भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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हरीतक्यादिवर्गः २१७ मला० - चुक्क । ब्रह्मी ० - गिन्सीखियाव । फा० - जञ्जबील, जजबीलखुश्क । अ० - जञ्जबिले आविस । अं० - Dry Zingiber (ड्राइजिझिबेर) Ginger (जिंजर) । ले० - Zingiber officinale Roscoe (जिंजिबेर ऑफिसिनेल) । Fam. Zingiberaceae (जिंजिबरेसी) । सुखाई आदी को सोंठ कहते हैं । सुखाने की विधि के अनुसार इसके स्वरूप में अंतर पाया जाता है । आदी को खूब स्वच्छ कर पानी या दूध में उबाल कर सुखाते हैं । प्रायः सोंठ दो प्रकार की होती है एक रक्ताभ भूरी और दूसरी सफेद । चूने के साथ शोधन करने से यह सफेद तथा टिकाऊ हो जाती है । जिनमें रेशे बहुत कम होते हैं, वह अच्छी समझी जाती है । रासायनिक संगठन-सोंठ में १-३% उडन शील तैल रहता है । जिंजेरोल तथा शोगोल नामक इसमें कटु द्रव्य है । इसके अतिरिक्त इसमें रेजिन तथा स्टार्च रहता है । अच्छी सोंठ में राख ६% से अधिक नहीं रहती जिसमें से जल में घुलनशील राख की मात्रा १.७% से कम न होनी चाहिये । इसमें मद्यसार में घुलनशील सत्त्व ४.५% से कम तथा जल में घुलनशील सत्त्व १०% से कम न होना चाहिये । गुण और प्रयोग-सोंठ यह अनेक रोगों में अन्य औषधियों के साथ उपयोग में आती है । सोंठ, मिरिच और पीपल तीनों मिलकर त्रिकटु कहलाती हैं जिसका बहुत व्यवहार होता है । सोंठ यह एक उत्तम पाचक, कफघ्न, वातहर एवं उत्तेजक सुगन्धित द्रव्य है । इससे उदरगत वायु के कारण होने वाले उदरशूल, हृच्छूल में लाभ होता है । इसके सेवन से पाचन क्रिया ठीक होकर उदर में वायु का सञ्चय नहीं होता । जीर्ण सन्धिवात में विशेषतः वृद्धों में इसके फांट का नित्य रात में प्रयोग लाभकारी होता है । यह उष्ण एवं वातहर होने से किसी भी प्रकार की पीड़ा में लाभकारी है गरम जल में सोंठ के चूर्ण का लेप शिरःशूल, वातनाड़ीशूल एवं दन्तशूल में उपयोगी है । पसीना अधिक होकर हाथ और पैरों में शीत आने पर इसके चूर्ण को रगड़ने से रक्ताभिसरण की क्रिया ठीक होकर शीत दूर होता है । यह कफघ्न होने के कारण इसका प्रयोग श्वास, कास, प्रतिश्याय, गले के रोग, स्वरभङ्ग इत्यादि में किया जाता है । इसके लिये इसका फांट बना कर लेना चाहिये । आमदोष दूर करने के लिये सोंठ के चूर्ण को घी के साथ सुबह लेना चाहिये । इससे आमातिसारजन्य शूल दूर होता है । गुड़ के साथ सोंठ का उपयोग अर्श, अजीर्ण, अतिसार, गुल्म, शोथ, प्रमेह, कामला आदि में किया जाता है । वल्य औषधियों के साथ सोंठ का उपयोग क्षतक्षीण एवं दुर्बल रोगियों के लिये उपयोगी है । विरेचक औषधियों के साथ सोंठ लेने से हल्लास, पेट में मरोड़ या ऐंठन नहीं होती । मात्रा-चूर्ण २ से ८ रत्ती । अथार्द्रकस्य नामानि गुणांश्चाह आर्द्रक श्रृङ्गवेरं स्यात्कटुभद्रंतथाऽऽर्द्रिका । आर्द्रिका भेदिनी गुर्वी तीक्ष्णोष्णा दीपनी मता ।।४९।। कटुका मधुरा पाके रूक्षा वातकफापहा । ये गुणाः कथिताः शुण्ठ्यास्तेऽपि सन्त्यार्द्रकेऽखिलाः ।।५०।। भोजनाग्रे सदा पथ्यं लवणाऽऽर्द्रकभक्षणम् । दाहे निदाघशरदोर्नैव पूजितमार्द्रकम् ।।५२।। अदरख के नाम तथा गुण-आर्द्रक, शृङ्गबेर, कटुभद्र और आर्द्रिका ये संस्कृत नाम अदरख के हैं । अदरख- मल को भेदन करने वाली, पाक में गुरु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, कटुरसयुक्त, विपाक में मधुर रसयुक्त, रूक्ष, वात तथा कफ को नष्ट करने वाली होती है और जितने गुण पूर्व में सोंठ के कह आये हैं, सभी गुण अदरख में भी रहते हैं और भोजन करने के प्रथम सर्वदा सेंधा नमक के साथ अदरख खाना हितकारी होता है । क्योंकि यह अग्नि को दीप्त करने वाला, रुचिकारक, जिह्वा तथा कण्ठ का शोधन करने वाला होता है । कुष्ठ, पाण्डुरोग, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, व्रण, ज्वर, दाह इन रोगों में एवं ग्रीष्म तथा शरद् ऋतुओं में अदरख खाना हितकर नहीं है । [४९-५२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA