भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २२९ अथ अजमोदाया नामानि गुणांश्चाह अजमोदा खराश्वा च मायूरो दीप्यकस्तथा¹। तथा ब्रह्मकुशा प्रोक्ता कारवीलो² चमस्तका ।।७८।। अजमोदा कटुस्तीक्ष्णा दीपनी कफवातनुत्। उष्णा विदाहिनी हृद्या वृष्या बलकरी लघुः ।। नेत्रामय ³कृमिच्छर्दिहिक्काबस्तिरुजो हरेत् ।।७९।। 'अजमोदा' (बड़ीअजवायन) के नाम तथा गुण-अजमोदा, खराश्वा, मायूरो, दीप्यक, ब्रह्मकुशा, कारवी और लोचमस्तका ये सब नाम 'अजमोदा' के हैं। अजमोदा-कटुरसयुक्त, तीक्ष्णवीर्य, अग्निदीपक, कफवातनाशक, उष्णवीर्य, विदाही, हृद्य (हृदय के लिये हितकर), वृष्य, बलकारक और परिपाक में लघु होती है और यह नेत्ररोग, कृमि, वमन, हिक्का (हिचकी) एवं बस्ति सम्बन्धी रोगों को नाश करने वाली होती है। [७८-७९] १५. अजमोदा हिं०-अजमोद, अजमोदा, अजमूदा, अजमोत। बं०-वनयमानी, रान्धुनी, अजमूद, चनु। गु०-बोडी अजमोद, अजमोद, बोडी अजमो। ते०-आजामोदा, वोमा, अशमदागां, वोमां, अजोदावोमरु। मध्य प्र०-रान्धुनी। पं०- भूतजटा। ता०-अशम, टागम, तागम, अशमता ओमान्। म०-अजमोदा वोवा, कोरंजा। क०-अजमोदा वोमा। फा०-करप्स। अ०-वज्रूल कर्प्स। अं०-Celery fruit (सेलेरी फ्रूट); Apii fructus (अप्पई फ्रक्टस्) ले०-Apium graveolens, Linn. (एपियम् ग्रॅविओलेन्स् लिन)। Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। यूरोप, अमेरिका तथा भारतवर्ष में इसकी खेती की जाती है। पञ्जाब तथा उत्तर प्रदेश में इसकी विशेष खेती होती है। यह उत्तर पश्चिमी हिमालय तथा पञ्जाब के पहाड़ी प्रान्तों में भी उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-२ से ३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-अनेक भागों में विभक्त, प्रत्येक भाग गहरे कटे किनारे वाले होते हैं। फूल-सफेद और छोटे छत्ते से होते हैं। फल-पीताभ, भूरा, गोलाभ अंडाकार, १ से १.५ मि० मि० चौड़ा, ०.५ मि० मि० मोटा एवं प्रत्येक अर्धखण्ड पर ५ गहरी धारियों से युक्त होता है। रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक हलके पीले रङ्ग का उड़नशील तैल १.५-३% पाया जाता है जिसमें एक विशेष प्रकार की इसकी गन्ध होती है। इसके अतिरिक्त इसमें गन्धक, ॲपोइल (Apoil) नामक एक विषैला पदार्थ, एक ग्लूकोसाइड ॲपोईन (Glucoside-Apiin), अल्ब्यू मिन्, गोंद और क्षार आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, पाचक, वातानुलोमक, उत्तेजक, वातशामक, बल्य, मूत्रल, गर्भाशय संकोचक एवं हृद्य है। घरेलू औषधि के रूप में इसका उपयोग आमवात, उदरशूल, आध्मान, वमन, हिक्का, कुपचन आदि रोगों में किया जाता है। इसको वातरक्त, कृमि, मूत्राशय के रोग और नष्टार्तव में काम में लाते हैं। इसके उद्वेष्टन निरोधी गुण के कारण श्वसनिका शोथ, श्वास एवं उदरशूल आदि विकारों में इसका व्यवहार किया जाता है। इसका पथरी के रोग में भी व्यवहार होता है। यकृत् और प्लीहा के रोगों में भी यह कुछ लाभदायी है। मसाले के रूप में भी व्यवहार होता है। यकृत् और प्लीहा के रोगों में भी यह कुछ लाभदायी है। मसाले के रूप में भी इसका व्यवहार किया जाता है। (१) इसका तैल उद्वेष्टन निरोधी, वातनाड़ियों के लिये बल्य एवं आमवाताभ संधिशोध में लाभदायी है। (२) इसका मूल रसायन एवं मूत्रल माना गया है और इसका उपयोग सर्वांग शोथ और शूल में किया जाता है। १. 'मयूर' इति पाठा० । २. 'च समस्तके'ति पाठा० । ३. 'कफे' पाठा० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA