भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २६३ ४. महामेदा ” कन्द-शुक्ल आर्द्रक पाण्डुरवर्ण ” के समान, लताजात ५. काकोली ” कन्द-शतावरी सदृश अधिक कृष्णवर्ण अश्वगंधा का सक्षीर मूल ६. क्षीर- ” सुगन्धयुक्त कम कृष्णवर्ण ” काकोली ७. ऋद्धि कोशलपर्वत कन्द-श्वेतलोमयुक्त कपास की गाँठ वाराहीकन्द लताजात के समान, वामा- छिद्रयुक्त वर्तफल ८. वृद्धि ” ” दक्षिणावर्तफल ” इस समय अष्टवर्ग की कोई भी औषधि सच्ची नहीं मिलती है। यों तो अष्टवर्ग के बेचनेवाले कितनी फर्में हो गयी हैं, इनमें 'अष्टवर्ग कार्यालय देहरादून' प्रसिद्ध है परन्तु अष्टवर्ग के देखने और शास्त्रों से मिलान करने से कोई भी असली नहीं सिद्ध होती। अष्टवर्ग के अभाव में मेदा-महामेदा की जगह शतावर, जीवक-ऋषभक की जगह विदारीकन्द, ककोली-क्षीरकाकोली की जगह असगन्ध और ऋद्धि-वृद्धि की जगह वाराहीकन्द डालने को कहा गया है। परन्तु आजकल के कतिपय विद्वान् वैद्य शतावर, विदारीकन्द, असगन्ध और वाराहीकन्द को अष्टवर्ग का प्रतिनिधि नहीं मानते। क्योंकि इनमें अष्टवर्ग का अत्यन्त न्यून गुण पाया जाता है। इसलिए अष्टवर्ग की जगह निम्नाङ्कित औषधियाँ देना उत्तम बतलाते हैं। जीवक अभाव में बहमन सफेद या गुडूची ऋषभक ” बहमन लाल या लम्बा सालव या वंशलोचन मेदा ” सालमिश्री महामेदा ” शकाकुल मिश्री या प्रसारिणी काकोली ” काली मूसली क्षीरकाकोली ” श्वेत मूसली ऋद्धि ” चिड़िया कन्द या बला या उटङ्गण के बीज वृद्धि ” सालव पंजा या महाबला या बीजबंद अथ यष्टीमधुनामगुणानाह यष्टीमधु तथा यष्टीमधुकं क्लीतकं तथा। अन्यत्क्लीतनकं तत्तु भवेत्तोये मधूलिका ।। १४५।। यष्टी हिमा गुरुः स्वाद्वी चक्षुष्या बलवर्णकृत्। सुस्निग्धा शुक्रला केश्या स्वर्या पित्तानिलास्रजित्। व्रणशोथविषच्छर्दितृष्णाग्लानिक्षयापहा ।। १४६ ।। मुलहठी के नाम तथा गुण—यष्टीमधु, यष्टीमधुक और क्लीतनक ये सब मुलहठी के नाम हैं। और अन्य प्रकार की भी एक मुलहठी होती है जो कि जल में उत्पन्न होती है जिसका नाम 'मधूलिका' है। मुलहठी—शीतवीर्य, गुरु, मधुररसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, बलकारक तथा वर्ण को सुन्दर करने वाली, सुस्निग्ध, वीर्यजनक, केशों के लिये हितकर, स्वर को सुधारने वाली, पित्त, वात तथा रक्त के प्रकोप को शमन करने वाली, व्रण, शोथ, विष, वमन, प्यास, ग्लानि तथा क्षय रोग को दूर करने वाली होती है। [१४५-१४६] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA