भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-इसका आन्तरिक प्रयोग बहुत कम होता है। यह खड़िया के समान अम्लत्व दूर करने वाला तथा ग्राही एवं स्थानिक उपशामक है। (१) इसका सूक्ष्म चूर्ण कर्णस्राव तथा कर्णपीड़ा के लिए कानों में डालते हैं। मुख तथा दाँतों के विकारों में यह दन्तमञ्जन की तरह उपयोग में आता है तथा झाँईं, मुहाँसे, व्यंग तथा चर्म के अन्य विकारों में इसका सूक्ष्मचूर्ण या नीबू के रस के साथ इसका लेप लगाया जाता है। अम्हौरी में गुलाब जल के साथ शरीर पर इसे लगाते हैं। (२) इसका नेत्र रोगों में विशिष्ट स्थान है। लेखन गुण के कारण नेत्रशुक्ल, जाला, धुंध आदि में सुरमा के समान या सुरमा में मिलाकर इसे काम में लाते हैं। वर्त्मदाह में इसे गुलाब जल और सैन्धव के साथ महीन पीसकर आँख में लगाते हैं। (३) कर्णस्राव में इसे तैल में सिद्ध करके उसका उपयोग करते हैं। (४) यद्यपि आयुर्वेद में इसका आंतरिक प्रयोग नहीं दिखाई देता तथापि यह चूने का अच्छा सेन्द्रिय योग है जिसका आन्तरिक उपयोग भी किया जा सकता है। मात्रा-२ से ८ रत्ती। अथाष्टवर्गस्य लक्षणगुणानाह जीवकर्षभकौ मेदे काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके ।।१२०।। अष्टवर्गोऽष्टभिर्द्रव्यैः कथितश्चरकादिभिः ।।१२१।। अष्टवर्गो हिमः स्वादुर्बृंहणः शुक्रलो गुरुः। भग्नसन्धानकृत्कामबलासबलवर्द्धनः ।। वातपित्तास्रतृड्दाहज्वरमेहक्षयप्रणुत् ।।१२२।। अष्टवर्ग के लक्षण तथा गुण-जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि और वृद्धि इन सब आठ द्रव्यों को चरकादि मुनिगण 'अष्टवर्ग' नाम से व्यवहार करते हैं। अष्टवर्ग-शीतवीर्य, स्वादिष्ट, बृंहण (धातुवर्धक), शुक्रजनक, विपाक में गुरु, भग्नसन्धानकारक (टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाला), काम, कफ तथा बल को बढ़ाने वाला, वात, पित्त, तृष्णा, दाह, ज्वर, प्रमेह और क्षय रोग को दूर करने वाला होता है। [१२०-१२२] तत्रादौ जीवकर्षभकयोरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह जीवकर्षभकौ ज्ञेयौ हिमाद्रिशिखरोद्भवौ। रसोनकन्दवत्कन्दौ निःसारौ सूक्ष्मपत्रकौ ।।१२३।। जीवकः कूर्चकाकार ऋषभो वृषशृङ्गवत्। जीवको मधुरः शृङ्गो ह्रस्वाङ्गः कूर्चशीर्षकः ।।१२४।। ऋषभो वृषभो धीरो विषाणी द्राक्ष इत्यपि। जीवकर्षभकौ बल्यौ शीतौ शुक्रकफप्रदौ ।। मधुरौ पित्तदाहास्रकाश्यवातक्षयापहौ ।।१२५।। अष्टवर्गान्तर्गत जीवक तथा ऋषभक के उत्पत्ति स्थान, लक्षण, नाम तथा गुण-जीवक और ऋषभक ये दोनों औषधियाँ हिमालय पर्वत के शिखर के ऊपर उत्पन्न होती हैं। इन दोनों के कन्द ठीक लहसुन के कन्द के समान होते हैं और ये निःसार होते हैं तथा पत्ते सूक्ष्म होते हैं। उसमें जीवक का आकार कूँची के समान होता है और ऋषभक बैल के सींग की भाँति होता है। जीवक, मधुर, शृङ्ग, ह्रस्वाङ्ग और कूर्चशीर्षक ये नाम जीवक के हैं। तथा ऋषभ, वृषभ, धीर, विषाणी और द्राक्ष ये नाम ऋषभक के हैं। ये दोनों बलकारक, शीतवीर्य, शुक्र तथा कफ के वर्धक, मधुर रसयुक्त, पित्त, दाह, रक्तदोष, कृशता, वात तथा क्षयरोग को दूर करने वाले होते हैं। [१२३-१२५] अथ मेदामहामेदयोरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह महामेदाऽभिधः कन्दो मोरङ्गादौ प्रजायते ।।१२६।। महामेदा वनीमेदा स्यादित्युक्तं मुनीश्वरैः ।।१२७।।