भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
२२८ भावप्रकाशनिघण्टुः भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में हरसाल खेतों में यह बोई जाती है विशेषकर इन्दौर तथा हैदराबाद राज्य में यह अधिकता से होती है । यह अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पर्शिया, मिश्र और यूरोप आदि देशों में भी उत्पन्न होती है । इसका क्षुप-१ से ३ फुट तक ऊँचा, पत्ते-धनिये के पत्ते के समान कटीले, अनेक भागों में विभक्त, डालियों पर दूर-दूर आते हैं। फूल-छत्ते से, सफेद रंग के बारीक आते हैं। फल-नन्हें-नन्हें रहते हैं। छत्ते पकने पर फल निकाल लिए जाते हैं । इन्हीं फलों को अजवायन कहते हैं । ये फल-बहुत छोटे, दबे हुए, गोल अंडाकार, २ मि० मि० लम्बे, भूरे रंग के होते हैं इनकी ऊपरी सतह पर छोटी गाँठें एवं प्रत्येक अर्ध खण्ड पर पाँच धारियाँ होती हैं । इसमें अजवायन की विशिष्ट गंध होती है । रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील सुगन्धित तैल जिसे अजवाइन का तेल कहते हैं, २ से ३% पाया जाता है जिसमें से ४०-५०% थाइमॉल रहता है । इसमें पाये जाने वाला रवेदार पदार्थ स्टिअरोप्टिन, जिसे अजवाइन का फूल या अजवायन का सत् कहते हैं डॉक्टरों के थाइमॉल के समान होता है । इसके अतिरिक्त इसमें साइमोन, टरपेन आदि पदार्थ रहते हैं । गुण और प्रयोग-अजवायन, अग्निदीपक, पाचक, उष्ण, उद्वेष्टन, निरोधी, उत्तेजक, बल्य, कृमिघ्न, संक्रमण निरोधी, दुर्गन्धिनाशक एवं सड़न को दूर करने वाली है । इसका उपयोग अतिसार, कुपचन, अजीर्ण, उदरशूल, आध्मान, विसूचिका आदि रोगों में किया जाता है । इसमें सरसों और मिर्चा का तीतापन, चिरायते का कड़ुआपन एवं हींग का उद्वेष्टन निरोधी गुण तीनों एक साथ हैं । इसका उपयोग अनेक औषधियों विशेषतया एरंड तैल की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए किया जाता है । पुरानी खाँसी में जब कफ बहुत कम रहता है तब इसके प्रयोग से कफ ढीला होकर निकल जाता है । श्वास में गरम पानी के साथ इसका चूर्ण दिया जाता है या इसको चिलम में रखकर पीते हैं । अजवायन का चूर्ण और सेंधानमक अजीर्ण से उत्पन्न विकारों की घरेलू दवा है । (१) उदरशूल, आध्मान आदि विकारों में अजवायन, सेंधानमक, सोंचरनमक, यवक्षार, हींग और आँवला इनके चूर्ण को १/२ से १ माशा की मात्रा में मधु के साथ दिया जाता है । (२) शराबियों को मद्य की आदत छुड़ाने के लिये शराब पीने की इच्छा होने पर इसे चबाने को दिया जाता है । (३) बच्चों के रोगों में तथा हैजे में इसका अर्क बहुत उपयोगी है । (४) अजवायन का सत्-बहुत अच्छा कृमिघ्न, सड़न को दूर करने वाला, प्रतिदूषक पदार्थ है । इसका उपयोग घोल के रूप में व्रण प्रक्षालन के लिये किया जाता है । अजवायन का सत्, पेपरमिंट का सत् और कपूर तीनों मिलाने से एक तरल पदार्थ बनता है जिसका विसूचिका के प्रारम्भ में ३, ४ बूँद बतासे के साथ व्यवहार किया जाता है । इससे कै, दस्त कम होकर लाभ होता है । अमृतधारा जैसे प्रचलित पेटेण्ट योगों में ये ही औषधियाँ मूलतः रहती हैं । यह आंत्रिक कृमियों पर विशेषकर अंकुश कृमि में बहुत उपयोगी है । संधिशूल आदि में इसको लगाने से लाभ होता है । अजवायन का सत दंतशूल में उपयोगी है । (५) इसकी पुल्टिस बनाकर उदरशूल, आमवात, सन्धिशूल आदि में सेंका जाता है । विसूचिका में हाथ, पैरों को तथा श्वास और खाँसी में छाती को इससे सेंकने से लाभ होता है । (६) इसके पत्तों का रस कृमियों को मारने के लिये काम में आता है एवं पत्तों को पीसकर कीड़ों के काटे हुए स्थानों पर लगाया जाता है । पत्तों के अन्य गुण शाकवर्ग में देखें । मात्रा-चूर्ण-३ से ६ माशा, अर्क-१ से २ औंस, सत-१/४ से १ र० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २२९ अथ अजमोदाया नामानि गुणांश्चाह अजमोदा खराश्वा च मायूरो दीप्यकस्तथा¹। तथा ब्रह्मकुशा प्रोक्ता कारवीलो² चमस्तका ।।७८।। अजमोदा कटुस्तीक्ष्णा दीपनी कफवातनुत्। उष्णा विदाहिनी हृद्या वृष्या बलकरी लघुः ।। नेत्रामय ³कृमिच्छर्दिहिक्काबस्तिरुजो हरेत् ।।७९।। 'अजमोदा' (बड़ीअजवायन) के नाम तथा गुण-अजमोदा, खराश्वा, मायूरो, दीप्यक, ब्रह्मकुशा, कारवी और लोचमस्तका ये सब नाम 'अजमोदा' के हैं। अजमोदा-कटुरसयुक्त, तीक्ष्णवीर्य, अग्निदीपक, कफवातनाशक, उष्णवीर्य, विदाही, हृद्य (हृदय के लिये हितकर), वृष्य, बलकारक और परिपाक में लघु होती है और यह नेत्ररोग, कृमि, वमन, हिक्का (हिचकी) एवं बस्ति सम्बन्धी रोगों को नाश करने वाली होती है। [७८-७९] १५. अजमोदा हिं०-अजमोद, अजमोदा, अजमूदा, अजमोत। बं०-वनयमानी, रान्धुनी, अजमूद, चनु। गु०-बोडी अजमोद, अजमोद, बोडी अजमो। ते०-आजामोदा, वोमा, अशमदागां, वोमां, अजोदावोमरु। मध्य प्र०-रान्धुनी। पं०- भूतजटा। ता०-अशम, टागम, तागम, अशमता ओमान्। म०-अजमोदा वोवा, कोरंजा। क०-अजमोदा वोमा। फा०-करप्स। अ०-वज्रूल कर्प्स। अं०-Celery fruit (सेलेरी फ्रूट); Apii fructus (अप्पई फ्रक्टस्) ले०-Apium graveolens, Linn. (एपियम् ग्रॅविओलेन्स् लिन)। Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। यूरोप, अमेरिका तथा भारतवर्ष में इसकी खेती की जाती है। पञ्जाब तथा उत्तर प्रदेश में इसकी विशेष खेती होती है। यह उत्तर पश्चिमी हिमालय तथा पञ्जाब के पहाड़ी प्रान्तों में भी उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-२ से ३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-अनेक भागों में विभक्त, प्रत्येक भाग गहरे कटे किनारे वाले होते हैं। फूल-सफेद और छोटे छत्ते से होते हैं। फल-पीताभ, भूरा, गोलाभ अंडाकार, १ से १.५ मि० मि० चौड़ा, ०.५ मि० मि० मोटा एवं प्रत्येक अर्धखण्ड पर ५ गहरी धारियों से युक्त होता है। रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक हलके पीले रङ्ग का उड़नशील तैल १.५-३% पाया जाता है जिसमें एक विशेष प्रकार की इसकी गन्ध होती है। इसके अतिरिक्त इसमें गन्धक, ॲपोइल (Apoil) नामक एक विषैला पदार्थ, एक ग्लूकोसाइड ॲपोईन (Glucoside-Apiin), अल्ब्यू मिन्, गोंद और क्षार आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, पाचक, वातानुलोमक, उत्तेजक, वातशामक, बल्य, मूत्रल, गर्भाशय संकोचक एवं हृद्य है। घरेलू औषधि के रूप में इसका उपयोग आमवात, उदरशूल, आध्मान, वमन, हिक्का, कुपचन आदि रोगों में किया जाता है। इसको वातरक्त, कृमि, मूत्राशय के रोग और नष्टार्तव में काम में लाते हैं। इसके उद्वेष्टन निरोधी गुण के कारण श्वसनिका शोथ, श्वास एवं उदरशूल आदि विकारों में इसका व्यवहार किया जाता है। इसका पथरी के रोग में भी व्यवहार होता है। यकृत् और प्लीहा के रोगों में भी यह कुछ लाभदायी है। मसाले के रूप में भी व्यवहार होता है। यकृत् और प्लीहा के रोगों में भी यह कुछ लाभदायी है। मसाले के रूप में भी इसका व्यवहार किया जाता है। (१) इसका तैल उद्वेष्टन निरोधी, वातनाड़ियों के लिये बल्य एवं आमवाताभ संधिशोध में लाभदायी है। (२) इसका मूल रसायन एवं मूत्रल माना गया है और इसका उपयोग सर्वांग शोथ और शूल में किया जाता है। १. 'मयूर' इति पाठा० । २. 'च समस्तके'ति पाठा० । ३. 'कफे' पाठा० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
२३० भावप्रकाशनिघण्टुः (३) इसके मूल से बनी कॉफी मस्तिष्क एवं वातनाडियों के लिये बलदायक मानी गई है। (४) यह अपस्मार एवं गर्भिणी के लिये हानिकारक माना गया है। मात्रा-फल चूर्ण-१ से ४ माशा। १६. अजवायन जंगली (१) यह दो प्रकार की होती है जिनका अलग-अलग वर्णन नीचे संक्षेप में दिया गया है। सं०- वन्ययमानी ? म०-किरमिंजी अजवां। बं०-वनजोवान। ले०-Seseli indicum W. & A. (सिसिली इण्डिकम्) । Fam. Umbeillferae (अम्बेलीफेरी) । यह हिमालय के निचले भागों में देहरादून से लेकर गोरखपुर, बुन्देलखण्ड, आसाम, मध्य बंगाल तथा कारोमण्डल तक होती है। इसके क्षुप-वर्षांयु, ४ से १२ इञ्च तक ऊँचे, अनेक शाखा प्रशाखाओं से युक्त सघन देखने में आते हैं। पत्ते- विभक्त, कटे किनारे वाले और रोमश होते हैं। फूल-छत्ते से सफेदी युक्त गुलाबी रंग के, फल-बारीक छोटे-छोटे गोल, किञ्चित् लम्बे फीके पीले रंग के होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके फल प्रायः पशुओं के लिये औषधि के काम में अधिक आते हैं। यह उत्तेजक, दीपन, पाचन, शूलघ्न, आँतों के लिये हितकारी तथा विशेषरूप से गोल कृमि का नाशक है। इसके सेवन से पेट के आफरे में लाभ होता है और भूख बढ़ती है। मात्रा-१ से ३ माशा। १७. अजवायन जंगली (२) हिं०-वन अजवायन। पं०-माशो, रंगस्बुर, मरिज़ह। फा०-हाशा अं०-Wild Thyme (वाइल्ड थाइम्) । ले०-Thymus serpyllum Linn. (थाइमस् सर्पाइलम्) । Fam. Labiatae (लेविएटी) यह हिमालय के गरम प्रांतों में काश्मीर से कुमाऊँ तक एवं ईरान में होती है। यह क्षुप जाति की वनौषधि अनेक शाखा प्रशाखाओं से युक्त, सघन, कुछ रोमयुक्त, ६ से १२ इञ्च तक ऊँची और सुगन्धित होती है। पत्ते-अवॄन्त, इञ्च के अष्टमांश से चतुर्थांश के घेरे में किञ्चित् आयताकार अण्डाकार होते हैं और उन पर तैलीय धब्बे होते हैं। फूल-बारीक बैंगनी रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-बारीक और चिकने होते हैं। इस औषधि का पञ्चांग व्यवहार में आता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील सुगन्धित तैल ०.६%, टैनिन तथा गोंद पाया जाता है। इसमें थायमॉल (अजवायन का सत्) बहुत ही थोड़ी मात्रा में होता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, सड़न को दूर करने वाली, मूत्रजनन, उत्तेजक, आँखों के लिये हितकर, श्वास एवं कफहर, ग्राही, कृमिघ्न, व्रणशोधक और व्रणरोपक है। सड़न को दूर करने का इसका गुण बहुत स्पष्ट है। (१) इसका स्वरस, सिरका और मधु पुरानी खाँसी, श्वास, कुक्कुर खाँसी और घटसर्प तथा आंत्रिक व्रणों में दिया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २३१ (२) अजीर्ण और अग्निमांद्य में सैन्धव के साथ इसको दिया जाता है। यह ग्राही है तथा इससे उदरशूल दूर होता है। (३) बस्ति पीड़ा, बस्ति शोथ तथा लसिकामेह (Chyluria) एवं मूत्र स्वच्छ न होने पर इसका क्वाथ मधु और सिरके के साथ दिया जाता है। (४) चर्मरोग जैसे दाद, खुजली आदि में यह बहुत लाभदायी है। (५) अग्निदग्ध व्रण पर इसका स्वरस घी के साथ लगाते हैं। (६) सन्धिशोथ आदि में इसको रेंडी के तेल के साथ पीसकर लगाते हैं तथा इसका क्वाथ पीने को देते हैं। (७) इसकी चटनी दृष्टि के लिये उपयोगी है। (८) इसका धूपनार्थ प्रयोग करने से हवा शुद्ध होती है। मात्रा—चूर्ण-१/८ से १/४ तोला। तेल-१ से ३ बूँद। अथ पारसीकयवानीगुणानाह पारसीकयवानी तु यवानीसदृशी गुणः। विशेषात्पाचनी रुच्या ग्राहिणी मादिनी गुरुः ॥८०॥ खुरासानी अजवायन के गुण—पारसीकयवानी अर्थात् खुरसानी अजवाइन का भी गुण अजवाइन के समान ही जानना चाहिये। किन्तु विशेषता यह है कि यह पाचक, रुचिकारक, ग्राही, मादक तथा परिपाक में गुरु होती है। [८०] १८. पारसीक यवानी हिं०—खुरासानी अजवायन, खुरासानी अजवाइन, खुरसाना। बं०—खुरसानी अजोवान। म०—खुरासानी ओंवा, खुरासाण ओंवा। गु०—खुरासाणी अजमो, छुहारी अजमोद। ते०—कुरासानी वाम। ता०—कुरासानी योमाम। पं०— खुरासानी अजवाइन, बजरुल। मा०—खुरासानी अजवाण। क०—खुरासानी वोभं। फा०—तुख्म वङ्गे, वङ्गदिवाना, वङ्ग, तुख्मविनग, तुख्मेवंग। अ०—वज़रुल वङ्ग, अवीद शिकरान, वजुलवङ्ग, बजरुल विनग। यू०—अजवायनी खुरसानी। अं०—Henbane (हेनबेन)। ले०—Hyoscyamus niger, Linn. (हायोसायामस् नाइगर लिन)। Fam. Solanaceae (सोलेनेसी)। खुरासानी अजवायन केवल खुरासान देश में ही नहीं बल्कि इसके छोटे छोटे क्षुप योरप और मध्य एशिया के कई प्रान्तों के जङ्गलों तथा कूड़ों के ढेर पर उगे हुए रहते हैं। हमारे देश में पश्चिम हिमालय के गरम प्रान्तों में काश्मीर से गढ़वाल तक पाये जाते हैं और सहारनपुर, पूना, आगरा और अजमेर के आस पास के कितने ही स्थानों में इसकी खेती की जाती है। इसकी अन्य जातियाँ H. reticulatus (हा. रेटिक्यूलैटस), तथा H. muticus (हा. म्यूटिकस-कोहीभंग) होती हैं। H. muticus (हा. म्यूटिकस) अधिक विषैली होती है तथा यह पश्चिमी पञ्जाब और सिन्ध के जङ्गली प्रदेशों तथा नदियों के किनारों पर उत्पन्न होती है एवं हा. रेटिक्युलेटस् वलुचिस्तान में होती है। इसका पौधा—सीधा, रोमश, चिपचिपा, उग्रगंधयुक्त एवं १-३ फीट ऊँचा होता है। पत्ते—धतूरे के समान, कुछ कटे किनारेवाले, दन्तुर, नीचे के सवृन्त आयताकार, अंडाकार किन्तु ऊपर के अवृन्त अंडाकार होते हैं। पुष्प—पीले रंग के, पाँच पंखड़ीवाले और आकार में तमाखू के फूलों के समान होते हैं तथा उन पर जामुनी रेखायें होती हैं। फल—अंडाकार, १/२ इंच व्यास के एवं दो खण्डों में विभक्त होते हैं। बीज—भूरे, धूसर, चिपटे, वृक्काकार या घोंघा की तरह, १.५-१.७५×१-१.२×०.५-०.७ मि० मि० बड़े, धारीदार, गंधहीन एवं अल्पतिक्त होते हैं।
२३२ भावप्रकाशनिघण्टुः हा. म्यूटिकस् के बीज-पीताभ, चिपटे, गोलाई लिये हुये चौकोर, करीब उतने ही बड़े किन्तु सूक्ष्म गड्ढेदार, अल्प उग्रगंध युक्त किन्तु स्वादहीन होते हैं। बजार में दोनों मिले हुये मिलते हैं जिसमें अन्य पदार्थ भी मिले हुये पाये जाते हैं। आयुर्वेद में बीजों का तथा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में पत्र तथा पुष्पित अग्रभाग के विभिन्न कल्पों का उपयोग किया जाता है। यूनानी चिकित्सकों के मत से खुरासानी अजवायन सफेद, काली और लाल तीन जाति की होती है। इनमें से काली विष के समान हानिकर और घातक मानी जाती है। रासायनिक संगठन-इसकी पत्तियों में हायोसाएमिन (Hyoscyamine) नामक क्षाराभ तथा अल्प मात्रा में हायोसीन (Hyoscine) या स्कोपोलामाइन (Scopolamine), ॲट्रोपिन (Atropine), हायोसिप्रिन (Hyosciprin), कोलिन तैल, गोंद, ॲल्ब्यूमिन तथा पोटैशियम नाइट्रेट २% आदि पदार्थ रहते हैं। इसकी विभिन्न जातियों में क्षाराभों की मात्रा भिन्न-भिन्न रहती है। सहारनपुर तथा काश्मीर में लगाये पौधों में इनकी मात्रा प्राकृत पौधों की अपेक्षा अधिक (.०३%) होती है तथा ब्रिटिशफार्माकोपिया के प्रतिमान (.०५५%) के करीब होती है। इसके बीजों में हायोसाएमिन (Hyoscyamine), २५% तैल, तथा राख ४-५% होती है। गुण और प्रयोग-यह अवसादक, वेदनाहर, स्वापजनक, उद्वेष्टन निरोधी, शामक, बल्य कनीनिका विकासि, दीपन, पाचन तथा कृमिघ्न है। यह बहुत अच्छा वेदनाहर एवं निद्राकर है। इससे अफीम के समान कब्जियत नहीं होती। इसकी क्रिया बेलाडोना की तरह होती है, लेकिन इससे मस्तिष्क कम उत्तेजित होता है और सुषुम्ना एवं आन्त्र पर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इससे अनैच्छिक मांस पेशियों के उद्वेष्ठन के कारण होने वाले शूल-जैसे नाग (Lead) शूल तथा मूत्रमार्ग प्रक्षोभ से उत्पन्न शूल-दूर होते हैं। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतंत्रक, निद्राभंग, आक्षेप, नाड़ीशूल तथा अनेक मस्तिष्क के विकार एवं मानसिक अस्वस्थता में किया जाता है। सूखी खाँसी एवं दमा में श्वसनिकाओं का संकोच दूर होकर लाभ होता है। यह विरेचक औषधियों से उत्पन्न मरोड़ को दूर करती है। पथरी एवं बस्तिशोथ आदि से उत्पन्न प्रक्षोभ में यवक्षार, पाठा तथा गुरुच के साथ यह बहुत गुणकारी है। अल्प मात्रा में देने से यह हृदय के लिये शामक है और बल्य होने से हृदय की धड़कन में इससे लाभ होता है। पीड़ातार्तव, अनियमितार्तव में भी इसका अच्छा उपयोग होता है। मद्य के साथ इसके बीजों को पीसकर स्तनशोथ, अंडशोथ, यकृत पीड़ा एवं संधिशोथ में लगाने से शोथ एवं वेदना कम होती है। दाँत के गड्ढे में इसके बीजों को पीस कर रखने से दंतशूल दूर होता है। इसकी अंगारों पर जलाकर उसके धूएँ का मुख में जाने देने से भी दंतशूल में लाभ होता है। अधिक मात्रा में यह मादक विष है जिससे प्रलाप, संन्यास आदि होकर शीघ्र मृत्यु होती है। वृद्ध एवं दुर्बल इसकी अधिक मात्रा सहन नहीं कर सकते, लेकिन बच्चे अधिक मात्रा सहन कर सकते हैं। मात्रा-पत्र चूर्ण १ १/२-३ र०, बीज चूर्ण १ १/२-३ र०, तरल एक्स्ट्रॅक्ट ३-६ बूँद, शुष्क एक्स्ट्रॅक्ट १/८-१/२ र०, टिंक्चर ३०-६० बूँद। अथ शुक्लजीरककृष्णजीरककालिकानां नामानि गुणाँश्चाह जीरको जरणोऽजाजी कणा स्याद्दीर्घजीरकः ।।८१।। कृष्णजीरः सुगन्धश्च तथैवोद्गारशोधनः । कालाजाजी तु सुषवी कालिका चोपकालिका ।।८२।। पृथ्वीका कारवी पृथ्वी पृथुकृष्णोपकुञ्चिका । उपकुञ्ची च कुञ्ची च बृहज्जीरक इत्यपि ।।८३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २३३ जीरकत्रितयं रूक्षं कटूष्णं दीपनं लघु । संग्राहि पित्तलं मेध्यं गर्भाशयविशुद्धिकृतक ॥८४॥ ज्वरघ्नं पाचनं वृष्यं बल्यं रुच्यं कफापहम् । चक्षुष्यं पवनाध्मानगुल्मच्छर्द्यतिसार हृत् ॥८५॥ सफेद जीरा, स्याह जीरा तथा कलौंजी (मंगरैला) के नाम तथा गुण-उसमें से जीरक, जरण, अजाजी, कणा और दीर्घजीरक ये सब 'सफेद जीरा' के नाम हैं । कृष्णजीर, सुगन्ध और उद्गारशोधन ये नाम 'स्याहजीरा' के हैं और कालाजाजी (कोई-कोई काला तथा अजाजी ऐसा पृथक् दो नाम मानते हैं), सुषवी, कालिका, उपकालिका, पृथ्वी- का, कारवी, पृथ्वी, पृथु, कृष्णा, उपकुञ्चिका, उपकुञ्जी, कुञ्जी और बृहज्जीरक ये सब नाम कलौंजी (मँगरैला) के हैं। तीनों प्रकार के जीरे-रूक्ष, कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, परिपाक में लघु, संग्राही, पित्तकारक, मेधा के लिये हितकारी, गर्भाशय को शुद्ध करने वाले, ज्वरनाशक, पाचक, वृष्य (वीर्यवर्धक), बलकारक, रुचिजनक, कफनाशक, नेत्रों के लिये हितकारी और वायु, आध्मान, गुल्म, वमन और अतिसार को भी दूर करने वाले होते हैं। [८१-८५] ९९. शुक्लजीरक (जीरा) हिं० - जीरा, सादाजीरा, साधारण जीरा, सफेद जीरा । बं० - सादाजीरे, शाहाजीरे, जीरे । म० - जीरें, पांढरे जीरे । गु० - जीरुं, शाकनु जीरुं, सादु जीरुं, धोलु जीरुं । क० - जीरिगे, विलिय जिरिगे विलिय जीरगे । ते० - जिलकारा, जील करर, जील कर्र । ता० - शीरागम । यू० - रवामुने । फा० - जीरये सफेद । अ० - कमून अवियज़ । अं० - Cumin seed (क्युमिन सीड) । ले० - Cuminum cyminum Linn. (क्युमिनम् साइमिनम्, लिन.) । Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी) । जीरा-एक सर्वप्रसिद्ध मसाले की वस्तु है । आसाम और बंगाल के सिवा प्रायः सब प्रान्तों में विशेषकर राजपूताना और उत्तर भारत के कई प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है । यह खेतों में प्रति वर्ष बोया जाता है । इस क्षुप जाति की वनस्पति की शाखायें पतली होती हैं । पत्ते-सौंफ के पत्तों के समान पतले-पतले, लम्बे तथा २-३ एक साथ रहते हैं । बारीक सफेद फूलों के छत्ते लगते हैं । फल-सौंफ के समान होता है ॥१८४॥ रासायनिक संगठन-इसमें एक सुगन्धि, उड़नशील तथा हलके पीले रङ्ग का तैल २.५-४% पाया जाता है । इस तैल में क्यूमिक ऑल्डिहाइड् (Cumic aldehyde) की मात्रा ५२% तक होती है जिसके अन्दर कई रासायनिक पदार्थ होते हैं । इस तैल को कृत्रिम रूप से थाइमॉल् (Thymol = अजवाइन का सत्) में परिवर्तित किया जा सकता है जो अच्छा प्रतिदूषक (Antiseptic) और कृमिघ्न पदार्थ है। इसके अतिरिक्त इसमें स्थिर तैल १०% एवं पेण्टोसान (Pentosan) ६.७% होता है । गुण और प्रयोग-यह पाचक, वातानुलोमक, मूत्रविरजनीय, वेदनाहर, उत्तेजक एवं संग्राही है । इसका उपयोग वमन, अतिसार, कुपचन, आध्मान, ज्वर तथा मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान के रोग जैसे सुजाक, पथरी एवं मूत्रावरोध में किया जाता है । बालकों के पाचन के विकारों में यह अधिक उपयोगी है । (१) ज्वर में पाचन सुधरकर भूख बढ़ती है, पेशाब साफ होती है और दाह शांति होती है इसमें गुड़ के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये । (२) अतिसार में दही के साथ इसको दिया जाता है । जीरकाद्यमोदक का उपयोग जीर्ण अतिसार, अपचन एवं अग्निमांद्यादि रोगों में किया जाता है । गर्भिणी में पित्तजन्य वांति में नींबू के रस के साथ देने से लाभ होता है । (३) सुजाक आदि में निम्नलिखित चूर्ण १० रत्ती की मात्रा में देने से लाभ होता है-जीरा ४, खूनखराबा २, कलमीशोरा ५, धनियां ५ तथा गुलाब २ भाग । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
२३४ भावप्रकाशनिघण्टुः (४) प्रसूता को देने से दुग्ध वृद्धि होती है । (५) हिचकी में घृत के साथ इसका धूम्रपान बहुत उपयोगी है । (६) इसको स्वरभंग एवं सर्पविष में भी उपयोगी बतलाया गया है । (७) इसका बाह्यलेप पीड़ाहर है एवं यह अर्श, स्तन, अण्डकोष तथा उदर की पीड़ा पर लगाया जाता है और घृत, मधु एवं नमक के साथ बिच्छू के काटने पर लगाने से लाभ होता है । इसके क्वाथ से स्नान करने से खुजली दूर होती है तथा इससे सिद्ध तैल का चर्मरोगों में उपयोग होता है । मात्रा—१/२-२ माशा । २०. कृष्ण जीरक हिं०-काला जीरा, स्या जीरा, स्याह जीरा, कृष्णजीरा । बं०-काल जीरें, कृष्णजीरा । म०-शहाजीरें, शाहाजीरं, कालेजीरे । गु०-स्याजीरूं । क०-करिजीरके, करिजिरेगे । ते०-शिमइसपू । ता०-शिमह शोम्बू । मा०-श्याजीरो । चुनाव०-गूंयूं । फा०-सियाहजीरा, स्याहजीरा, जीरेस्याह, जीरयेस्याह । अ०-कमूने किरमानी, कमून अस्वद । अं०-Black Caraway seed (ब्लॅक कॅरावे सीड) । ले०-Carum carvi Linn. (कॅरम् कॅरुइ) । Fam. Umbelliferae (अम्बेलिफेरी) । इसका क्षुप—उत्तरी हिमालय के पहाड़ी भागों में उत्पन्न होता है । इसकी खेती भारत के मैदानी भागों में एवं काश्मीर, कुमाऊँ, गढ़वाल, चम्बा आदि पहाड़ी स्थानों में की जाती है । यह अफगानिस्तान एवं ईरान में भी होता है । यह १-२ फूट ऊँचा, शाखा-कोमल, हरित, एकांतर; पत्र-बहुविभक्त; पुष्प-श्वेत, छत्राकार; फल-कुछ टेढ़ापन लिये लंबे, सुगंधि, भूरापन लिये हुये काले, करीब ७ मि० मि० तक लंबे एवं २ मि० मि० चौड़े एवं दोनों सिरों पर नोकीले होते हैं । रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल ३.१%-७% पाया जाता है । गुण और प्रयोग-यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक और स्तन्यजनन है । आधमान, उदरशूल, अतिसार, अपचन, जीर्णज्वर आदि में इसका उपयोग किया जाता है । प्रसूतिकाल में दूध बढ़ाने के लिए इसको देते हैं । यूरोप में इसको शान्तिदायक, मस्तिष्क के लिए उत्तेजक और अपतंत्रक में उपयोगी मानते हैं । (१) इसके तैल का उपयोग अन्य औषधियों को सुगन्धित करने के लिए एवं उनसे उत्पन्न हल्लास और मरोड़ को दूर करने के लिए किया जाता है । (२) इसके अर्क का उपयोग बच्चों का पेट फूलना, शूल आदि में अनुपान के रूप में किया जाता है । (३) अर्श में सूजन हो तो इसके क्वाथ से सेंकने से लाभ होता एवं गर्भाशय की पीड़ा में स्त्री को इसके क्वाथ में बैठाते हैं । मात्रा—१/२-२ माशा । नोट—एक अन्य प्रकार के जीरक का वर्णन जिसे संस्कृत में अरण्यजीरक और लैटिन में वर्नोनिया ॲन्थेल्मिण्टिका; कॉम्पोसिटी (Vernonia anthelmintica Willd; Fam. Compositae) कहते हैं, परिशिष्ट में देखें । २१. कालाजाजी (कलौंजी) हिं०-कलौंजी, कलवंजी, कलौंजी, मँगरेला, मंगरैल, मंगरैला । बं०-मोटा कालेजीरे, मोटकालजीर । म०- कलौंजी जीरे, कालेजीरे । गु०-कलौंजी जीरु । क०-करि जीरिगे । ते०-नल्लजील कारा । फा०-स्याहदाना ।
हरीतक्यादिवर्गः २३५ अ०-हब्बतुस्सोदा, शोनिझ। अं०-Black cumin (ब्लॅक् क्युमिन्), Small fennel (स्मॉल फेनेल), Nigella seed (निगेल्ला सीड)। ले०-Nigella sativa Linn. (निगेला सॉटिवा, लिन)। Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्युलेसी)। कलौंजी हमारे देश का सर्व प्रसिद्ध एक गरम मसाला है। यह प्रायः पूर्व के प्रान्तों में एवं बिहार और पंजाब में अधिक बोई जाती है। दक्षिणी यूरोप तथा सीरिया में भी यह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-छोटा, पत्ते-लम्बे तथा कटे हुए, फूल-हलके नीले रंग के और फलियाँ-१/२ इञ्च लम्बी होती हैं। बीज-त्रिकोणाकार, तिल के समान पर तिल से किञ्चित् मोटे और अत्यन्त काले रङ्ग के होते हैं। इसका गूदा-सफेद होता है और इसमें तीव्र गन्ध होती है। रासायनिक संगठन-इसमें पीले रंग का उड़नशील तैल ०.५-१.४%, स्थिर तैल ३७.५% राल, अॅल्ब्यूमिन्, शर्करा, गोंद, टॅनिन, ग्लूकोसाइड, मेलान्थिन, मेलान्थ्येजेनिन (१%) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धित, वातानुलोमक, दीपन, पाचन, गर्भाशय शुद्धिकर, स्तन्यवर्धक, स्वेदल एवं कृमिघ्न है। इसका उत्सर्ग त्वचा, वृक्क एवं स्तन द्वारा होता है तथा इनके स्रावों की वृद्धि होती है। अधिक मात्रा में इसके सेवन से शरीर की उष्णता बढ़ती है, नाड़ी की गति बढ़ती है तथा साथ-ही-साथ गर्भाशय संकोच होकर गर्भपात की भी संभावना रहती है। सूतिका में इसका उपयोग चित्रकमूल के साथ करने से भूख बढ़ती है, पाचन ठीक होता है, गर्भाशय शुद्ध होता है तथा दूध भी बढ़ता है। पीड़ितार्तव वा नष्टार्तव में यह उपयोगी है। सूतिका ज्वर तथा विषमज्वर में इसका उपयोग किया जाता है। अग्निमांद्य, कुपचन तथा आध्मान आदि में अन्य औषधियों के साथ इसका प्रयोग लाभदायक है। हिचकी में मट्ठे के साथ देने से लाभ होता है। विरेचक औषधियों के साथ इसका प्रयोग लाभदायक है। हिचकी में मट्ठे के साथ देने से लाभ होता है। विरेचक औषधियों के साथ इसके उपयोग से मरोड़ नहीं होने पाती। यह मसाले के रूप में भी व्यवहार में आता है। इसका लेप हाथ और पैरों की सूजन पर करने से दर्द दूर होकर सूजन कम होती है। त्वक् रोगों में इससे सिद्ध तैल का व्यवहार करते हैं तथा इसका आंतरिक प्रयोग भी करते हैं। मात्रा-१/२-१ माशा। हानिकर-गर्भिणी के लिये। अथ धान्यकस्य नामानि गुणाँश्चाह धान्यकं धानकं धान्यं धाना धानेयकं तथा। कुनटी धेनुका छात्रा कुस्तुम्बुरु वितुन्नकम् ।।८६।। धान्यकं तुवरं स्निग्धमवृष्यं मूत्रलं लघु। तिक्तं कटूष्णवीर्यञ्च दीपनं पाचनं स्मृतम् ।।८७।। ज्वरघ्नं रोचकं ग्राहि स्वादुपाकि त्रिदोषनुत्। तृष्णादाहवमिश्वासकासकार्श्यक्रिमिप्रणुत् ।। आर्द्रन्तु तद्गुणं स्वादु विशेषात्पित्तनाशनम् १ ।।८८।। धनियाँ के नाम तथा गुण-धान्यक, धानक, धान्य, धाना, धानेयक, कुनटी, धेनुका, छात्रा, कुस्तुम्बरु और वितुन्नक ये सब 'धनियाँ' के नाम हैं। धनियाँ-कषायरसयुक्त, स्निग्ध, अवृष्य, मूत्रजनक, लघु, तिक्त तथा कटुरस युक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, पाचक, ज्वरनाशक, रोचक, ग्राही, परिपाक में मधुररसयुक्त, त्रिदोष को दूर करने वाली, तृष्णा (प्यास), दाह, वमन, श्वास, कास, कृशता तथा कृमिरोग का नाश करने वाली है। कच्ची धनिया के भी गुण 'धनियाँ' ही के समान हैं किन्तु विशेषता यह है कि यह मधुर रस युक्त तथा पित्त की विशेष रूप से नाशक होती है। [८६-८८] १. 'पित्तनाशि तदि'ति पाठा०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
२३६ भावप्रकाशनिघण्टुः २२. धनियाँ हिं०-धनियाँ । बं०-धने, कोथिंबीर, धणे । गु०-धाना, धाणा, कोथमीर । क०-कोथुंबुरी, कोथम्बरी, हविज । ते०-कोत्तिमिरि, धनियलु । ता०-कोटमल्लि, कोतमल्ली । सिन्ध०-धानु । फा०-कश्नीज । अ०-कज़बुरा, कज़बुरह । अं०-Coriander fruit (कोरिएण्डर फ्रूट) । ले०-Coriandrum sativum Linn. (कोरिएण्ड्रम सैटिवम् लिन) । Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी) । इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में एवं विदेशों में भी इसकी उपज की जाती है। इसका पौधा-१-२ फुट ऊँचा, शाखायें-चिकनी, पत्ते-विषमवर्त्ती, जड़ के निकटवाले पत्ते गोलाकार, ३-४ या ५ भागों में विभक्त, प्रत्येक भाग कटे किनारे वाले और कँगूरेदार तथा शाखाओं के पत्ते सोआ, चनसुल आदि के पत्तों के समान होते हैं। फूल-छत्ते से सोया के फूल के समान सफेद या किंचित् गुलाबी रंगों के आते हैं। फल- नन्हें नन्हें, अण्डाकार, गुच्छों में छत्राकार लगते हैं। सूखने पर वे दो टुकड़े होकर धनिये के नाम से बिकते हैं। रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक उड़नशील तैल ०.५-१% तक पाया जाता है जिसमें ४५-५५% कोरिएण्ड्रॉल (Coriandrol, C₁₀ H₁₈ O) तथा कुछ अन्य पदार्थ रहते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें स्थिर तैल १३%, वसीय पदार्थ १३%, गोंद, टैनिन, मॅलिक एसिड तथा राख ५% आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-धनियाँ मूत्रल, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, संग्राही, दाहशामक एवं पिपासाघ्न है। इसका उपयोग नेत्र रोग, ज्वरजन्यदाह, वमन, अतिसार, आमाजीर्ण, आध्मान, शूल आदि में किया जाता है। मसाले के रूप में, अनेक औषधियों को सुगन्धित करने के लिए तथा विरेचक औषधियाँ जैसे सनाय रेवाचीनी आदि से मरोड़ न हो इसलिए इसका व्यवहार किया जाता है। (१) ज्वर में दाह एवं प्यास की शान्ति के लिए इसका शीत कषाय मिश्री तथा मधु मिलाकर पिलाते हैं। (२) नेत्राभिष्यन्द में इसके क्वाथ को छानकर नेत्र बिन्दु के रूप में डालने से लाभ होता है। पहले एरण्ड तैल डालकर फिर इसका प्रयोग करना चाहिये। शीतला में आँख धोने के लिये इसके जल का व्यवहार किया जाता है जिससे उत्तरकालीन नेत्राभिष्यन्द एवं नेत्रव्रण आदि उपद्रवों का प्रतिषेध होता है। (३) इसके तैल का व्यवहार वातनाड़ी शूल एवं जोड़ों के दर्द में करते हैं तथा बच्चों के आध्मान जन्य शूल में १-४ बूँद मिश्री के साथ देते हैं। (४) कच्ची धनियाँ का लेप सरदर्द तथा भिलावे से उत्पन्न दाह पर किया जाता हैं। (५) पुराने घाव, सूजन तथा विषैले फोड़ों पर यवके आटे के साथ इसकी पुल्टिस उपयोगी है। (६) इसके क्वाथ में मिश्री मिलाकर रक्तार्श में देने से लाभ होता है। (७) क्षोभशामक होने के कारण धनियाँ के शीत कषाय का उपयोग अनुपान या सहपान के रूप में स्वप्नमेह एवं श्वेतप्रदर में किया जाता है। (८) जीर्ण प्रतिश्याय में धनियाँ का फाण्ट या बीजों का चूर्ण मिश्री के साथ प्रयुक्त होता है। मात्रा-१/२-४ माशा । अधिक मात्रा में सेवन से कामशक्ति का ह्रास तथा स्त्रियों में मासिक धर्म रुक जाता है। दर्पनाशक-मधु, दालचीनी और अण्डा।
हरीतक्यादिवर्गः २३७ अथ शतपुष्पामिश्रेययोर्नामानि गुणांश्चाह शतपुष्पा शताह्वा च मधुरा कारवी मिसिः । अतिलम्बी सितच्छत्रा संहितच्छत्रिकाऽपि१ च ।।८९।। छत्रा शालेयशालीनी मिश्रेया मधुरा मिसिः । शतपुष्पा लघुस्तीक्ष्णा पित्तकृद्दीपनी कटुः ।।९०।। उष्णा ज्वरानिलश्लेष्मव्रणशूलाक्षिरोगहृत् । मिश्रेया तद्गुणा प्रोक्ता विशेषाद्यो निशूलनुत् ।।९१।। अग्निमान्द्यहरी हृद्या बद्धविट्कृमिशुक्रहृत् । रूक्षोष्णा पाचनी कासवमिश्लेष्मानिलाहरेत् ।।९२।। सोया और सौफ के नाम तथा गुण-शतपुष्पा, शताह्वा, मधुरा, कारवी, मिसि, अतिलम्बी, सितच्छत्रा और संहितच्छत्रिका ये नाम सोवे के हैं और छत्रा, शालेय, शालीन, मिश्रेया, मधुरा और मिसि ये सब नाम सौफ के हैं। सोया- परिपाक में लघु, तीक्ष्ण, पित्तकारक, अग्निदीपक, कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य तथा ज्वर, वातश्लेष्म, व्रण, शूल और नेत्रसम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली है और सौंफ के भी सोये के समान ही गुण हैं किन्तु विशेष करके यह योनि सम्बन्धी शूल को दूर करने वाली, अग्नि की मन्दता को नाश करने वाली, हृदय के लिये हितकारक, मल की विबद्धता को दूर करने वाली, कृमि तथा शुक्र का नाश करने वाली, रूक्ष, उष्णवीर्य पाचक एवं कास, वमन, कफ तथा वायु को दूर करने वाली होती है। [८९-९२] २३. सोआ हिं०-सोआ, सोया, सोवा, वनसौंफ । बं०-शुलफा, शुल्फा । पं०-सोया । म०-बालंत शोप, शेपु । क०- सल्बसिगे । गु०-शुवा । ते०-पुशतकुपिविट्टुलू, सोम्पा । मा०-सोवा, सुवा । ता०-शतकुप्पी विरह । अं०- Indian dill fruit (इण्डियन डिल फ्रूट) । ले०-Anethum sowa Kurz (अनेथम् सोवा) । Peucedanum graveolens Linn. (प्यूसिर्डेनम् ग्रॅवियोलेन्स लिन) Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी) । यूरोपीय जाति प्यूसिर्डेनम् ग्रॅवियोलेन्स (Peucedanum graveolens) से भारतीय जाति में कुछ अन्तर होने के कारण भारतीय जाति को अनेथम सोवा (Anethum sowa) कहते हैं। इस देश के सब प्रान्तों में विशेषकर गरम और शीत गरम प्रान्तों में इसकी खेती शीत ऋतु में की जाती है। यह क्षुप जाति की वनस्पति १-३ फीट तक ऊँची होती है। पत्ते-कई भागों में विभक्त, बारीक और अत्यन्त कोमल होते हैं। फूल-छत्राकार किञ्चित् पीले रंग के होते हैं। फल-अंडाकार, चिपटे, उन्नतोदार, किनारे पर सपक्ष एवं प्रायः दोनों अर्धखण्ड मिले हुये तथा आधार पर पतला डण्ठल लगा रहता है। ये विदेशी बीजों से कम चौड़े तथा अधिक उन्नतोदार और इनके पृष्ठ भाग की धारियाँ हल्के रंग की होती हैं। रासायनिक संगठन-इसके फलों में ३-३.५% एक उड़नशील तैल पाया जाता है। इस तैल में डिल एपिओल (Dill-apiol, C₁₂H₁₄O₄) नामक एक तैलीय पदार्थ रहता है जो पारस्ले एपिओल (Parsley apiole, C₁₂H₁₄O₄) के सदृश होते हुये भी गुणों में उससे पृथक् (Isomeric = आइसोमेरिक्) रहता है। इसके अतिरिक्त इसमें एक तरल हाइड्रोकार्बन अॅनीथेन् (Hydrocarbon-anethene, C₁₀H₁₀) और कारवोन (Carvone) सदृश पदार्थ रहता है। विदेशी और भारतीय तैल में थोड़ा अन्तर होता है। गुण और प्रयोग-सोआ दीपन, पाचन, वातानुलोमक, सुगन्धित, उत्तेजक, वातहर, गर्भाशय उत्तेजक एवं दुग्धवर्धक है। १. 'संहिते'ति पाठा० ।
२३८ भावप्रकाशनिघण्टुः बालकों के पाचन विकारों में, विशेषकर आध्मान एवं शूल में चूने के जल के साथ इसके अर्क का बहुत व्यवहार किया जाता है। प्रसूता में भी वमन, अजीर्ण, हिक्का, आध्मान, शूल तथा दुग्ध वृद्धि आदि के लिये इसके क्वाथ का प्रयोग किया जाता है। अनार्तव में भी इसका प्रयोग करते हैं। केस और म्हसकर के मतानुसार अंकुश कृमि (Hookworm) में यह उपयोगी है। (१) अतिसार में मेथी और सोआ घी में भूनकर देते हैं। (२) इसके पत्तों को तेल लगा कर गरम करके फोड़े-फुन्सियों पर बाँधने से वे जल्दी, पक जाते हैं। (३) इसके पत्ते तथा मूल को पीसकर जोड़ों की सूजन पर बाँधने से लाभ होता है। (४) विरेचक औषधियों के साथ इसके तैल या अर्क के व्यवहार से मरोड़ नहीं होती। (५) चरक की राजयक्ष्मा की चिकित्सा में पार्श्वशूलहर लेप में इसका उल्लेख है। मात्रा-फल चूर्ण-१-४ माशा, तैल-१-३ बूँद, अर्क-१/२-१ औंस। संकेन्द्रित जल (ॲक्वा कन्सेण्ट्रेटा = Aqua Concentrata)-५-१५ बूँद। २४. सौंफ हिं०-सौंफ, बड़ी सौंफ, सउँफ। बं०-मौरी, पान मौरी। पं०-बड़ी शेप गु०-वरीआली, बलीय़ारी। क०- वड़ी सोपु, सब्बसिंगे। मा०-सोंफ। पं०-सोंफ। ते०-सोपु, पेद्दजिलकुरां। ता०-सोहिकिरे, शोम्बु। फा०- राज़यानज़, राज़याना, बादियाँ, बादियान, राजियानह। अ०-एजियानज़, असलुल एजियानज़, राज़ियाज़। अं०- Fennel Fruit (फेन्नेल फ्रूट)। ले०-Foeniculum vulgare Mill. (फिनिक्यूलम् वल्गेरि); Syn. Anethum foeniculum (एनेथम् फिनिक्यूलम्)। Fam. Umbeliferae (अंबेलिफेरी)। प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में यह बोई जाती है। इसका क्षुप-लम्बा, पत्ते-कई भागों में विभक्त सोये के पत्तों के समान, फूल-छत्राकार किञ्चित् पीले रंग के और फल-६ से ७ मि० मि० लम्बे, ४ मि० मि० चौड़े, आयताकार, प्रायः अखण्डित एवं डंठल युक्त होते हैं। नये बीज हरे रंग के और पुराने होने पर पीलापन युक्त हो जाते हैं। जिन फलों का तेल निकाल लिया जाता है उनमें तैल की मात्रा कम हो जाती है और उनकी गन्ध भी कम होती है तथा वे अधिक गहरे रंग के हो जाते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल १-२.९% और स्थिर तैल ८.८-१५.८% रहता है। इस उड़नशील तैल में एनीथॉल् (Anethol) ६०% तथा फेनकोन् (Fenchone) आदि कुछ अन्य पदार्थ रहते हैं। विदेशी सौंफ की अपेक्षा भारतीय सौंफ में इस तैल की मात्रा कम रहती है। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धित, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, दाहप्रशमन एवं मूत्रविरजनीय है। इसका उपयोग विशेष रूप से मसाले के रूप में एवं मादक पेयों में सुगन्धि के लिये किया जाता है। इसका अर्क बच्चों के पाचन के विकार जैसे आध्मान, शूल आदि में दिया जाता है और अन्य औषधियों के अनुपान के रूप में भी व्यवहार करते हैं। इसका व्यवहार आमातिसार, अजीर्ण, आध्मान, ज्वर, खाँसी, श्वास, वृक्करोग, प्लीहा वृद्धि, अनार्तव तथा दृष्टिमांद्य आदि रोगों में किया जाता है। (१) इसको पीसकर पीने से पेशाब की जलन दूर होकर पेशाब साफ होती है। (२) सूखी खाँसी और मुख के विकारों में इसे मुख में रखने से लाभ होता है। (३) इसके पत्र सुगन्धि, मूत्रल और स्वेदजनक होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २३९ (४) इसका मूल विरेचक होता है । (५) इसके फलों को पीसकर लेप करने से गरमी के दिनों में होने वाला चक्कर तथा शिरःशूल दूर होता है । (६) आध्मान में इसके क्वाथ से बस्ति देने से लाभ होता है । मात्रा—४ रत्ती से २ माशा तक । नोट—एक अन्य प्रकार की सौंफ जिसे 'बादियाण' (Pimpinella anisum Linn. पिंपेनेल्ला एनिसन्) कहते हैं उसका वर्णन परिशिष्ट में देखें । अथ मेथीवनमेथीनामगुणानाह १मेथिकामेथिनी मेथी दीपनी बहुपत्रिका । बोधिनी बहुबीजा च ज्योतिर्गन्धफला२ तथा ।।९३।। वल्लरी चन्द्रिका मन्था मिश्रपुष्पा च केंरवी । कुञ्चिका बहुपर्णी च पीतबीजा३ मुनिच्छदा ।।९४।। मेथिकावातशामनी श्लेष्मघ्नीज्वरनाशिनी । ततः स्वल्पगुणावन्या४ वाजिनां सा तु पूजिता ।।९५।। मेथी तथा वनमेथी के नाम तथा गुण—मेथिका, मेथिनी, मेथी, दीपनी, बहुपत्रिका, बोधिनी, बहुबीजा, ज्योतिः, गन्धफला, वल्लरी, चन्द्रिका, मन्था, मिश्रपुष्पा, कैरवी, कुञ्चिका, बहुपर्णी, पीतबीजा और मुनिच्छदा ये सब नाम मेथी के हैं । मेथी—वायु को शमन करने वाली, कफ को दूर करने वाली तथा ज्वर को नष्ट करने वाली है और वनमेथी— मेथी की अपेक्षा कम गुण वाली होती है, किन्तु वह घोड़ों के लिये अत्यन्त उत्तम (हितकर) होती है । [९३-९५] २५. मेथी हिं०—मेथी । पं०—बं०—म०—गु०—मेथी । ते०—मेंदुलु, मेंतुलु, मेंति । ता०—वण्डयन्, वेंडयम, वेन्दयम । क०—मेत्रे । मल०—उल्लव । फा०—तुख्मशमलीत । अ०—बजरुल हुल्बा, वजरुलहल्बह, हुलबह । अं०—Fenugreek (फेनुग्रीक) । ले०—Trigonella foenumgraecum Linn. (ट्राइगोनेल्ला फोएनम् ग्रैइकम) । Papilionaceae (पॅपिलि-ओनेसी) । प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है परन्तु पञ्जाब और काश्मीर में यह आप-ही-आप जङ्गल में उत्पन्न होती है । इसका क्षुप—६ इञ्च से १६-१७ इञ्च तक ऊँचा होता है । पत्ते—संयुक्त एवं प्रत्येक सींक पर तीन-तीन पत्रक रहते हैं और वे आध से एक इञ्च तक लम्बे, अण्डाकार और बारीक कंगूरेदार होते हैं । फूल—नन्हें-नन्हें हलके पीत रङ्ग के आते हैं । फलियाँ—गोल २-३ इञ्च लम्बी कुछ टेढ़ी सी नोकदार रहती हैं । प्रत्येक से १०-२० पीले रङ्ग के दाने निकलते हैं । इन्हीं का चिकित्सा में अधिक उपयोग करते हैं । रासायनिक संगठन—इसके सूखे पञ्चाङ्ग में प्रोटीन (Protein) की मात्रा १६% रहती है जिसमें से इसके ग्लोब्यूलिन (Globulin) में हिस्टॅडीन् (Histadine) की काफी मात्रा रहती है । इसके अॅल्ब्यूमिन् (Albumin) भाग में फॉस्फोरस् (Phosphorus) तथा गन्धक रहता है । इसके बीजों में ट्रिगोनेल्लिन (Trigonelline, C₇ H₇ O₂ N), कोलीन (Choline) आदि क्षाराभ, एक पीत रञ्जक पदार्थ, स्थिरतैल ६%, प्रोटीन २२% तथा गोंद २८% रहता है । बीजों को जलाने से इसमें ७% राख निकलती १. 'मिथिती'ति पाठा० । २. 'जाती'ति पाठा० । ३. 'पित्तजिद्धायनुद्द्विधे'ति पाठा० । ४. 'बल्येऽति' पाठा० ।
२४० भावप्रकाशनिघण्टुः है जिसमें से १/४ फॉस्फोरिक् एसिड (Phosphoric acid) रहता है। इसके बीजों में फॉस्फेट्स (Phosphates) लेसिथिन् (Lecithin) और न्यूक्लिओ अॅल्ब्यूमिन् (Nucteo-albumin) रहने के कारण ये कॉडलिवर ऑइल (Cod-liver oil) के समान पोषक तथा बलकारक होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके बीज स्निग्ध, सुगन्धित, वातानुलोमक, अग्निदीपक, आध्मानहर, बल्य, वृष्य, वातहर, गर्भाशय सङ्कोचक, दुग्ध वृद्धिकर एवं शोथघ्न होते हैं। इसके पत्र शीतल, दाहशामक, शोथहर एवं मृदु विरेचक होते हैं। (१) इसके बीजों से बनाये लड्डू का व्यवहार प्रसूता में किया जाता है जिससे भूख बढ़ती है, मल शुद्धि और आर्तवशुद्धि होती है। अजीर्ण, अग्निमांद्य, आमवात एवं कामशक्ति की कमजोरी में भी ये उपयोगी हैं। (२) रक्तातिसार एवं मसूरिका में इसके बीज भूनकर और फिर उसका फांट बनाकर देते हैं। (३) शरीर की पीड़ा में इसके बीजों को १/२-१ तोला की मात्रा में खिलाने से लाभ होता है। (४) दुग्ध वृद्धि के लिये इसकी लस्सी बनाकर प्रसूता को दी जाती है। (५) घी में भुने हुये मेथी के बीज, बादियाण और नमक का व्यवहार अतिसार रोकने के लिये करते हैं। (६) इसके बीजों को कॉडलिवर आइल के स्थान पर दे सकते हैं और इसका व्यवहार गण्डगाला, फक्कारोग, पाण्डु, वातरक्त, मधुमेह और औपसर्गिक रोगजन्य दौर्बल्य में किया जाता है। (७) मिस्र में ज्वर रोकने के लिये इसको अङ्कुरित करके खिलाते हैं। मधुमेह में भी इससे लाभ होता है। (८) चर्म को मुलायम और स्वच्छ रखने के लिये इसके बीजों का उपयोग किया जाता है। बालों के झड़ने पर तथा सूजन पर इसका लेप उपयोगी है। श्वेतप्रदर में इसकी पेसरी को धारण कराया जाता है। (९) इसके पत्तों का भी लेप सूजन एवं दाह में किया जाता है। लू लगने में इसके पत्तों को पीसकर शरीर पर मलते हैं तथा आन्तरिक व्यवहार भी करते हैं जिसमें दाह की शान्ति होती है। अल्पमूल्य में बल्य एवं पोषक होने के कारण पशुओं को भी खिलायी जाती है। मात्रा-चूर्ण १/४-१/२ तोला। २६. वनमेथी हिं०-वनमेथी, जङ्गली मेथी। पं०-सिंजी। सिन्ध-जिर। अ०-अकुलिल्-उल्-मलिका। अं०-Sweet- cloves (स्वीट् क्लोव्हस्) ले०-Melilotus parviflora Desf. मेलिलोटस् पार्विफ्लोरा); Syn. Trifolium indicum Linn. (ट्रिफोलिअम् इण्डिकम्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । पश्चिम प्रायद्वीप, बंगाल और उत्तरप्रदेश आदि स्थानों में यह आप-ही-आप उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-३० से ४५ मि० मि० ऊँचा तथा वर्षायु होता है। पत्र-संयुक्त तथा त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक-१२ से १६×८ से १० मि० मि०, दन्तुर, अर्धमालाकार या अर्ध अंडाकार होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, पीतवर्ण की मंजरियों में आते हैं। फली-दीर्घवृत्ताकार, दबी हुई, दोनों छोर पर पतली एवं २.५ मि० मि० लंबे एक बीज युक्त होती है। गुण और प्रयोग-इसके बीज ग्राही होते हैं तथा उदरशूल, अतिसार और आंत्र के विकारों में लाभदायक हैं। इसका व्यवहार कष्टार्तव, आमवात, गण्डमाला आदि में तथा रक्त शुद्धि के लिये किया जाता है। बच्चों के अतिसार में इसकी लप्सी का व्यवहार करते हैं।
हरीतक्यादिवर्गः २४१ अथ चन्द्रशूरस्य नामानि गुणाँश्चाह चन्द्रिका चर्महन्त्री च पशुमेहनकारिका१। नन्दिनी कारवी भद्रा २वासपुष्पा सुवासरा ।।९६।। चन्द्रशूरं हितं हिक्कावातश्लेष्मातिसारिणाम्। असृग्वातगदद्वेषि बलपुष्टिविवर्द्धनम् ।।९७।। चनसूर के नाम तथा गुण-चन्द्रिका, चर्महन्त्री, पशुमेहनकारिका, नन्दिनी, कारवी, भद्रा, वासपुष्पा और सुवासरा ये नाम चनसूर के हैं। चनसूर-हिचकी, वात-श्लेष्मा और अतिसार ग्रस्त रोगी तथा रक्तवातग्रस्त रोगियों के लिए हितकर है और बल तथा पुष्टिवर्धक भी है। [९६-९७] २७. चन्द्रिका (हालों) हिं०-हालों, हालिम, चनसुर, चन्द्रशूर। बं०-हालिम, हालिमा, हालो, चान्दसूर, अलेवेरी। म०-आलीव, हालिम, अहालीव। गु०-अशेलीओ, अशोरिया, आशाल बीज। यू०-तरम राह के बीज। फा०-तुख्म तरह तेजक। अ०-वातरुज्जरजीर। कुमा०-हालिम। ता०-अलिविरइ। ते०-अदित यलु। पं०-तेजक। सि०-अहेरो। क०- अल्लिबीज। अं०-Common Cress (कॉमनक्रेस)। ले०-Lepidium sativum Linn. (लेपिडियम् सेटिवम्) Fam. Cruciferae (क्रुसिफेरी)। यह सब प्रान्तों में बोया जाता है। इसका क्षुप-१ से ३ फीट ऊँचा, मसृण या कुछ रोएंदार होता है। पत्ते- विभक्त होते हैं। पुष्प-सफेद तथा छोटे होते हैं। फल-०.२ इञ्च, चिपटे, अण्डाकार परन्तु अग्र पर भीतर की तरफ दबे हुये रहते हैं। बीज-छोटे, लाल तथा जल में डालने पर लुआबदार होते हैं। अधिकतर इसके बीजों का उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में एक सुगन्धि उड़नशील तथा स्थिर तैल पाया जाता है। इसमें आयोडीन (Iodine), लोह, फॉस्फेट्स (Phosphates), पोटैश (Potash), कुछ लवण, एक तिक्त सत्व एवं जल आदि पदार्थ रहते हैं तथा गन्धक अधिक मात्रा में रहता है। इसके ग्लूकोसाइड (Glucoside) को ग्लूकोट्रोपोइओलियन (Glucotro-poeolin) कहते हैं। गुण और प्रयोग- चनसुर रसायन, बल्य, वाजीकर, उत्तेजक, आनुलोमिक, दुग्धवर्धक एवं शूलहर है। इसका उपयोग प्रसूतावस्था, रक्तदोष, त्वचा के रोग, नेत्र रोग, यकृत और प्लीहा की जीर्ण वृद्धि, ग्रन्थिरोग, रक्तार्श, श्वास, कास एवं अतिसार आदि में किया जाता है। (१) इसके फांट का व्यवहार आमाशय के प्रक्षोभ से उत्पन्न हिक्का में किया जाता है। इसको बार-बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पिलाना चाहिये। इसी प्रकार प्रक्षोभजन्य अतिसार एवं ग्रहणी में भी इससे लाभ होता है। (२) गरी के साथ इसकी बर्फी या दूध में लप्सी बनाकर प्रसूता को दिया जाता है। यह रसायन, पौष्टिक तथा दुग्धवर्धक है। इससे कटिशूल एवं श्वेतप्रदर में भी लाभ होता है। दूध में उबाल कर गर्भपात कराने के लिए प्रयोग में लाते हैं। पुरुषों के लिए भी यह रसायन तथा बाजीकर है एवं इसका व्यवहार शरीर की ऊँचाई बढ़ाने के लिए करते हैं। (३) मिश्री के साथ इसका चूर्ण कुपचन, अतिसार एवं ग्रहणी आदि में देते हैं। (४) नींबू के रस में पीसकर इसका लेप कटिशूल, आन्तरिक शोथ, आमवात तथा सन्धीशूल आदि में करते हैं। १. 'चन्द्रिकाया' इति पाठा०। २. 'वामपुष्पे'ति पाठा०। १९ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
२४२ भावप्रकाशनिघण्टुः (५) इसके पत्र मूत्रल तथा उत्तेजक होते हैं एवं इनका सलाद प्रशीताद (Scurvy = स्कर्वी) नामक रोग में व्यवहार में लाया जाता है। (६) इसकी जड़ का व्यवहार फिरङ्ग तथा निस्तानिका (Tenesmus = टेनेस्मस्) में किया जाता है। मात्रा—१/४-१ तो०। अथ चतुर्बीजगुणानाह मेथिका चन्द्रशूरश्च कालाऽजाजी यवानिका। एतच्चतुष्टयं युक्तं चतुर्बीजमिति स्मृतम् ।।९८।। तच्चूर्णं भक्षितं नित्यं निहन्ति पवनामयम् । अजीर्णं शूलमाध्मानं पार्श्वशूलं कटिव्यथाम् ।।९९।। 'चतुर्बीज' (चारदाना) के गुण—मेथी, चनसुर, मंगरैला और अजवाइन इन चारों के बीजों के योग को 'चतुर्बीज' (चारदाना) कहते हैं और इस चतुर्बीज और कमर का दर्द दूर होता है। [९८-९९] अथ हिंगुनामगुणानाह सहस्रवेधि जतुकं बाह्लीकं हिङ्गु रामठम् ।।१००।। हिङ्गूष्णं पाचनं रुच्यं तीक्ष्णं वातवलासनुत्¹। शूलगुल्मोदरानाहकृमिघ्नं पित्तवर्द्धनम् ।।१०१।। हींग के नाम तथा गुण—सहस्रवेधि, जतुक, बाह्लीक, हिङ्गु और रामठ ये सब नाम हींग के हैं। हींग उष्णवीर्य, पाचक, रुचिकारक, तीक्ष्ण, वात-श्लेष्म को दूर करने वाला, शूल, गुल्म, उदर सम्बन्धी रोग, आनाह (अफरा) और कृमियों को नष्ट करनेवाला एवम् पित्त को बढ़ाने वाला होता है। [१००-१०१] २८. हींग हिं०—हींग। बं०—हिंगु। पं०—हिंगे, हींग। म०—हिंग। मा०—हींग। गु०—हिंगड़ो, वधारणी, हिंग बघारणी। ते०—इङ्गुव, इंगुर, इंगुरा। ता०—पेरुंगियम्, पेरुंग्यम्। क०—हिंगु। फा०—अंगूजह, अंगुजा, अंघुजेह-इलरी। अ०— हिल तीत्, हिलतीस। अं०—Asafoetida (असेफीटिडा)। ले०—Ferula narthex, Boiss. (फेरुला नार्थेक्स, बॉ यस); F. alliacea Boiss. (फे, एलिएंसिआ); Ferula foetida Regel (फेरुला फीटिडा)। Fam— Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। हींग सर्व प्रसिद्ध वस्तु एक विदेशीय वृक्ष का निर्यास है। इसकी उपर्युक्त कई जातियाँ विभिन्न स्थानों पर होती हैं जिनसे कुछ-कुछ भिन्न प्रकार का निर्यास प्राप्त किया जाता है। अधिकांश मिलावटी हींग बिकती है। इनमें चोखी हींग, हीरा हींग, तलाव हींग इत्यादि अच्छी समझी जाती हैं। जो हींग रूमी मस्तगी के समान वर्ण वाली, गरम घी में डालने से लावा के समान खिल जाने वाली तथा लालिमा लिये भूरे या बादामी रंग की वह अच्छी मानी जाती है। उत्तम हींग की डली को तोड़ने से वह भाग बादामी रंग का दिखाई पड़ता है। इसका स्वाद कड़वा और लहसुन के समान खराशदार तथा इसकी गन्ध लहसुन के समान तीव्र होती है। पानी में घोलने से सफेद रंग की दिखाई पड़ती है। हींग के वृक्ष काबुल, हिरात, खुरासान, फारस एवं अफगानिस्तान आदि प्रदेशों में उत्पन्न होते हैं तथा इस देश के पंजाब और काश्मीर में कहीं-कहीं देखने में आते हैं। विभिन्न जातियों में थोड़ा बहुत स्वरूप में अंतर होता है। इसका वृक्ष—झाड़ के समान छोटा ५ से ८-९ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते—अनेक भागों में विभक्त, अजमोदे के पत्तों के समान कटे किनारे वाले एवं १-२ फूट लम्बे होते हैं तथा टहनियों के अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं। फल—तिहाई से तीन चौथाई इञ्च के घेरे में अण्डाकार होते हैं। १. 'हृदि'ति पा०।
हरीतक्यादिवर्गः २४३ चार वर्ष का वृक्ष होने पर इसको काटते हैं और भूमि के पास वाली जड़ को तिरछे तराशने से जो रस निकल कर सूख जाता है उसको दो दिन के बाद खुरच कर संग्रह कर लेते हैं। फिर दो दिन के बाद जड़ को उसी प्रकार ऊपर से तराश कर छोड़ देते हैं और सूखने पर खुरच कर इकट्ठा कर लेते हैं। यही सूखा हुआ पदार्थ हींग है। प्रत्येक वृक्ष से २-३ छटांक से ५-६ छटांक तक हींग मिल सकती है। देशी हींग की अपेक्षा काबुली हींग अच्छी होती है। साधारण परीक्षा-(१) जल के साथ घोटने से इसका पीताभ दुधिया घोल बनता है जो क्षार मिलाने पर हरिताभ पीत हो जाता है। (२) थोड़े से हींग को गन्धक के तेजाब के साथ गरम करने पर लाल से भूरे रंग का घोल बनता है। इस घोल को अधिक जल से विरल बनाकर (Dilute), छानकर (filtering) उसको क्षारीय करने से एक गाढ़े नीले रंग की चमक उत्पन्न होती है (Purplish-blue fluorescence) । मिलावटें-हींग में कङ्कड़, बालू, मिट्टी, मूल के टुकड़े, गोदन्ती तथा गोंद आदि मिलाये रहते हैं। रासायनिक संगठन-यह गन्धक का सेन्द्रिय योग है। इसमें लहसुन में पाये जाने वाला एक उड़नशील तैल ६-१७% रहता है। इस तैल में टरपेन्स् (Terpenes), डाइ-सल्फाइड्स (Disulphides, C₇H₁₄S₂ and C₁₁H₂₀S₂) और एक नीले रंग का तरल पदार्थ (C₁₀H₁₆O)n रहता है। इसमें राल रहती है जिसमें अॅसारेसिनोटेनॉल (Asaresino-tannol) ॲसारेसिनोल फेरूलिक् एसिड इस्टर (Asaresinol ferulic acid ester) तथा फ्री फेरूलिक् एसिड (Free ferulic acid-1.3%) रहता है। इसके अतिरिक्त इसमें गोंद की मात्रा २५% रहती है। शुद्ध हींग में ६५-७५% मद्यसार में घुलने वाले पदार्थ रहते हैं तथा राख ३-५% रहती है। इसकी राल का ऊर्ध्व पातन (Dry distillation) करने से अंबेलि-फेरोन् (Umbelliferone) प्राप्त होता है लेकिन भारतीय जाति से यह प्राप्त नहीं होता। गुण और प्रयोग-हींग दीपन, पाचन, वातानुलोमक, उद्वेष्टन निरोधि, उत्तेजक, कफदुर्गन्धि हर, कफनिःसारक, वातनाडियों के लिये बल्य, गर्भाशयसंकोचक एवं कृमिघ्न है। इसका उत्सर्ग फुफ्फुस, त्वचा, मूत्र तथा पसीने के द्वारा होता है। इसका उपयोग आध्मान, शूल, अपस्मार, अपतन्त्रक, वातविकार, श्वास, कास, कुकास एवं हृच्छूल आदि में किया जाता है। हींग को घृत में भूनकर व्यवहार में लाया जाता है जिससे वमन नहीं होने पाता। (१) फुफ्फुस के रोगों में हींग का अच्छा उपयोग होता है। जीर्ण श्वास नलिका शोथ, दमा, कुकास, बच्चों के फुफ्फुसपाक एवं शुष्क कास आदि में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके लिये जल के साथ हींग के घोल का व्यवहार करना चाहिये। (२) आध्मान, शूल, विबन्ध एवं आमाशय तथा आन्त्र की शिथिलता में अजवाइन अथवा एलुवा और साबुन के साथ गोली बनाकर दिया जाता है। ऐसे विकारों में हिंग्वाष्टक चूर्ण अथवा हिंगुकर्पूरवटी का बहुत व्यवहार किया जाता है। (३) विषमज्वर में प्रतिबन्धन की दृष्टि से अन्न के साथ हींग का व्यवहार किया जाता है। (४) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं तज्जन्य अन्य विकारों में इसका बहुत अच्छा उपयोग होता है। (५) प्रसव के बाद इसके उपयोग से आर्तव शुद्धि होती है। बार-बार होने वाले गर्भपात को रोकने के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। गर्भ रहते ही ६ माशे हींग की ६० गोलियाँ बनाकर प्रारम्भ में १ गोली दिन में दो बार देते हैं। बाद में धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ाते हुये १० गोली प्रतिदिन देते हैं और फिर प्रसव तक धीरे-धीरे इसकी मात्रा कम करते हैं।
२४४ भावप्रकाशनिघण्टुः (६) आध्मान, शूल एवं आक्षेप आदि में २-३ माशा हींग जल के साथ घोटकर उसकी बस्ति दी जाती है। इससे सूत्र कृमि में भी लाभ होता है। (७) सीलोन में नारियल के दूध में हींग को उबालकर सर्पदंश के स्थान पर लगाते हैं तथा पानी में इसको घोलकर नाक में भी टपकाते हैं। बिच्छू के काटने पर भी इसको लगाने से लाभ होता है। (८) बच्चों के पेट फूलने पर इसका लेप पेट पर लगाते हैं तथा कुकास में छाती पर लेप करने से लाभ होता है। नारू तथा दाद पर इसको लगाने से लाभ होता है। (९) हींग तथा अफीम की गोली दाँत के दर्द में दाँत के गढ़े में रखने से लाभ होता है। (१०) हींग, लहसुन तथा सैंधव आदि पदार्थों से सिद्ध तैल कर्णरोगों में बहुत उपयोगी है। इसको १/२-१ चम्मच दूध के साथ दिन में ३, ४ बार या सुबह ४ चम्मच एक साथ ही दूध और मिश्री के साथ पिलाते हैं एवं इसको गर्म करके कान में ३, ४ बूँद डालते हैं। यह तैल बहुत अच्छा प्रतिदूषक (Antiseptic) है एवं इसका अन्तर्बाह्य प्रयोग उपयोगी है। मात्रा-२-८ रत्ती। अथ वचाया नामानि गुणाँश्चाह वचोग्रगन्धा षड्ग्रन्था गोलोमी शतपर्विका। क्षुद्रपत्री च मङ्गल्या जटिलोग्रा च लोमशा ।।१०२।। वचोग्रगन्धा कटुका तिक्तोष्णा वान्तिवह्निकृत्। विबन्धाध्मानशूलघ्नी शकृन्मूत्रविशोधिनी ।। अपस्मारकफोन्मादभूतजन्त्वनिलान्हरेत् ।।१०३।। वच के नाम तथा गुण-वचा, उग्रगन्धा, षड्ग्रन्था, गोलोमी, शतपर्विका, क्षुद्रपत्री, मङ्गल्या, जटिला, उग्रा और लोमशाा ये सब नाम वच के हैं। वच-उग्रगन्ध युक्त, तिक्त तथा कटुरस वाली, उष्णवीर्य, वमनकारक, अग्निजनक, विबन्ध, आध्मान और शूल को नष्ट करने वाली एवं मल तथा मूत्र का शोधन करने वाली होती है। एवम् मिर्गी, कफ, उन्माद, भूतबाधा, कृमि तथा वायु को भी दूर करने वाली होती है। [१०२-१०३] २९. वच हिं०-वच, घोरवच, घोड़वच। बं०-वच। म०-वेखण्ड। ते०-वासा, वस। गु०-वज, घोड़ावज। क०- बजे। ता०-वशाम्बु। मला०-व्ययम्पु। गोमा०-वेखण्ड। पं०-बरि बोज। फा०-सोसन जर्द, अगरि तुर्की। अ०-उदल बुज, अकरुन, बज, बिज। यू०-अकुरुन्। अं०-Sweet Flag (स्वीट फ्लैग)। ले०-Acorus calamus, Linn. (एकोरस् कैलॅमस्, लिन.)। Fam. Araceae (एरेसी)। एशिया खण्ड का मध्य भाग तथा पूर्वी यूरोप वच का उत्पत्ति स्थान माना जाता है। मणीपुर, नागा पहाड़, काश्मीर, सिरमूर और युक्त प्रान्त के कितने ही देशों के दलदल और सजल स्थान, में यह उत्पन्न होती है। यह गुल्म जाति की वनौषधि ३-४ हाथ ऊँची होती है। इसकी जड़-अन्य पौधों की जड़ की तरह सीधी नहीं रहती बल्कि बहुत सी जटा के सदृश जड़ की शाखायें चारों ओर फैली हुई रहती हैं और इसकी मुटाई मध्यमा उँगली के समान होती है। प्रत्येक गाँठ के चारो ओर सघन रोवें से होते हैं। इसके पत्ते-लम्बे, पतले और तलवार के समान रहते हैं। मंजरियाँ-सघन, विदाण्डिक, २-४ इञ्च लम्बी, लम्ब गोल और ६-१८ इञ्च लम्बे पत्रकोशों से ढकी रहती हैं। वच के पौधों के सर्वाङ्ग में गन्ध आती है और इसकी जड़ में यह अत्यधिक होती है। मूलस्तम्भ तथा राइजोम (Rhizome) को टुकड़े-टुकड़े कर बाजार में बेचते हैं। ये भूरे रङ्ग के और सुगन्धित होते हैं जिनके निचले हिस्से पर मूल के निशान रहते हैं तथा ऊपर के भाग में लम्बी गढ़ेदार धारियाँ होती हैं।
हरीतक्यादिवर्गः २४५ बाजार में वच के नाम से प्रायः कुलिंजन (Alpinia galanga) की जड़ बेची जाती है। इसीलिये जहाँ वचा (Acorus calamus) की आवश्यकता हो वहाँ घोरवच नाम से ही औषधि खरीदनी चाहिये। वच के स्थान पर आंतरिक प्रयोग में बालवच का प्रयोग भी शास्त्रोक्त नहीं है न उचित ही है। रासायनिक संगठन- इसमें एक सुगन्धित उड़नशील पीले रङ्ग का तैल १.५-३.५%, एकोरिन (Acoria) नामक मधु के समान पतला तिक्त सुगन्धि ग्लूकोसाइड, एकोरेटिन (Acoretin) नामक राल सदृश पदार्थ, कैलामेन (Calamene) नामक रवेदार, क्षाराभ तथा स्टार्च, गोंद, टैनिन् एवं कॅल्शियम् ऑक्सैलेट (Calcium oxalate) आदि पदार्थ रहते हैं। इसके उड़नशील तैल में अॅसारिल् ऑल्डिहाइड् (Asaryl-aldehyde), अॅल्फापिनिन (a- pinene) एवं कैफीन् (Camphene) आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग-वच वामक, कफनिःसारक, हल्लासकर, उद्वेष्टन निरोधि, वातानुलोमक, दीपन, पाचन, मेध्य, वृष्य, कृमिघ्न एवं सुगन्धित है। अधिक मात्रा में देने से यह वामक है। