भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ भावप्रकाशनिघण्टुः ५. अदरक हिं०-अदरख, आदी। बं०-आदा। पं०-अदरक, अद, अद्रक, आदा। म०-आले। ते०-अल्ल, अल्लम्। ब्रह्मी०-ख्येन, सेङ्ग, गिनसिन। गु०-आदु। क०-अल्ल, असिशोंठि, हसीसुण्ठी। मा०-आदो। ता०-शुक्क, इञ्जि। मल०-इञ्जी। सिंहली०-अमुडुङ्कुरु। फा०-अञ्जीबीले तर। अ०-जंजबीले रतव। अं०-Ginger root (जिञ्जर रूट)। ले०-Zingiber officinale (जिंजिबेर ऑफिसिनेल)। भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में अदरक की खेती की जाती है। अदरक का पौधा प्रायः एक हाथ ऊँचा होता है। इसके पत्ते बाँस के पत्तों के समान पर उनसे कुछ छोटे होते हैं। इसकी जड़ में जो कन्द होता है, उसी को अदरक कहते हैं। इसका फूल, फल बहुत कम देखने में आता है। किसी- किसी पुराने पौधे पर फूल आते हैं। फूलों का रङ्ग जामुनी रङ्ग का होता है। अदरक रेतीली भूमि में गोबर की खाद डाली हुई दुमट मिट्टी में अधिक उत्पन्न होती है। इसके लिये पर्याप्त वर्षा की आवश्यकता रहती है। गुण और प्रयोग-आर्द्रक के रस का उपयोग शहद के साथ विशेषकर श्वास, कास आदि कफ रोगों में अनुपान के लिये किया जाता है। भोजन के पूर्व सेंधानमक और आदी के सेवन से भूख बढ़ती है, जिह्वा एवं कण्ठ की शुद्धि होकर अन्न में रुचि भी बढ़ती है। आर्द्रक रस और प्याज का रस १, १ तोला लेने से उल्टी और जी मिचलाना दूर होता है। मलाबार में जलोदर रोग में इसका रस, तीव्र मूत्रनिःसारक रूप में दिया जाता है। इसकी मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाई जाती है जिससे मूत्र की मात्रा भी बढ़ती जाती है। लेकिन पुराने हृदय रोग एवम् वृक्कविकार (ब्राइट्स डिसौजा) में यह हानिकारक है। गुड़ के साथ इसका रस शीतपित्त में उपयोगी है। आदी का रस गुनगुना गरम करके कान में डालने से कर्णशूल दूर होता है। मात्रा-स्वरस ½-२ चम्मच। अथ पिप्पल्या नामानि गुणाँश्चाह पिप्पली मागधी कृष्णा वैदेही चपला कणा। उपकुल्योष्णा शौण्डी कोला स्यात्तीक्ष्णतण्डुला ।।५३।। पिप्पली दीपनी वृष्या स्वादुपाका रसायनी। अनुष्णा कटुका स्निग्धा वातश्लेष्महरो लघुः ।।५४।। पिप्पली रेचनी हन्ति श्वासकासोदरज्वरान्। कुष्ठप्रमेहगुल्मार्शः प्लीहशूलाममारुतान् ।।५५।। आर्द्रा कफप्रदा स्निग्धा शीतला मधुरा गुरुः। पित्तप्रशमनी सा तु शुष्का पित्तप्रकोपिणी ।।५६।। पिप्पली मधुसंयुक्ता मेदःकफविनाशिनी। श्वासकासज्वरहरी वृष्या मेध्याऽग्निवर्द्धिनी ।।५७।। द्विगुणः पिप्पलीचूर्णाद् गुडोऽत्र भिषजां मतः ।।५८।। पीपर के नाम तथा गुण-पिप्पली, मागधी, कृष्णा, वैदेही, चपला, कणा, उपकुल्या, ऊषणा, शौण्डी, कोला और तीक्ष्णतण्डुला ये सब संस्कृत नाम पीपर के हैं। पीपर-अग्निदीपक, वृष्य, पाक में मधुर रसयुक्त, रसायन, अनुष्ण (थोड़ी उष्ण), कटुरसयुक्त, स्निग्ध, वात तथा कफ नाशक, लघुपाकी और रेचक (दस्तावर) है। यह-श्वास, कास, उदररोग, ज्वर, कुष्ठ, प्रमेह, गुल्म, बवासीर, प्लीहा, शूल और आमवातनाशक है। कच्ची पीपर-कफकारी, स्निग्ध, शीतल, मधुर, गुरु और पित्त को शान्त करने वाली है। किन्तु सूखी पीपर-पित्त को कुपित करने वाली है। मधु (शहद) से युक्त पीपर-मेद, कफ, श्वास, कास और ज्वर का नाश करने वाली होती है एवं वृष्य, मेधा (धारणाशक्ति) के लिये हितकारी और अग्निवर्द्धक भी है। गुड़ से युक्त पीपर-जीर्णज्वर और अग्निमान्द्य में हितकर होती है-एवं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA