भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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२४६ भावप्रकाशनिघण्टुः खुरासानी वच के नाम तथा गुण—पारसीकवचा, शुक्लवचा और हैमवती ये नाम खुरासानी वच के हैं। खुरासानी वच—शुक्लवर्ण की (सफेद) होती है तथा गुणों में पूर्वोक्त वच के समान ही होती है किन्तु विशेष करके यह वायु को दूर करने वाली होती है ॥१०४॥ ३०. खुरासानी वचा (पारसीक वचा) पारसीक वचा (हैमवती) के संबंध में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। कुछ लोग इसी को बालबच भी कहते हैं। कुछ परम्परा ऐसी है कि आंतरिक प्रयोग में जब 'वचा' लेनी हो तो बालबच नाम से मिलने वाला द्रव्य लिया जाय एवं बाह्य प्रयोग में 'वचा' के नाम से घोरबच लिया जाय। यद्यपि इसके लिए कोई शास्त्रीय आधार नहीं मिलता और प्रत्यक्षतः वचा के स्थान पर बाह्याभ्यन्तर प्रयोग में घोरबच का उपयोग अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है। बालबच के नाम से भी बाजार में भिन्न-भिन्न मूल की गाँठें बिकती हैं जिनमें से एक का विनिश्चय श्री ठा० बलवन्तसिंह जी ने किया है। इसका वैज्ञानिक नाम Paris polyphylla Sm. (पैरिस पॉलिफाइला) है तथा इसे हिन्दी में दुधवच एवं नेपाली में इसे सतुआ कहते हैं। इसकी मोटी-मोटी गाँठे जैसी होती हैं। डॉ देसाई के मत से मजार पोश (काश्मी०), ले०-Iris germanica Linn. (आइरिस् जर्मेनिका) यह बालबच है। यह कश्मीर में कब्र पर लगाई हुई मिलती है। बाजार में एक बहुत छोटे अन्य प्रकार के मूल भी बालबच के नाम से मिलते हैं। अथ महाभरीवचा यस्या लोके कुलिञ्जन इति नामान्तरं तस्या गुणानाह सुगन्धाऽप्युग्रगन्धा च विशेषात्कफकासनुत् । सुस्वरत्वकरी रुच्या हृत्कण्ठमुखशोधिनी ॥१०५॥ महाभरी (कुलिञ्जन) के गुण—महाभरी वच (कुलिंजन) सुगन्ध तथा उग्रगन्ध युक्त होती है। विशेष करके यह कफ तथा खाँसी दूर करने वाली, स्वर को उत्तम करने वाली, रुचिजनक, हृदय, कण्ठ तथा मुख को शुद्ध करने वाली होती है। [१०५] ३१. कुलिंजन हिं०-कुलंजन, बड़ा कुलञ्जन। बं०-कुरची वच, महाभरी वच, कुलञ्जन। म०-कुलिंजन कोष्ट कोलञ्जन, मोठे कोलञ्जन। गु०-कुलिंजन जानु, कोलिंजन। सिन्ध०-कुञ्जर, कंजर, कांठी। ता०-पेररत्तइ। ते०- पेड्डादुम्पराशष्ठकम् । मला०-पेरारट्टा। क०-धूम रास्मी। ब्रही०-पदगोजी। फा०-खिरदारु, खरदारु, खुशरवे दारु एकलान्। अ०-इर्क खोलिजान, खुलंजान, खुलांजाने कस्वी, खुलंजान्-ए-कबीर। अं०-Greater Galangal (ग्रेटर गॅलंगाल); Java Galangal (जावा गॅलंगाल)। ले०-Alpinia galanga Willd. (अॅल्पिनिया गॅलंगा)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबॅरेॅसी)। पहले यह जावा और सुमात्रा से आया करता था किन्तु अब बंगाल के पूर्व भाग, दक्षिण भारत, मालावार और गोमान्तक के जंगलों में यह अधिकता से उत्पन्न होता है। इसका क्षुप—आमा हल्दी के आकार का २ मी. तक ऊँचा होता है। पत्ते—२२ से ४५ से.मी. लम्बे, ३-१२ से.मी. चौड़े, चिकने, आयताकार-भालाकार होते हैं। फूल—हरे से सफेद छोटे-छोटे आते हैं। फल—८ मि.मी. गोल नारङ्गी रङ्ग के होते हैं। बहुवर्षायु क्षुप होने के कारण काण्ड के सूख जाने पर भी इसकी जड़ जीवित रहती है। जड़— कन्दवत् और सुगन्धयुक्त होती है। इसको टुकड़े-टुकड़े कर सुखा करके बेचते हैं। ये टुकड़े २.५ से.मी. से ६ से.मी. तक मोटे, बाहर से लाल या मोर्चा के समान बादामी रंग के और अन्दर से हल्के नारंगी बादामी रंग के होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA