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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

२५० भावप्रकाशनिघण्टुः यह लता आसाम, सिलहट, खासिया की निम्न श्रेणियों एवं तेनासेरिम आदि स्थानों में उत्पन्न होती है। इसमें काँटे नहीं होते। पत्र—नुकीले, पतले, अधोभाग हल्के रंग का; पुष्प—सफेद विदण्डिक; मूल—चोबचीनी की तरह। गुण और प्रयोग—इसके ताजे मूल का क्वाथ त्वक् रोग तथा फिरंग आदि रतिजन्य उपसर्गों से उत्पन्न फोड़े- फुन्सी आदि में दिया जाता है। (ग) हरिया शुकचिन पहा०-हूरिन शूकचिन बं०-गुचिया शूकचिन। ले०-Smilax lanceaefolia Roxb. (स्माइलैक्स लॅन्सिफोलिया)। यह भी लता सिक्किम, हिमालय, आसाम एवं म्यानमार (बर्मा) में होती है। पत्र—पतले तथा उन पर ३ बड़ी शिराएँ रहती हैं। इसकी जड़ चोबचीनी के समान होती हैं जिसका व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग—इसकी जड़ का रस निकालकर आमवात में पिलाते हैं तथा इसके कल्क को वेदनास्थान पर बाँधते हैं। (घ) उशबा, सार्सापरिला हिं०-उशबामग्रबी, सार्सापरिला। अं०-Sarsaparilla (सार्सापरिला)। ले०-Smilax ornata Hook. (स्माइलैक्स ओर्नेटा)। यह स्माइलैक्स की उपर्युक्त विदेशी जाति तथा अन्य विदेशी जातियों के सुखाये हुए मूल हैं। कभी-कभी भौमिक काण्ड (राइजोम) के टुकड़े इसके साथ मिले रहते हैं। यह बहुत लंबे, धारीदार एवं कुछ लालिमा लिये हुए होते हैं। स्थान भेद से तथा वर्ण, धारी एवं भौमिक या वायवीय भाग की अधिकता इत्यादि के कारण इसके स्वरूप में भिन्नता रहती है। यह प्रायः गंधहीन एवं कुछ मीठापन लिये हुए कटु होती है। रासायनिक संगठन—इसमें मुख्यतया सॅपोनिन् (Saponin) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—फिरंग, आमवात, जीर्ण चर्मविकार एवं रक्तदोष के लिए यह बहुत प्रसिद्ध औषध रही है। यह कैसे कार्य करती है यह स्पष्ट नहीं है। संभवतः शारीरिक क्षमता को बढ़ाकर या अन्य औषध के प्रचूषण में सहायता का कार्य करती है। विदेशों में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा—१ से ३ ग्रा.। अथ हपुषाद्वयम् तन्मध्ये प्रथमं फलं मत्स्यसदृशं विस्रगन्ध्यं द्वितीयमश्वत्थफलसदृशं मत्स्यगन्धम्, तयोर्नामानि गुणाँश्चाह- हपुषा हबुषा विस्रा पराऽश्वत्थफला मता। मत्स्यागन्धाप्लीहहन्त्री विषघ्नी ध्वांक्षनाशिनी ।।१९०९।। हपुषा दीपनी तिक्ता मृदूष्णा तुवरा गुरुः। पित्तोदरसमीराशोग्रहणीगुल्मशूलहृत् ।। पराऽप्येतद्गुणा प्रोक्ता रूपभेदो द्वयोरपि ।।१९१०।। हपुषाद्वयम के नाम तथा गुण—दो प्रकार का 'हाऊबेर' होता है। उसमें पहला जो आकार में मछली के समान तथा आम गन्धवाला होता है और दूसरा जो आकार में पीपल के फल के समान तथा मछली के समान गन्धवाला होता

हरीतक्यादिवर्गः २५१ है, उन दोनों के नाम तथा गुण—हपुषा, हबुषा और विस्रा ये तीन नाम प्रथम हाऊबेर के हैं और दूसरे के नाम- अश्वत्थफला, मत्स्यगन्धा, प्लीहहन्त्री, विषघ्नी और ध्वाङ्क्षनाशिनी (इसके खाने से कौवे मर जाते हैं) ये हैं। प्रथम हाऊबेर—अग्निदीपक, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, मृदु, उष्णवीर्य, पाक में गुरु, पित्त, उदर और वात सम्बन्धी रोग, बवासीर, ग्रहणी, गुल्म तथा शूल को दूर करता है और दूसरा हाऊबेर भी इन्हीं पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है अन्तर केवल आकार तथा गन्ध मात्र में ही है। ३४. हपुषा (हाऊबेर) हिं०-हाऊबेर, हाऊबैर, आरार। बं०-हवुषा। म०-होश। मा०-हाऊबेर। पं०-हाऊबेर, पेत्यरी, अवहुल। कुमा०-चिचिया। काश्मी०-वेंथा, पेथरा। फा०-तुख्बदुलह, ओरस। अ०-अरअर, अवहाल, हब्बउलअरअर। अं०-Juniper Berry (जूनिपेर बेरी)। ले०-Juniperus communis Linn. (जूनिपेरस् कम्युनिस्)। Fam. Cupressaceae (क्यूप्रेसेंसी)। हाऊबेर दो प्रकार का होता है। एक का संस्कृत नाम 'हपुषा' और दूसरे का 'अश्वत्थफला' है। हपुषा और अश्वत्थफला वास्तव में दोनों फल और गन्धभेद से दो द्रव्य हैं, परन्तु दोनों के गुण समान हैं और दोनों ही के वृक्ष भी समान ही होते हैं। हपुषा—मछली के समान आकृति का एवं आम गन्ध युक्त और अश्वत्थफल—मछली के समान गन्ध और पीपर (अश्वत्थ) वृक्ष के फलों के समान फलवाला होता है। हपुषा के वृक्ष हिमालय के पश्चिमोत्तर भाग में कुमाऊँ से पश्चिम की ओर ४००० से ४७०० मी. की ऊँचाई तक देखने में आते हैं। इसका वृक्ष बड़ा नहीं होता बल्कि इसका झाड़ होता है जो सघन, फैला हुआ तथा बारहो मास हरा-भरा रहता है। पत्ते—रेखाकार, नुकीले, ५ से १३ मि.मी. लंबे, एक साथ तीन-तीन एवं काण्ड से समकोण बनाते हुए होते हैं। फूल—पीत वर्ण के गुच्छों में आते हैं। फल—१/३-२/३ इञ्च के घेरे में गोलाकार, गूदेदार और पकने पर नीलापन युक्त काले या कुछ बैंगनी रंग के दिखाई पड़ते हैं। इनके ऊपर रजावरण रहता है। अग्रभाग पर शल्कपत्र के त्रिविभक्त निशान रहते हैं और आधार पर भी शल्क पत्र के दो चक्र रहते हैं। प्रत्येक फल में तीन-तीन बीज रहते हैं जिनके पृष्ठ पर तैलग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। फलों से तेल निकाला जाता है। कुल लोग ले०-टैमरिक्स गॉलिका (Tamarix gallica Linn.), हिं०-झाऊ तथा फ्लूजिया ल्यूकोपाइरस (Flueggea leucopyrus Willd.) को ग्रहण करते हैं जो उचित नहीं है। रासायनिक संगठन—इसमें एक उड़नशील तैल ०.२५%, राल १०%, मधुशर्करा ३३%, एक तिक्त पदार्थ ज्यूनिपेरिन (Juniperin), ऑक्सैलिक एसिड तथा कुछ आर्गेनिक अम्ल (Organic acid) आदि पदार्थ रहते हैं। इसी की एक अन्य जाति जू. मैक्रोपोडा (J. macropoda Boiss) के फल कुछ लम्बे रहते हैं तथा उसमें तैल की मात्रा ३.२४% पाई गई है। गुण और प्रयोग—हाऊबेर सुगन्धित, मूत्रजनक, वातानुलोमक, आध्मानहर, पाचक, उत्तेजक, वृष्य, रक्तस्कन्दक, आर्तवजनक एवं उपसर्गनाशक है। इसका उपयोग उदर

२५२ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) आध्मान, शूल तथा पाचन के विकारों में इसको मद्यसार के साथ देते हैं। (३) इसका तैल उत्तेजक, मूत्रल तथा वातानुलोमक है एवं इसका उपयोग कटिशूल, आध्मान तथा शूल में किया जाता है। उत्सर्ग के समय प्रत्याक्षेप क्रिया द्वारा यह गर्भाशय का संकोच करता है इसलिए आर्तवस्राव वृद्धि के लिए इसका उपयोग किया जाता है। इसके बाह्य प्रयोग से चर्म में प्रक्षोभ उत्पन्न होता है। वृक्क रोग में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। (४) इसका काष्ठ स्वेदल है तथा ग्वायकम और सासाफ्रास के बदले में प्रयुक्त होता है। (५) हाऊबेर का रस एक अच्छा उपसर्ग नाशक है। स्थूलांत्र दण्डाणु (बी. कोलाइ) जैसे जीवाणुओं का भी यह नाश करता है। इसके धूम्र का व्यवहार किया जाता है तथा यह मांस तथा मद्यों के संरक्षण के लिये भी प्रयोग में आता है। जानपदिक संक्रामक रोगों के मरक (Pestilence) को रोकने की दृष्टि से यह उपयोगी समझा जाता है। मरक के समय इसके चूर्ण का दैनिक सेवन करने से व्याधि का प्रतिषेध होता है। (६) बच्चों के राजयक्ष्मा में इसको पकाकर देने से भूख बढ़ती है, वजन बढ़ता है और लाभ होता है। (७) इसके चूर्ण को आमवातादि में संधियों तथा सूजन पर मलते हैं। (८) यह 'जिन' आदि आपानक मद्यों के निर्माण के लिये यूरोप में व्यवहार में आता है। मात्रा—चूर्ण २-६ ग्रा.। तैल- ½ से १ बूँद पाचक, ४-६ बूँद मूत्रल। स्पिरिट (२० में १) २०-६० बूँद। फांट-२-३ औंस। अथ विडङ्गस्य नामानि गुणाँश्चाह पुंसि क्लीबे विडङ्गः स्यात्कृमिघ्नो जन्तुनाशनः । तण्डुलश्च तथा वेल्लममोघा चित्रतण्डुलः ।।१११।। विडङ्गं कटु तीक्ष्णोष्णं रूक्षं वह्निकरं लघु । शूलाध्मानोदरश्लेष्मकृमिवातविबन्धनुत् ।।११२।। वायविडङ्ग के नाम तथा गुण—'विडङ्ग' (यह शब्द पुल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग दोनों ही में व्यवहृत होता है), कृमिघ्न, जन्तुनाशन, तण्डुल, वेल्ल, अमोघा और चित्रतण्डुल ये सब वायविडङ्ग के पर्यायवाची शब्द हैं। वायविडङ्ग— कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण और उष्ण वीर्य होता है तथा रूक्ष, अग्निवर्धक एवं पाक में लघु होता है और यह शूल, आध्मान, उदर, कफ, कृमि तथा वात रोग एवं विबद्धता को दूर करता है। [१११-११२] ३५. वायविडङ्ग प्रायः सभी पंसारी धनिये के समान गोल-गोल किञ्चित् लाली युक्त बीज को वायविडङ्ग के नाम से बेचते हैं और अधिकांश वैद्य इसी को लेकर व्यवहार में लाते हैं, किन्तु आजकल के कतिपय विद्वान् वैद्यों की सम्मति है कि शास्त्रीय 'विडङ्ग' वास्तव में आजकल व्यवहार में आने वाले फल वायविडङ्ग नहीं है बल्कि 'नाड़ीहिङ्गु' को उपयोग में लेना चाहिये। कुछ विद्वान् काम्पिल्ल के फल को ही वायविडङ्ग मानते हैं। इस प्रकार वायविडङ्ग एक भ्रमात्मक औषधि मानी जाने लगी है। किन्तु मेरी समझ में विडङ्ग और नाड़ीहिङ्गु एक वस्तु नहीं है और न वायविडङ्ग काम्पिल्ल का फल ही है। प्रचलित विडङ्ग में शास्त्रोक्त कृमिघ्न, अग्निदीपक आदि गुण पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं, अतः इसी का व्यवहार औषधि-कार्यों में करना चाहिए। हिं०-वायविडङ्ग, भाभिरंग, बाबिरंग। बं०-विरंग। म०-वावडिङ्ग। गु०-वावडीङ्ग। क०-वायुविडङ्ग, वायबिलंग। ते०-वायुविडंघमु। ता०-वायुविलंगम। पं०-बबरंग, वाबरंग। मा०-वायविरंग। सिंहली०-उम्बेलिया, अम्बेलिया।- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २५३ वंसज काबुली ने०-हिमलचेरी। अ०-विरंज काबुली। फा०-बरंग कावली, विरंज काबली। अं०-Babreng, Fruit of Embelia ribes। बाबरिंग, फ्रूट आफ अम्बेलिया राइब्स ले०-Embelia ribes Burm. (एम्बेलिया राइब्स)। Fam. Myrsinaceae (मिर्सिनेसी)। यह मध्य हिमालय से भारतवर्ष के पहाड़ी भागों में तथा सिलोन से सिंगापुर तक बहुत पाया जाता है। इसकी झाड़ी—बहुत विस्तार में बढ़ने वाली होती है। छाल—वातरन्ध्रों के कारण खुरदुरी होती है। टहनियाँ— लंबी, पतली, लचीली, गोल एवं लंबे पर्व युक्त होती हैं। पत्ते—चर्मवत्, ५ से १० से.मी. लंबे, दीर्घवृत्ताकार या कुछ भालाकार, तीक्ष्णाग्र, ऊपर से चमकीले एवं अधोतल पर हलके या कुछ रजताभ एवं सूक्ष्म रक्ताभ ग्रन्थियों से युक्त होते हैं। फूल—सफेद या किञ्चित् हरियाली लिये फीके पीले रंग के गुच्छों में आते हैं। फल—५ मि.मी. तक गोलाकार, पकने पर लाल रंग के किन्तु सूखने पर झुर्रीदार काले रंग के दिखाई पड़ते हैं। फलों में डण्ठल के साथ पाँच पट्टों का पुष्प पात्र लगा रहता है और अग्र की तरफ नुकीला रहता है। फल तोड़ने पर चितकबरे लाल रंग के पतले आवरण से युक्त एक-एक बीज निकलता है, जो स्वाद में चरपरा और गरम मसाले के समान सुगन्धित होता है। चित्रतण्डुलः यह पर्याय इसी चितकबरे वर्ण का द्योतक है। रासायनिक संगठन—इसके फलों में एम्बेलिक् एसिड (Embelic acid) या एम्बेलिन (Embelin, C₁₈ H₂₈ O₄) नामक एक सुनहरे पीले रंग का रवेदार पदार्थ २.५% पाया जाता है। यह जल में अघुलनशील तथा मद्यसार, ईथर, क्लोरोफार्म और बेंझीन में घुलनशील होता है। क्षारीय घोल में यह घुलकर घोल लाल रंग का हो जाता है। इसके अतिरिक्त अल्प मात्रा में क्रिस्टेम्बिन (Christembine) नामक एक क्षाराभ तथा तैल, उड़नशील तैल, रञ्जक द्रव्य, टॅनिन एवं राल सदृश पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह उत्तम कृमिघ्न, वातानुलोमक, वातहर, दीपन, पाचन, वातनाडी संस्थान के लिये बल्य, रक्त शोधक, आनुलोमिक तथा रसायन है। रसग्रन्थियों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। इसका उत्सर्ग मूत्र द्वारा होता है जिससे मूत्र लाल रंग का हो जाता है। (१) स्फीतकृमि (Tape-worm) के लिये यह अत्युत्तम औषधि है। मेलफर्न (Malefern) के समान इससे मरोड़ नहीं होती और अधिक लाभ होता है। बच्चों को ४ ग्रा. तथा बड़ों को ८ ग्रा. चूर्ण मधु या दही के साथ सुबह खिलाकर ४ घंटे पश्चात्, एरण्ड तैल अथवा कोई विरेचन देना चाहिये। अथवा कोष्ठ शुद्धि के पश्चात् रात में इसका चूर्ण मट्ठे के साथ देकर दूसरे दिन सुबह विरेचन देना चाहिये। इससे मरे हुए कृमि निकल जाते हैं। अन्य कृमियों पर भी इससे लाभ होता है। इसका कृमिघ्न गुण एम्बेलिक् एसिड के कारण है। इसके लवण अमोनियम् एम्बेलेट Ammonium embelate (१ १/२ - ३ र०) का भी उपयोग मधु के साथ अच्छा होता है। इसके पूर्व तथा पश्चात् एरण्ड तैल से विरेचन कराना चाहिये। (२) यह एक अच्छा रसायन है। सुश्रुत में एक 'सर्वोपघातशमनीय' नामक प्रयोग बतलाया है। नित्य एक महीने तक विडंग के मगज का चूर्ण तथा मुलेठी खाकर ऊपर से ठण्डा जल पीना चाहिये। पथ्य में बिना नमक, मूँग का आँवले के साथ सिद्ध किया यूष तथा घी और भात औषध पचने पर लें। इसके उपयोग से सब प्रकार के अर्श अच्छे होते हैं। ग्रहण शक्ति तथा धारणा शक्ति बढ़ती है। शरीर के सभी प्रकार के कृमि नष्ट होकर शरीर स्वस्थ होता है। इसके हर साल प्रयोग से मनुष्य निरोग तथा शतायु होता है। इससे सब प्रकार के पुराने रोग जैसे अर्श, संग्रहणी, प्रमेह, कुष्ठ, क्षय, श्वास, उपदंश एवं व्रण आदि अच्छे होते हैं तथा हैजा, प्लेग आदि उपसर्गों का भय नहीं रहता।

२५४ भावप्रकाशनिघण्टुः (३) बालकों के सभी रोगों की यह अच्छी औषधि है। सुखण्डी, आध्मान, शूल, कुपचन एवं अग्निमांद्य आदि में दूध में इसको डालकर उबालते हैं और वही दूध पिलाते हैं। इससे बच्चे तन्दुरुस्त रहते हैं। यदि इसके साथ अनन्तमूल भी दिया जाय तो अधिक लाभ होता है। (४) गण्डमाला के लिये-वायविडङ्ग, गुग्गुलु, मनःशिला तथा शृङ्गभस्म, मधु और घृत के साथ देने से धीरे-धीरे लाभ होता है। (५) चर्म रोगों में इसका आन्तरिक एवं बाह्य प्रयोग किया जाता है। दाद में इसके लेप से लाभ होता है। (६) मज्जातन्तु के रोग जैसे अर्धांगघात, आक्षेप एवं अपस्मार आदि में लहसुन के साथ दूध में उबालकर देना चाहिये। (७) पीनस, शिरःशूल तथा अर्धावभेदक में इससे सिद्ध तैल के नस्य से लाभ होता है। शिरःशूल में कपाल पर इसकी मालिश करनी चाहिये। (८) बिच्छू के काटने तथा सर्प दंश पर इसका उपयोग लिखा गया है। (९) इसका ताजा रस शीतल, मूत्रल तथा आनुलोमिक होता है। मात्रा—चूर्ण ४ से १६ ग्रा.। ३६. विडङ्ग भेद सं०-विडङ्गभेद। हिं०-वायविडङ्ग भेद, वायविभाङ्ग। अवध०-बेबरङ्ग। देहरादून०-वायविरङ्ग, गैया। गोंड०- कोपडल्ली। कुरकु०-भारङ्गेली। मु०-आमटी, गोंदली, बार्बटी। ने०-कलय बोगोटी। अं०-Basal (बासल)। ले०-E. tsjeriam-cottam A. DC. (ए. त्स्जेरियम-कोट्टम ए. डीसी.)। Fam. Myrsinaceae (मिरसिनेंसी)। यह हिमालय पहाड़ के पूर्व की ओर बङ्गाल तथा दक्षिण की ओर सिलोन तक कहीं न कहीं पाया जाता है। इसके वृक्ष—छोटे और बहुत झाड़दार होते हैं। पत्ते कुछ अधिक बड़े होते हैं तथा शिराएँ कुछ मुरचई रोमावरण से युक्त होती हैं। फूल—हरियाली लिये सफेद रंग या हरापन युक्त फीके पीले रंग के बहुत छोटे-छोटे आते हैं। फल— छोटे-छोटे गोल होते हैं और लंबाई में महीन धारीदार होते हैं। गुण और प्रयोग—यह वातानुलोमक, कृमिघ्न, अर्शोघ्न, शोथप्रतीकारक और रसायन है। इसका उपयोग विडङ्ग के समान किया जाता है। बाजार में दोनों ही जाति के फल मिले हुये रहते हैं। (१) वह भी विडङ्ग के समान विशेषरूप से स्फीतकृमि नाशक होता है। (२) गण्डमाला में अनन्तमूल के साथ इसका क्वाथ पिलाते हैं तथा ठण्डे जल में पीसकर गाँठों पर लेप करते हैं। (३) दन्तशूल में इसका चूर्ण हींग के साथ दाँत के गड्ढे में रखने से लाभ होता है तथा इसका मञ्जन में व्यवहार करते हैं। इसके मूल की छाल का भी इसमें उपयोग होता है। (४) इसके कोमल पत्तों का सोंठ के साथ क्वाथ बनाकर गले की सूजन, मुख के छाले एवं व्रण में कवल कराने से लाभ होता है। (५) न्यूमोनिया तथा अन्य छाती के विकारों में चावल की माँड़ के साथ इसकी छाल को उबाल- कर पिलाते हैं तथा छाल पीसकर छाती पर लेप करते हैं। इसके फलों को पीसकर मक्खन के साथ छाती पर लगाने से फुप्फुसावरण शोथ में लाभ होता है तथा शिरःशूल में भी इसी प्रकार कपाल में इसका लेप करते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २५५ विशेष—एक अन्य मिरसीन अफ्रिकाना (Myrsine africana Linn.) के फलों को भी कहीं-कहीं विडंग कहा जाता है, किन्तु इसमें शास्त्रोक्त गुण नहीं हैं। ३७. नाड़ी हिङ्गु (डिकामाली) नाडीहिङ्गु पलाशाख्या जन्तुका रामठी च सा । वंशपत्री च पिण्डाह्वा सुवीर्य्या हिङ्गुनाडिका ।। (रा.नि.) सं०-नाडीहिङ्गु, पलाशाख्या, जन्तुका, रामठी, वंशपत्री, पिण्डाह्वा, सुवीर्य्या, हिङ्गुनाडिका। हिं०- नाड़ीहिङ्गु, नारीहींग, कलपतीहींग, डिकामाली, डिकेमाली, कमरी। बं०-हिंगुविशेष। म०-डिकेमाली। गु०-डीकामारी। काठी. मालण, मालडी। क०-डिक्कामल्लि। ता०-कुंवै। ते०-गेरिविक्कि, करिगा, तेल्लामंगा। अ०-कनखाम। अं०- Gummy Gardenia (गम्मी गार्डेनीया); Cambi resin (कॅम्बी रेसिन)। ले०-Gardenia gummifera Linn. (गार्डेनिया गम्भीफेरा)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। इसके वृक्ष अधिकतर दक्षिण भारत में पाये जाते हैं। इसका वृक्ष—छोटा तथा झाड़दार होता है। पत्ते—विनाल, ४.५-७ x २-२.५ से.मी. बड़े, दीर्घवृत्ताभ, आयताकार, स्वरूप में कुछ अमरूद के पत्तों के समान तथा चिकने, चमकीले होते हैं। फूल—सुगंधहीन, प्रारंभ में श्वेत किन्तु बाद में पीतवर्ण के १ से ३ साथ-साथ रहते हैं। फल—२.५-३.८ से. मी., आयताकार या दीर्घवृत्ताभ, चिकना, लंबाई में धारीदार एवं नोकदार होता है। इन पौधों की कोमल शाखाओं के बीच तथा कलियों में से जाड़े के दिनों में हरियाली लिए हुए किञ्चित् पीले रंग का गोंद निकलता है। उसी को 'डीकामाली' कहते हैं। इसकी छाल से गोंद नहीं निकलता। जंगली गोंड लोग ठीकरों में इकट्ठा कर सुखा करके बाजार में बेचते हैं। इस गोंद में छोटी- छोटी लकड़ियां, फूस-घास आदि मिली रहती है अतएव इसे गरम जल में घोल, छान एवं सुखा करके औषधि के काम में लेना चाहिये। शुद्ध डिकामाली में बिलार के मूत्र जैसी गन्ध आती है तथा वह कुछ आर्द्र एवं चमकीला रहता है और उसके चूर्ण बनाने में कठिनाई होती है। गुण--नाडीहिङ्गु कटूष्णं च कफवातार्त्तिशान्तिकृत् । विष्ठाविबन्धदोषघ्नमानाहामयहारि च ।। रा. नि. नाड़ीहिंगु—कटु, उष्ण, कफ और वात की पीड़ा को शमन करने वाली तथा विष्ठा विबन्ध और आनाह रोग को नष्ट करने वाली है। नाडीहिङ्गुस्तु कटुकस्तीक्ष्णश्चोष्णश्च दीपकः । कफवातमलस्तम्भमनोमोहामनाशनः ।। निघण्टुरत्नाकरः नाड़ीहिंगु—कटु, तीक्ष्ण, उष्ण, अग्निप्रदीपक तथा कफ, वात, मलबन्ध, मन का मोह और आम का नाश करने वाली है। रासायनिक संगठन—इसमें दो प्रकार के राल के सदृश पदार्थ रहते हैं जिसमें से गार्डेनिन् (Gardenin) रवेदार सुनहले पीले रंग का तथा दूसरा डिकेनाली (Dikenali) कुछ मुलायम तथा हरे रंग का होता है। गुण और प्रयोग—यह उद्वेष्ठन निरोधि, वातानुलोमक, अग्निदीपक, विरेचक, कृमिघ्न, ज्वरहर, स्वेदजनन, श्लेष्मनिःसारक, त्वक् दोषहर एवं प्रतिदूषक है। गुणों में वायविडङ्ग और डिकामाली बहुत समानता रखते हैं। किन्तु शास्त्रों में विडङ्ग को कृमिघ्न लिखा है और डिकामाली के विषय में उसकी कृमिघ्नता के गुण का स्पष्टीकरण नहीं किया है। आधुनिक शोध द्वारा सिद्ध हुआ है कि डिकामाली भी विशेष कृमिघ्न है। नाड़ीहिङ्गु के प्रयोग से कोष्ठान्तर्गत वर्तुलाकार कृमि नष्ट या निर्जीव हो जाते हैं। वायविडङ्ग—विशेष रूप से पक्वाशय के लम्बे चिपटे कृमियों का विनाशक है। डिकामाली-इन कृमियों का नाश नहीं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

२५६ भावप्रकाशनिघण्टुः कर सकती। इससे गोल (Round) या कुछ लम्बे नन्हें-नन्हें कृमियों का नाश होता है। डिकेमाली का फांट नियत कालिक ज्वर में देने से कम्पन कम होता है। आन्त्र की विकृतियाँ जैसे आध्मान, कुपचन एवं शूल आदि में इससे लाभ होता है। बच्चों को दन्तोद्भव के समय जो पाखाना एवं वमन आदि विकार होते हैं उसमें इससे अच्छा लाभ होता है। आध्मान में एलुवा के साथ पेट पर इसका लेप करते हैं तथा डिकेमाली खिलाते हैं। इसके फल विरेचक तथा कृमिघ्न होते हैं। मोटापा तथा प्लीहावृद्धि में इसका गोंद व्यवहार किया जाता है। बाहरी प्रयोग से दूषित व्रण साफ किये जाते हैं। इससे कीड़े नहीं पड़ने पाते तथा पड़े हुए कीड़े निकल जाते हैं और मक्खियाँ नहीं बैठने पातीं। इससे दन्तशूल में लाभ होता है। नारू में इसे ६०० मि.ग्रा. की मात्रा में देते हैं। अतएव नाड़ीहिङ्गु शास्त्रीय 'विडङ्ग' कदापि नहीं हो सकती। मात्रा—चूर्ण ६०-२५० मि.ग्रा.। अथ तुम्बुरुफलस्य नामानि गुणाँश्चाह तुम्बुरुः सौरभः सौरो वनजः सानुजोऽन्धकः ।।११३।। तुम्बुरु प्रथितं तिक्तं कटुपाकेऽपि तत्कटु । रूक्षोष्णं दीपनं तीक्ष्णं रुच्यं लघु विदाहि च ।।११४।। वातश्लेष्माक्षिकर्णौष्ठशिरोरुग्गुरुताकृमीन् । कुष्ठशूलारुचिश्वासप्लीहकृच्छ्राणि नाशयेत् ।।११५।। 'तुम्बुरु' फल के नाम तथा गुण—तुम्बरु, सौरभ, सौर, वनज, सानुज और अन्धक ये नाम 'तुम्बुरु फल' के हैं। तुम्बुरु फल—तिक्त तथा कटुरस युक्त है और विपाक में भी कटुरस युक्त है। यह रूक्ष, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, तीक्ष्ण, रुचिजनक, पाक में लघु और विदाही होता है। यह वातश्लेष्म, नेत्र, कर्ण, ओष्ठ तथा शिर के रोगों को एवं गुरुता (शरीर का भारीपन), कृमि, कुष्ठ, शूल, अरुचि, श्वास, प्लीहा और मूत्रकृच्छ्र इन सभी रोगों को भी दूर करता है। [११३-११५] ३८. तुम्बुरु हिं०-तुम्बुरु, तुम्बुल, तेजफल। बं०-तम्बुल, तुम्बुरु फल, नेपाली धने, नेपाली धनियाँ। म०- नेपाली धनियाँ। मा०-तूगरू। क०-तुम्बरु। ते०-तुम्दुरुलु। पं०-तुम्बर। गु०-तुम्बुरुफल। लिपचा०-तंग्रु कंग। ले०-Zanthoxylum alatum Roxb. (झैन्थोक्साइलम् ॲलॅटम्); Zanthoxylum acanthopodium DC. (झैन्थोक्साइलम् एकैन्थोपोडियम) दूसरी जाति। Fam. Rutaceae (रूटॅसी)। यह हिमालय की गरम तराइयों में जम्मू से भूटान तक, खासिया पहाड़, टेहरी, गढ़वाल, नाग पहाड़, विजिगापट्टम और गंजाम के पहाड़ों पर पाया जाता है। इसका वृक्ष—झाड़ीदार या क्वचित् छोटे वृक्षवत् रहता है। काँटे—सीधे, १-२ से. मी. लंबे एवं अंडाकार आधार के ऊपर रहते हैं। पत्ते—संयुक्त लंबे पत्र दण्ड वाले एवं आधार की तरफ सपंख तथा गुलाबी एवं सीधे काँटों से युक्त होते हैं। पत्रक—५ से ११, भालाकार, न्यूनाधिक दन्तुर, ऊपर से चमकीले एवं नीचे से हल्के रंग के होते हैं। छोटे- छोटे पीले रंग के फूलों के गुच्छे लगते हैं। फल—काली मरिच के समान झुमकों में रहते हैं, किन्तु उनके मुख फटे होते हैं। फलों में सुगन्ध आती है। इन फलों के ऊपर तेलिया राल की गाँठे होती हैं तथा इनके अन्दर कागज के समान परदा रहता है। फल प्रायः खाली रहते हैं किन्तु कभी-कभी उनके अन्दर गोल, काले चमकीले बीज रहते हैं। उत्तर हिन्दुस्तान में इसका व्यवहार किया जाता है। दक्षिण में इसके स्थान पर ले०-झैँ. हेट्सा (Z. rhetsa DC.), हि०- चिरफल, तिरफल, के फल का व्यवहार किया जाता है जो तुंबुरु के फल से बड़े होते हैं। उन पर तेलिया राल की गाँठे तथा अन्दर कागज के समान परदा नहीं रहता। उनका स्वाद चटपटा अकरकरहा के समान एवं गन्ध संतरे के छिलके के समान होती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २५७ रासायनिक संगठन—इसकी छाल में एक कडुवा पदार्थ, उड़नशील तैल और राल रहती है। यह कडुवा पदार्थ दारुहरिद्रा में पाये जाने वाले बर्बेरीन (Berberine) के सदृश होता है। इसके फलों में एक उड़नशील तैल, राल, एक अम्ल पदार्थ और एक रवेदार पदार्थ झैंथ्योक्शाइलिन् (Xanthoxylin) पाया जाता है। यह तैल यूकैलिप्टस् (Eucalyptus) तैल के सदृश गन्ध एवं गुण वाला होता है। गुण और प्रयोग—यह सुगन्धित, उष्ण, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, ग्राही और उत्तेजक है। इसकी क्रिया गन्धबिरोजा तथा यूकैलिप्टस् तेल के समान होती है। इसके छाल की क्रिया दारुहरिद्रा के समान होती है। (१) ज्वर, कुपचन, अतिसार, हैजा एवं मंदाग्नि आदि में इसके मूलत्वक् और फल का फांट उत्तेजक तथा बल्य औषध के रूप में दिया जाता है। (२) दमे में इसका गुडाखू बनाकर धूम्रपान उपयोगी है। (३) गले की सूजन में इसके ताजे पत्तों को पीसकर चावल के आटे के साथ गरम करके बाँधने से लाभ होता है। (४) यह एक अच्छा प्रतिदूषक (Antiseptic) होने के कारण व्रणों के लिये इसके फलों का आन्तरिक तथा बाह्य प्रयोग किया जाता है। इसके मूलत्वक् क्वाथ से व्रण प्रक्षालन से लाभ होता है। (५) इसके फलों का व्यवहार दन्तशूल में किया जाता है। इसकी दातुन दाँतों के लिये अच्छी समझी जाती है एवं छाल तथा फल का दन्तमञ्जनों में प्रयोग किया जाता है। (६) इसका तैल प्रतिदूषक, कीटाणुनाशक तथा दुर्गन्धहर है। मात्रा—फल–२००-५०० मि.ग्रा., छाल–१०-२० ग्रा. फांट बनाकर। ३९. तिरफल सं०–तुंबरु। म०–चिरफल, तिसल। ते०–इरतचै। ता०–राचामम्। क०–जिसुमी मारा। ले०- Zanthoxylum rhetsa DC. (झैंथ्योक्साइलम् रेट्सा) । Fam. Rutaceae (रुटेंसी) । यह मध्यम ऊँचाई का कटीला वृक्ष दक्षिण में विशेषकर कोंकण में होता है। इसके पत्ते—सदलपर्ण एवं मोटी टहनियों के अग्र पर समूहबद्ध होकर रहते हैं। पत्रक—प्रायः १९-२५, तून के सदृश, आयताकार या प्रासवत्, अखण्ड या गोल दन्तुर धार वाले होते हैं। पुष्प—छोटे, पीले, गुच्छों के रूप में। फल—गुच्छों के रूप में, कच्ची अवस्था में हरे तथा बाद में काले से हो जाते हैं। अन्य वर्णन ऊपर तुम्बुरु के साथ दिया गया है। इसके फल तथा जड़ की छाल का प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—तुम्बुरु के समान तैल, राल आदि। गुण और प्रयोग—इसके गुण तुम्बरु के समान हैं। इसके मूलत्वक् की क्रिया दारुहरिद्रा, मझोरियून, चोबेहयात या पीतचम्पक के छाल की तरह होती है। इसकी जड़ सुगन्धित, कड़वी, मूत्रल तथा पौष्टिक है। (१) इसके फल उत्तेजक, ग्राही, दीपन एवं पाचन होते हैं और इनका व्यवहार, आध्मान, कुपचन, अजीर्ण एवं अतिसार आदि में किया जाता है। सड़ी हुई मछलियों के खाने से उत्पन्न अजीर्ण, वमन एवं अतिसार में इसका व्यवहार करते हैं। मछली खाने वालों के लिये यह पाचक है। तिरफल तथा अजवायन का अर्क हैजे में दिया जाता है। आमवात में मधु के साथ इसे खिलाते हैं। (२) मूलत्वक्—शिथिलताजन्य कुपचन में प्रयोग में लाई जाती है। यह मूत्रल होती है। दन्तशूल में तथा लकवा से जिह्वा का कार्य ठीक न होता हो तो इसे चबाने को देते हैं। जीर्ण आमवात में भी इससे लाभ होता है। यह वृष्य, कड़वी और सुगन्धित होती है और फल की तरह भी इसका उपयोग किया जाता है। २० भाव.I

२५८ भावप्रकाशनिघण्टुः मात्रा—बीज निकाले हुए फल का चूर्ण—१२५-२५० मि.ग्रा. मधु के साथ; मूलत्वक् १०-२० ग्रा. फांट बनाकर नित्य एक बार। अथ वंशलोचनस्य नामानि गुणाँश्चाह स्याद्वंशरोचना वांशी तुगाक्षीरी तुगाशुभा । त्वक्क्षीरी वंशजा शुभ्रा वंशक्षीरी च वैणवी ॥११६॥ वंशजा बृंहणी वृष्या बल्या स्वादी च शीतला । तृष्णाकासज्वरश्वासक्षयपित्तास्रकामलाः ॥ हरेत्कुष्ठं व्रणं पाण्डुं कषाया वातकृच्छ्रजित् ।।११७।। वंशलोचन के नाम तथा गुण—वंशरोचना, वांशी, तुगाक्षीरी, तुगा, शुभा, त्वक्क्षीरी, वंशजा, शुभ्रा, वंशक्षीरी और वैणवी ये नाम वंशलोचन के हैं। वंशलोचन—बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), बलकारक, स्वादु, कषाय रसयुक्त और शीतल होता है और यह तृष्णा, कास, ज्वर, श्वास, क्षय, रक्तपित्त, कामला, कुष्ठ, व्रण, पाण्डु, वात तथा मूत्रकृच्छ्र को दूर करता है। [११६-११७] ४०. वंशलोचन हिं०—वंशलोचन, वंशलोचन। बं०—बाँस काबर। म०—वंसलोचन। गु०—वंशकपूर, बाँसकपूर। क०—वंशलोचना, वंशरोचना, वंशरोचना। ते०—तवक्षीरी, तरक्षीरी, वंशलोचनमु। ता०—वंशलोचनम्। फा०—तवासीर, तवासीर। अ०— तवाशीर। अं०—Bamboo Manna (बाम्बू मन्ना)। ले०—Bambusa arundinacia Willd. (बाँबुजा अरूण्डिनेसिया)। Gramineae (ग्रॅमिनी); Syn. Poaceae । बाँस के वृक्ष भारतवर्ष के प्रायः सभी प्रान्तों में उत्पन्न होते हैं, विशेषकर बंगाल की तरफ इसकी खेती होती है। मोटे और दृढ़ बाँस के भीतर एवं बड़े मोटे पोली जाती के पहाड़ी बाँसों के भीतर जिसे नजला बाँस कहते हैं जब सफेद रस सूखकर कंकर के समान बन जाता है, तब इस सफेद कंकरी को वंशलोचन कहते हैं। यह केवल मादा जाति के ही बाँसों में जमता है। बाँसों को काटकर जब फाड़ते हैं तब किसी-किसी बाँस के भीतर से यह निकलता है। कहते हैं कि स्वाती नक्षत्र का जल बांस के भीतर पड़ने से उसमें वंशलोचन उत्पन्न होता है। असली वंशलोचन नीलापन युक्त सफेद रङ्ग का होता है, लकड़ी पर घिसने पर रेशा नहीं उभरता तथा जल में डालने पर पारदर्शक हो जाता है। लेकिन मिट्टी के तेल में डालने पर पारदर्शकता कम हो जाती है। स्वाद में यह फीका होता है। लेकिन आजकल बाजार में प्रायः नकली वंशलोचन ही बिकता है जो देखने में बहुत सुन्दर नीली आभा युक्त बड़े-बड़े कंकड़ों के रूप में होता है। पहले असली वंशलोचन जावा, सिङ्गापुर आदि से आता था। अब तो शायद किसी रासायनिक विधि से यह तैयार करके असली के नाम पर बिका करता है जिसका स्वाद कुछ तीक्ष्ण रहता है। वंशलोचन के अतिरिक्त बाँस के कोमल प्रांकुर, पत्र, गाँठ, बीज तथा मूल का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—वंशलोचन में सिलिका (Silica) ९०% या सिलिसिक् एसिड के हाइड्रेट के रूप में सिलिकम् (Silicum as hydrate of silicic acid), मंडूर (Peroxide of iron), पोटॅश (Potash), चूना, ॲल्युमिनिया (Aluminia) तथा कुछ वानस्पतिक पदार्थ जैसे कोलिन (Colin), बिटेन (Betain), न्यूक्लिएस (Nuclease), यूरिएस (Urease), प्रभुजिन एवं कार्बोज के पाचक किण्व तथा स्नेहविलेयक किण्व (Proteolytic, diastatic and emulsifying enzymes), तथा सायनोजेनिटक् ग्लूकोसाइड (Cyanogenetic glucoside) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। बाँस की राख में सिलिका २८, चूना ४, मॅग्नेशिया ६, पोटॅशियम् ३४, सोडियम् १२, क्लोरीन २, गंधक १० भाग और कुछ जल रहता है। कुछ लोग इसके क्षार को तथा असली वंशलोचन को गरम करके जल में डालते हैं और सूखने पर वंशलोचन के स्थान पर बेचते हैं।

हरीतक्यादिवर्गः २५९ गुण और प्रयोग-(१) वंशलोचन उत्तेजक, ज्वरहर, कफनिःसारक, बल्य, वृष्य, प्यासशमन करने वाला, उद्वेष्ठननिरोधि एवं ग्राही होता है। इससे श्वसनसंस्थान की श्लेष्मलकला को पुष्टि मिलती है तथा कफ की मात्रा कम होती है। इससे बने हुए सितोपलादि चूर्ण का व्यवहार जीर्णज्वर, श्वास, कास, क्षय, मन्दाग्नि, कमजोरी, कफ में खून जाना, दाह, पूयमेह, मूत्रदाह तथा वातविकार एवं सर्पदंश में किया जाता है। ग्राही औषधियों के साथ जीर्ण संग्रहणी तथा आन्तरिक रक्तस्रावों में इसका उपयोग करते हैं। (२) इसकी कोमल गाँठ तथा पत्रों का क्वाथ गर्भाशय संकोचक होता है। इसका उपयोग प्रसूता में आर्तवशुद्धि के लिए एवं अन्य आर्तव विकारों में किया जाता है। (३) इसके कोमलपत्र का उपयोग कफ से खून जाना, कुष्ठ, ज्वर तथा बच्चों के सूत्रकृमि में किया जाता है। (४) इसके प्रांकुर (Shoots) का रस निकाल कर कृमियुक्त घावों पर डाला जाता है तथा बाद में उसका पोल्टिस उन पर बाँध दिया जाता है। जिन लोगों का पाचन ठीक नहीं होता उनको इसके कोमल प्रांकुरों से बने सिरके का उपयोग मांस मछली के साथ उपयोगी होता है। इससे भूख बढ़ती है तथा पाचन भी ठीक होता है। (५) इसकी गाँठों को पीसकर जोड़ों के दर्द पर उसका बन्धन उपयोगी है। (६) इसके बीज को गरीब लोग चावल के रूप में खाते हैं। (७) इसका मूल विस्फोटक व्याधियों (Eruptive affections) में बहुत उपयोगी है तथा दाद पर लाभदायक है। इसके पुष्परस का उपयोग कर्णबिन्दु के रूप में कर्णशूल एवं बाधिर्य आदि में किया जाता है। मात्रा-चूर्ण ½-२ माशा। अथ समुद्रफेनस्य नामानि गुणांश्चाह समुद्रफेनः फेनश्च हिण्डीरोऽब्धिकफस्तथा ॥१९८॥ समुद्रफेनश्चक्षुष्यो लेखनः शीतलश्च सः। कषायो विषपित्तघ्नः कर्णरुक्कफहृत्सरः ॥१९९॥ समुद्रफेन के नाम तथा गुण-समुद्रफेन, फेन, हिण्डीर और अब्धिकफ ये सब नाम 'समुद्रफेन' के हैं। समुद्रफेन-नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, शीतल, कषाय रस युक्त, विष और पित्त का नाशक, कर्णरोग तथा कफ का भी नाशक और यह सारक भी होता है। [१९८-१९९] ४१. समुद्रफेन हिं०-समुद्रफेन, समुन्दरफेन, दर्या का कफ। बं०-समुद्रेर फेना, समुद्रफेला। म०-समुद्रफेण। मा०- समन्दरझाग, पं०-समुन्द्रझाग, समुद्रझाग। गु०-समुद्रफिण। क०-समुद्रनालिगे। मल०, ता०-कड़ल नीरे। ते०-सोरुपेनक, समुद्रपुनुरुगु। फा०-कफदरिया। अ०-जुबदुल्लहेरे, अब्दुल बहेर। अं०-Cuttle Fish Bone (कटिल फिश बोन); Os Sepiae (ऑस् सीपी)। ले०-Sepia officinalis (सेपिया ऑफिसिनॉलिस)। जाति- (Family)-Cephalopoda (सिफैलोपोडा)। वर्ग-(Class)-Mollusca (मोल्यूस्का)। समुद्रफेन यह समुद्र का झाग नहीं है वरन् यह एक समुद्री जीव (मछली) का अस्थिपञ्जर (या कवच) है जो कुछ समय बाद विशेष आकृति का हो जाता है और समुद्र के पानी पर तैरता रहता है। इसके टुकड़े १-३ इञ्च चौड़े और ५-१० इञ्च लम्बे होते हैं। ये लम्बे, चिपटे, आयताकार अथवा अण्डाकार, सफेदी लिये हुये, कठोर तथा भंगुर होते हैं। इसकी बाह्य सतह कई परतों से बनी दिखलाई देती है तथा सुचूर्ण्य होती है। भीतरी सतह कठोर, सुषिर एवं आसानी से टूटने वाली होती है। इसका स्वाद फीका, तीक्ष्ण तथा क्षारीय होता है। रासायनिक संगठन-इसमें कैल्शियम् कार्बोनेट (Calcium Carbonate) ८०-८५% तथा फास्फेट, सल्फेट और सिलिका (Silica) आदि पदार्थ रहते हैं।

२६० भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-इसका आन्तरिक प्रयोग बहुत कम होता है। यह खड़िया के समान अम्लत्व दूर करने वाला तथा ग्राही एवं स्थानिक उपशामक है। (१) इसका सूक्ष्म चूर्ण कर्णस्राव तथा कर्णपीड़ा के लिए कानों में डालते हैं। मुख तथा दाँतों के विकारों में यह दन्तमञ्जन की तरह उपयोग में आता है तथा झाँईं, मुहाँसे, व्यंग तथा चर्म के अन्य विकारों में इसका सूक्ष्मचूर्ण या नीबू के रस के साथ इसका लेप लगाया जाता है। अम्हौरी में गुलाब जल के साथ शरीर पर इसे लगाते हैं। (२) इसका नेत्र रोगों में विशिष्ट स्थान है। लेखन गुण के कारण नेत्रशुक्ल, जाला, धुंध आदि में सुरमा के समान या सुरमा में मिलाकर इसे काम में लाते हैं। वर्त्मदाह में इसे गुलाब जल और सैन्धव के साथ महीन पीसकर आँख में लगाते हैं। (३) कर्णस्राव में इसे तैल में सिद्ध करके उसका उपयोग करते हैं। (४) यद्यपि आयुर्वेद में इसका आंतरिक प्रयोग नहीं दिखाई देता तथापि यह चूने का अच्छा सेन्द्रिय योग है जिसका आन्तरिक उपयोग भी किया जा सकता है। मात्रा-२ से ८ रत्ती। अथाष्टवर्गस्य लक्षणगुणानाह जीवकर्षभकौ मेदे काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके ।।१२०।। अष्टवर्गोऽष्टभिर्द्रव्यैः कथितश्चरकादिभिः ।।१२१।। अष्टवर्गो हिमः स्वादुर्बृंहणः शुक्रलो गुरुः। भग्नसन्धानकृत्कामबलासबलवर्द्धनः ।। वातपित्तास्रतृड्दाहज्वरमेहक्षयप्रणुत् ।।१२२।। अष्टवर्ग के लक्षण तथा गुण-जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि और वृद्धि इन सब आठ द्रव्यों को चरकादि मुनिगण 'अष्टवर्ग' नाम से व्यवहार करते हैं। अष्टवर्ग-शीतवीर्य, स्वादिष्ट, बृंहण (धातुवर्धक), शुक्रजनक, विपाक में गुरु, भग्नसन्धानकारक (टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाला), काम, कफ तथा बल को बढ़ाने वाला, वात, पित्त, तृष्णा, दाह, ज्वर, प्रमेह और क्षय रोग को दूर करने वाला होता है। [१२०-१२२] तत्रादौ जीवकर्षभकयोरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह जीवकर्षभकौ ज्ञेयौ हिमाद्रिशिखरोद्भवौ। रसोनकन्दवत्कन्दौ निःसारौ सूक्ष्मपत्रकौ ।।१२३।। जीवकः कूर्चकाकार ऋषभो वृषशृङ्गवत्। जीवको मधुरः शृङ्गो ह्रस्वाङ्गः कूर्चशीर्षकः ।।१२४।। ऋषभो वृषभो धीरो विषाणी द्राक्ष इत्यपि। जीवकर्षभकौ बल्यौ शीतौ शुक्रकफप्रदौ ।। मधुरौ पित्तदाहास्रकाश्यवातक्षयापहौ ।।१२५।। अष्टवर्गान्तर्गत जीवक तथा ऋषभक के उत्पत्ति स्थान, लक्षण, नाम तथा गुण-जीवक और ऋषभक ये दोनों औषधियाँ हिमालय पर्वत के शिखर के ऊपर उत्पन्न होती हैं। इन दोनों के कन्द ठीक लहसुन के कन्द के समान होते हैं और ये निःसार होते हैं तथा पत्ते सूक्ष्म होते हैं। उसमें जीवक का आकार कूँची के समान होता है और ऋषभक बैल के सींग की भाँति होता है। जीवक, मधुर, शृङ्ग, ह्रस्वाङ्ग और कूर्चशीर्षक ये नाम जीवक के हैं। तथा ऋषभ, वृषभ, धीर, विषाणी और द्राक्ष ये नाम ऋषभक के हैं। ये दोनों बलकारक, शीतवीर्य, शुक्र तथा कफ के वर्धक, मधुर रसयुक्त, पित्त, दाह, रक्तदोष, कृशता, वात तथा क्षयरोग को दूर करने वाले होते हैं। [१२३-१२५] अथ मेदामहामेदयोरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह महामेदाऽभिधः कन्दो मोरङ्गादौ प्रजायते ।।१२६।। महामेदा वनीमेदा स्यादित्युक्तं मुनीश्वरैः ।।१२७।।

हरीतक्यादिवर्गः २६१ शुक्लार्द्रकनिभः कन्दो लताजातः सुपाण्डुरः । महामेदाभिधो ज्ञेयो मेदालक्षणमुच्यते ।।१२८।। शुक्लकन्दो नखच्छेद्यो मेदोधातुमिव स्रवेत् । यः स मेदेति विज्ञेयो जिज्ञासातत्परैर्जनैः ।।१२९।। शल्यपर्णी१ मणिच्छिद्रा मेदा मेदाभवाध्वरा । महामेदा वसुच्छिद्रा त्रिदन्ती देवतामणिः ।।१३०।। मेदायुगं गुरु स्वादु वृष्यं स्तन्यकफावहम् । बृंहणं शीतलं पित्तरक्तवातज्वरप्रणुत् ।।१३१।। मेदा और महामेदा के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण-उसमें महामेदा नामक कन्द मोरङ्ग (नेपाल का दक्षिणपूर्वभाग) आदि प्रदेशों में उत्पन्न होता है। महामेदा, वनीमेदा है ऐसा मुनीश्वरों ने कहा है। महामेदा लता से उत्पन्न होती है तथा इसका कन्द पाण्डुवर्ण का, सफेद अदरक के समान होता है। ये महामेदा के लक्षण हुये, अब मेदा के भी लक्षण कहते हैं—जिसके कन्द सफेद हों तथा जिसमें नख से काटने पर मेदधातु के समान एक प्रकार का रस निकलता हो उसे मेदा समझना चाहिये। शल्यपर्णी, मणिच्छिद्रा, मेदा, मेदोभवा और अध्वरा ये नाम मेदा के हैं। महामेदा, वसुच्छिद्रा, त्रिदन्ती और देवतामणि ये नाम महामेदा के हैं। उक्त दोनों प्रकार का मेदा-ये दोनों परिपाक में गुरु, स्वादिष्ट, वीर्यवर्धक, दुग्ध तथा कफ को बढ़ाने वाले, धातुवर्धक, शीतल, पित्त, रक्तसम्बन्धी दोष, वायु तथा ज्वर को दूर करने वाले होते हैं। [१२८-१३१] अथ काकोलीक्षीरकाकोल्योरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह जायते क्षीरकाकोली महामेदोद्भवस्थले ।।१३२।। यत्र स्यात्क्षीरकाकोली महामेदोद्भवस्थले । पीवरीसदृशः कन्दः सक्षीरः२ प्रियगन्धवान् ।।१३३।। सा प्रोक्ता क्षीरकाकोली काकोलीलिङ्गमुच्यते । यथास्यात्क्षीरकाकोली काकोल्यपि तथा भवेत् ।।१३४।। एषा किञ्चिद्भवेत्कृष्णा भेदोऽयमुभयोरपि । काकोली वायसोली च वीरा कायस्थिका तथा ।।१३५।। सा शुक्ला क्षीरकाकोली वयस्था क्षीरवल्लिका । कथिता क्षीरिणी धीरा३ क्षीरशुक्ला पयस्विनी ।।१३६।। काकोलीयुगलं शीतं शुक्लं मधुरं गुरु । बृंहणं वातदाहास्त्रपित्तशोषज्वरापहम् ।।१३७।। काकोली तथा क्षीरकाकोली के उत्पत्तिस्थान, लक्षण नाम तथा गुण—महामेदा के उत्पन्न होने का जहाँ स्थान है, वहीं पर क्षीरकाकोली भी उत्पन्न होती है। और जहाँ पर क्षीरकाकोली उत्पन्न होती है, वहाँ पर काकोली भी होती है। क्षीरकाकोली का कन्द पीवरी (शतावर) के समान होता है और काटने पर उसमें से दूध निकलता है तथा यह प्रिय गन्ध से युक्त होता है। अब काकोली के लक्षण कहते हैं—जिस प्रकार की क्षीरकाकोली होती है उसी प्रकार की काकोली भी होती है। किन्तु दोनों में भेद यह है कि काकोली, क्षीरकाकोली की अपेक्षा कुछ कृष्णवर्ण की होती है। काकोली, वायसोली, वीरा और कायस्थिका ये नाम काकोली के हैं और शुक्ला, क्षीरकाकोली, वयस्था, क्षीरवल्लिका, क्षीरिणी, धीरा, क्षीरशुक्ला और पयस्विनी ये नाम क्षीरकाकोली के हैं। उक्त दोनों प्रकार की काकोली—शीतल, शुक्रवर्धक, मधुर, गुरु, बृंहण (धातुवर्धक), वात, दाह, रक्तपित्त (या रक्तदोष तथा पित्त) शोष और ज्वर की नाशक होती है। [१३२-१३७] अथ ऋद्धिवृद्ध्योरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह ऋद्धिवृद्धिश्च कन्दौ द्वौ भवतः कोशलेऽचले४ । श्वेतलोमान्वितः कन्दोलताजातः सरन्ध्रकः ।।१३८।। स एव ऋद्धिवृद्धिश्च भेदमप्येतयोर्ब्रुवे । तूलग्रन्थिसमा ऋद्धिर्वामावर्त्तफला चसा ।।१३९।। वृद्धिरस्तु दक्षिणावर्त्तफला प्रोक्ता महर्षिभिः । ऋद्धियोग्यं५ सिद्धिलक्ष्म्यौ वृद्धेरप्याह्वया इमे ।।१४०।। ऋद्धिर्बल्या त्रिदोषघ्नी शुक्ला मधुरा गुरुः । प्राणैश्वर्यकरी मूर्च्छारक्तपित्तविनाशिनी ।।१४१।। वृद्धिर्गर्भप्रदा शीता बृंहणी मधुरा स्मृता । वृष्या पित्तास्रशमनी क्षतकासक्षयापहा ।।१४२।। १. 'स्वल्पपर्णी'ति पाठा. । २. 'क्षीरं स्रवति गन्धवानि'ति पाठा. । ३. 'धीरे'ति पाठा. । ४. 'कोशयामले' इति पाठान्तरम् । ५. 'ऋद्धियुग्मं'ति पाठा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA

२६२ भावप्रकाशनिघण्टुः ऋद्धि तथा वृद्धि के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण-ऋद्धि और वृद्धि ये दोनों कन्द कोशल पर्वत में उत्पन्न होते हैं। ऋद्धि का कन्द सफेद रोयें से युक्त, लता से उत्पन्न होने वाला तथा छिद्रों से युक्त होता है और वृद्धि भी इसी प्रकार की होती है, किन्तु इन दोनों का जो परस्पर भेद है उसे अब कहता हूँ—ऋद्धि कपास की गाँठ के समान आकार वाली तथा बायें तरफ से आवर्तशील फल वाली होती है। और वृद्धि—दाहिने तरफ से आवर्तशील फलवाली होती है ऐसा महर्षि लोग कहते हैं। उक्त दोनों प्रकार की ऋद्धि (ऋद्धि-वृद्धि) के योग्य, सिद्धि और लक्ष्मी ये तीन नाम हैं। ऋद्धि-बलकारक, त्रिदोष को दूर करने वाली, शुक्रवर्धक, मधुर रस युक्त, पाक में गुरु और प्राणप्रद, ऐश्वर्यजनक एवं मूर्च्छा और रक्त पित्त को नाश करने वाली होती है। वृद्धि-गर्भजनक, शीतल, बृंहण (धातुवर्धक), मधुर रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), रक्तपित्त को शमन करने वाली, क्षत (उरःक्षतादिक) कास तथा क्षय को दूर करने वाली होती है। [१३८-१४२] राज्ञामप्यष्टवर्गस्तु यतोऽयमतिदुर्लभः । तस्मादस्य प्रतिनिधिं गृह्णीयात्तद्गुणं भिषक् ॥१४३॥ साधारण लोगों को कौन कहे अष्टवर्ग की उक्त औषधियाँ राजाओं को भी दुर्लभ हैं। अतः वैद्य को चाहिये कि वे इसके समान गुण वाली प्रतिनिधि औषधियों को काम में लावें। [१४३] ❖ मुख्यसदृशः = प्रतिनिधिः ॥१४३॥ यहाँ पर 'प्रतिनिधि' पद का 'मुख्य के सदृश' यह अर्थ समझना चाहिये। [१४३] अथाष्टवर्गस्य प्रतिनिधिमाह मेदाजीवककाकोलीऋद्धिद्वन्द्वेऽपि चासति । वरीविदार्यश्वगन्धावाराहींश्चक्रमात् क्षिपेत् ॥१४४॥ अष्टवर्ग की प्रतिनिधि औषधियाँ—दोनों प्रकार की मेदा, दोनों प्रकार के जीवक, दोनों प्रकार की काकोली तथा दोनों प्रकार की ऋद्धि के स्थान में क्रम से शतावर, विदारीकन्द, असगन्ध और वाराहीकन्द इन औषधियों को डालना चाहिये। [१४४] ❖ मेदामहामेदास्थाने शतावरीमूलम् । जीवकर्षभकस्थाने विदारीमूलम् । काकोली क्षीरकाकोलीस्थाने अश्वगन्ध्यामूलम् । ऋद्धिवृद्धिस्थाने वाराहीकन्दं गुणैस्तत्तुल्यं क्षिपेत् । [१४४] यहाँ पर 'मेदा और महामेदा के स्थान में सतावर का मूल, जीवक तथा ऋषभक के स्थान में विदारीकन्द का मूल, काकोली तथा क्षीरकाकोली के स्थान में असगन्ध का मूल एवं ऋद्धि तथा वृद्धि के स्थान में वाराही कन्द को गुणों में पूर्वोक्त औषधियों के समान समझकर डालें' ऐसा समझना चाहिये। [१४४] ४२. अष्टवर्ग नाम । उत्पत्तिस्थान । सामान्यरूप । परस्पर पार्थक्य । शा. प्रतिनिधि १. जीवक । हिमालय पर्वत शिखर । कन्द-रसोन के समान पत्र-सूक्ष्म, सारहीन । कूँची के समान । विदारीकन्द २. ऋषभक । ” । ” । बैल के सींग के समान । ” ३. मेदा । मोरङ्ग (नेपाल का दक्षिण-पूर्व भाग । कन्द-मेद के सदृश स्राव नख से छेद्य । शुक्लवर्ण । शतावरी मूल

हरीतक्यादिवर्गः २६३ ४. महामेदा ” कन्द-शुक्ल आर्द्रक पाण्डुरवर्ण ” के समान, लताजात ५. काकोली ” कन्द-शतावरी सदृश अधिक कृष्णवर्ण अश्वगंधा का सक्षीर मूल ६. क्षीर- ” सुगन्धयुक्त कम कृष्णवर्ण ” काकोली ७. ऋद्धि कोशलपर्वत कन्द-श्वेतलोमयुक्त कपास की गाँठ वाराहीकन्द लताजात के समान, वामा- छिद्रयुक्त वर्तफल ८. वृद्धि ” ” दक्षिणावर्तफल ” इस समय अष्टवर्ग की कोई भी औषधि सच्ची नहीं मिलती है। यों तो अष्टवर्ग के बेचनेवाले कितनी फर्में हो गयी हैं, इनमें 'अष्टवर्ग कार्यालय देहरादून' प्रसिद्ध है परन्तु अष्टवर्ग के देखने और शास्त्रों से मिलान करने से कोई भी असली नहीं सिद्ध होती। अष्टवर्ग के अभाव में मेदा-महामेदा की जगह शतावर, जीवक-ऋषभक की जगह विदारीकन्द, ककोली-क्षीरकाकोली की जगह असगन्ध और ऋद्धि-वृद्धि की जगह वाराहीकन्द डालने को कहा गया है। परन्तु आजकल के कतिपय विद्वान् वैद्य शतावर, विदारीकन्द, असगन्ध और वाराहीकन्द को अष्टवर्ग का प्रतिनिधि नहीं मानते। क्योंकि इनमें अष्टवर्ग का अत्यन्त न्यून गुण पाया जाता है। इसलिए अष्टवर्ग की जगह निम्नाङ्कित औषधियाँ देना उत्तम बतलाते हैं। जीवक अभाव में बहमन सफेद या गुडूची ऋषभक ” बहमन लाल या लम्बा सालव या वंशलोचन मेदा ” सालमिश्री महामेदा ” शकाकुल मिश्री या प्रसारिणी काकोली ” काली मूसली क्षीरकाकोली ” श्वेत मूसली ऋद्धि ” चिड़िया कन्द या बला या उटङ्गण के बीज वृद्धि ” सालव पंजा या महाबला या बीजबंद अथ यष्टीमधुनामगुणानाह यष्टीमधु तथा यष्टीमधुकं क्लीतकं तथा। अन्यत्क्लीतनकं तत्तु भवेत्तोये मधूलिका ।। १४५।। यष्टी हिमा गुरुः स्वाद्वी चक्षुष्या बलवर्णकृत्। सुस्निग्धा शुक्रला केश्या स्वर्या पित्तानिलास्रजित्। व्रणशोथविषच्छर्दितृष्णाग्लानिक्षयापहा ।। १४६ ।। मुलहठी के नाम तथा गुण—यष्टीमधु, यष्टीमधुक और क्लीतनक ये सब मुलहठी के नाम हैं। और अन्य प्रकार की भी एक मुलहठी होती है जो कि जल में उत्पन्न होती है जिसका नाम 'मधूलिका' है। मुलहठी—शीतवीर्य, गुरु, मधुररसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, बलकारक तथा वर्ण को सुन्दर करने वाली, सुस्निग्ध, वीर्यजनक, केशों के लिये हितकर, स्वर को सुधारने वाली, पित्त, वात तथा रक्त के प्रकोप को शमन करने वाली, व्रण, शोथ, विष, वमन, प्यास, ग्लानि तथा क्षय रोग को दूर करने वाली होती है। [१४५-१४६] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

२६४ भावप्रकाशनिघण्टुः ४३. यष्टीमधु हिं०-मुलहठी, मुलेटी, मुलेठी, मीठी लकड़ी, जेठीमध । बं०-यष्टिमधु । म०-जेष्टिमध । गु०-जेठीमध । क०-जेष्ठमधु । ते०-यष्टिमधुकम । पं०-मुलेटी । मा०-मलहठी । ता०-अतिमधुरं । फा०-आसरेहमहक, बिखेमहक । अ०-असलुसूस । अं०-Liquorice Root (लिकोरिस् रूट) । ले०-Glycyrrhiza glabra, Linn. (ग्लिस्रहाइझा ग्लैंब्रा, लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । इसका क्षुप अरब, फारस की खाड़ी, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान एवं साइबेरिया आदि स्थानों में उत्पन्न होता है । इसकी उपज पञ्जाब तथ चेनाव से लेकर पेशावर आदि हिमालय के निचले हिस्से में तथा अंडमान द्वीप एवं वर्मा में होती है । बलूचिस्तान तथा चित्रााल में भी यह उत्पन्न होता है। काश्मीर में वरमूला घाटी में इसको उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त हुई है । इसका क्षुप २-४ फुट ऊँचा होता है। पत्रक-छोटे, ४ से ७ जोड़े, आयताकार से चौड़ाई लिये हुए मालाकार; अपरिमित सदण्डिक पुष्प व्यूह; पुष्प-बैंगनी वर्ण के, लगभग १/२ इञ्च लम्बे; फली-छोटी, बारीक, १/२-१ इञ्च लम्बी, चिपटी; बीज-बहुतया २-३ होते हैं । इसकी जड़ तथा भौमिक तने को सुखा कर छाल सहित अथवा छाल निकालकर बाजार में मुलेटी के नाम से बेचा जाता है। ये लम्बे टुकड़े, पीताभ बादामी रंग के झुर्रीदार होते हैं तथा छाल निकाले हुये हलके पीले रंग के रेशेदार होते हैं। इनमें एक प्रकार की हल्की गन्ध तथा स्वाद मीठा होता है । स्थान भेद से इसकी अन्य जातियाँ होती हैं जिनके स्वाद में अन्तर रहता है। यूनानी मत से ३ प्रकार की मुलेठी मानी गई है जिसमें से मिश्र की उत्तम, अरब की मध्यम तथा तुरुष्क वा फारस की अधम होती है जो उत्तरोत्तर कम मीठी होती हैं । रासायनिक संगठन-इसमें एक सफेद, मीठा, रवेदार पदार्थ ग्लिसहाइज्जिन् (Glyoyrrhizin) ५-१०% पाया जाता है जिसमें ग्लिसहाइजिक् एसिड (Glycyrrhizic acid) से बने चूना तथा पोटैशियम् (Potassium) के लवण होते हैं । यह एसिड भी शुभ्र रवेदार होता है तथा इसका द्रवणांक २५° श० होता है। यह चीनी से ५० गुना अधिक मीठा होता है। गरम जल में ग्लिसहाइज्जिन् का बना घोल ठंडा होने पर गाढ़ा हो जाता है। इसके अतिरिक्त मुलेठी में ५-१०% शर्करा, ३०% स्टार्च, प्रभुजिन, स्नेह, राल एवं अॅस्पराजिन् (Asparagin) करीब १% होता है। गुण और प्रयोग-मुलेठी मधुर, शीतल, स्नेहन, बल्य, वृष्य, रसायन, कफशामक, स्वर्य, नेत्र्य, मूत्रजनन, स्तन्यवर्धक, शोथहर एवं व्रणरोपक गुणों से युक्त होती है। (१) इसमें स्नेहन तथा सौम्य कफ निःसारक गुण होने के कारण इसका मुख्य उपयोग स्वरभंग, कास, श्वसनिका शोथ एवं गलशोथ आदि में किया जाता है। इसके लिये इसके टुकड़े को मुख में रख कर चूसने को दिया जाता है तथा तीसी के साथ इसके क्वाथ का उपयोग किया जाता है। (२) मीठी होने के कारण क्वाथों को मधुर बनाने के लिये तथा अनेक औषधियाँ जैसे सनाय, एलुवा आदि को सुस्वादु बनाने के लिये तथा खाँसी के लिये चूसने की गोलियों में इसका उपयोग करते हैं। इसके चूर्ण का उपयोग गोली बनाने में सहायक द्रव्य के रूप में व्यवहार में आता है । (३) मूत्र मार्ग के प्रक्षोभ में यह बहुत उपयोगी है। इससे पेशाब की जलन दूर होती है। (४) अम्लपित्त में इसके उपयोग से आमाशयिक अम्ल कम होकर शूल दूर होता है। (५) चीन में इसका व्यवहार रसायन औषधि की दृष्टि से बहुत किया जाता रहा तथा अपने यहाँ भी इसे रसायन, -बल्य तथा शुक्रल मानते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २६५ (६) इसका सत्त्व रब्बेसूस, जो काले रंग का तथा मीठा होता है का व्यवहार खाँसी एवं गले की तकलीफ आदि में चूसने के लिए किया जाता है। (७) सुश्रुत में 'सर्वोपघातशमनीय' योग में इसका अन्तर्भाव किया गया है। इस प्रकार सभी प्रकार के अभिघातों से उत्पन्न लक्षणों में इसका प्रयोग उत्तम माना गया है। (८) इसका उपयोग क्षतक्षीण, रक्तवमन, हृद्रोग एवं अपस्मार आदि में भी किया जाता है। दूध अथवा घृत और मधु के साथ इसको देना चाहिये। (९) घृत के साथ इसके कल्क का प्रयोग घावों पर लगाने के लिये उपयोगी है। भिलावे से यदि त्वक्शोथ हो गया हो तो मुलेठी और तिल को दूध में पीस कर लेप करने से लाभ होता है। मात्रा-चूर्ण-१/४ माशा। अथ काम्पिल्लस्य नामगुणानाह काम्पिल्लः कर्कशश्चन्द्रो रक्ताङ्गो रोचनोऽपि च॥ काम्पिल्लः कफपित्तास्रकृमिगुल्मोदरव्रणान्। हन्ति रेची कटूष्णाश्च मेहानाहविषाश्मनुत् ॥१४७॥ कबीला के नाम तथा गुण-काम्पिल्ल, कर्कश, चन्द्र, रक्ताङ्ग और रोचन ये नाम कबीला के हैं। कबीला- कफ, रक्तपित्त, कृमि, गुल्म, उदररोग एवं व्रण (घाव) को दूर करता है। तथा यह रेचक (दस्तावर), कटु रस युक्त और उष्णवीर्य है। एवं प्रमेह, आनाह, विष तथा पथरी को नष्ट करने वाला होता है। [१४७] ४४. कम्पिल्ल (कबीला) हिं०-कबीला, कमीला, काम्बीला। बं०-कमिला, कमलागुरी। म०-शेन्द्रि कपिला। गु०-कपीलो। क०- वसारे, चन्द्रहिट्टू। पं०-कमल। ते०-कुम्कुम। ता०-कपिला रङ्ग, कपिला पोडि। मला०-पोनागम। फा०- कम्बिलाय, कमीलह, कम्बेला। अ०-कम्बील, किम्बील, वार्स। अं०-Kamala (कमला)। ले०-Mallotus philippinensis, Muell-Arg. (मॅल्लोटस् फिलिपाइनेन्सिस, मुएल-आर्ग.)। Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बिएसी)। यह प्रायः सब गरम प्रान्तों में हिमालय पहाड़ के नीचे से पूरब की ओर सिन्ध से दक्षिण, बंगाल, ब्रह्मा, सिंगापुर, सिलोन एवं मलाया द्वीप समूह आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसका सदा हरित वृक्ष-मध्यमाकार का २५-३० फीट तक ऊँचा होता है। छाल-चौथाई इंच मोटी, खाकी रङ्ग की फटी सी और भीतर से लाल दिखाई पड़ती है। पत्ते-गूलर के पत्तों के समान ३ से ९ इञ्च तक लम्बे, अंडाकार, नोकदार, विषमवर्ती और निम्न पृष्ठ रोमश रक्ताभ होते हैं। कार्तिक से पूस तक फूल, फल आते हैं और उष्णकाल में फल पकते हैं। फूल-छोटे-छोटे भूरापन युक्त लाल रङ्ग के आते हैं। फल-त्रिदल आकार में झरबेर के समान और पकने पर लाल रवेदार रज से ढका रहता है। इसी लाल रज को कबीला कहते हैं। बीज-चिकने, गोल और काले होते हैं। 'कबीला वायविडङ्ग की रज का नाम है' यह कहना भ्रमात्मक है। कबीला के बीजों को कहीं-कहीं वायविडङ्ग की जगह व्यवहार में लाते हैं जो अनुचित है। वास्तव में वायविडङ्ग और कबीले के वृक्ष एक नहीं, दो भिन्न-भिन्न हैं। इस वृक्ष के फलों के ऊपर के पराग (ग्रन्थि तथा रोम) को कबीला कहते हैं। फल पक जाने पर उनको कपड़े में डालकर अथवा हाथ से रगड़ कर इसे अलग करते हैं। इस लाल बदामी रंग की बुकनी में न तो स्वाद होता है न

? Or ? Wait, it's ! Look at the foot of that digit: it has a horizontal foot! But wait, does have a foot? Yes, in Devanagari,has a horizontal base:. Wait, is the digit before a? Yes, look at the base: it has a little horizontal foot going right. Wait, what is before it? ! Wait, is there a hyphen between and२०? Look between and: there is a tiny mark, or a space? It looks like ५-२०where the hyphen didn't print or is extremely faint, or simply५ २०. Let's type ५ २०or५-२०? If there's a space, let's keep ५ २०. Line 32: पुनः दें। Line 33:अथारग्वधस्य (धानबहेरा, अमलतास) नामगुणानाह Line 34:आरग्वधो राजवृक्षः शम्पाकश्चतुरङ्गुलः। आरेवतो व्याधिघातः कृतमालः सुवर्णकः ।।१४८।। Line 35:कर्णिकारो दीर्घफलः स्वर्णाङ्गः स्वर्णभूषणः । आरग्वधोगुरुः स्वा

ज्वरहृद्रोगपित्तास्रवातोदावर्त्तशूलनुत् । तत्फलं स्रं सनं रुच्यं कुष्ठपित्तकफापहम् ।। ज्वरे तु सततं पथ्यं कोष्ठशुद्धिकरं परम् ।। १५० ।। अमलतास (धनबहेरा) के नाम तथा गुण—आरग्वध, राजवृक्ष, शम्पाक, चतुरङ्गुल, आरवेत, व्याधिघात, कृतमाल, सुवर्णक, कर्णिकार, दीर्घफल, स्वर्णाङ्ग और स्वर्णफल ये नाम अमलतास के हैं । अमलतास—गुरु, मधुर, शीतल और उत्तम रेचक है । यह ज्वर, हृद्रोग, रक्तपित्त, वायु, उदावर्त्त और शूल को दूर करता है । अमलतास का फल—मृदु रेचक, रुचिकारक, कुष्ठ, पित्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है । यह ज्वर में सदा हितकर होता है एवं कोष्ठ को अत्यन्त शुद्ध करने वाला होता है । [१४८-१५०]

४५. आरग्वध (अमलतास) हिं०—अमलतास, सोनहाली । बं०—सोन्दाली, सोनालु, बन्दर लाठी । म०—बाहवा । क०—कक्केमर । ते०— रेलचेट्टु । गु०—गरमाली । पं०—अमलतास, करङ्गल, कनियार । ता०—कोत्रेमरं, शरकोन्ने, कोरैकाय । फा०— ख्यारेचम्बर । अ०—ख्यारे शम्बर, ख्यारशम्बर । अं०—Pudding Pipe Tree (पुडिंग पाइप ट्री) या Indian Laburnum (इण्डियन लॅवर्नम्), या Purging Cassia (पर्जिंग केशिया) । ले०—Cassia fistula, Linn. (केशिया फिस्टुला, लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है । इसका वृक्ष—मध्यमाकार का होता है, किन्तु कहीं-कहीं बड़े वृक्ष भी देखने में आते हैं। लकड़ी बहुत मजबूत होती है । १२ से १८ इञ्च तक की लम्बी-लम्बी सींकों पर ४ से ८ जोड़े पत्ते लगते हैं जो १।। से ३।। इञ्च तक लम्बे, अण्डाकार होते हैं । १०-२० इञ्च तक की लम्बी टहनियों पर सुनहले चमकीले पीले-पीले रङ्ग के पाँच-पाँच दल वाले फूलों के घनहरे लगते हैं, जो चैत के अन्त से ज्येष्ठ तक वृक्षों को सुशोभित करते हैं। जेठ में पतली सलाई के समान हरी-हरी फलियाँ निकल कर वर्षा के अन्त तक १-२ फीट लम्बी १ इञ्च तक मोटी हरी-हरी फलियाँ लटकती दिखाई पड़ती हैं । फिर हेमन्त के अन्त से काला रूप धारण करके वसन्त में पक जाती हैं । फलियों के भीतर पुरानी चवन्नी बराबर गोल-गोल पतले-पतले काले रस से लिपटे हुए परत रहते हैं और परतों के बीच सिरस के बीज के समान बीज होते हैं । रासायनिक संगठन—अमलतास के गूदे में गोंद, पेक्टिन (Pectin), रंजक पदार्थ, शर्करा, अल्प मात्रा में एक मधुगंधि उड़नशील तैल तथा हाइड्रोक्सिमेथिल्-अन्थ्राँक्विनोन् (Hydroxymethyl-anthraquinone) आदि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग—(१) अमलतास की गुद्दी आनुलोमिक, दाहशामक एवं वेदना स्थापक है । यह मृदु विरेचनों में सर्वश्रेष्ठ है । इसका प्रयोग ज्वरावस्था में सुकुमार, बाल, गर्भिणी एवं कोमल प्रकृति की नारियों में किया जाता है । मृदु विरेचन के लिये इसके स्वतंत्र प्रयोग की अपेक्षा सनाय के साथ बनाया हुआ अवलेह (Confectio seana) अधिक अच्छा है जिससे मरोड़, हल्लास, शूल, आध्मान आदि नहीं होते जो स्वतन्त्र प्रयोग में अधिक मात्रा में लेने से होते हैं । इससे बनी गुलकन्द का भी व्यवहार किया जाता है । रक्त की उष्णता बढ़ने पर अथवा मल संचय होकर वातरक्त एवं आमवात आदि रोग उत्पन्न होने पर विरेचन के लिये इसका उपयोग करते हैं। जिन्हें कब्जियत की शिकायत हमेशा रहती है उन्हें अल्प मात्रा में इसे बराबर सेवन कराया जाता है । अधिक दिन प्रयोग से मूत्र का रंग गहरे बादामी रंग का हो जाता है । ज्वर में अथवा मधुमेह में विरेचन की आवश्यकता हो तो इसका उपयोग कर सकते हैं। कॉफी के सत्व में इसकी मिलावट की जाती है । इसका लेप आमवात, वातरक्त एवं व्रणशोथ आदि पर किया जाता है ।

२६८ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) इसके बीज वामक होते हैं तथा ५-७ बीजों का चूर्ण वमन के लिये दिया जाता है । (३) इसकी छाल के क्वाथ से कवल करने से गले की गाँठों की सूजन कम होती है । (४) इसके पत्तों का रस अर्दित में पिलाया जाता है तथा जिस अंग का घात हुआ हो वहाँ इससे मला जाता है । दाद तथा भिलावें की सूजन पर इसके लगाने से लाभ होता है । (५) इसकी मूल तीव्र विरेचक एवं ज्वरहर होती है । मात्रा-गुद्दी ४/८ माशा । अथ कटुकाया नामगुणानाह कट्वी तु कटुका तिक्ता कृष्णभेदा कटम्भरा९ ।। अशोका मत्स्यशकला चक्राङ्गी शकुलादनी ।। मत्स्यपित्ता काण्डरुहा रोहिणी कटुरोहिणी ।। १५१ ।। कट्वी तु कटुका पाके तिक्ता रूक्षा हिमा लघुः । भेदिनी दीपनी हृद्या कफपित्तज्वरापहा ।। प्रमेहश्वासकासास्रदाहकुष्ठक्रिमिप्रणुत् ।। १५२ ।। कुटकी के नाम तथा गुण-कट्वी, कटुका, तिक्ता, कृष्णभेदा, कटम्भरा, अशोका, मत्स्यशकला, चक्राङ्गी, शकुलादनी, मत्स्यपित्ता, काण्डरुहा, रोहिणी और कटुरोहिणी ये सब कुटकी के नाम हैं । कुटकी-तिक्त रसयुक्त, परिपाक में कटु रसयुक्त, रूक्ष, शीतल, लघु, मल को भेदन करने वाली, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकर, कफ, पित्तज्वर, प्रमेह, श्वास, रक्त दोष, दाह, कुष्ठ तथा कृमि का नाश करने वाली होती है । [१५१-१५२] ४६. कुटकी हिं०-कुटकी, कटुकी, कटुका बं०-कटकी । म०-केदारकडू, काली कुटकी । गु०-बालकडू, कडू । ते०- कटुकुरोणी । क०-कटुक रोहणी, कटुकुरोहिनी । ता०- कटुकु रोगणी । फा०-खर्बकै हिन्दी । अ०-सर्वके अस्वद, खानेखस्वैल । अं०- Picrorhiza (पिक्रोहाइझा) । ले०-Picrorhiza kurroa Royle ex Benth. (पिक्रोहाइझा कुर्रों) । Fam. Scrophulariaceae (स्क़्रोफ्युलॅरियासी) । यह हिमालय पहाड़ की ९०००-१५००० फीट ऊँची चोटियों पर काश्मीर से सिक्कम तक बहुत उत्पन्न होती है । इसका क्षुप-रोमश होता है । इसका भामिक तना बहुवर्षायु, छोटी उँगली के समान मोटा एवं ६ से १०- १२ इञ्च तक लम्बा होता है । पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, सुवाकार, जड़ की ओर संकुचित, आगे की ओर चौड़े, किञ्चित् चिकने और कटे हुए झालदार किनारे वाले होते हैं । क्षुप के बीच से एक डण्डी निकलती है जिसके अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं । फूल-नीले या सफेद रङ्ग के आते हैं । फली-चौथाई इञ्च की होती है । कुटकी इस क्षुप के मूल (भौमिकत ने-Rhizome) को कहते हैं । यह १ से २ इञ्च लम्बे, कपिश लोहबान की तरह रंग वाले, खुरदरे एवं मुड़े हुए टुकड़े होते हैं । इन पर छोटी-छोटी चक्राकार गाँठें तथा गिरे हुए पत्तों एवं मूल के निशान रहते हैं । यह एक तरफ मोटी तथा दूसरी तरफ पतली होती है तथा इसमें एक प्रकार की हल्की गन्ध होती है । इसका स्वाद अत्यन्त कड़ुवा होता है । रासायनिक संगठन-इसमें पिक्रोह्राइझिन् (Picrorhizin) नामक एक कड़ुआ रवेदार मधुमेय (Glycoside) २६.६% पाया जाता है, जिसका उदांशन (Hydrolysis) होने पर पिक्रोह्रीझेटिन् (Picrohizetin) एवं एक प्रकार की मधु शर्करा (Dextrose) प्राप्त होती है । यह मधुमेय जल, मद्यसार, एसिटोन (Acetone) और एथिल् ऑसिटेट्

हरीतक्यादिवर्गः २६९ (Ethyl acetate) में घुलनशील एवं क्लोरफॉर्म (Chloroform), बेंझिन (Benzene) और ईथर (Ether) में अघुलनशील होता है यह अत्यन्त जलग्राही (Hygroscopic) होता है। इसके अतिरिक्त इसमें मधुशर्करा, मोम एवं कॅथर्टिक् ऑसिड् (Cathartic acid) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह एक उत्तम कडुआ पौष्टिक, दीपक, पाचक, पित्तविरेचक और नियतकालिक ज्वरहर है। इसकी क्रिया आंत्र एवं यकृत् पर होती है यह अल्प मात्रा में संस्रन तथा अधिक मात्रा में विरेचक होती है। जेन्शियन की तरह तिक्त पौष्टिक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। इसका गुण इन्द्रायण के सदृश होता है। इसका उपयोग नियतकालिकज्वर, शीतज्वर, कामला, पांडु, यकृत् विकार, श्वास, कुपचन, हृद्रोग, संग्रहणी, आन्त्र की शिथिलता तथा बच्चों के कृमि विकारों में किया जाता है। (१) पुनरावर्तित ज्वरों में इससे अच्छा लाभ होता है लेकिन इसको अधिक मात्रा में (३-४ माशा) देना पड़ता है। अविशिष्ट स्वरूप के सभी पुराण मन्द ज्वरों में, विशेषकर विबन्धयुक्त ज्वर में, इससे अच्छा लाभ होता है। इससे ज्वर जनित दाह की शान्ति होती है। (२) हृदय के ऊपर इसकी क्रिया डिजिटॅलिस् की तरह होती है। हृदय की अकार्य क्षमता जनित यकृत् वृद्धि एवं उदरशोथ में इसको अधिक मात्रा में क्वाथ के रूप में देने से पतले दस्त होकर लाभ होता है तथा हृदय को बल प्राप्त होता है। (३) आरोग्यवर्धिनी गुटिका में इसकी आधी मात्रा रहती है। मात्रा—चूर्ण ५-१० रत्ती। जीर्णज्वर में—३-४ माशा। प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण—(क) कुटकी के ही नाम से जेन्शियाना कुरों (Gentiana korroo, Royle; Fam. Gentianaceae) के मूल जिन्हे 'करू' कहा जाता है, बेचे जाते हैं। ये बाह्य स्वरूप में कुटकी के ही समान दिखलाई देते हैं, लेकिन दोनों की सूक्ष्म रचना में भेद होता है। इनके अनुप्रस्थ विच्छेद (Transverse section) में अन्तर स्पष्ट दिखलाई देता है। जें० कुरों में रसारोहण नलिका (Vessel) के कोष्ठावरणों की वृद्धि से उत्पन्न मोटाई, चक्राकार (Annular) या सीढ़ी के डण्डों की तरह मोटी रेखाकार (Scalariform) होती है, लेकिन कुटकी (P. kurroa) में यह मोटाई बिन्दुमय (Pitted) होती है। कुटकी (P. kurroa) में मूल के मध्य भाग में रहने वाले कोष्ठ जिन्हें पिथकोष्ठ (Pith cells) कहा जाता है, वे बिन्दुमय आवरण (Pitted walled) वाले होते हैं लेकिन ये कोष्ठ जे० कुरों में अनुपस्थित रहते हैं। गुण धर्म की दृष्टि से भारतीय जे० कुरों विदेशी जेन्शियाना का अच्छा प्रतिनिधि समझा जाता है। (ख) जे० कुरों के अतिरिक्त इसमें एक तीक्ष्ण औषधि ले०—Helleborus niger Linn. (हेलीबोरस् नाइगर्) मिली हुई रहती है, जिसको पहचानना आवश्यक है। इसके टुकड़े १ से ३ इन्च लंबे और १/४ इन्च से कम मोटे होते हैं। बाह्य पृष्ठ चिकना, टूटे हुवे मूल के निशानों से युक्त एवं हलके रंग का होता है। यह टुकड़े बहुत हलके तथा दो अंगुलियों के बीच नख से दबाने पर दब जाने वाले होते हैं। ४६. (क) करू सं०—त्रायमाण, हिं०, बं०—करू, कुटकी। पं०—कमल फूल, नीलकंठ। बम्ब०—पाषाणभेद, जिंतीयाण। अं०—Indian Gentian (इण्डियन् जेन्शियन)। ले०—Gentiana kurroo Royle (जॅन्शियाना कुरों)। Fam. Gentianaceae (जेन्शियानेंसी)।