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतंत्रक, श्वास, कास, कण्ठरोग, जीर्ण अतिसार, संग्रहणी, आध्मान, शूल, मन्दज्वर, विषमज्वर, कर्णमूल, ग्रन्थिशोथ एवं अश्मरी आदि रोगों में किया जाता है। (१) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं अंगघात आदि रोगों के लिये यह बहुत अच्छी औषधि है। इसके सेवन से धारणाशक्ति (मेधा) बढ़ती है। इसके लिये वच को मधु अथवा दूध के साथ अधिक दिन तक सेवन करना चाहिये। ब्राह्मी, शंखपुष्पी तथा वच तीनों समान मात्रा में लेकर इसके चूर्ण को ब्राह्मी के रस की ३ भावनाएं देनी चाहिये। इसको अथवा सारस्वत चूर्ण को १/२ से १ माशा मधु एवं घृत के साथ कुछ दिन लेने से उन्माद, स्मरणशक्ति का ह्रास एवं वाणी की जड़ता आदि दूर होकर बुद्धि का विकास होता है। बेहोशी दूर करने के लिये अन्य औषधियों के साथ इसका अच्छा उपयोग होता है। (२) यह अधिक मात्रा (१ से २ माशा) में वामक है तथा खाँसी और श्वास में वमन कराने के लिये इसको नमक और गरम जल से पिलाना चाहिये। इससे बिना किसी कष्ट के कफ निकल जाता है। यह इपिकाक की अपेक्षा अधिक अच्छी औषधि है। सरदी, गले की सूजन, खाँसी तथा बच्चों के सूक्ष्म श्वसनिका शोथ में इसका क्वाथ बहुत उपयोगी होता है। सूखी खाँसी में इसका टुकड़ा मुख में रखने से लाभ होता है। (३) इसमें रहने वाले टॅनिन के कारण इसका उपयोग जीर्ण अतिसार एवं संग्रहणी आदि में किया जाता है। इसके सेवन से आध्मान एवं शूल दूर होता है तथा पाचन सुधर कर भूख बढ़ती है। बच्चों के लिए इसको भूनकर देना चाहिए। यह कृमि तथा पथरी में भी लाभदायक है। दंतोद्भेद के समय इसकी चबाने को बच्चों को देते हैं। (४) मलेरिया आदि विषमज्वरों में अन्य औषधियों के साथ इसके उपयोग से अधिक लाभ होता है। (५) जयपाल के विष को दूर करने के लिए इसको भूनकर जल के साथ पिलाना चाहिये। (६) अर्श में भांग और अजवाइन के साथ इसकी धूनी देने से दर्द दूर होता है। (७) इसका बाह्य प्रयोग अंगघात, आमवात, संधिपीड़ा, आध्मान्, शूल तथा खाँसी और श्वास में उपयोगी है। (८) मक्खी एवं दीमक आदि कीटों का नाश करने के लिए इसका उपयोग होता है। मात्रा-वामक-१ से २ माशा; अन्य गुणों के लिए २-४ र०। अधिक मात्रा में शिरःशूल होता है। दर्पनाशक- सौंफ। अथ पारसीक (खुरासानी) वचाया नामानि गुणाँश्चाह पारसीकवचा शुक्ला प्रोक्ता हैमवतीति सा। हैमवत्युदिता तद्वद्वातं हन्ति विशेषतः ।।१०४।।
२४६ भावप्रकाशनिघण्टुः खुरासानी वच के नाम तथा गुण—पारसीकवचा, शुक्लवचा और हैमवती ये नाम खुरासानी वच के हैं। खुरासानी वच—शुक्लवर्ण की (सफेद) होती है तथा गुणों में पूर्वोक्त वच के समान ही होती है किन्तु विशेष करके यह वायु को दूर करने वाली होती है ॥१०४॥ ३०. खुरासानी वचा (पारसीक वचा) पारसीक वचा (हैमवती) के संबंध में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। कुछ लोग इसी को बालबच भी कहते हैं। कुछ परम्परा ऐसी है कि आंतरिक प्रयोग में जब 'वचा' लेनी हो तो बालबच नाम से मिलने वाला द्रव्य लिया जाय एवं बाह्य प्रयोग में 'वचा' के नाम से घोरबच लिया जाय। यद्यपि इसके लिए कोई शास्त्रीय आधार नहीं मिलता और प्रत्यक्षतः वचा के स्थान पर बाह्याभ्यन्तर प्रयोग में घोरबच का उपयोग अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है। बालबच के नाम से भी बाजार में भिन्न-भिन्न मूल की गाँठें बिकती हैं जिनमें से एक का विनिश्चय श्री ठा० बलवन्तसिंह जी ने किया है। इसका वैज्ञानिक नाम Paris polyphylla Sm. (पैरिस पॉलिफाइला) है तथा इसे हिन्दी में दुधवच एवं नेपाली में इसे सतुआ कहते हैं। इसकी मोटी-मोटी गाँठे जैसी होती हैं। डॉ देसाई के मत से मजार पोश (काश्मी०), ले०-Iris germanica Linn. (आइरिस् जर्मेनिका) यह बालबच है। यह कश्मीर में कब्र पर लगाई हुई मिलती है। बाजार में एक बहुत छोटे अन्य प्रकार के मूल भी बालबच के नाम से मिलते हैं। अथ महाभरीवचा यस्या लोके कुलिञ्जन इति नामान्तरं तस्या गुणानाह सुगन्धाऽप्युग्रगन्धा च विशेषात्कफकासनुत् । सुस्वरत्वकरी रुच्या हृत्कण्ठमुखशोधिनी ॥१०५॥ महाभरी (कुलिञ्जन) के गुण—महाभरी वच (कुलिंजन) सुगन्ध तथा उग्रगन्ध युक्त होती है। विशेष करके यह कफ तथा खाँसी दूर करने वाली, स्वर को उत्तम करने वाली, रुचिजनक, हृदय, कण्ठ तथा मुख को शुद्ध करने वाली होती है। [१०५] ३१. कुलिंजन हिं०-कुलंजन, बड़ा कुलञ्जन। बं०-कुरची वच, महाभरी वच, कुलञ्जन। म०-कुलिंजन कोष्ट कोलञ्जन, मोठे कोलञ्जन। गु०-कुलिंजन जानु, कोलिंजन। सिन्ध०-कुञ्जर, कंजर, कांठी। ता०-पेररत्तइ। ते०- पेड्डादुम्पराशष्ठकम् । मला०-पेरारट्टा। क०-धूम रास्मी। ब्रही०-पदगोजी। फा०-खिरदारु, खरदारु, खुशरवे दारु एकलान्। अ०-इर्क खोलिजान, खुलंजान, खुलांजाने कस्वी, खुलंजान्-ए-कबीर। अं०-Greater Galangal (ग्रेटर गॅलंगाल); Java Galangal (जावा गॅलंगाल)। ले०-Alpinia galanga Willd. (अॅल्पिनिया गॅलंगा)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबॅरेॅसी)। पहले यह जावा और सुमात्रा से आया करता था किन्तु अब बंगाल के पूर्व भाग, दक्षिण भारत, मालावार और गोमान्तक के जंगलों में यह अधिकता से उत्पन्न होता है। इसका क्षुप—आमा हल्दी के आकार का २ मी. तक ऊँचा होता है। पत्ते—२२ से ४५ से.मी. लम्बे, ३-१२ से.मी. चौड़े, चिकने, आयताकार-भालाकार होते हैं। फूल—हरे से सफेद छोटे-छोटे आते हैं। फल—८ मि.मी. गोल नारङ्गी रङ्ग के होते हैं। बहुवर्षायु क्षुप होने के कारण काण्ड के सूख जाने पर भी इसकी जड़ जीवित रहती है। जड़— कन्दवत् और सुगन्धयुक्त होती है। इसको टुकड़े-टुकड़े कर सुखा करके बेचते हैं। ये टुकड़े २.५ से.मी. से ६ से.मी. तक मोटे, बाहर से लाल या मोर्चा के समान बादामी रंग के और अन्दर से हल्के नारंगी बादामी रंग के होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २४७ रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धित हल्के पीले रंग का तेल १.५-४.८% पाया जाता है जिसमें यूजीनॉल (Eugenol 25%), सिनेओल-डी-पिनेन् (Cineole-d-pinene, कॅडेनेन्स (Cadenens), बॅसोरिन् (Bassorin) एवं गॅलैंगिन् (Galangin), रहते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें ३ पीले रवेदार पदार्थ कैंफेराइड (Kaempferide, C₁₆H₁₂O, H₂O), गलेंगाॅल् (Galangol), मॉनोमेथिल् ईथर ऑफ गॅलैंगिन् (Mono-methyl ether of galangin) और स्टार्च २३%, राल, टैनिन, फोलोबॅफेन (Pholobaphane), वसा और मोम आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग—प्राणियों में सिरा द्वारा इसके टिंक्चर या क्वाथ के प्रयोग से निम्न प्रभाव दिखलाई देते हैं। रक्त का दबाव पहले कम होकर बाद में ठीक हो जाता है। यह शायद औदरिक रक्तवाहिनियों के विस्फार के कारण होता है। रक्तवहासंस्थान तथा हृदय के ऊपर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इसकी अल्प मात्रा से श्वसन क्रिया उत्तेजित तथा अधिक मात्रा से श्वसन केन्द्र का घात होकर अवसादित होती है। इसकी अल्प मात्रा से भी श्वसनिकाओं (Bronchioles) का विस्फार होता है। यह पाइलोकारपीन द्वारा कृत्रिम रूप से उत्पन्न श्वसनिकाओं के संकोच को भी दूर करता है। रक्त के दबाव के कम होने के कारण ही प्रारंभ में मूत्र की मात्रा कम होती है जो बाद में प्रकृत हो जाती है। पृथक्कृत (Isolated) गर्भाशय इसके प्रयोग से शिथिल होता है तथा उसके संकोच नियमित होने लगते हैं। पाचन- संस्थान के ऊपर इसकी क्रिया अन्य सुगन्धित उड़नशील तैलों की तरह होती है। कुलंजन उत्तेजक, कफनिःसारक, दीपक, पाचक, वातानुलोमक, बल्य तथा वृष्य है। इसका व्यवहार सरदी जुकाम, आमवात, खाँसी, श्वास, स्वरभंग एवं मधुमेह आदि में किया जाता है। (१) श्वास, खाँसी, कुकास एवं सर्दी के लिये यह बहुत अच्छी औषध है। बच्चों एवं वृद्धों के श्वसनसंस्थान के विकारों में इसको मधु के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है। इससे श्वासकृच्छ्र दूर होकर ज्वर भी कम होता है। दमे में इसके उद्वेष्ठननिरोधी गुण के कारण लाभ होता है। गले के प्रदाह में इसको चूसने से लाभ होता है। (२) इसके सुगन्धित, पाचक तथा दीपक गुणों के कारण पाचन के विकारों में यह उपयोगी है तथा अन्य औषधियों को सुगन्धित करने के लिये इसका व्यवहार किया जाता है। (३) मधुमेह तथा अपने आप होने वाले मूत्रत्याग (Incontinence) में इसका क्वाथ लाभदायी है। (४) मुख की दुर्गन्ध दूर करने के लिये तथा वाजीकरण के लिये इसको चबाते हैं। (५) इससे सिद्ध तैल का उपयोगः मुखदूषिका तथा कर्णपिटिका आदि चर्म रोगों में किया जाता है। (६) दन्तशूल में इसके चूर्ण को दाँतों पर रगड़ते हैं। (७) अधिक पसीना आता हो तो इसके चूर्ण को शरीर पर रगड़ते हैं। (८) इसके बीज का भी उपर्युक्त गुणों के लिये व्यवहार होता है। मात्रा—२५० से ५०० मि.ग्रा.। विशेष—इसी की एक अन्य जाति जिसे ॲल्पीनिया ऑफिसिनेरम् हेन्स (Alpinia officinarum Hance) और अं० में लेसर गॅलेंगल (Lesser Galangal) कहते हैं, उसका भी व्यवहार कुलंजन के स्थान पर किया जाता है तथा हीन श्रेणी की सोंठ अथवा घोरबच की मिलावट भी इसमें रहती है। दक्षिण भारत में रास्ना के नाम से कुलंजन या उसके भेद का उपयोग करते हैं। अथ अपरा सुगन्धा स्थूलग्रन्थिः यस्या लोके महाभरी इति नाम तस्या गुणानाह स्थूलग्रन्थिः सुगन्धा स्यात्ततो हीनगुणा स्मृता ।।१०६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA