भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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२३० भावप्रकाशनिघण्टुः (३) इसके मूल से बनी कॉफी मस्तिष्क एवं वातनाडियों के लिये बलदायक मानी गई है। (४) यह अपस्मार एवं गर्भिणी के लिये हानिकारक माना गया है। मात्रा-फल चूर्ण-१ से ४ माशा। १६. अजवायन जंगली (१) यह दो प्रकार की होती है जिनका अलग-अलग वर्णन नीचे संक्षेप में दिया गया है। सं०- वन्ययमानी ? म०-किरमिंजी अजवां। बं०-वनजोवान। ले०-Seseli indicum W. & A. (सिसिली इण्डिकम्) । Fam. Umbeillferae (अम्बेलीफेरी) । यह हिमालय के निचले भागों में देहरादून से लेकर गोरखपुर, बुन्देलखण्ड, आसाम, मध्य बंगाल तथा कारोमण्डल तक होती है। इसके क्षुप-वर्षांयु, ४ से १२ इञ्च तक ऊँचे, अनेक शाखा प्रशाखाओं से युक्त सघन देखने में आते हैं। पत्ते- विभक्त, कटे किनारे वाले और रोमश होते हैं। फूल-छत्ते से सफेदी युक्त गुलाबी रंग के, फल-बारीक छोटे-छोटे गोल, किञ्चित् लम्बे फीके पीले रंग के होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके फल प्रायः पशुओं के लिये औषधि के काम में अधिक आते हैं। यह उत्तेजक, दीपन, पाचन, शूलघ्न, आँतों के लिये हितकारी तथा विशेषरूप से गोल कृमि का नाशक है। इसके सेवन से पेट के आफरे में लाभ होता है और भूख बढ़ती है। मात्रा-१ से ३ माशा। १७. अजवायन जंगली (२) हिं०-वन अजवायन। पं०-माशो, रंगस्बुर, मरिज़ह। फा०-हाशा अं०-Wild Thyme (वाइल्ड थाइम्) । ले०-Thymus serpyllum Linn. (थाइमस् सर्पाइलम्) । Fam. Labiatae (लेविएटी) यह हिमालय के गरम प्रांतों में काश्मीर से कुमाऊँ तक एवं ईरान में होती है। यह क्षुप जाति की वनौषधि अनेक शाखा प्रशाखाओं से युक्त, सघन, कुछ रोमयुक्त, ६ से १२ इञ्च तक ऊँची और सुगन्धित होती है। पत्ते-अवॄन्त, इञ्च के अष्टमांश से चतुर्थांश के घेरे में किञ्चित् आयताकार अण्डाकार होते हैं और उन पर तैलीय धब्बे होते हैं। फूल-बारीक बैंगनी रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-बारीक और चिकने होते हैं। इस औषधि का पञ्चांग व्यवहार में आता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील सुगन्धित तैल ०.६%, टैनिन तथा गोंद पाया जाता है। इसमें थायमॉल (अजवायन का सत्) बहुत ही थोड़ी मात्रा में होता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, सड़न को दूर करने वाली, मूत्रजनन, उत्तेजक, आँखों के लिये हितकर, श्वास एवं कफहर, ग्राही, कृमिघ्न, व्रणशोधक और व्रणरोपक है। सड़न को दूर करने का इसका गुण बहुत स्पष्ट है। (१) इसका स्वरस, सिरका और मधु पुरानी खाँसी, श्वास, कुक्कुर खाँसी और घटसर्प तथा आंत्रिक व्रणों में दिया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA