तीक्ष्ण, पसीना लाने वाला, सुगन्धिकारक, वातहर, कृमिनाशक, उत्तेजक, पाचक एवं बल्य है। आमातिसार, श्वास और खाँसी में जब कफ की अधिकता रहती है तब इसका उपयोग किया जाता है। इसके फांट को देने से कफ ढीला होकर निकलता है। संताल लोग इसको आमवात, संधिवात आदि रोगों में स्थानीय लेप के रूप में लगाते हैं। इसका उपयोग सुगंधित द्रव्य के रूप में अन्य औषधियों के साथ किया जाता है। इसमें १४ १/२% राख, गोंद तथा एक क्षाराभ रहता है। मात्रा-फांट (१ में १०) २-६ ड्राम। अथ चित्रकस्य नामानि गुणाँश्चाह चित्रकोऽनलनामा च पाठी व्यालस्तथोषणः। चित्रकः कटुकः पाके वह्निकृत्पाचनो लघुः ॥७०॥ रूक्षोष्णो ग्रहणीकुष्ठशोथार्शः कृमिकासनुत् । वातश्लेष्महरो ग्राही वातघ्नः १ श्लेष्मपित्तहृत् ॥७१॥ 'चीता' के नाम तथा गुण-चित्रक, अनलनामा (अग्नि के जितने नाम हैं वे सब 'चीता' के भी होते हैं), पाठी, व्याल तथा ऊषण ये सब संस्कृत नाम चीता के हैं। चीता-पाक में कटुरस युक्त, अग्निवर्धक, पाचक, लघु (शीघ्र पचने वाला), रूक्ष और उष्ण वीर्य वाला है और यह ग्रहणी, कुष्ठ, शोथ, अर्श, कृमि तथा कास का नाशक होता है। तथा वात और श्लेष्मा को दूर करने वाला, ग्राही, वात और श्लेष्म एवं पित्त का नाशक होता है। [७०-७१] १. 'वातार्र्श' इति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA