भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ भावप्रकाशनिघण्टुः भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में हरसाल खेतों में यह बोई जाती है विशेषकर इन्दौर तथा हैदराबाद राज्य में यह अधिकता से होती है । यह अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पर्शिया, मिश्र और यूरोप आदि देशों में भी उत्पन्न होती है । इसका क्षुप-१ से ३ फुट तक ऊँचा, पत्ते-धनिये के पत्ते के समान कटीले, अनेक भागों में विभक्त, डालियों पर दूर-दूर आते हैं। फूल-छत्ते से, सफेद रंग के बारीक आते हैं। फल-नन्हें-नन्हें रहते हैं। छत्ते पकने पर फल निकाल लिए जाते हैं । इन्हीं फलों को अजवायन कहते हैं । ये फल-बहुत छोटे, दबे हुए, गोल अंडाकार, २ मि० मि० लम्बे, भूरे रंग के होते हैं इनकी ऊपरी सतह पर छोटी गाँठें एवं प्रत्येक अर्ध खण्ड पर पाँच धारियाँ होती हैं । इसमें अजवायन की विशिष्ट गंध होती है । रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील सुगन्धित तैल जिसे अजवाइन का तेल कहते हैं, २ से ३% पाया जाता है जिसमें से ४०-५०% थाइमॉल रहता है । इसमें पाये जाने वाला रवेदार पदार्थ स्टिअरोप्टिन, जिसे अजवाइन का फूल या अजवायन का सत् कहते हैं डॉक्टरों के थाइमॉल के समान होता है । इसके अतिरिक्त इसमें साइमोन, टरपेन आदि पदार्थ रहते हैं । गुण और प्रयोग-अजवायन, अग्निदीपक, पाचक, उष्ण, उद्वेष्टन, निरोधी, उत्तेजक, बल्य, कृमिघ्न, संक्रमण निरोधी, दुर्गन्धिनाशक एवं सड़न को दूर करने वाली है । इसका उपयोग अतिसार, कुपचन, अजीर्ण, उदरशूल, आध्मान, विसूचिका आदि रोगों में किया जाता है । इसमें सरसों और मिर्चा का तीतापन, चिरायते का कड़ुआपन एवं हींग का उद्वेष्टन निरोधी गुण तीनों एक साथ हैं । इसका उपयोग अनेक औषधियों विशेषतया एरंड तैल की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए किया जाता है । पुरानी खाँसी में जब कफ बहुत कम रहता है तब इसके प्रयोग से कफ ढीला होकर निकल जाता है । श्वास में गरम पानी के साथ इसका चूर्ण दिया जाता है या इसको चिलम में रखकर पीते हैं । अजवायन का चूर्ण और सेंधानमक अजीर्ण से उत्पन्न विकारों की घरेलू दवा है । (१) उदरशूल, आध्मान आदि विकारों में अजवायन, सेंधानमक, सोंचरनमक, यवक्षार, हींग और आँवला इनके चूर्ण को १/२ से १ माशा की मात्रा में मधु के साथ दिया जाता है । (२) शराबियों को मद्य की आदत छुड़ाने के लिये शराब पीने की इच्छा होने पर इसे चबाने को दिया जाता है । (३) बच्चों के रोगों में तथा हैजे में इसका अर्क बहुत उपयोगी है । (४) अजवायन का सत्-बहुत अच्छा कृमिघ्न, सड़न को दूर करने वाला, प्रतिदूषक पदार्थ है । इसका उपयोग घोल के रूप में व्रण प्रक्षालन के लिये किया जाता है । अजवायन का सत्, पेपरमिंट का सत् और कपूर तीनों मिलाने से एक तरल पदार्थ बनता है जिसका विसूचिका के प्रारम्भ में ३, ४ बूँद बतासे के साथ व्यवहार किया जाता है । इससे कै, दस्त कम होकर लाभ होता है । अमृतधारा जैसे प्रचलित पेटेण्ट योगों में ये ही औषधियाँ मूलतः रहती हैं । यह आंत्रिक कृमियों पर विशेषकर अंकुश कृमि में बहुत उपयोगी है । संधिशूल आदि में इसको लगाने से लाभ होता है । अजवायन का सत दंतशूल में उपयोगी है । (५) इसकी पुल्टिस बनाकर उदरशूल, आमवात, सन्धिशूल आदि में सेंका जाता है । विसूचिका में हाथ, पैरों को तथा श्वास और खाँसी में छाती को इससे सेंकने से लाभ होता है । (६) इसके पत्तों का रस कृमियों को मारने के लिये काम में आता है एवं पत्तों को पीसकर कीड़ों के काटे हुए स्थानों पर लगाया जाता है । पत्तों के अन्य गुण शाकवर्ग में देखें । मात्रा-चूर्ण-३ से ६ माशा, अर्क-१ से २ औंस, सत-१/४ से १ र० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA