भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 313

२६२ भावप्रकाशनिघण्टुः ऋद्धि तथा वृद्धि के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण-ऋद्धि और वृद्धि ये दोनों कन्द कोशल पर्वत में उत्पन्न होते हैं। ऋद्धि का कन्द सफेद रोयें से युक्त, लता से उत्पन्न होने वाला तथा छिद्रों से युक्त होता है और वृद्धि भी इसी प्रकार की होती है, किन्तु इन दोनों का जो परस्पर भेद है उसे अब कहता हूँ—ऋद्धि कपास की गाँठ के समान आकार वाली तथा बायें तरफ से आवर्तशील फल वाली होती है। और वृद्धि—दाहिने तरफ से आवर्तशील फलवाली होती है ऐसा महर्षि लोग कहते हैं। उक्त दोनों प्रकार की ऋद्धि (ऋद्धि-वृद्धि) के योग्य, सिद्धि और लक्ष्मी ये तीन नाम हैं। ऋद्धि-बलकारक, त्रिदोष को दूर करने वाली, शुक्रवर्धक, मधुर रस युक्त, पाक में गुरु और प्राणप्रद, ऐश्वर्यजनक एवं मूर्च्छा और रक्त पित्त को नाश करने वाली होती है। वृद्धि-गर्भजनक, शीतल, बृंहण (धातुवर्धक), मधुर रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), रक्तपित्त को शमन करने वाली, क्षत (उरःक्षतादिक) कास तथा क्षय को दूर करने वाली होती है। [१३८-१४२] राज्ञामप्यष्टवर्गस्तु यतोऽयमतिदुर्लभः । तस्मादस्य प्रतिनिधिं गृह्णीयात्तद्गुणं भिषक् ॥१४३॥ साधारण लोगों को कौन कहे अष्टवर्ग की उक्त औषधियाँ राजाओं को भी दुर्लभ हैं। अतः वैद्य को चाहिये कि वे इसके समान गुण वाली प्रतिनिधि औषधियों को काम में लावें। [१४३] ❖ मुख्यसदृशः = प्रतिनिधिः ॥१४३॥ यहाँ पर 'प्रतिनिधि' पद का 'मुख्य के सदृश' यह अर्थ समझना चाहिये। [१४३] अथाष्टवर्गस्य प्रतिनिधिमाह मेदाजीवककाकोलीऋद्धिद्वन्द्वेऽपि चासति । वरीविदार्यश्वगन्धावाराहींश्चक्रमात् क्षिपेत् ॥१४४॥ अष्टवर्ग की प्रतिनिधि औषधियाँ—दोनों प्रकार की मेदा, दोनों प्रकार के जीवक, दोनों प्रकार की काकोली तथा दोनों प्रकार की ऋद्धि के स्थान में क्रम से शतावर, विदारीकन्द, असगन्ध और वाराहीकन्द इन औषधियों को डालना चाहिये। [१४४] ❖ मेदामहामेदास्थाने शतावरीमूलम् । जीवकर्षभकस्थाने विदारीमूलम् । काकोली क्षीरकाकोलीस्थाने अश्वगन्ध्यामूलम् । ऋद्धिवृद्धिस्थाने वाराहीकन्दं गुणैस्तत्तुल्यं क्षिपेत् । [१४४] यहाँ पर 'मेदा और महामेदा के स्थान में सतावर का मूल, जीवक तथा ऋषभक के स्थान में विदारीकन्द का मूल, काकोली तथा क्षीरकाकोली के स्थान में असगन्ध का मूल एवं ऋद्धि तथा वृद्धि के स्थान में वाराही कन्द को गुणों में पूर्वोक्त औषधियों के समान समझकर डालें' ऐसा समझना चाहिये। [१४४] ४२. अष्टवर्ग नाम । उत्पत्तिस्थान । सामान्यरूप । परस्पर पार्थक्य । शा. प्रतिनिधि १. जीवक । हिमालय पर्वत शिखर । कन्द-रसोन के समान पत्र-सूक्ष्म, सारहीन । कूँची के समान । विदारीकन्द २. ऋषभक । ” । ” । बैल के सींग के समान । ” ३. मेदा । मोरङ्ग (नेपाल का दक्षिण-पूर्व भाग । कन्द-मेद के सदृश स्राव नख से छेद्य । शुक्लवर्ण । शतावरी मूल