भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ भावप्रकाशनिघण्टुः त्रिफला के लक्षण, नाम तथा गुण- हरड़, बहेड़ा और आँवला इन तीनों के फल यदि समान भाग से एकत्र किये जायँ तो यही त्रिफला कहलाता है। इसके फलत्रिक और वरा ये भी नामान्तर हैं। त्रिफला- कफ तथा पित्त को नाश करनेवाला एवं प्रमेह व कुष्ठ को दूर करनेवाला, दस्तावर, नेत्रों के लिये हितकर, अग्निदीपक, रुचिकारक एवं विषम ज्वर को नाश करने वाला होता है। [४२-४३] त्रिफला आजकल विद्वान् यद्यपि हरड़, बहेड़ा और आँवला-इन तीनों को एक साथ मिलाकर त्रिफला मानते हैं तो भी इनके सम भाग होने में मतभेद है। कोई एक भाग हरड़, दो भाग बहेड़ा और तीन भाग आँवला एवं कोई एक भाग हरड़, दो भाग बहेड़ा और चार भाग आँवला को त्रिफला कहते हैं। एक हरड़, दो बहेड़े और चार आँवले को भी बहुत लोग त्रिफला मानते हैं। उसी प्रकार एक हरड़ से एक भाग हरड़, दो बहेड़ा से दो भाग बहेड़ा और चार आँवले से चार भाग आँवले समझते हैं किन्तु यदि एक हरड़, दो बहेड़े और चार आंवले (बनारसी बड़े आँवले से भिन्न) लिये जायें तो ये प्रायः समभाग ही होते हैं। अथ शुण्ठ्यानामानि गुणाँश्चाह शुण्ठी विश्वा च विश्वञ्च नागरं विश्वभेषजम् । ऊषणं कटुभद्रञ्च शृङ्गवेरं महौषधम् ।।४४।। शुण्ठी रुच्यामवातघ्नी पाचनी कटुका लघुः । स्निग्धोष्णा मधुरा पाके कफवातविबन्धनुत् ।।४५।। वृष्या ^१स्वर्य्यावमिश्वासशूलकासहृदामयान् । हन्ति श्लीपदशोथार्श आनाहोदरमारुतान् ।।४६।। आग्नेयगुणभूयिष्ठात् ^२ तोयांशपरिशोषि यत् । संगृह्णाति मलं तत्तु ग्राहि शुण्ठ्यादयो यथा ।।४७।। विबन्धभेदिनी या तु सा कथं ग्राहिणी भवेत् । शक्तिर्विबन्धभेदे स्याद्गतो न मलपातनो ।।४८।। सोंठ के नाम तथा गुण- शुण्ठी, विश्वा, विश्व, नागर, विश्वभेषज, ऊषण, कटुभद्र, शृङ्गवेर और महौषध ये सब संस्कृत नाम सोंठ के हैं। सोंठ- रुचिकारक, आमवातनाशक, पाचक, कटुरस-युक्त, लघुपाकी, स्निग्ध, उष्णवीर्य, विपाक में मधुर रस युक्त, कफ, वात और विबन्ध (विबद्धता) को दूर करने वाली, वृष्य, स्वर के लिये हितकारी, वमन, श्वास, शूल, कास, हृद्रोग, श्लीपद, शोथ, बवासीर, आनाह और उदर की वायु इन सबों को दूर करती है और जो द्रव्य अधिकतर अग्नि सम्बन्धी गुणों से युक्त होने से जलीय अंश को सूखाने वाला तथा मल का संग्राहक अर्थात् पतले मल के जलीय भाग को सुखाकर गाढ़ा करने वाला होता है वह 'ग्राही' कहलाता है, जैसे कि-सोंठ आदि। अब यहाँ पर प्रश्न उपस्थित होता है कि- जो सोंठ विबन्ध (बंधे हुये मल) का भेदन करने वाली होती है वह कैसे ग्राही होगी ? क्योंकि अभी अपने ग्राही द्रव्य का 'मल को गाढ़ा करना' लक्षण बतलाया है। इसका उत्तर यह है कि- इस द्रव्य का यह प्रभाव है कि- यह विबंध (मलबद्धता) के दूर करने में तो समर्थ होती है, किन्तु मल के गिराने में नहीं होती है क्योंकि आश्रय भेद से द्रव्यों के कर्मों में भी प्रभाववश भिन्नता हो ही जाती है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। [४४- ४८] ४. सोंठ हिं०- सोंठ, सौंठ, सूंठ, सिंघी। बं- शुंठ, शुण्ठि, सुंट। मा०-सूंठ। सिंहली०-वेलिच इङ्गरु। गु०-शुंठ्य, सुंठ-सूंठ। क०-शुंठि, शोंठि, ओणसुठि, वेनंशुठी। ते०-शोंठी, सोंठी, सोंटि। ता०-शुक्कु। प०-सुंड। १. 'स्वर्ये'ति पाठः। २. 'भूयिष्ठमि'ति पाठः। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA