भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २४९ रासायनिक संगठन—इसमें वसा, शर्करा, ग्लूकोसाइड, रञ्जक पदार्थ, सॅपोनिन्, गोंद तथा स्टार्च आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—सम्राट् चार्ल्स पंचम के वातरक्त (Gout) में इस औषधि की बहुत सफलता सिद्ध होने से इसका यूरोप में बहुत प्रचार हुआ था। १७वीं शताब्दी में सार्सपरिला के समान इसका व्यवहार किया जाता रहा। यह स्वेदल, स्नेहन, उत्तेजक, रसायन, रक्तशोधक, बल्य, वाजीकर, फिरंगहर तथा धातुओं को गलाने वाली (Resolvent – रीसॉलवेण्ट) है। (१) इसको दूध में उबालकर इसमें मस्तगी, इलायची तथा दालचीनी मिलाकर इसका व्यवहार आमवात, वातरक्त, अपस्मार, जीर्ण वातविकार, कार्श्य, धातुक्षीणता, ग्रन्थिविकार तथा फिरंग की तृतीयावस्था में किया जाता है। (२) अनन्तमूल के साथ इसको पुराने सिरदर्द में देने से लाभ होता है तथा आमवात एवं फिरङ्ग में भी इसका व्यवहार करते हैं। (३) डॉ. देसाई के मतानुसार यह श्रेष्ठ रसायन है। इसकी क्रिया त्वचा, सन्धियों के बन्धन तथा रसग्रन्थियों पर होती है। सोज़ाक से उत्पन्न सन्धिशोथ आदि विकारों में तथा फिरङ्ग की द्वितीयावस्था तथा तृतीयावस्था में इससे बहुत लाभ होता है। पोटैशियम् आयोडाइड् की अपेक्षा यह शीघ्र लाभकर एवं निर्दुष्ट औषध है। फिरङ्गादि से उत्पन्न ग्रन्थिवृद्धि में इसके उपयोग से प्रथम वेदना कम होकर बाद में सूजन कम होती है। चोबचीनी जितना चूर्ण रूप में काम करती है उतना फाण्ट या क्वाथ रूप में नहीं करती। मात्रा—चूर्ण २-४ ग्रा. सोंठ के साथ दूध में। इस जाति की जिन अन्य औषधियों का व्यवहार किया जाता है, प्रसंगतः उनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है— (क) जङ्गली उषाबा हिं०-जङ्गली उषाबा, चोबचीनी। बं०-कुमारिका। मल०-कुरिबिलाण्डि। म०-घोटवेल। गु०-गुटी। ता०- मलैतामर। ले०-Smilax macrophylla Roxb. (स्माइलॅक्स मॅक्रोफाइला)। यह एक बड़ी लता होती है जो समस्त भारत में उत्पन्न होती है। पत्ते—लम्बे, बड़े, अखण्ड और नुकीले रहते हैं जिन पर ५, ७ मोटी सिराएँ होती हैं। काँटे दूर-दूर या प्रायः अनुपस्थित होते हैं। पुष्प—गुच्छों में आते हैं। फल— चने के समान गोल, हरित एवं पकने पर रक्तवर्ण के हो जाते हैं। मूल—बहुत तथा सार्सपरिला के समान लाल रंग की होती है। इसकी जड़ों का व्यवहार किया जाता है। इसकी जड़ें ताजी काम में लानी चाहिये। गुण और प्रयोग—यह स्वेदल, मूत्रल, पौष्टिक, कामोद्दीपक और रसायन है। फिरङ्ग की द्वितीयावस्था, जीर्ण आमवात तथा सन्धिशोथ में इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। फिरङ्ग से उत्पन्न होने वाले फोड़े-फुन्सियाँ, सन्धिवात, अस्थिशोथ, अस्थिवात और शूल तथा ग्रन्थियों की वृद्धि में उपयोगी है। पुराने चर्मरोग तथा गण्डमाला में इससे लाभ होता है। नेपाल में ३ ग्रा. चूर्ण सोजाक तथा अन्य श्लैष्मिककला के स्रावों के लिए दिया जाता है। मात्रा—१०-२० ग्रा. चूर्ण का क्वाथ दिन में एक बार। (ख) बड़ी चोबचीनी हिं०-बड़ी चोबचीनी। बं०-हरिनाशुकचिन। म०-गोटी शूकचिन। पहा०-हझिन। ले०-Smilax glabra Roxb. (स्माइलॅक्स ग्लॅब्रा)।