भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 312, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः २६१ शुक्लार्द्रकनिभः कन्दो लताजातः सुपाण्डुरः । महामेदाभिधो ज्ञेयो मेदालक्षणमुच्यते ।।१२८।। शुक्लकन्दो नखच्छेद्यो मेदोधातुमिव स्रवेत् । यः स मेदेति विज्ञेयो जिज्ञासातत्परैर्जनैः ।।१२९।। शल्यपर्णी१ मणिच्छिद्रा मेदा मेदाभवाध्वरा । महामेदा वसुच्छिद्रा त्रिदन्ती देवतामणिः ।।१३०।। मेदायुगं गुरु स्वादु वृष्यं स्तन्यकफावहम् । बृंहणं शीतलं पित्तरक्तवातज्वरप्रणुत् ।।१३१।। मेदा और महामेदा के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण-उसमें महामेदा नामक कन्द मोरङ्ग (नेपाल का दक्षिणपूर्वभाग) आदि प्रदेशों में उत्पन्न होता है। महामेदा, वनीमेदा है ऐसा मुनीश्वरों ने कहा है। महामेदा लता से उत्पन्न होती है तथा इसका कन्द पाण्डुवर्ण का, सफेद अदरक के समान होता है। ये महामेदा के लक्षण हुये, अब मेदा के भी लक्षण कहते हैं—जिसके कन्द सफेद हों तथा जिसमें नख से काटने पर मेदधातु के समान एक प्रकार का रस निकलता हो उसे मेदा समझना चाहिये। शल्यपर्णी, मणिच्छिद्रा, मेदा, मेदोभवा और अध्वरा ये नाम मेदा के हैं। महामेदा, वसुच्छिद्रा, त्रिदन्ती और देवतामणि ये नाम महामेदा के हैं। उक्त दोनों प्रकार का मेदा-ये दोनों परिपाक में गुरु, स्वादिष्ट, वीर्यवर्धक, दुग्ध तथा कफ को बढ़ाने वाले, धातुवर्धक, शीतल, पित्त, रक्तसम्बन्धी दोष, वायु तथा ज्वर को दूर करने वाले होते हैं। [१२८-१३१] अथ काकोलीक्षीरकाकोल्योरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह जायते क्षीरकाकोली महामेदोद्भवस्थले ।।१३२।। यत्र स्यात्क्षीरकाकोली महामेदोद्भवस्थले । पीवरीसदृशः कन्दः सक्षीरः२ प्रियगन्धवान् ।।१३३।। सा प्रोक्ता क्षीरकाकोली काकोलीलिङ्गमुच्यते । यथास्यात्क्षीरकाकोली काकोल्यपि तथा भवेत् ।।१३४।। एषा किञ्चिद्भवेत्कृष्णा भेदोऽयमुभयोरपि । काकोली वायसोली च वीरा कायस्थिका तथा ।।१३५।। सा शुक्ला क्षीरकाकोली वयस्था क्षीरवल्लिका । कथिता क्षीरिणी धीरा३ क्षीरशुक्ला पयस्विनी ।।१३६।। काकोलीयुगलं शीतं शुक्लं मधुरं गुरु । बृंहणं वातदाहास्त्रपित्तशोषज्वरापहम् ।।१३७।। काकोली तथा क्षीरकाकोली के उत्पत्तिस्थान, लक्षण नाम तथा गुण—महामेदा के उत्पन्न होने का जहाँ स्थान है, वहीं पर क्षीरकाकोली भी उत्पन्न होती है। और जहाँ पर क्षीरकाकोली उत्पन्न होती है, वहाँ पर काकोली भी होती है। क्षीरकाकोली का कन्द पीवरी (शतावर) के समान होता है और काटने पर उसमें से दूध निकलता है तथा यह प्रिय गन्ध से युक्त होता है। अब काकोली के लक्षण कहते हैं—जिस प्रकार की क्षीरकाकोली होती है उसी प्रकार की काकोली भी होती है। किन्तु दोनों में भेद यह है कि काकोली, क्षीरकाकोली की अपेक्षा कुछ कृष्णवर्ण की होती है। काकोली, वायसोली, वीरा और कायस्थिका ये नाम काकोली के हैं और शुक्ला, क्षीरकाकोली, वयस्था, क्षीरवल्लिका, क्षीरिणी, धीरा, क्षीरशुक्ला और पयस्विनी ये नाम क्षीरकाकोली के हैं। उक्त दोनों प्रकार की काकोली—शीतल, शुक्रवर्धक, मधुर, गुरु, बृंहण (धातुवर्धक), वात, दाह, रक्तपित्त (या रक्तदोष तथा पित्त) शोष और ज्वर की नाशक होती है। [१३२-१३७] अथ ऋद्धिवृद्ध्योरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह ऋद्धिवृद्धिश्च कन्दौ द्वौ भवतः कोशलेऽचले४ । श्वेतलोमान्वितः कन्दोलताजातः सरन्ध्रकः ।।१३८।। स एव ऋद्धिवृद्धिश्च भेदमप्येतयोर्ब्रुवे । तूलग्रन्थिसमा ऋद्धिर्वामावर्त्तफला चसा ।।१३९।। वृद्धिरस्तु दक्षिणावर्त्तफला प्रोक्ता महर्षिभिः । ऋद्धियोग्यं५ सिद्धिलक्ष्म्यौ वृद्धेरप्याह्वया इमे ।।१४०।। ऋद्धिर्बल्या त्रिदोषघ्नी शुक्ला मधुरा गुरुः । प्राणैश्वर्यकरी मूर्च्छारक्तपित्तविनाशिनी ।।१४१।। वृद्धिर्गर्भप्रदा शीता बृंहणी मधुरा स्मृता । वृष्या पित्तास्रशमनी क्षतकासक्षयापहा ।।१४२।। १. 'स्वल्पपर्णी'ति पाठा. । २. 'क्षीरं स्रवति गन्धवानि'ति पाठा. । ३. 'धीरे'ति पाठा. । ४. 'कोशयामले' इति पाठान्तरम् । ५. 'ऋद्धियुग्मं'ति पाठा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA