भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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२५० भावप्रकाशनिघण्टुः यह लता आसाम, सिलहट, खासिया की निम्न श्रेणियों एवं तेनासेरिम आदि स्थानों में उत्पन्न होती है। इसमें काँटे नहीं होते। पत्र—नुकीले, पतले, अधोभाग हल्के रंग का; पुष्प—सफेद विदण्डिक; मूल—चोबचीनी की तरह। गुण और प्रयोग—इसके ताजे मूल का क्वाथ त्वक् रोग तथा फिरंग आदि रतिजन्य उपसर्गों से उत्पन्न फोड़े- फुन्सी आदि में दिया जाता है। (ग) हरिया शुकचिन पहा०-हूरिन शूकचिन बं०-गुचिया शूकचिन। ले०-Smilax lanceaefolia Roxb. (स्माइलैक्स लॅन्सिफोलिया)। यह भी लता सिक्किम, हिमालय, आसाम एवं म्यानमार (बर्मा) में होती है। पत्र—पतले तथा उन पर ३ बड़ी शिराएँ रहती हैं। इसकी जड़ चोबचीनी के समान होती हैं जिसका व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग—इसकी जड़ का रस निकालकर आमवात में पिलाते हैं तथा इसके कल्क को वेदनास्थान पर बाँधते हैं। (घ) उशबा, सार्सापरिला हिं०-उशबामग्रबी, सार्सापरिला। अं०-Sarsaparilla (सार्सापरिला)। ले०-Smilax ornata Hook. (स्माइलैक्स ओर्नेटा)। यह स्माइलैक्स की उपर्युक्त विदेशी जाति तथा अन्य विदेशी जातियों के सुखाये हुए मूल हैं। कभी-कभी भौमिक काण्ड (राइजोम) के टुकड़े इसके साथ मिले रहते हैं। यह बहुत लंबे, धारीदार एवं कुछ लालिमा लिये हुए होते हैं। स्थान भेद से तथा वर्ण, धारी एवं भौमिक या वायवीय भाग की अधिकता इत्यादि के कारण इसके स्वरूप में भिन्नता रहती है। यह प्रायः गंधहीन एवं कुछ मीठापन लिये हुए कटु होती है। रासायनिक संगठन—इसमें मुख्यतया सॅपोनिन् (Saponin) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—फिरंग, आमवात, जीर्ण चर्मविकार एवं रक्तदोष के लिए यह बहुत प्रसिद्ध औषध रही है। यह कैसे कार्य करती है यह स्पष्ट नहीं है। संभवतः शारीरिक क्षमता को बढ़ाकर या अन्य औषध के प्रचूषण में सहायता का कार्य करती है। विदेशों में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा—१ से ३ ग्रा.। अथ हपुषाद्वयम् तन्मध्ये प्रथमं फलं मत्स्यसदृशं विस्रगन्ध्यं द्वितीयमश्वत्थफलसदृशं मत्स्यगन्धम्, तयोर्नामानि गुणाँश्चाह- हपुषा हबुषा विस्रा पराऽश्वत्थफला मता। मत्स्यागन्धाप्लीहहन्त्री विषघ्नी ध्वांक्षनाशिनी ।।१९०९।। हपुषा दीपनी तिक्ता मृदूष्णा तुवरा गुरुः। पित्तोदरसमीराशोग्रहणीगुल्मशूलहृत् ।। पराऽप्येतद्गुणा प्रोक्ता रूपभेदो द्वयोरपि ।।१९१०।। हपुषाद्वयम के नाम तथा गुण—दो प्रकार का 'हाऊबेर' होता है। उसमें पहला जो आकार में मछली के समान तथा आम गन्धवाला होता है और दूसरा जो आकार में पीपल के फल के समान तथा मछली के समान गन्धवाला होता