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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

२६० भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-इसका आन्तरिक प्रयोग बहुत कम होता है। यह खड़िया के समान अम्लत्व दूर करने वाला तथा ग्राही एवं स्थानिक उपशामक है। (१) इसका सूक्ष्म चूर्ण कर्णस्राव तथा कर्णपीड़ा के लिए कानों में डालते हैं। मुख तथा दाँतों के विकारों में यह दन्तमञ्जन की तरह उपयोग में आता है तथा झाँईं, मुहाँसे, व्यंग तथा चर्म के अन्य विकारों में इसका सूक्ष्मचूर्ण या नीबू के रस के साथ इसका लेप लगाया जाता है। अम्हौरी में गुलाब जल के साथ शरीर पर इसे लगाते हैं। (२) इसका नेत्र रोगों में विशिष्ट स्थान है। लेखन गुण के कारण नेत्रशुक्ल, जाला, धुंध आदि में सुरमा के समान या सुरमा में मिलाकर इसे काम में लाते हैं। वर्त्मदाह में इसे गुलाब जल और सैन्धव के साथ महीन पीसकर आँख में लगाते हैं। (३) कर्णस्राव में इसे तैल में सिद्ध करके उसका उपयोग करते हैं। (४) यद्यपि आयुर्वेद में इसका आंतरिक प्रयोग नहीं दिखाई देता तथापि यह चूने का अच्छा सेन्द्रिय योग है जिसका आन्तरिक उपयोग भी किया जा सकता है। मात्रा-२ से ८ रत्ती। अथाष्टवर्गस्य लक्षणगुणानाह जीवकर्षभकौ मेदे काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके ।।१२०।। अष्टवर्गोऽष्टभिर्द्रव्यैः कथितश्चरकादिभिः ।।१२१।। अष्टवर्गो हिमः स्वादुर्बृंहणः शुक्रलो गुरुः। भग्नसन्धानकृत्कामबलासबलवर्द्धनः ।। वातपित्तास्रतृड्दाहज्वरमेहक्षयप्रणुत् ।।१२२।। अष्टवर्ग के लक्षण तथा गुण-जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि और वृद्धि इन सब आठ द्रव्यों को चरकादि मुनिगण 'अष्टवर्ग' नाम से व्यवहार करते हैं। अष्टवर्ग-शीतवीर्य, स्वादिष्ट, बृंहण (धातुवर्धक), शुक्रजनक, विपाक में गुरु, भग्नसन्धानकारक (टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाला), काम, कफ तथा बल को बढ़ाने वाला, वात, पित्त, तृष्णा, दाह, ज्वर, प्रमेह और क्षय रोग को दूर करने वाला होता है। [१२०-१२२] तत्रादौ जीवकर्षभकयोरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह जीवकर्षभकौ ज्ञेयौ हिमाद्रिशिखरोद्भवौ। रसोनकन्दवत्कन्दौ निःसारौ सूक्ष्मपत्रकौ ।।१२३।। जीवकः कूर्चकाकार ऋषभो वृषशृङ्गवत्। जीवको मधुरः शृङ्गो ह्रस्वाङ्गः कूर्चशीर्षकः ।।१२४।। ऋषभो वृषभो धीरो विषाणी द्राक्ष इत्यपि। जीवकर्षभकौ बल्यौ शीतौ शुक्रकफप्रदौ ।। मधुरौ पित्तदाहास्रकाश्यवातक्षयापहौ ।।१२५।। अष्टवर्गान्तर्गत जीवक तथा ऋषभक के उत्पत्ति स्थान, लक्षण, नाम तथा गुण-जीवक और ऋषभक ये दोनों औषधियाँ हिमालय पर्वत के शिखर के ऊपर उत्पन्न होती हैं। इन दोनों के कन्द ठीक लहसुन के कन्द के समान होते हैं और ये निःसार होते हैं तथा पत्ते सूक्ष्म होते हैं। उसमें जीवक का आकार कूँची के समान होता है और ऋषभक बैल के सींग की भाँति होता है। जीवक, मधुर, शृङ्ग, ह्रस्वाङ्ग और कूर्चशीर्षक ये नाम जीवक के हैं। तथा ऋषभ, वृषभ, धीर, विषाणी और द्राक्ष ये नाम ऋषभक के हैं। ये दोनों बलकारक, शीतवीर्य, शुक्र तथा कफ के वर्धक, मधुर रसयुक्त, पित्त, दाह, रक्तदोष, कृशता, वात तथा क्षयरोग को दूर करने वाले होते हैं। [१२३-१२५] अथ मेदामहामेदयोरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह महामेदाऽभिधः कन्दो मोरङ्गादौ प्रजायते ।।१२६।। महामेदा वनीमेदा स्यादित्युक्तं मुनीश्वरैः ।।१२७।।

हरीतक्यादिवर्गः २६१ शुक्लार्द्रकनिभः कन्दो लताजातः सुपाण्डुरः । महामेदाभिधो ज्ञेयो मेदालक्षणमुच्यते ।।१२८।। शुक्लकन्दो नखच्छेद्यो मेदोधातुमिव स्रवेत् । यः स मेदेति विज्ञेयो जिज्ञासातत्परैर्जनैः ।।१२९।। शल्यपर्णी१ मणिच्छिद्रा मेदा मेदाभवाध्वरा । महामेदा वसुच्छिद्रा त्रिदन्ती देवतामणिः ।।१३०।। मेदायुगं गुरु स्वादु वृष्यं स्तन्यकफावहम् । बृंहणं शीतलं पित्तरक्तवातज्वरप्रणुत् ।।१३१।। मेदा और महामेदा के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण-उसमें महामेदा नामक कन्द मोरङ्ग (नेपाल का दक्षिणपूर्वभाग) आदि प्रदेशों में उत्पन्न होता है। महामेदा, वनीमेदा है ऐसा मुनीश्वरों ने कहा है। महामेदा लता से उत्पन्न होती है तथा इसका कन्द पाण्डुवर्ण का, सफेद अदरक के समान होता है। ये महामेदा के लक्षण हुये, अब मेदा के भी लक्षण कहते हैं—जिसके कन्द सफेद हों तथा जिसमें नख से काटने पर मेदधातु के समान एक प्रकार का रस निकलता हो उसे मेदा समझना चाहिये। शल्यपर्णी, मणिच्छिद्रा, मेदा, मेदोभवा और अध्वरा ये नाम मेदा के हैं। महामेदा, वसुच्छिद्रा, त्रिदन्ती और देवतामणि ये नाम महामेदा के हैं। उक्त दोनों प्रकार का मेदा-ये दोनों परिपाक में गुरु, स्वादिष्ट, वीर्यवर्धक, दुग्ध तथा कफ को बढ़ाने वाले, धातुवर्धक, शीतल, पित्त, रक्तसम्बन्धी दोष, वायु तथा ज्वर को दूर करने वाले होते हैं। [१२८-१३१] अथ काकोलीक्षीरकाकोल्योरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह जायते क्षीरकाकोली महामेदोद्भवस्थले ।।१३२।। यत्र स्यात्क्षीरकाकोली महामेदोद्भवस्थले । पीवरीसदृशः कन्दः सक्षीरः२ प्रियगन्धवान् ।।१३३।। सा प्रोक्ता क्षीरकाकोली काकोलीलिङ्गमुच्यते । यथास्यात्क्षीरकाकोली काकोल्यपि तथा भवेत् ।।१३४।। एषा किञ्चिद्भवेत्कृष्णा भेदोऽयमुभयोरपि । काकोली वायसोली च वीरा कायस्थिका तथा ।।१३५।। सा शुक्ला क्षीरकाकोली वयस्था क्षीरवल्लिका । कथिता क्षीरिणी धीरा३ क्षीरशुक्ला पयस्विनी ।।१३६।। काकोलीयुगलं शीतं शुक्लं मधुरं गुरु । बृंहणं वातदाहास्त्रपित्तशोषज्वरापहम् ।।१३७।। काकोली तथा क्षीरकाकोली के उत्पत्तिस्थान, लक्षण नाम तथा गुण—महामेदा के उत्पन्न होने का जहाँ स्थान है, वहीं पर क्षीरकाकोली भी उत्पन्न होती है। और जहाँ पर क्षीरकाकोली उत्पन्न होती है, वहाँ पर काकोली भी होती है। क्षीरकाकोली का कन्द पीवरी (शतावर) के समान होता है और काटने पर उसमें से दूध निकलता है तथा यह प्रिय गन्ध से युक्त होता है। अब काकोली के लक्षण कहते हैं—जिस प्रकार की क्षीरकाकोली होती है उसी प्रकार की काकोली भी होती है। किन्तु दोनों में भेद यह है कि काकोली, क्षीरकाकोली की अपेक्षा कुछ कृष्णवर्ण की होती है। काकोली, वायसोली, वीरा और कायस्थिका ये नाम काकोली के हैं और शुक्ला, क्षीरकाकोली, वयस्था, क्षीरवल्लिका, क्षीरिणी, धीरा, क्षीरशुक्ला और पयस्विनी ये नाम क्षीरकाकोली के हैं। उक्त दोनों प्रकार की काकोली—शीतल, शुक्रवर्धक, मधुर, गुरु, बृंहण (धातुवर्धक), वात, दाह, रक्तपित्त (या रक्तदोष तथा पित्त) शोष और ज्वर की नाशक होती है। [१३२-१३७] अथ ऋद्धिवृद्ध्योरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह ऋद्धिवृद्धिश्च कन्दौ द्वौ भवतः कोशलेऽचले४ । श्वेतलोमान्वितः कन्दोलताजातः सरन्ध्रकः ।।१३८।। स एव ऋद्धिवृद्धिश्च भेदमप्येतयोर्ब्रुवे । तूलग्रन्थिसमा ऋद्धिर्वामावर्त्तफला चसा ।।१३९।। वृद्धिरस्तु दक्षिणावर्त्तफला प्रोक्ता महर्षिभिः । ऋद्धियोग्यं५ सिद्धिलक्ष्म्यौ वृद्धेरप्याह्वया इमे ।।१४०।। ऋद्धिर्बल्या त्रिदोषघ्नी शुक्ला मधुरा गुरुः । प्राणैश्वर्यकरी मूर्च्छारक्तपित्तविनाशिनी ।।१४१।। वृद्धिर्गर्भप्रदा शीता बृंहणी मधुरा स्मृता । वृष्या पित्तास्रशमनी क्षतकासक्षयापहा ।।१४२।। १. 'स्वल्पपर्णी'ति पाठा. । २. 'क्षीरं स्रवति गन्धवानि'ति पाठा. । ३. 'धीरे'ति पाठा. । ४. 'कोशयामले' इति पाठान्तरम् । ५. 'ऋद्धियुग्मं'ति पाठा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA

२६२ भावप्रकाशनिघण्टुः ऋद्धि तथा वृद्धि के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण-ऋद्धि और वृद्धि ये दोनों कन्द कोशल पर्वत में उत्पन्न होते हैं। ऋद्धि का कन्द सफेद रोयें से युक्त, लता से उत्पन्न होने वाला तथा छिद्रों से युक्त होता है और वृद्धि भी इसी प्रकार की होती है, किन्तु इन दोनों का जो परस्पर भेद है उसे अब कहता हूँ—ऋद्धि कपास की गाँठ के समान आकार वाली तथा बायें तरफ से आवर्तशील फल वाली होती है। और वृद्धि—दाहिने तरफ से आवर्तशील फलवाली होती है ऐसा महर्षि लोग कहते हैं। उक्त दोनों प्रकार की ऋद्धि (ऋद्धि-वृद्धि) के योग्य, सिद्धि और लक्ष्मी ये तीन नाम हैं। ऋद्धि-बलकारक, त्रिदोष को दूर करने वाली, शुक्रवर्धक, मधुर रस युक्त, पाक में गुरु और प्राणप्रद, ऐश्वर्यजनक एवं मूर्च्छा और रक्त पित्त को नाश करने वाली होती है। वृद्धि-गर्भजनक, शीतल, बृंहण (धातुवर्धक), मधुर रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), रक्तपित्त को शमन करने वाली, क्षत (उरःक्षतादिक) कास तथा क्षय को दूर करने वाली होती है। [१३८-१४२] राज्ञामप्यष्टवर्गस्तु यतोऽयमतिदुर्लभः । तस्मादस्य प्रतिनिधिं गृह्णीयात्तद्गुणं भिषक् ॥१४३॥ साधारण लोगों को कौन कहे अष्टवर्ग की उक्त औषधियाँ राजाओं को भी दुर्लभ हैं। अतः वैद्य को चाहिये कि वे इसके समान गुण वाली प्रतिनिधि औषधियों को काम में लावें। [१४३] ❖ मुख्यसदृशः = प्रतिनिधिः ॥१४३॥ यहाँ पर 'प्रतिनिधि' पद का 'मुख्य के सदृश' यह अर्थ समझना चाहिये। [१४३] अथाष्टवर्गस्य प्रतिनिधिमाह मेदाजीवककाकोलीऋद्धिद्वन्द्वेऽपि चासति । वरीविदार्यश्वगन्धावाराहींश्चक्रमात् क्षिपेत् ॥१४४॥ अष्टवर्ग की प्रतिनिधि औषधियाँ—दोनों प्रकार की मेदा, दोनों प्रकार के जीवक, दोनों प्रकार की काकोली तथा दोनों प्रकार की ऋद्धि के स्थान में क्रम से शतावर, विदारीकन्द, असगन्ध और वाराहीकन्द इन औषधियों को डालना चाहिये। [१४४] ❖ मेदामहामेदास्थाने शतावरीमूलम् । जीवकर्षभकस्थाने विदारीमूलम् । काकोली क्षीरकाकोलीस्थाने अश्वगन्ध्यामूलम् । ऋद्धिवृद्धिस्थाने वाराहीकन्दं गुणैस्तत्तुल्यं क्षिपेत् । [१४४] यहाँ पर 'मेदा और महामेदा के स्थान में सतावर का मूल, जीवक तथा ऋषभक के स्थान में विदारीकन्द का मूल, काकोली तथा क्षीरकाकोली के स्थान में असगन्ध का मूल एवं ऋद्धि तथा वृद्धि के स्थान में वाराही कन्द को गुणों में पूर्वोक्त औषधियों के समान समझकर डालें' ऐसा समझना चाहिये। [१४४] ४२. अष्टवर्ग नाम । उत्पत्तिस्थान । सामान्यरूप । परस्पर पार्थक्य । शा. प्रतिनिधि १. जीवक । हिमालय पर्वत शिखर । कन्द-रसोन के समान पत्र-सूक्ष्म, सारहीन । कूँची के समान । विदारीकन्द २. ऋषभक । ” । ” । बैल के सींग के समान । ” ३. मेदा । मोरङ्ग (नेपाल का दक्षिण-पूर्व भाग । कन्द-मेद के सदृश स्राव नख से छेद्य । शुक्लवर्ण । शतावरी मूल

हरीतक्यादिवर्गः २६३ ४. महामेदा ” कन्द-शुक्ल आर्द्रक पाण्डुरवर्ण ” के समान, लताजात ५. काकोली ” कन्द-शतावरी सदृश अधिक कृष्णवर्ण अश्वगंधा का सक्षीर मूल ६. क्षीर- ” सुगन्धयुक्त कम कृष्णवर्ण ” काकोली ७. ऋद्धि कोशलपर्वत कन्द-श्वेतलोमयुक्त कपास की गाँठ वाराहीकन्द लताजात के समान, वामा- छिद्रयुक्त वर्तफल ८. वृद्धि ” ” दक्षिणावर्तफल ” इस समय अष्टवर्ग की कोई भी औषधि सच्ची नहीं मिलती है। यों तो अष्टवर्ग के बेचनेवाले कितनी फर्में हो गयी हैं, इनमें 'अष्टवर्ग कार्यालय देहरादून' प्रसिद्ध है परन्तु अष्टवर्ग के देखने और शास्त्रों से मिलान करने से कोई भी असली नहीं सिद्ध होती। अष्टवर्ग के अभाव में मेदा-महामेदा की जगह शतावर, जीवक-ऋषभक की जगह विदारीकन्द, ककोली-क्षीरकाकोली की जगह असगन्ध और ऋद्धि-वृद्धि की जगह वाराहीकन्द डालने को कहा गया है। परन्तु आजकल के कतिपय विद्वान् वैद्य शतावर, विदारीकन्द, असगन्ध और वाराहीकन्द को अष्टवर्ग का प्रतिनिधि नहीं मानते। क्योंकि इनमें अष्टवर्ग का अत्यन्त न्यून गुण पाया जाता है। इसलिए अष्टवर्ग की जगह निम्नाङ्कित औषधियाँ देना उत्तम बतलाते हैं। जीवक अभाव में बहमन सफेद या गुडूची ऋषभक ” बहमन लाल या लम्बा सालव या वंशलोचन मेदा ” सालमिश्री महामेदा ” शकाकुल मिश्री या प्रसारिणी काकोली ” काली मूसली क्षीरकाकोली ” श्वेत मूसली ऋद्धि ” चिड़िया कन्द या बला या उटङ्गण के बीज वृद्धि ” सालव पंजा या महाबला या बीजबंद अथ यष्टीमधुनामगुणानाह यष्टीमधु तथा यष्टीमधुकं क्लीतकं तथा। अन्यत्क्लीतनकं तत्तु भवेत्तोये मधूलिका ।। १४५।। यष्टी हिमा गुरुः स्वाद्वी चक्षुष्या बलवर्णकृत्। सुस्निग्धा शुक्रला केश्या स्वर्या पित्तानिलास्रजित्। व्रणशोथविषच्छर्दितृष्णाग्लानिक्षयापहा ।। १४६ ।। मुलहठी के नाम तथा गुण—यष्टीमधु, यष्टीमधुक और क्लीतनक ये सब मुलहठी के नाम हैं। और अन्य प्रकार की भी एक मुलहठी होती है जो कि जल में उत्पन्न होती है जिसका नाम 'मधूलिका' है। मुलहठी—शीतवीर्य, गुरु, मधुररसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, बलकारक तथा वर्ण को सुन्दर करने वाली, सुस्निग्ध, वीर्यजनक, केशों के लिये हितकर, स्वर को सुधारने वाली, पित्त, वात तथा रक्त के प्रकोप को शमन करने वाली, व्रण, शोथ, विष, वमन, प्यास, ग्लानि तथा क्षय रोग को दूर करने वाली होती है। [१४५-१४६] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

२६४ भावप्रकाशनिघण्टुः ४३. यष्टीमधु हिं०-मुलहठी, मुलेटी, मुलेठी, मीठी लकड़ी, जेठीमध । बं०-यष्टिमधु । म०-जेष्टिमध । गु०-जेठीमध । क०-जेष्ठमधु । ते०-यष्टिमधुकम । पं०-मुलेटी । मा०-मलहठी । ता०-अतिमधुरं । फा०-आसरेहमहक, बिखेमहक । अ०-असलुसूस । अं०-Liquorice Root (लिकोरिस् रूट) । ले०-Glycyrrhiza glabra, Linn. (ग्लिस्रहाइझा ग्लैंब्रा, लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । इसका क्षुप अरब, फारस की खाड़ी, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान एवं साइबेरिया आदि स्थानों में उत्पन्न होता है । इसकी उपज पञ्जाब तथ चेनाव से लेकर पेशावर आदि हिमालय के निचले हिस्से में तथा अंडमान द्वीप एवं वर्मा में होती है । बलूचिस्तान तथा चित्रााल में भी यह उत्पन्न होता है। काश्मीर में वरमूला घाटी में इसको उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त हुई है । इसका क्षुप २-४ फुट ऊँचा होता है। पत्रक-छोटे, ४ से ७ जोड़े, आयताकार से चौड़ाई लिये हुए मालाकार; अपरिमित सदण्डिक पुष्प व्यूह; पुष्प-बैंगनी वर्ण के, लगभग १/२ इञ्च लम्बे; फली-छोटी, बारीक, १/२-१ इञ्च लम्बी, चिपटी; बीज-बहुतया २-३ होते हैं । इसकी जड़ तथा भौमिक तने को सुखा कर छाल सहित अथवा छाल निकालकर बाजार में मुलेटी के नाम से बेचा जाता है। ये लम्बे टुकड़े, पीताभ बादामी रंग के झुर्रीदार होते हैं तथा छाल निकाले हुये हलके पीले रंग के रेशेदार होते हैं। इनमें एक प्रकार की हल्की गन्ध तथा स्वाद मीठा होता है । स्थान भेद से इसकी अन्य जातियाँ होती हैं जिनके स्वाद में अन्तर रहता है। यूनानी मत से ३ प्रकार की मुलेठी मानी गई है जिसमें से मिश्र की उत्तम, अरब की मध्यम तथा तुरुष्क वा फारस की अधम होती है जो उत्तरोत्तर कम मीठी होती हैं । रासायनिक संगठन-इसमें एक सफेद, मीठा, रवेदार पदार्थ ग्लिसहाइज्जिन् (Glyoyrrhizin) ५-१०% पाया जाता है जिसमें ग्लिसहाइजिक् एसिड (Glycyrrhizic acid) से बने चूना तथा पोटैशियम् (Potassium) के लवण होते हैं । यह एसिड भी शुभ्र रवेदार होता है तथा इसका द्रवणांक २५° श० होता है। यह चीनी से ५० गुना अधिक मीठा होता है। गरम जल में ग्लिसहाइज्जिन् का बना घोल ठंडा होने पर गाढ़ा हो जाता है। इसके अतिरिक्त मुलेठी में ५-१०% शर्करा, ३०% स्टार्च, प्रभुजिन, स्नेह, राल एवं अॅस्पराजिन् (Asparagin) करीब १% होता है। गुण और प्रयोग-मुलेठी मधुर, शीतल, स्नेहन, बल्य, वृष्य, रसायन, कफशामक, स्वर्य, नेत्र्य, मूत्रजनन, स्तन्यवर्धक, शोथहर एवं व्रणरोपक गुणों से युक्त होती है। (१) इसमें स्नेहन तथा सौम्य कफ निःसारक गुण होने के कारण इसका मुख्य उपयोग स्वरभंग, कास, श्वसनिका शोथ एवं गलशोथ आदि में किया जाता है। इसके लिये इसके टुकड़े को मुख में रख कर चूसने को दिया जाता है तथा तीसी के साथ इसके क्वाथ का उपयोग किया जाता है। (२) मीठी होने के कारण क्वाथों को मधुर बनाने के लिये तथा अनेक औषधियाँ जैसे सनाय, एलुवा आदि को सुस्वादु बनाने के लिये तथा खाँसी के लिये चूसने की गोलियों में इसका उपयोग करते हैं। इसके चूर्ण का उपयोग गोली बनाने में सहायक द्रव्य के रूप में व्यवहार में आता है । (३) मूत्र मार्ग के प्रक्षोभ में यह बहुत उपयोगी है। इससे पेशाब की जलन दूर होती है। (४) अम्लपित्त में इसके उपयोग से आमाशयिक अम्ल कम होकर शूल दूर होता है। (५) चीन में इसका व्यवहार रसायन औषधि की दृष्टि से बहुत किया जाता रहा तथा अपने यहाँ भी इसे रसायन, -बल्य तथा शुक्रल मानते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २६५ (६) इसका सत्त्व रब्बेसूस, जो काले रंग का तथा मीठा होता है का व्यवहार खाँसी एवं गले की तकलीफ आदि में चूसने के लिए किया जाता है। (७) सुश्रुत में 'सर्वोपघातशमनीय' योग में इसका अन्तर्भाव किया गया है। इस प्रकार सभी प्रकार के अभिघातों से उत्पन्न लक्षणों में इसका प्रयोग उत्तम माना गया है। (८) इसका उपयोग क्षतक्षीण, रक्तवमन, हृद्रोग एवं अपस्मार आदि में भी किया जाता है। दूध अथवा घृत और मधु के साथ इसको देना चाहिये। (९) घृत के साथ इसके कल्क का प्रयोग घावों पर लगाने के लिये उपयोगी है। भिलावे से यदि त्वक्शोथ हो गया हो तो मुलेठी और तिल को दूध में पीस कर लेप करने से लाभ होता है। मात्रा-चूर्ण-१/४ माशा। अथ काम्पिल्लस्य नामगुणानाह काम्पिल्लः कर्कशश्चन्द्रो रक्ताङ्गो रोचनोऽपि च॥ काम्पिल्लः कफपित्तास्रकृमिगुल्मोदरव्रणान्। हन्ति रेची कटूष्णाश्च मेहानाहविषाश्मनुत् ॥१४७॥ कबीला के नाम तथा गुण-काम्पिल्ल, कर्कश, चन्द्र, रक्ताङ्ग और रोचन ये नाम कबीला के हैं। कबीला- कफ, रक्तपित्त, कृमि, गुल्म, उदररोग एवं व्रण (घाव) को दूर करता है। तथा यह रेचक (दस्तावर), कटु रस युक्त और उष्णवीर्य है। एवं प्रमेह, आनाह, विष तथा पथरी को नष्ट करने वाला होता है। [१४७] ४४. कम्पिल्ल (कबीला) हिं०-कबीला, कमीला, काम्बीला। बं०-कमिला, कमलागुरी। म०-शेन्द्रि कपिला। गु०-कपीलो। क०- वसारे, चन्द्रहिट्टू। पं०-कमल। ते०-कुम्कुम। ता०-कपिला रङ्ग, कपिला पोडि। मला०-पोनागम। फा०- कम्बिलाय, कमीलह, कम्बेला। अ०-कम्बील, किम्बील, वार्स। अं०-Kamala (कमला)। ले०-Mallotus philippinensis, Muell-Arg. (मॅल्लोटस् फिलिपाइनेन्सिस, मुएल-आर्ग.)। Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बिएसी)। यह प्रायः सब गरम प्रान्तों में हिमालय पहाड़ के नीचे से पूरब की ओर सिन्ध से दक्षिण, बंगाल, ब्रह्मा, सिंगापुर, सिलोन एवं मलाया द्वीप समूह आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसका सदा हरित वृक्ष-मध्यमाकार का २५-३० फीट तक ऊँचा होता है। छाल-चौथाई इंच मोटी, खाकी रङ्ग की फटी सी और भीतर से लाल दिखाई पड़ती है। पत्ते-गूलर के पत्तों के समान ३ से ९ इञ्च तक लम्बे, अंडाकार, नोकदार, विषमवर्ती और निम्न पृष्ठ रोमश रक्ताभ होते हैं। कार्तिक से पूस तक फूल, फल आते हैं और उष्णकाल में फल पकते हैं। फूल-छोटे-छोटे भूरापन युक्त लाल रङ्ग के आते हैं। फल-त्रिदल आकार में झरबेर के समान और पकने पर लाल रवेदार रज से ढका रहता है। इसी लाल रज को कबीला कहते हैं। बीज-चिकने, गोल और काले होते हैं। 'कबीला वायविडङ्ग की रज का नाम है' यह कहना भ्रमात्मक है। कबीला के बीजों को कहीं-कहीं वायविडङ्ग की जगह व्यवहार में लाते हैं जो अनुचित है। वास्तव में वायविडङ्ग और कबीले के वृक्ष एक नहीं, दो भिन्न-भिन्न हैं। इस वृक्ष के फलों के ऊपर के पराग (ग्रन्थि तथा रोम) को कबीला कहते हैं। फल पक जाने पर उनको कपड़े में डालकर अथवा हाथ से रगड़ कर इसे अलग करते हैं। इस लाल बदामी रंग की बुकनी में न तो स्वाद होता है न

? Or ? Wait, it's ! Look at the foot of that digit: it has a horizontal foot! But wait, does have a foot? Yes, in Devanagari,has a horizontal base:. Wait, is the digit before a? Yes, look at the base: it has a little horizontal foot going right. Wait, what is before it? ! Wait, is there a hyphen between and२०? Look between and: there is a tiny mark, or a space? It looks like ५-२०where the hyphen didn't print or is extremely faint, or simply५ २०. Let's type ५ २०or५-२०? If there's a space, let's keep ५ २०. Line 32: पुनः दें। Line 33:अथारग्वधस्य (धानबहेरा, अमलतास) नामगुणानाह Line 34:आरग्वधो राजवृक्षः शम्पाकश्चतुरङ्गुलः। आरेवतो व्याधिघातः कृतमालः सुवर्णकः ।।१४८।। Line 35:कर्णिकारो दीर्घफलः स्वर्णाङ्गः स्वर्णभूषणः । आरग्वधोगुरुः स्वा

ज्वरहृद्रोगपित्तास्रवातोदावर्त्तशूलनुत् । तत्फलं स्रं सनं रुच्यं कुष्ठपित्तकफापहम् ।। ज्वरे तु सततं पथ्यं कोष्ठशुद्धिकरं परम् ।। १५० ।। अमलतास (धनबहेरा) के नाम तथा गुण—आरग्वध, राजवृक्ष, शम्पाक, चतुरङ्गुल, आरवेत, व्याधिघात, कृतमाल, सुवर्णक, कर्णिकार, दीर्घफल, स्वर्णाङ्ग और स्वर्णफल ये नाम अमलतास के हैं । अमलतास—गुरु, मधुर, शीतल और उत्तम रेचक है । यह ज्वर, हृद्रोग, रक्तपित्त, वायु, उदावर्त्त और शूल को दूर करता है । अमलतास का फल—मृदु रेचक, रुचिकारक, कुष्ठ, पित्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है । यह ज्वर में सदा हितकर होता है एवं कोष्ठ को अत्यन्त शुद्ध करने वाला होता है । [१४८-१५०]

४५. आरग्वध (अमलतास) हिं०—अमलतास, सोनहाली । बं०—सोन्दाली, सोनालु, बन्दर लाठी । म०—बाहवा । क०—कक्केमर । ते०— रेलचेट्टु । गु०—गरमाली । पं०—अमलतास, करङ्गल, कनियार । ता०—कोत्रेमरं, शरकोन्ने, कोरैकाय । फा०— ख्यारेचम्बर । अ०—ख्यारे शम्बर, ख्यारशम्बर । अं०—Pudding Pipe Tree (पुडिंग पाइप ट्री) या Indian Laburnum (इण्डियन लॅवर्नम्), या Purging Cassia (पर्जिंग केशिया) । ले०—Cassia fistula, Linn. (केशिया फिस्टुला, लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है । इसका वृक्ष—मध्यमाकार का होता है, किन्तु कहीं-कहीं बड़े वृक्ष भी देखने में आते हैं। लकड़ी बहुत मजबूत होती है । १२ से १८ इञ्च तक की लम्बी-लम्बी सींकों पर ४ से ८ जोड़े पत्ते लगते हैं जो १।। से ३।। इञ्च तक लम्बे, अण्डाकार होते हैं । १०-२० इञ्च तक की लम्बी टहनियों पर सुनहले चमकीले पीले-पीले रङ्ग के पाँच-पाँच दल वाले फूलों के घनहरे लगते हैं, जो चैत के अन्त से ज्येष्ठ तक वृक्षों को सुशोभित करते हैं। जेठ में पतली सलाई के समान हरी-हरी फलियाँ निकल कर वर्षा के अन्त तक १-२ फीट लम्बी १ इञ्च तक मोटी हरी-हरी फलियाँ लटकती दिखाई पड़ती हैं । फिर हेमन्त के अन्त से काला रूप धारण करके वसन्त में पक जाती हैं । फलियों के भीतर पुरानी चवन्नी बराबर गोल-गोल पतले-पतले काले रस से लिपटे हुए परत रहते हैं और परतों के बीच सिरस के बीज के समान बीज होते हैं । रासायनिक संगठन—अमलतास के गूदे में गोंद, पेक्टिन (Pectin), रंजक पदार्थ, शर्करा, अल्प मात्रा में एक मधुगंधि उड़नशील तैल तथा हाइड्रोक्सिमेथिल्-अन्थ्राँक्विनोन् (Hydroxymethyl-anthraquinone) आदि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग—(१) अमलतास की गुद्दी आनुलोमिक, दाहशामक एवं वेदना स्थापक है । यह मृदु विरेचनों में सर्वश्रेष्ठ है । इसका प्रयोग ज्वरावस्था में सुकुमार, बाल, गर्भिणी एवं कोमल प्रकृति की नारियों में किया जाता है । मृदु विरेचन के लिये इसके स्वतंत्र प्रयोग की अपेक्षा सनाय के साथ बनाया हुआ अवलेह (Confectio seana) अधिक अच्छा है जिससे मरोड़, हल्लास, शूल, आध्मान आदि नहीं होते जो स्वतन्त्र प्रयोग में अधिक मात्रा में लेने से होते हैं । इससे बनी गुलकन्द का भी व्यवहार किया जाता है । रक्त की उष्णता बढ़ने पर अथवा मल संचय होकर वातरक्त एवं आमवात आदि रोग उत्पन्न होने पर विरेचन के लिये इसका उपयोग करते हैं। जिन्हें कब्जियत की शिकायत हमेशा रहती है उन्हें अल्प मात्रा में इसे बराबर सेवन कराया जाता है । अधिक दिन प्रयोग से मूत्र का रंग गहरे बादामी रंग का हो जाता है । ज्वर में अथवा मधुमेह में विरेचन की आवश्यकता हो तो इसका उपयोग कर सकते हैं। कॉफी के सत्व में इसकी मिलावट की जाती है । इसका लेप आमवात, वातरक्त एवं व्रणशोथ आदि पर किया जाता है ।

२६८ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) इसके बीज वामक होते हैं तथा ५-७ बीजों का चूर्ण वमन के लिये दिया जाता है । (३) इसकी छाल के क्वाथ से कवल करने से गले की गाँठों की सूजन कम होती है । (४) इसके पत्तों का रस अर्दित में पिलाया जाता है तथा जिस अंग का घात हुआ हो वहाँ इससे मला जाता है । दाद तथा भिलावें की सूजन पर इसके लगाने से लाभ होता है । (५) इसकी मूल तीव्र विरेचक एवं ज्वरहर होती है । मात्रा-गुद्दी ४/८ माशा । अथ कटुकाया नामगुणानाह कट्वी तु कटुका तिक्ता कृष्णभेदा कटम्भरा९ ।। अशोका मत्स्यशकला चक्राङ्गी शकुलादनी ।। मत्स्यपित्ता काण्डरुहा रोहिणी कटुरोहिणी ।। १५१ ।। कट्वी तु कटुका पाके तिक्ता रूक्षा हिमा लघुः । भेदिनी दीपनी हृद्या कफपित्तज्वरापहा ।। प्रमेहश्वासकासास्रदाहकुष्ठक्रिमिप्रणुत् ।। १५२ ।। कुटकी के नाम तथा गुण-कट्वी, कटुका, तिक्ता, कृष्णभेदा, कटम्भरा, अशोका, मत्स्यशकला, चक्राङ्गी, शकुलादनी, मत्स्यपित्ता, काण्डरुहा, रोहिणी और कटुरोहिणी ये सब कुटकी के नाम हैं । कुटकी-तिक्त रसयुक्त, परिपाक में कटु रसयुक्त, रूक्ष, शीतल, लघु, मल को भेदन करने वाली, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकर, कफ, पित्तज्वर, प्रमेह, श्वास, रक्त दोष, दाह, कुष्ठ तथा कृमि का नाश करने वाली होती है । [१५१-१५२] ४६. कुटकी हिं०-कुटकी, कटुकी, कटुका बं०-कटकी । म०-केदारकडू, काली कुटकी । गु०-बालकडू, कडू । ते०- कटुकुरोणी । क०-कटुक रोहणी, कटुकुरोहिनी । ता०- कटुकु रोगणी । फा०-खर्बकै हिन्दी । अ०-सर्वके अस्वद, खानेखस्वैल । अं०- Picrorhiza (पिक्रोहाइझा) । ले०-Picrorhiza kurroa Royle ex Benth. (पिक्रोहाइझा कुर्रों) । Fam. Scrophulariaceae (स्क़्रोफ्युलॅरियासी) । यह हिमालय पहाड़ की ९०००-१५००० फीट ऊँची चोटियों पर काश्मीर से सिक्कम तक बहुत उत्पन्न होती है । इसका क्षुप-रोमश होता है । इसका भामिक तना बहुवर्षायु, छोटी उँगली के समान मोटा एवं ६ से १०- १२ इञ्च तक लम्बा होता है । पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, सुवाकार, जड़ की ओर संकुचित, आगे की ओर चौड़े, किञ्चित् चिकने और कटे हुए झालदार किनारे वाले होते हैं । क्षुप के बीच से एक डण्डी निकलती है जिसके अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं । फूल-नीले या सफेद रङ्ग के आते हैं । फली-चौथाई इञ्च की होती है । कुटकी इस क्षुप के मूल (भौमिकत ने-Rhizome) को कहते हैं । यह १ से २ इञ्च लम्बे, कपिश लोहबान की तरह रंग वाले, खुरदरे एवं मुड़े हुए टुकड़े होते हैं । इन पर छोटी-छोटी चक्राकार गाँठें तथा गिरे हुए पत्तों एवं मूल के निशान रहते हैं । यह एक तरफ मोटी तथा दूसरी तरफ पतली होती है तथा इसमें एक प्रकार की हल्की गन्ध होती है । इसका स्वाद अत्यन्त कड़ुवा होता है । रासायनिक संगठन-इसमें पिक्रोह्राइझिन् (Picrorhizin) नामक एक कड़ुआ रवेदार मधुमेय (Glycoside) २६.६% पाया जाता है, जिसका उदांशन (Hydrolysis) होने पर पिक्रोह्रीझेटिन् (Picrohizetin) एवं एक प्रकार की मधु शर्करा (Dextrose) प्राप्त होती है । यह मधुमेय जल, मद्यसार, एसिटोन (Acetone) और एथिल् ऑसिटेट्

हरीतक्यादिवर्गः २६९ (Ethyl acetate) में घुलनशील एवं क्लोरफॉर्म (Chloroform), बेंझिन (Benzene) और ईथर (Ether) में अघुलनशील होता है यह अत्यन्त जलग्राही (Hygroscopic) होता है। इसके अतिरिक्त इसमें मधुशर्करा, मोम एवं कॅथर्टिक् ऑसिड् (Cathartic acid) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह एक उत्तम कडुआ पौष्टिक, दीपक, पाचक, पित्तविरेचक और नियतकालिक ज्वरहर है। इसकी क्रिया आंत्र एवं यकृत् पर होती है यह अल्प मात्रा में संस्रन तथा अधिक मात्रा में विरेचक होती है। जेन्शियन की तरह तिक्त पौष्टिक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। इसका गुण इन्द्रायण के सदृश होता है। इसका उपयोग नियतकालिकज्वर, शीतज्वर, कामला, पांडु, यकृत् विकार, श्वास, कुपचन, हृद्रोग, संग्रहणी, आन्त्र की शिथिलता तथा बच्चों के कृमि विकारों में किया जाता है। (१) पुनरावर्तित ज्वरों में इससे अच्छा लाभ होता है लेकिन इसको अधिक मात्रा में (३-४ माशा) देना पड़ता है। अविशिष्ट स्वरूप के सभी पुराण मन्द ज्वरों में, विशेषकर विबन्धयुक्त ज्वर में, इससे अच्छा लाभ होता है। इससे ज्वर जनित दाह की शान्ति होती है। (२) हृदय के ऊपर इसकी क्रिया डिजिटॅलिस् की तरह होती है। हृदय की अकार्य क्षमता जनित यकृत् वृद्धि एवं उदरशोथ में इसको अधिक मात्रा में क्वाथ के रूप में देने से पतले दस्त होकर लाभ होता है तथा हृदय को बल प्राप्त होता है। (३) आरोग्यवर्धिनी गुटिका में इसकी आधी मात्रा रहती है। मात्रा—चूर्ण ५-१० रत्ती। जीर्णज्वर में—३-४ माशा। प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण—(क) कुटकी के ही नाम से जेन्शियाना कुरों (Gentiana korroo, Royle; Fam. Gentianaceae) के मूल जिन्हे 'करू' कहा जाता है, बेचे जाते हैं। ये बाह्य स्वरूप में कुटकी के ही समान दिखलाई देते हैं, लेकिन दोनों की सूक्ष्म रचना में भेद होता है। इनके अनुप्रस्थ विच्छेद (Transverse section) में अन्तर स्पष्ट दिखलाई देता है। जें० कुरों में रसारोहण नलिका (Vessel) के कोष्ठावरणों की वृद्धि से उत्पन्न मोटाई, चक्राकार (Annular) या सीढ़ी के डण्डों की तरह मोटी रेखाकार (Scalariform) होती है, लेकिन कुटकी (P. kurroa) में यह मोटाई बिन्दुमय (Pitted) होती है। कुटकी (P. kurroa) में मूल के मध्य भाग में रहने वाले कोष्ठ जिन्हें पिथकोष्ठ (Pith cells) कहा जाता है, वे बिन्दुमय आवरण (Pitted walled) वाले होते हैं लेकिन ये कोष्ठ जे० कुरों में अनुपस्थित रहते हैं। गुण धर्म की दृष्टि से भारतीय जे० कुरों विदेशी जेन्शियाना का अच्छा प्रतिनिधि समझा जाता है। (ख) जे० कुरों के अतिरिक्त इसमें एक तीक्ष्ण औषधि ले०—Helleborus niger Linn. (हेलीबोरस् नाइगर्) मिली हुई रहती है, जिसको पहचानना आवश्यक है। इसके टुकड़े १ से ३ इन्च लंबे और १/४ इन्च से कम मोटे होते हैं। बाह्य पृष्ठ चिकना, टूटे हुवे मूल के निशानों से युक्त एवं हलके रंग का होता है। यह टुकड़े बहुत हलके तथा दो अंगुलियों के बीच नख से दबाने पर दब जाने वाले होते हैं। ४६. (क) करू सं०—त्रायमाण, हिं०, बं०—करू, कुटकी। पं०—कमल फूल, नीलकंठ। बम्ब०—पाषाणभेद, जिंतीयाण। अं०—Indian Gentian (इण्डियन् जेन्शियन)। ले०—Gentiana kurroo Royle (जॅन्शियाना कुरों)। Fam. Gentianaceae (जेन्शियानेंसी)।

