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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २४७ रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धित हल्के पीले रंग का तेल १.५-४.८% पाया जाता है जिसमें यूजीनॉल (Eugenol 25%), सिनेओल-डी-पिनेन् (Cineole-d-pinene, कॅडेनेन्स (Cadenens), बॅसोरिन् (Bassorin) एवं गॅलैंगिन् (Galangin), रहते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें ३ पीले रवेदार पदार्थ कैंफेराइड (Kaempferide, C₁₆H₁₂O, H₂O), गलेंगाॅल् (Galangol), मॉनोमेथिल् ईथर ऑफ गॅलैंगिन् (Mono-methyl ether of galangin) और स्टार्च २३%, राल, टैनिन, फोलोबॅफेन (Pholobaphane), वसा और मोम आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग—प्राणियों में सिरा द्वारा इसके टिंक्चर या क्वाथ के प्रयोग से निम्न प्रभाव दिखलाई देते हैं। रक्त का दबाव पहले कम होकर बाद में ठीक हो जाता है। यह शायद औदरिक रक्तवाहिनियों के विस्फार के कारण होता है। रक्तवहासंस्थान तथा हृदय के ऊपर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इसकी अल्प मात्रा से श्वसन क्रिया उत्तेजित तथा अधिक मात्रा से श्वसन केन्द्र का घात होकर अवसादित होती है। इसकी अल्प मात्रा से भी श्वसनिकाओं (Bronchioles) का विस्फार होता है। यह पाइलोकारपीन द्वारा कृत्रिम रूप से उत्पन्न श्वसनिकाओं के संकोच को भी दूर करता है। रक्त के दबाव के कम होने के कारण ही प्रारंभ में मूत्र की मात्रा कम होती है जो बाद में प्रकृत हो जाती है। पृथक्कृत (Isolated) गर्भाशय इसके प्रयोग से शिथिल होता है तथा उसके संकोच नियमित होने लगते हैं। पाचन- संस्थान के ऊपर इसकी क्रिया अन्य सुगन्धित उड़नशील तैलों की तरह होती है। कुलंजन उत्तेजक, कफनिःसारक, दीपक, पाचक, वातानुलोमक, बल्य तथा वृष्य है। इसका व्यवहार सरदी जुकाम, आमवात, खाँसी, श्वास, स्वरभंग एवं मधुमेह आदि में किया जाता है। (१) श्वास, खाँसी, कुकास एवं सर्दी के लिये यह बहुत अच्छी औषध है। बच्चों एवं वृद्धों के श्वसनसंस्थान के विकारों में इसको मधु के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है। इससे श्वासकृच्छ्र दूर होकर ज्वर भी कम होता है। दमे में इसके उद्वेष्ठननिरोधी गुण के कारण लाभ होता है। गले के प्रदाह में इसको चूसने से लाभ होता है। (२) इसके सुगन्धित, पाचक तथा दीपक गुणों के कारण पाचन के विकारों में यह उपयोगी है तथा अन्य औषधियों को सुगन्धित करने के लिये इसका व्यवहार किया जाता है। (३) मधुमेह तथा अपने आप होने वाले मूत्रत्याग (Incontinence) में इसका क्वाथ लाभदायी है। (४) मुख की दुर्गन्ध दूर करने के लिये तथा वाजीकरण के लिये इसको चबाते हैं। (५) इससे सिद्ध तैल का उपयोगः मुखदूषिका तथा कर्णपिटिका आदि चर्म रोगों में किया जाता है। (६) दन्तशूल में इसके चूर्ण को दाँतों पर रगड़ते हैं। (७) अधिक पसीना आता हो तो इसके चूर्ण को शरीर पर रगड़ते हैं। (८) इसके बीज का भी उपर्युक्त गुणों के लिये व्यवहार होता है। मात्रा—२५० से ५०० मि.ग्रा.। विशेष—इसी की एक अन्य जाति जिसे ॲल्पीनिया ऑफिसिनेरम् हेन्स (Alpinia officinarum Hance) और अं० में लेसर गॅलेंगल (Lesser Galangal) कहते हैं, उसका भी व्यवहार कुलंजन के स्थान पर किया जाता है तथा हीन श्रेणी की सोंठ अथवा घोरबच की मिलावट भी इसमें रहती है। दक्षिण भारत में रास्ना के नाम से कुलंजन या उसके भेद का उपयोग करते हैं। अथ अपरा सुगन्धा स्थूलग्रन्थिः यस्या लोके महाभरी इति नाम तस्या गुणानाह स्थूलग्रन्थिः सुगन्धा स्यात्ततो हीनगुणा स्मृता ।।१०६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA