भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० भावप्रकाशनिघण्टुः (४) पीपल चौसठ प्रहर घोट कर उपयोग करने से जीर्ण ज्वर में विशेष लाभदायी होती है। (५) सोंठ एवं पीपल से सिद्ध तैल की मालिश गृध्रसी, कटिशूल तथा अधोशाखाघात में उपयोगी है। (६) त्रिकटु और सहिजन के बीज को अगस्तिमूल के रस से घोटकर उसका नस्य देने से बेहोशी, मूर्च्छा आदि दूर होती है। मात्रा-चूर्ण दो चार रत्ती। दर्पनाशक-जरेशक, बबूल का गोंद और इसबगोल। अथ मरीचस्य नामानि गुणाँश्चाह मरिचं वेल्लजं कृष्णमूषणं धर्मपत्तनम् ॥५९॥ मरिचं कटुकं तीक्ष्णं दीपनं कफवातजित् । उष्णं पित्तकरं रूक्षं श्वासशूलकृमीन्हरेत् ॥६०॥ तदार्द्रं मधुरं पाके नात्युष्णं कटुकं गुरु । किञ्चित्तीक्ष्णगुणं श्लेष्मप्रसेकि स्यादपित्तलम् ॥६१॥ मरिच के नाम तथा गुण-मरिच, वेल्लज, कृष्ण, ऊषण और धर्मपत्तन ये मरिच के संस्कृत नाम हैं। मरिच- कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, कफ तथा वायु को दूर करने वाला, उष्णवीर्य, पित्तकारक और रूक्ष है एवं श्वास, शूल तथा कृमिरोग को नष्ट करने वाला होता है। यदि यही गीला (कच्चा) हो तो-पाक में मधुर रस युक्त, थोड़ा उष्णवीर्य, कटुरस युक्त, पाक में गुरु, थोड़ा तीक्ष्ण गुण से युक्त, कफ को गिराने वाला और थोड़ा पित्तकारक होता है।[५९-६१] ७. मरिच हिं०-मरिच, मिरच, गोल मरिच, काली मरिच, दक्षिणी मरिच, गोल मिर्च, चोखा मिरच। बं०-मरिच, गोल मरिच, गोल मिरच, मुरिच, मोरिच। म०-मिरे, काली मिरी। क०-ओल्लेमेणसु। गु०-मरि, मरितीखा, मरी, कालमरी। ते०-मरिचमु, शव्यमु, मरियलु। ता०-मोलह शेव्वियम्। पं०-काली मरिच, गोल मिरिच। मा०-काली मरिच। मोटिया०-स्पोट। काश्मी०-मर्ज। सिन्धी०-गूलमिरीएँ। मला०-लइ, कुरु मुलक, कुरु मिलगु। अफ०-दारुगर्म। फा०-पिल्पिले अस्वद, फिलफिल् अस्वद, स्याह गिर्द, हलपिला गिर्द, फिल्फिल् स्याह। अ०- Black pepper फिलफिले अवीद, फिलफिल गिर्द, फिल् फिलस्सोदाय, पिल्पिले गिर्द। अं. (ब्लैक पेपर)। ले०- Piper nigrum, Linn. (पाइपर नाइग्रम् लिन)। Fam. Piperaceae (पाइपरेसी)। दक्षिण कोंकण, आसाम, मलाबार तथा मलाया और स्याम इसका उत्पत्ति स्थान है। दक्षिण भारत के उष्ण और आर्द्र भागों में त्रिवांकुर, मलाबार आदि खादर तथा गीली जमीन में यह अधिकता से उत्पन्न होती है। कच्छार, सिलहट, दार्जिलिंग, सहारनपुर और देहरादून के पास भी इसकी खेती की जाती है। वर्षा ऋतु में इसकी लता को पान के बेल के समान छोटे-छोटे टुकड़े कर बड़े-बड़े वृक्षों की जड़ में गाड़ देते हैं। ये लता रूप से बढ़ कर वृक्षों का सहारा पाने से उनके ऊपर चढ़ जाती हैं। पत्ते-५-७ इञ्च लम्बे तथा २-५ इञ्च चौड़े, गोलाकार, नुकीले तथा पान के पत्तों के आकार के होते हैं। फल-गुच्छों में लगते हैं। कच्ची अवस्था में फल हरे रङ्ग के होते हैं। उस अवस्था में चरपराहट कम होती है। जब पकने पर आते हैं तब उनका रङ्ग नारंग लाल हो जाता है। उसी समय तोड़ कर सुखा लेते हैं। सूखने पर काले रङ्ग के हो जाते हैं। पूरे पक जाने पर तोड़ने से चरपराहट कम हो जाती है। पूर्वी मरिच की अपेक्षा दक्षिणी मरिच अधिक गुणदायक है। दक्षिणी मरिच ऊपर से भूरी तथा भीतर से हरियाली युक्त सफेद होती है। यह अधिक तीक्ष्ण होती है। पूर्वी मरिच ऊपर से अधिक काली और भीतर सफेद होती है। अधिक पके फलों को जब वे पीले हो जाते हैं तब तोड़कर पानी में फुला कर छिलके दूर करके सुखा लेते हैं। उसी को सफेद मरिच कहते हैं। मरिच के ऊपरी छिलके में कटु द्रव्य अधिक रहता है इसलिये सफेद मरिच कम कटु रहती है। इस