२. द्वितीय खण्ड: ग्रहणी, अतीसार, अर्श, मन्दाग्नि, गुल्म एवं उदररोग चिकित्सा

२७० भावप्रकाशनिघण्टुः

इसका क्षुप—कश्मीर तथा हिमालय के उत्तरी पश्चिमी शिखरों पर ५०००-११००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। पत्र—मूलीय; कोषमय आधार वाले, ३-५ इञ्च लम्बे, रेखाकार (Linear); पुष्प—नीले सफेद दागों से युक्त; मूल—हलका, पीला, चौपहल; फली—लम्बी। चिकित्सा में इसके भौमिक तने तथा मूल का व्यवहार किया जाता है। कुटकी तथा विदेशी ‘जेन्शियन्’ के स्थान पर इसका प्रयोग किया जाता है। इसकी अन्य जातियों का भी इसी प्रकार व्यवहार किया जाता है। इसके टुकड़े १ इञ्च लम्बे एवं इन पर चक्राकार धारियाँ होती हैं तथा ये ऐंठे हुए से प्रतीत होते हैं। अन्य पार्थक्य ऊपर लिखा गया है।

रासायनिक संगठन—इसमें एक कडुवा पदार्थ तथा एक पारदर्शक राल के समान पीले रंग का बिना स्वाद का पदार्थ २०% पाया जाता है जो क्षारीय घोल में नहीं घुलता। इसमें जेन्शिय पिक्रिन (Gentiopicrin) नहीं होता जिसे विदेशी जेन्शियन् (G. lutea) का प्रभावकारी द्रव्य समझा जाता है। शायद यह इसके ताजे मूल से प्राप्त हो सकता है।

गुण और प्रयोग—यह कडुवा तथा बल्य है। इससे आमाशयिक रसों की अभिवृद्धि होकर भूख बढ़ती है। अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह विरेचन कराती है। इसका स्वाद एवं गन्ध अच्छी होने के कारण अनेक बल्य एवं पाचक औषधियों के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। इसमें टॅनिन न होने के कारण यह ग्राही भी नहीं होता है। ज्वर में इससे लाभ होता है।

मात्रा—चूर्ण ५/१५ र० ।

४६. (ख) खुरासानी कुटकी

हिं०—खुरासानी कुटकी। गु०—कडू। म०—कडू। अ०—खेरतिक। इरान—खेरबेकसीआ। अं०—Black hellebore (ब्लैक् हेलीबोर), Christmas rose (क्रिस्टमस रोज़)। ले०—Helleborus niger Linn. (हेलीबोरस नाइगर)। Fam. Rananculaceae (रेनन्क्युलेसी)।

इस वनस्पति के मूल नेपाल, हिमालय और अरब से आते हैं। कुटकी में इसकी मिलावट रहती है। विशेष वर्णन कुटकी के साथ दिया गया है।

रासायनिक संगठन—इसमें हेल्लेबोरिन् (Helleborin) तथा हेल्लेबोरेइन् (Helleborein) नामक पदार्थ पाये जाते हैं।

गुण और प्रयोग—यह हृद्य, ज्वरहर, वेदनाहर, विरेचक, आर्तववृद्धिकर एवं कृमिघ्न है। अधिक मात्रा में यह विषैली औषधि है। इससे हृदयातिपात होकर मृत्यु हो सकती है। अधिक मात्रा से प्रथम वमन और विरेचन प्रारम्भ होता है, फिर नाड़ी की गति कम होते-होते मृत्यु हो सकती है।

(१) हृदय की अकार्यक्षमता के कारण उत्पन्न जलोदर में पुनर्नवा, अपामार्ग, चिरायता एवं सोंठ के साथ इसका क्वाथ बहुत लाभकर होता है। हृदय पर इसकी क्रिया डिजिटेलिस् के समान होती है। इससे हृदय को बल मिलता है एवं नाडी की गति मंद होकर नाडी बलवान् होती है और जलोदर दूर होता है।

(२) वेदनायुक्त ज्वर जैसे फुफ्फुस पाक, तीव्र सन्धि शोथ एवं प्रसूतिज्वर आदि में इसके प्रयोग से लाभ होता है। इन रोगों में इसकी क्रिया वत्सनाभ के समान होती है।


१. 'कटुम्बरे'ति पा.।

हरीतक्यादिवर्गः २७१ (३) इसके क्वाथ से व्रण प्रक्षालन करने से व्रणपीडा दूर होती है। यह स्थानिक वेदनाहर भी है। मात्रा-चूर्ण ४-८ र० । अथ किरातकस्य (चिरायता) नामगुणानाह किराततिक्तः कैरातरतः कटुतिक्तः किरातकः ।।१५३।। काण्डतिक्तोऽनार्यतिक्तो भूनिम्बो रामसेनकः ।। किरातकोऽन्यो नैपालः सोऽर्द्धतिक्तो ज्वरान्तकः ।।१५४।। किरातः सारको रूक्षः शीतलस्तिक्तको लघुः । सन्निपातज्वरश्वासकफपित्तास्रदाहनुत् । कासशोथतृषाकुष्ठज्वरव्रणकृमिप्रणुत् ।।१५५।। चिरायता के नाम तथा गुण-किराततिक्त, कैरात, कटुतिक्त, किरातक, काण्डतिक्त, अनार्यतिक्त भूनिम्ब और रामसेनक ये सब चिरायता के नाम हैं। नेपाल देश में एक प्रकार की चिरायता उत्पन्न होती है जो कि इसकी अपेक्षा आधा तिक्तरसयुक्त होती है। अतएव उसे 'अर्धतिक्त' कहते हैं। वह ज्वरनाशक होती है। चिरायता-सारक (दस्तावर), रूक्ष, शीतल, तिक्तरसयुक्त एवं लघु होती है एवं सन्निपातज्वर, श्वास, कफ, पित्त, रक्तदोष, दाह, कास, शोथ, प्यास, कुष्ठ, ज्वर, व्रण और कृमि इन सबों को दूर करती है।।१५३-१५५] ४७. किरात (चिरायता) हिं०-चिरायता, चिरेता, चिरैता, चिराइता। बं०-चिराता, चिरेता। म०-काडेचिराईत, चिराइता। गु०- करियातुं। क०-नेलंबेडु। ते०-नीलवेमु। ता०-निलस्वेम्बु । फा०-नोनिहाद, मोनिहादन्दी। अ०-कसबुज्जराीरा, कसबुज्झारिरा, कसबुल् रायरह। अं०-Chireta (चिरेटा)। ले०-Swertia Chirata (Buch-Ham) । (स्वर्शिया चिराटा) Fam. Gentianaeae (जेन्शियार्नेंसी)। चिरायता हिमालय पहाड़ के गरम प्रान्तों में कश्मीर से भूटान तक और खासिया के पहाड़ पर उत्पन्न होता है। प्रायः पृथ्वी के सब देशों में १८० प्रकार का चिरायता पाया जाता है, इनमें हमारे देश में ३७ प्रकार का होने का अनुभव किया गया है। जिस चिरायते को हम लोग व्यवहार में लाते हैं और जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है, वह हिमालय पहाड़ के लगभग ४ हजार से १० हजार फीट ऊँची चोटियों पर तथा खासिया के पहाड़ पर ४ हजार से ५ हजार फीट की ऊँची चोटियों पर उत्पन्न होता है। इसका वर्षायु क्षुप-दो फीट से ५ फीट तक ऊँचा होता है। कांड-नारंगी कालासा या जामुनी, मूल की तरफ गोल, मोटा, ऊपर बहुशाखा युक्त तथा चौपहल; पत्र-चौड़े भालाकार, ४ x १.५ इञ्च, चिकने, नोकदार, ३ से ७ शिराओं से युक्त, विपरीत; दलपत्र-हरित पीत, परंतु बैंगनी रंग की छाया भी हो सकती है। प्रत्येक विच्छेद पर दो- दो हरिताभ और रोमश ग्रन्थियाँ होती हैं। फूलने पर इसमें डोंडी लगती है जिनमें बहुत, बारीक बीज निकलते हैं। पुष्पित होने पर सम्पूर्ण क्षुप को उखाड़ कर सुखाकर बेचते हैं जिसका औषधि में व्यवहार होता है। यह अत्यन्त कड़वा होता है। रासायनिक संगठन-इसमें चिरातिन् (Chiratin, C₅₂H₉₆O₃₀) और ओफेलिक् एसिड (Ophelic acid, C₂₆H₄₀O₂₀) नामक दो कडुवे द्रव्य १.४२-१.५२% रहते हैं। इनमें पहला हलके पीले रंग का पदार्थ है एवं दूसरा

२७२ भावप्रकाशनिघण्टुः भी हलके पीले बादामी रंग का, आर्द्र, चासनी की तरह पदार्थ होता है जो जल तथा मद्यसार में घुल जाता है। इसके अतिरिक्त इसमें यवक्षार, चूना, राल एवं ओलिक् (Oleic), पामिटिक् (Palmitic) और स्टियरिक् अम्ल (Stearic acids) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। **गुण और प्रयोग—**चिरायता दीपन, पाचन, तिक्तपौष्टिक, ज्वरहर, दाहप्रशमन, पित्तविरेचक एवं कृमिघ्न है। जेन्शियन की तरह ही यह लाभदायक है। इसके प्रयोग से भूख बढ़ती है, पखाना साफ होता है तथा पुराने ज्वर में लाभ होता है। इसका उपयोग स्वतन्त्र की अपेक्षा अन्य औषधियों के साथ अधिक किया जाता है। इसका प्रयोग ज्वर, विषमज्वर, दाह, अग्निमान्द्य, शैथिल्यप्रधान, कुपचन, आध्मान, अम्लपित्त, यकृत् विकार, कामला, पांडु, श्वास, शोथ, गण्डमाला तथा कृमिरोग एवं व्रण में किया जाता है। (१) पुराने ज्वर में जब अग्निमांद्य तथा शरीर में दाह रहता है तब इसके फांट या चूर्ण से लाभ होता है। सुदर्शन चूर्ण, जिसमें इसकी आधी मात्रा रहती है, बहुत व्यवहार में आता है। (२) रोग संनिवृत्तावस्था में पाचन सुधारने के लिए तथा अग्निवृद्धि के लिए बल्य औषधि के रूप में इसके फाण्ट का व्यवहार लौंग, दालचीनी आदि सुगन्धि औषधियों के साथ किया जाता है। (३) हिचकी, गर्भिणीवमन एवं मद्यपान करने वालों में यदि वमन हो तो इसके चूर्ण का क्वाथ का प्रयोग मधु या शर्करा मिलाकर करते हैं। (४) वातरक्त में बल्य औषधि की तरह इसका प्रयोग किया जाता है। (५) उष्ण कटिबन्धज यकृत् विकारों में धनियाँ तथा चिरायते का क्वाथ मधु के साथ देने से लाभ होता है। (६) भूनिम्बादि चूर्ण जिसमें चिरायता, कुटकी, त्रिकटु, मुस्तक, इन्द्रयव, कुरैया की छाल एवं चित्रक आदि पदार्थ रहते हैं, उसका व्यवहार कुपचन, संग्रहणी, ज्वर तथा कृमिरोग में किया जाता है। (७) सुदर्शन चूर्ण तथा टङ्क

