भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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२४८ भावप्रकाशनिघण्टुः **महाभरी वच के नाम तथा गुण—**जो मोटी गाँठवाली तथा सुगन्धयुक्त (महाभरी) वच होती है वह पूर्वोक्त वच की अपेक्षा हीन गुण वाली होती है। [१०६] ३२. महाभरीवच **हिं०—**महाभरी वच, कुलञ्जन भेद। **बं०—**महाभरी वच, नरकचूर। **पं०—**कचूर, नरकचूर। **मला०—**कटुइंशीकुआ। **ले०—**Zingiber zerumbet Rosc. ex Smith (जिंजीबेर जिरम्बेट्)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेॅसी)। इस देश के कई प्रान्तों में यह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप गन्ने के समान १ से १॥ मी. ऊँचा और १२ मि.मी. गोल होता है। **पत्ते—**२०-३० से.मी. लम्बे, ५-८ से.मी. चौड़े, नरसल के पत्तों के समान किञ्चित् आयताकार-भालाकार एवं नोंकदार होते हैं। ३० से ४५ से.मी. तक लम्बी डण्डियों पर फूल आते हैं। **फूल—**फीके पीले रङ्ग के होते हैं। **फल—**२.५ से.मी. लम्बा दीर्घवृत्ताकार होता है। **बीज—**छोटे-छोटे आयताकार काले रङ्ग के होते हैं। **मूलस्तम्भ—**कड़ा, द्विवर्षीय, भीतर से पीत एवं स्वाद में कुछ आर्द्रक जैसा ही किन्तु कुछ कड़वाहट लिये हुए होता है। इसका व्यवहार खाँसी, श्वास, कृमि, कुष्ठ तथा अन्य चर्मरोगों में किया जाता है एवं इसके अन्य गुण सोंठ की ही तरह हैं। अथ चोबचीनीति लोके या प्रसिद्धा तस्या नाम गुणाँश्चाह द्वीपान्तरवचा किञ्चित्तिक्तोष्णा वह्निदीप्तिकृत्। विबन्धाध्मानशूलघ्नी शकृन्मूत्रविशोधिनी।। १०७।। वातव्याधीनपस्मारमुन्मादं तनुवेदनाम्। व्यपोहति विशेषेण फिरङ्गामयनाशिनी।। १०८।। चोबचीनी के नाम तथा गुण—'द्वीपान्तरवचा' यह संस्कृत नाम चोबचीनी का है। **चोबचीनी—**कुछ तिक्तरसयुक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, विबन्ध, आध्मान तथा शूल को नष्ट करने वाली, मल तथा मूत्र का शोधन करने वाली होती है एवं वातव्याधि, अपस्मार (मिर्गी), उन्माद (पागलपन) और शरीर के दर्द को दूर करती है और विशेष करके यह फिरङ्गरोग को दूर करने में उत्तम होती है। [१०७-१०८] ३३. चोबचीनी **हिं०—**चोबचीनी, तोबचीनी, चोबचिंनी। **बं०—**तोबचीना, कुमारिका, शूकचिन। **म०-गु०—**चोबचीनी। ते०— पिरङ्गीचेवक्का। **ता०—**परङ्गिचेक्कई। मला०— चाइना पैवू या पैर्रू। **ने०—**चोबचीनी। **यू०—**खसिलियर आशसिनी। **फा०—**चोबचीनी। **अ०—**कशवचीनी, खुशबुस्सीनी। **अं०—**China root (चाइनारूट)। ले०— Smilax china Linn. (स्माइलैक्स चाइना)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। वच की अनेक जातियों में चोबचीनी भी एक मानी गई है। यह चीन देश में अधिक उत्पन्न होती है और वहीं से इस देश में आती है। इस कारण इसका नाम द्वीपान्तरवचा रखा गया है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में फैलनेवाली होती है। इस लता की जड़ को ही चोबचीनी कहते हैं। चोबचीनी ८-१० से.मी. लम्बी, २५ मि.मी. तक मोटी, गाँठदार, बेरेशा, खुरदुरी तथा दृढ़ काष्ठवत् जड़ है। इसका स्वरूप सफेदी मायल पीत, गुलाबी एवं किंचित् कालापन युक्त होता है। अधिक पुरानी होने पर चोबचीनी में प्रायः घुन लग जाते हैं, जिससे वह छिद्रयुक्त दिखाई देती है। घुनी हुई तथा गाँठविहीन चोपचीनी को उपयोग में नहीं लाना चाहिये।