भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 270, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरितक्यादिवर्गः २९१ कास, अजीर्ण, अरुचि, श्वास, हृद्रोग, पाण्डुरोग तथा कृमिरोग को दूर करने वाली भी होती है। यहाँ पर अर्थात् पीपर के साथ गुड़ मिलाने में पीपर के चूर्ण के तोल से दूना गुड़ मिलाना चाहिए ऐसा वैद्यों का मत है। [५३-५८] ६. पीपल हिं०-पीपर, पीपल। बं०-पीपुल, पिपुल। म०-पिंपली। गु०-पीपर, लीड़ी पीपल, लिंडी पीपल। क०- हिप्पली। ते०-पिप्पलु, पिप्पलि, पिप्पल चेट्टु। ता०-तिप्पली। तु०-इप्पली। मला०-तिप्पली। ब्राह्मी- पौखीन। गोम०-हिपली। मा०-पीपल। फा०-पिलपिल दराज, फिल्फिल् दराज, पीपल दराज। अ०-दारफिल्फिल, डाल फिल्फिल्। अं०-Long pepper (लांग पीपर); Dried catkins (ड्राइड कॅटकिन्स)। ले०-Piper longum Linn (पाइपर लांगमं)। Chavica roxburghii (चविका रॉक्सवर्घाइ)। Fam. Piperaceae (पाइपरेसी)। पीपल-इस देश से गरम प्रान्तों में पूर्व नेपाल से आसाम, खासिया के पहाड़ों पर, बंगाल में, पश्चिम की ओर बम्बई तक तथा दक्षिण की ओर ट्रावनकोर तक पायी जाती है। सीलोन, मलावका तथा फिलीपाइन द्वीपों में भी यह पाई जाती है। पीपल लता जाति की वनौषधि का फल है। इसकी बेल-अन्य लताओं की भाँति अधिक विस्तार में नहीं बढ़ती किन्तु थोड़ी ही दूरी में फैलती है। जड़-कुछ मोटी और खड़ी सी होती है। उससे शाखाएँ निकल कर भूमि पर फैलती हैं। पत्ते-२।।-३।। इञ्च के घेरे में, गोलाकार, पान के पत्तों के आकार वाले कोमल होते हैं। ऊपर के पत्ते विनाल होते हैं। फलगुच्छ-१-१।। इञ्च लम्बे और कृष्णाभ होते हैं जिनमें अत्यन्त छोटे-छोटे फल लगे रहते हैं। एक दूसरी जाति की पीपल को पहाड़ी पीपल कहते हैं। इसका लेटिन नाम Piper sylvaticum Roxb. (पीपर सिलवेटिकम्) है। यह आसाम और बंगाल में अधिक उत्पन्न होती है। इसकी लता कई फीट तक बढ़ जाती है और सूखने पर आपस में लिपटी हुई मालूम होती है। पत्ते-पान के आकार वाले, उक्त पीपल के पत्तों से किञ्चित् बड़े होते हैं। फलगुच्छ-पौन से १।। इञ्च लम्बे गोल होते हैं। इसको बङ्गाल के कविराज अधिक व्यवहार में लाते हैं। पीपल छोटी और बड़ी-इसमें १% उड़न शील तैल रहता है जिसमें से करीब ५-६.४% पाइपरीन, पाइपरीडीन एवं एक कटु राल (चविसिन), स्टार्च और स्नेह आदि द्रव्य रहते हैं। गुण और प्रयोग-पीपल रसायन, सुगन्धि, दीपक, पाचक, उष्ण, वातहर और कफघ्न है। इसका उपयोग आनाह, अपचन, अग्निमान्द्य, उदरशूल, कास, श्वास, जीर्णज्वर, प्रसूतिज्वर, आमवात, गृध्रसी, कटिशूल, वातरक्त, अङ्गघात आदि रोगों में किया जाता है। (१) मधु के साथ इसका चूर्ण नये वा पुराने कास, श्वास, स्वरभङ्ग तथा हिचकी में उपयोगी है। (२) प्रसूतिज्वर में गर्भाशय शुद्धि के लिए इसका मधु के साथ अच्छा उपयोग होता है। (३) वर्धमान पिप्पली का उपयोग रसायन के लिए एवं अधोशाखाघात, पुरानी खाँसी, दमा, यक्ष्मा, प्लीहावृद्धि, उदर, अर्श आदि रोगों में बहुत लाभदायी है। इसके लिए प्रथम तीन दिन पीपल का फांट मधु अथवा शर्करा के साथ दिया जाता है फिर नित्य तीन पीपल बढ़ाई जाती है। इस प्रकार दसवें दिन ३० पीपल का फांट दिया जाता है। फिर इसी प्रकार तीन पीपल नित्य कम की जाती है। कुछ लोग आधा दूध आधा जल में उबालकर दूध शेष रहने पर उसी पीपल को खिलाकर ऊपर से वही दूध पिलाते हैं। इसके अतिरिक्त इसके चूर्ण को घृत और मधु के साथ उपयोग किया जा सकता है।