हरीतक्यादिवर्गः २७३ (४) S. paniculata Wall. (स्व० पॅनिक्युलॅटा) बं०- कड़वी । (५) S. perennis Linn. (स्व० पेरेन्न्रिस) । (६) S. corymbosa Wight (स्व० कोरिम्बोसा) । (७) S. affinis Clarke (स्व० अफिनिस्) । (८) Exacum bicolor Roxb. (एक्झाँकम् बाइकलर) ।—हिं०—बड़ा चिरायता । इसका क्षुप दक्षिण में कोंकण में बरसात के दिनों में उत्पन्न होता है । पुष्प—श्वेत और सुन्दर । दलपत्रों के अन्तिम हिस्से जरा नीले से रहते हैं । गुण—पौष्टिक, अग्निवर्धक एवं करू की तरह । (९) E. tetragonum Roxb. (ए० टेट्रागोनम्)—हिं०—तितखन, म०—ऊदकिराईत । इसका वर्षायु क्षुप—उत्तर हिन्दुस्तान के पहाड़ी प्रदेश एवं हिमालय पर उत्पन्न होता है । यह एक हाथ ऊँचा, कांड—चौपहल; पत्र—विपरीत, विनाल, शल्याकृति लेकिन कुछ चौड़े, एक अङ्गुल लम्बे और ५ शिरायुक्त; पुष्प—नीले । गुण—दीपन एवं कडुवा पौष्टिक । इसका प्रयोग जीर्णज्वर तथा कुपचन में किया जाता है । (१०) Erythraea roxburghii G. Don (एरिथ्रिआ रॉक्सवर्गाय) । बं०-गिर्मि । म०—लुन्तक । इसका छोटा क्षुप सभी जगह किन्तु समुद्र के किनारे तथा तर जमीन में अधिक होता है । यह बंगाल में नहीं होता । गुजरात तथा उत्तरी कोंकण में बहुत होता है । इसका क्षुप—एक बित्ता ऊँचा एवं बहुत शाखायुक्त होता है । कांड—सीधा, चौपहल एवं मूल से ऊपर तक पत्र युक्त । पत्र—विपरीत, विनाल, शल्याकृति, सनाय वा इमली की तरह एवं ३ शिरायुक्त । पुष्प—श्वेत, छोटे, विनाल, प्रत्येक कोण में ३, ३ । फल—गोल फली । स्वाद—अत्यन्त कडुवा । इसके पञ्चांग का व्यवहार गुजरात तथा मद्रास में अधिक किया जाता है । गुण और प्रयोग—यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक, आनुलोमिक एवं तिक्त पौष्टिक है । इसकी रत्ती दो रत्ती मात्रा में कुपचन में देते हैं । व्यामिश्रण—इनमें से प्रथम दो जेन्शियानेसी (Gentianaceae) वर्ग के हैं । (१) S. angustifolia Buch.-Ham. (स्व० अँगरिस्टफोलिया)—इसका कांड—चौपहल एवं पंखयुक्त होता है । यह स्वाद में चिरायते की अपेक्षा कम कटु होता है एवं इसमें पिथ कोष (Pith cells) बहुत ही अल्प रहते हैं । (२) S. alata Royleex D. Don (स्व० अॅलाट)—यह बिलकुल कडुवा नहीं होता । इसमें पिथ (Pith) पूर्ण सम्बंधित रहता है । चिरायता इससे अधिक गहरे रंग का, स्वाद में अत्यन्त कडुवा और इसका पिथ (Pith) सतत (Continuous) रहता है । (३) Rubia cordifolia Linn. (रूबिया कॉर्डिफोलिया) (Fam.–Rubiaceae– रूबिएसी)—इसकी पहचान इसके बैंगनी (Purple) रंग से हो जाती है । (४) Andrographis paniculata Nees (Fam. Acanthaceae–(अॅकेन्थेन्सी) (अंड्रोग्राफिस् पॅनिक्युलॅटा)– हि० कालमेघ । इसके कांड हरे, अनेक सीधी, पतली विपरीत शाखाएँ एवं पत्र भालाकार और हरे होते हैं जिससे इसका भेद किया जा सकता है । देशी चिरायता के नाम से यह बजार में बिकता है । अथेन्द्रयवस्य नामगुणानाह उक्तं कुटजबीजं तु यवमिन्द्रयवं तथा । कलिङ्गं चापि कालिङ्गं तथा भद्रयवा अपि ।। १५६ ।। २१ भाव.I., CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

२७४ भावप्रकाशनिघण्टुः इन्द्रयव के नाम तथा गुण-कुटज (कुडा या कुरैया) के बीज को इन्द्रयव कहते हैं उसके नाम-कुटजबीज, यव, इन्द्रयव, कलिङ्ग, लिङ्ग का और भद्रयव ये सब हैं। [१५६] ❖ इति क्लीबेऽमरोप्यह ।।१५६।। 'अमर सिंह ने 'अमरकोश' में इन्द्रयव को नपुंसकलङ्ग कहा है। [१५६] क्वचिदिन्दस्य नामैव भवेत्तदभिधायकम् । फलानीन्द्रयवास्तस्य तथा भद्रयवा अपि ।।१५७।। कहीं पर इन्द्र के जो नाम हैं वे ही इन्द्रजव के भी समझे जाते हैं और कुरैया के फल का इन्द्रयव तथा भद्रयव नाम हैं। [१५७] ❖ इति धन्वन्तरिः प्राह ।।१५७।। यहाँ पर यह और समझना चाहिये कि यह वचन 'धन्वन्तरि' भगवान् का है, इससे इन्द्रयव का पुल्लिङ्ग में भी प्रयोग होता है ।।१५७।। इन्द्रयवं त्रिदोषघ्नं संग्राहि कटु शीतलम् ।।१५८।। ज्वरातीसाररक्तार्शोवमिवीसर्पकुष्ठनुत् । दीपनं गुदकीलास्रवातास्रश्लेष्मशूलजित् ।।१५९।। इन्द्रजव त्रिदोषनाशक, संग्राही, कटु रस युक्त और शीतल है। यह ज्वर, अतिसार, खूनी बवासीर, वमन, वीसर्प एवं कुष्ठ को दूर करने वाला, अग्निदीपक एवं गुदकील, रक्तदोष, वातरक्त, कफ तथा शूल को दूर करता है। [१५८-१५९] ४८. इन्द्रयव हिं०-इन्द्रजव, कड़वा इन्द्रजव । गु०-इन्दर जव, इन्द्र जव । म०-कुड्याचे बी । ले०-Holarrhena antidysenterica Wall. (हॉलेहीना एण्टिडिसेण्टेरिका) । Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी) । कुड़ा वृक्ष की फलियों के बीज को 'इन्द्रजव' कहते हैं। यह देखने में जई के आकार का होता है। इन्द्रजव कड़वा और इन्द्रजव मीठा इन भेदों से यह दो प्रकार का होता है। मीठा या कम कड़वा इन्द्रजव, कुटज भेद, राइटिया टिन्क्टोरिया (Wrightia tinctoria B. Br.) के बीज को कहते हैं जो कम गुण वाला होता है। इनका शेष परिचय कुटज वृक्ष के प्रकरण में दिया जायगा। गुण और प्रयोग-यह कडुवा, दीपन, संग्राही, ज्वरहर, कृमिघ्न, वातानुलोमक, वृष्य, बल्य एवं रक्तसंग्राहक है। इसका प्रयोग रक्तातिसार, ज्वरातिसार, शीतज्वर, रक्तार्श, संग्रहणी, प्रवाहिका, पथरी तथा श्वास एवं पुराने फुप्फुस विकारों में किया जाता है। इसको भूनकर फांट, क्वाथ या चूर्ण के रूप में दिया जाता है। (१) बच्चों के रक्तातिसार में कड़वा इन्द्रजव एवं नागरमोथा के क्वाथ में मधु मिलाकर दिया जाता है। (२) रक्तार्श में सोंठ के साथ इसके क्वाथ को देने से लाभ होता है। इसको दूध के साथ क्वाथ करके देने से इसमें बहुत लाभ होता है। (३) कुपचन, उदरशूल एवं अग्निमान्द्य आदि के लिये इसके चूर्ण को अल्प मात्रा में नित्य लेने से लाभ होता है। वमन में इसको भूनकर या फांट या क्वाथ बनाकर देना चाहिये। (४) पुराने फुप्फुस के विकार तथा दमा में इसका व्यवहार किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २७५ (५) पर्यायिकज्वर तथा शीतज्वर में इसको गुडुच के साथ क्वाथ बनाकर देना चाहिये। नित्य इन्द्रजव का चूर्ण खाते रहने से शीतज्वर नहीं आता। (६) पूयदन्त (Pyorrhoea) में मसूढ़ों पर इसके चूर्ण को मलने से रक्तस्राव कम होता है तथा पूय एवं दुर्गन्धि दूर होती है। मात्रा—चूर्ण १-४ माशा भूनकर या १/४-१/२ तो० क्वाथ बनाकर। मीठा इन्द्रयव बलवर्धक है तथा धातुपौष्टिक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। अथ मदनस्य (मैनफल) नामगुणानाह मदनश्छर्दनः पिण्डो नटः¹ पिण्डीतकस्तथा। करहाटो मरुवकः शल्यको विषपुष्पकः ।।१६०।। मदनो मधुरस्तिक्तो वीर्योष्णो लेखनो लघुः । वान्तिंकृद्विद्रधिहरः प्रतिश्यायव्रणान्तकः ।। रूक्षः कुष्ठकफानाहशोथगुल्मव्रणापहः ।।१६१।। मैनफल के नाम तथा गुण—मदन, छर्दन, पिण्ड, नट, पिण्डीतक, करहाट, मरुवक, शल्यक तथा विषपुष्पक ये सब मैनफल के नाम हैं। मैनफल—मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, उष्णवीर्य, लेखन, लघु, वमनकारक, विद्रधिरोग को दूर करने वाला, प्रतिश्याय (जुकाम) और व्रण का नाशक, रूक्ष एवं कुष्ठ, कफ, आनाह, शोथ, गुल्म तथा क्षत को दूर करने वाला होता है। [१६०-१६१] ४९ मदन (मैनफल) हिं०—मैनफल, मयनफल। बं०—मैनफल, मयना कांटार गाछ। म०—गेल, गेलफल। गु०—मींढोल, मींढल। क०—मंगरिक्कै। ते०—वसन्त कड़िमि चेट्टु, मण्डचेट्टु, मंगचेट्टु। ता०—मरकलन, पुंगारै। ने०—मैदल। फा०— झुझ-उल्-कुच्। अ०—जौजुल कौसल। अं०—Emetic Nut (एनेटिक नट्), (Bushy Gardenia (वुशी गार्डेनिया)। ले०— Randia dumetorum Lam. (रेंडिया ड्युमेटोरम्)। Fam. Rubiaceae (रूबियेसी)। यह हिमालय के साधारण प्रदेश में जम्मू से पूरब की ओर सिक्कम तथा दक्षिण की ओर चट्टगाँव, खासिया पहाड़, सिलहट आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसका वृक्ष—१-१।। इञ्च लम्बे-लम्बे मजबूत पत्र कोणीय काँटों से भरा हुआ छोटे कद का होता है। छाल— भूरे रङ्ग की लकड़ी—सफेद या भूरे रंग की होती है। पत्ते १-२ इञ्च लम्बे ऊपर से लट्वाकार और क्रमशः पतले होकर पंखयुक्त पत्रनाल में परिवर्तित होते हैं और प्रायः दलबद्ध होकर रहते है। फूल—पाँच पंखड़ी वाले किञ्चित् हरिताभ, सफेद और सुगन्धयुक्त होते हैं। फल—जङ्गली अञ्जीर, सुपारी या अखरोट के आकार के होते हैं और पकने पर पीले पड़ जाते हैं। बीज—बीहीदाने के समान होते हैं। इन्हीं फलों को मैनफल कहते हैं। रासायनिक संगठन—इसके फल में सॅपोनिन् (Saponin) तथा ह्वैलिरियानिक् एसिड (Valerianic acid), मोम, राल एवं रञ्जक पदार्थ आदि पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—मैनफल बहुत अच्छा वमन द्रव्य माना गया है। प्राचीन शास्त्रकारों में इसके बीजों को एक विशेष प्रकार से संग्रह कर व्यवहार करने को लिखा है। नये ग्रन्थकार इसके बीज व फल की छाल को वामक नहीं मानते लेकिन इसके गूदे (Pulp) को वामक मानते हैं। डॉ० देसाई प्राचीन मत से सहमत हैं। कुछ भी हो सम्पूर्ण फल वामक अवश्य है। कुछ विद्वान् इसको इपीकाक् का अच्छा प्रतिनिधि बतलाते हैं। इसका उपयोग गर्भपात कराने के लिये किया जाता हैं तथा यह मछलियों के लिये विषैला है। १. 'राठः' इति पाठा. ।

२७६ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) एक फल कूट कर २ १/२ तो० जल में १ घंटा भिगोकर रखना चाहिये । फिर पत्थर के खरल में घोंटकर, कपड़े से छान कर, उसमें थोड़ा मधु तथा पीपर मिलाकर खाली पेट पिलाने से १ घण्टे बाद १-२ साफ वमन हो जाता है और कभी-कभी बाद में विरेचन भी होता है । इस वामक प्रयोग को हृष्ट-पुष्ट मनुष्य में व्यवहार में लाना चाहिये । (२) इसके २-३ फलों के गूदे को कूट कर १/२ पाव जल में १०-१५ मिनट मसल कर छानकर प्रयोग किया जाय तो प्रायः १० मिनट में हल्लास और वमन शुरू हो जाता है । इसको देने के बाद उष्ण जल पिलाने से और भी वमन होता है । या केवल १ फल का गूदा भी पर्याप्त हो सकता है । (३) इसके गूदे को सुखाकर रख सकते हैं तथा १ से ४ माशे तक वामक औषधि के रूप में या १-१/२-५ र० कफनिःसारक एवं स्वेदल औषधि के रूप में व्यवहार में ला सकते हैं । (४) मुलेठी, मन्दार एवं मैनफल का चूर्ण २-७ र० देने से श्वास तथा खाँसी में लाभ होता हैं एवं अधिक मात्रा में (१०-३० र०) अजीर्ण, शूल, शिरःशूल और अण्डकोष शोथ में वमन कराने के लिये देते हैं । (५) अन्य सुगन्धि औषधियों के साथ रक्तातिसार, पार्यायिक ज्वर एवं शिरःशूल में इसके गूदे को देते हैं । अतिसार में १ से २ माशा गूदा दिया जाता है । यह इपीकाक् का अच्छा प्रतिनिधि है । (६) इसके गूदे का टिंक्चर १५-६० बूँद कुकास एवं पागलपन में तथा उद्वेष्ठन निरोधि एवं शामक औषधि के रूप में व्यवहार में लाया जाता है । (७) इसका फलत्वक् एवं बीज विरेचक एवं कृमिघ्न है एवं बच्चों में पित्तमयता तथा कृमि दूर करने के लिये व्यवहार में आता है । (८) इसके वृक्ष की छाल का बाह्य लेप शोथहर एवं वेदनाहर है एवं आमवात, फोड़े तथा चोट एवं हड्डियों की पीड़ा पर लगाया जाता है । अतिसार, संग्रहणी, ज्वर तथा आमवात में इस वृक्ष की छाल का आन्तरिक प्रयोग में किया जात है । कांजी के साथ इसके फल को पीस कर नाभि के चारों तरफ लगाने से उदरशूल दूर होता है । मुखदूषिका (acne) एवं फोड़े आदि में इसके फल के लेप से लाभ होता है । (९) बच्चों में दन्तोद्भेद के समय ज्वर आदि होने पर इसके गूदे के चूर्ण को तालू तथा मसूढ़ों पर रगड़ते हैं । (१०) बन्ध्यत्व दूर करने के लिये ६ माशा इसके बीज के चूर्ण को दूध, शक्कर वा केशर के साथ खिलाना चाहिये तथा ८, १० रत्ती चूर्ण की गुड़ के साथ बत्ती बनाकर योनि में धारण करानी चाहिये । इस प्रयोग से गर्भाशय शोथ आदि विकार दूर होकर कष्टार्तव एवं अनियमितार्तव आदि में भी लाभ होता है । (११) सर्पविष में यह औषधि लाभदायक है । इसके मूल को बैल के मूत्र में पीसकर अंजन कराया जाता है तथा शुष्क मज्जा का आन्तरिक प्रयोग (५-१५ र०) करते हैं । मात्रा-वामक-१ फल का हिम । गूदे का चूर्ण १-४ माशा । अन्य गुणों के लिये २-४ रत्ती । अथ रास्नाया नमागुणानाह रास्ना युक्तरसा रस्र्या सुवहा रसना रसा । एलापर्णी च सुरसा सुगन्ध्या श्रेयसी तथा ।।१६२।। रास्नाऽऽमपाचिनी तिक्ता गुरूष्णा कफवातजित् ।।१६३।। शोथश्वाससमीरास्रवातशूलोदरापहा । कासज्वरविषाशीतिवातिकामयसिध्महृत् ।।१६४।। रास्ना के नाम तथा गुण-रास्ना, युक्तरसा, रस्र्या, सुवहा, रसना, रसा, एलापर्णी, सुरसा, सुगन्धा तथा श्रेयसी, ये सब रास्ना के नाम हैं । रास्ना-आम को पचाने वाली, तिक्तरस युक्त, गुरु, उष्णवीर्य और कफ वात नाशक है तथा

हरीतक्यादिवर्गः २७७ शोथ, श्वास, वातरक्त, वातशूल, उदर रोग, कास, गुरु, उष्णवीर्य और कफ वातनाशक है तथा शोथ, श्वास, वातरक्त, वातशूल, उदर रोग, कास, ज्वर, विष अस्सी (८०) प्रकार के वात रोग तथा सिध्म इन सबको दूर करती हैं। [१६३-१६४] ५०. रास्ना आज कल वैद्य समाज में रास्ना एक भ्रमात्मक औषधि मानी जा रही है। वात विकारों के लिये आयुर्वेद में इसका प्रयोग रास्नादि, महारास्नादि क्वाथ के रूप में बहुत किया जाता है। भिन्न-भिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न औषधि रास्ना नाम से ली जाती है। प्राचीन ग्रन्थों में इसके परिचय में निम्न श्लोक प्राप्त होते हैं। रास्ना तु त्रिविधा प्रोक्ता मूलं पत्रं तृणं तथा। ज्ञेयौ मूलदलौ श्रेष्ठौ तृणरास्ना तु मध्यमा। (रा. नि.) अथ रास्ना भृङ्गपत्रा पाषाणादौ प्रजायते। गिरौ च लघु-रास्ना स्यात् ततो हीनगुणा स्मृता ।। (शिवदत्तः) सुगन्धमूला, एलापर्णी ।। नीचे रास्ना नाम से ली जाने वाली विभिन्न वनस्पतियों का वर्णन अलग-अलग किया गया है। (१) Pluchea lanceolata Oliver & Hiern (प्लूचिया लॅन्सिओलॅटा)। Fam. Compositae (काम्पोज़िटी)। हि०-रायसन, रोशना, वायसुरई। पं०-रासन। सिन्ध०-कौरसन। रा० पु०-छोटा कलिया। अलीगढ़-वनसेरई, वनसोरई, वायसुरई। आगरा-छोटी कलिया। कानपुर-सुरही, सोरहि। बिहार-रोशना, रचना, रोचना। यह अपर बंगाल, बिहार, अवध, कानपुर और पश्चिम की ओर पञ्जाब तथा सिन्ध तक पाई जाती है। पत्तों का आकार रास्ना अर्थात् जिह्वा के सदृश होने से इसका नाम रास्ना रखा गया है। इसी के आधार पर उत्तर प्रदेश, पश्चिमोत्तर प्रदेश आदि जगहों के अधिकांश वैद्य वायसुरई को ही 'रास्ना' मानते हैं। बिहार के ग्रामीण इसको 'रचना' और 'रोचना' के नाम से पुकारते हैं। मालूम होता है कि-रचना शब्द रसना का अपभ्रंश है। बिहार के अधिकांश वैद्य भी इसको उपयोग में लाते हैं। श्रीमान् ठा० बलवन्त सिंहजी इसी को उपयोग में लाने की सलाह देते हैं। इसका क्षुप-१-२ फीट ऊँचा, अनेक शाखा-प्रशाख करके झाड़दार तथा उन पर असंख्य बारीक भूरे रङ्ग के रोवें होते हैं। पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे सनाय के पत्तों के आकार वाले किन्तु उससे बड़े होते हैं तथा सूखने पर पीलापन लिये भूरे रङ्ग के हो जाते हैं। पर्णवृन्त छोटा एवं ऐंठा हुआ होता है। पतली-पतली शाखाओं के अन्त में नन्हें-नन्हें बैंगनी रङ्ग के फूलों की घुण्डियाँ लगती हैं। गुण और प्रयोग-इसके पत्र सनाय की तरह भेदन हैं तथा सनाय के स्थान पर प्रयोग में आते हैं। (२) Inula racemosa Hook. f. (इनुला रेसिमोसा)। Fam. Compositae (कॉम्पोझिटी)। फा०- रासन, कुछ-इ-शामी। अ०-जंजबीलशमी। ईरान०-पिल्गूष् घार्ष। कश्मीर-पोष्कर। डॉ. देसाई अन्य शास्त्रज्ञों के साथ सहमत होते हुए रास्ना के स्थान पर इसी क्षुप के मूल को व्यवहार करने की सलाह देते हैं क्योंकि इसके गुण रास्ना से मिलते जुलते हैं। कुछ अन्य विद्वान् इनूला को पुष्करमूल मानते हैं स्थान भेद से इसके क्षुप की ३, ४ जातियाँ पाई जाती हैं। यह काश्मीर तथा उत्तर-पश्चिम हिमालय में होती है। भारत में जहाँ-जहाँ सुगन्ध कूठ होता है वहाँ-वहाँ यह उत्पन्न होने से तथा उसके समान दिखलाई देने से कूठ में इसकी मिलावट की जाती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

२७८ भावप्रकाशनिघण्टुः रासन का क्षुप-५ फीट तक ऊँचा एवं दृढ़ होता है। पत्र-चर्मवत्, ऊपर से खुरदरे एवं नीचे से घनरोमश तथा दन्तुर होते हैं। आधारीय पत्र ८-१८ इञ्च × ५-८ इञ्च बड़े, दीर्घ वृत्ताकार-भालाकार एवं लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। काण्डपत्र अंडाकार-आयताकार, अर्धकाण्डांसक्त एवं प्रायः आधार पर गहराई तक खंडित होते हैं। पुष्प-पीत वर्ण के १.५-२ इञ्च व्यास के गुच्छों में आते हैं। फल-छोटे, महीन एवं अग्र पर रक्ताभ रोमयुक्त होते हैं। इसकी ताजी जड़ में ओरिस् एवं कर्पूर जैसी तीव्र गंध होती है जो रखने पर कम हो जाती है। रासायनिक संगठन-रासन में अल्प मात्रा में उड़नशील तैल और इनुलिन् (Inulin) होता है। तैल में एलेण्टोलॅक्टोन (Alantonactone, C₁₅ H₂₀ O₂) नामक एक कृमिनाशक, कफनिःसारक एवं मूत्रल द्रव्य होता है। गुण और प्रयोग-यह पाचन, वातहर, कफहर, श्वासहर एवं गर्भाशय संकोचक है। इसका क्वाथ आधमान, उदरशूल, कुपचन, अनार्तव, कष्टार्तव, फुफ्फुस विकार जैसे दमा, जीर्ण श्वसनिका शोथ, क्षय, फुफ्फुसावरण शोथ एवं आमवात तथा अन्य वातिक रोगों में दिया जाता है। इससे ज्वर तथा सूजन कम होती है तथा वेदना दूर होती है। कण्डू आदि त्वचा के रोगों में इसके क्वाथ को शरीर पर लगाया जाता है। मूल को गोमूत्र में रगड़ कर खुजली, दाद एवं पामा आदि पर लगाया जाता है। राजयक्ष्मा के जन्तुओं से उत्पन्न त्वचा के व्रणों में इससे लाभ होता है। जन्तुओं के विष को दूर करने के लिये इसका उपयोग करते हैं तथा इससे वेदना कम होती है। प्रतिनिधि-कूठ। (३) Vanda roxburghii B. Br. (वॅण्डा रॉक्सवर्गाई) । Fam. Orchidacene (ओरचिडॅसी)। बांद्रा, वंगीर्य रास्ना। बं०-रास्ना। संताल-दरेबंकि। क०-मरवाले। ते०-कनपचेट्टू, वदनिके, नेरदानचेट्टू । यह बंगाल, बिहार, गुजरात तथा कोंकण से ट्रावनकोर तक प्राप्त होते हैं। इसके पौधे-प्रायः आम और मधूक वृक्षों की डालियों पर उगे हुए पाये जाते हैं। काण्ड-१-२ फीट लम्बा तथा उसकी ग्रन्थियों से अनेक मोटे और मांसल वातलम्बी (Epiphytic = एपिफाइटिक्) मूल निकले रहते हैं। पत्तियाँ-६-८ इञ्च लंबी, मध्य पर्णुक पर गहरी और दो कतारों में निकली हुई रहती है। सदण्डिक पुष्पमंजरियाँ पत्तियों से लम्बी होती है। पुष्प-व्यास में १ १/२-२ इञ्च और पंखड़ियाँ प्रायः मिश्रित वर्ण की होती हैं। वे अधिकतर पीताभ और कभी-कभी नीलाभ होती हैं और उनके कुछ भागों में बदामी, बैंगनी तथा सफेद रंग भी होते हैं। फल-३-३ १/२ इञ्च लम्बा और सन्धियों पर रीढ़दार होता है। इसके मूल का उपयोग किया जाता है। बंगाल के अधिकांश कविराज इसी को उपयोग में लाते हैं। वे प्रायः वाटिकाओं में आम के वृक्षों की मोटी टहनियों के ऊपर की खुरदरी छाल को पृथक् कर उस पर उक्त रासन को शोरियाँ युक्त बिठा रस्सी में बाँध कुछ मिट्टी का अंश दे पानी से कुछ रोज सींचा करते हैं। गुण और प्रयोग-आमवातादि में इससे कुछ लाभ होता है। ज्वर में सर्वाङ्ग पर इसके पत्तों का लेप किया जाता है। कर्णस्राव में इसके पत्तों का रस कान में डालते हैं। अनेक वातविकारों तथा आमवातादि में बाह्य प्रयोग के लिये इससे बने तेल का उपयोग किया जाता है। यह फिरङ्ग की द्वितीयावस्था तथा वृश्चिक दंश पर लाभदायक है। (४) Saccolabium papillosum Lindl. (सॅक्कोलेविअम् पॅप्पिल्लोसम्)। Fam. Orchidaceae (ऑरचिडॅसी)। क०-मरवाले। म०-कानभेर। इसके बाँदे भी आम्रवृक्ष के ऊपर होने वाले बाँदों की तरह दिखलाई देते हैं। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक है तथा इसका आमवातादि में प्रयोग होता है। केले के पत्तों में इसके पत्ते लपेटकर पुटपाक करके उसके रस को मधु के साथ कर्णपिटिका के लिये कान में डालते हैं जिससे कर्णपीड़ा दूर होती है।

हरीतक्यादिवर्गः २७९ (५) Tylophora asthmatica W. & A. (टाइलोफोरा एस्थ्मेटिका)। Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी)। हिं०-अंतमूल, जंगली पिकवन। बं०-अन्तोमूल। म०-पितकारी, खडकी रास्ना। ता०-नायपालै। ते०- वेरिपल। मल०-वल्लीपाल। क०-किरूमंजि। उडि०-मेंडी। सं०-मूलिनी, मूलरास्ना, पित्तवल्ली, आन्त्रपाचक। इसकी लता उत्तरी बंगाल, आसाम, कछार, उड़ीसा, कोंकण, दक्षिणी भारत, कनारा, मद्रास प्रान्त एवं पूर्व पाकिस्तान, वर्मा, मलाक्का द्वीप तथा लंका आदि स्थानों पर पायी जाती है। यह रेतीली भूमि पर अधिक होती है। बंबई के बजार में रास्ना के नाम से इसके मूल भी बिकते हैं। इसकी बहुवर्षायु लता होती है। पत्र-२ से ५ इञ्च लम्बे, १ से २ इञ्च चौड़े, लट्वाकार या अंडाकार, तीक्ष्णाग्र वा लम्बाग्र, आधार पर तांबूलाकार, अखण्ड, सनाल, ऊपरी पृष्ठ चिकना, अधोपृष्ठ रोमश भूरे रंग का, ताजी अवस्था में स्वाद एवं गंध हल्लासकर एवं सूखने पर गन्धहीन एवं रुचिहीन। पुष्प-बहुत, छोटे, हलके पीले रंग के, अन्दर से बैंगनी एवं गुच्छों में। फल-(Follicle)-२ से ४ इञ्च लंबा अग्र की तरफ नुकीला होता जाता है। मूल-बहुत लम्बे, मांसल, अनेक, बारीक, हलके पीले या मटमैले तन्तुयुक्त, अन्दर से हलके पीले रंग के, आसानी से टूटने वाले, गन्धहीन, स्वाद प्रारंभ में मीठा लेकिन बाद में कटु। इसकी लता ईश्वरमूल की तरह दिखलाई देती है लेकिन उसके पत्र के दोनों पृष्ठ हरे और चिकने तथा पुष्प बड़े होते हैं। इसके मूल तथा पत्र का व्यवहार किया जाता है जिनमें पत्र अधिक गुणकारी हैं। रासायनिक संगठन-इसमें टाइलोफोराइन् (Tylophorine, C₂₄ H₂₇ O₄ N), टाइलोफोरिनाइन् (Tylophorinine C₂₃ H₂₇ O₄ N, O.5 H₂O), ये दो रवेदार क्षाराभ, एक उड़नशील तैल ०.२६%, एक रंगहीन रवेदार अन्य पदार्थ ०.१८%, खनिज (Mineral matter) १५% तथा एक वामक द्रव्य आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-इसके मूल तथा पत्र अच्छे वामक, कफनिःसारक, स्वेदल, रक्तशोधक, आनुलोमिक एवं आमपाचक हैं। यह एपीकॅक् के अच्छे प्रतिनिधि हैं। अल्प मात्रा में इससे खाँसी दमा, बच्चों की कुक्कुर खाँसी, अतिसार एवं संग्रहणी आदि में बहुत लाभ होता है। अधिक मात्रा में यह वामक तथा अधिक बार प्रयोग से वमन के साथ विरेचन भी होता है। (१) यह १ माशा की मात्रा में चूर्ण के रूप में अतिसार, रक्तातिसार एवं संग्रहणी आदि में देने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ सोंठ, गोंद या अल्प मात्रा में अफीम मिलाई जा सकती है। (२) कफ विकारों में इसके चूर्ण को घोडबच एवं मुलेठी आदि के साथ देने से लाभ होता है। (३) प्रसूति के बाद स्रावशुद्धि के लिए इसका उपयोग करते हैं। (४) अजीर्ण आदि में वमन कराने के लिये ४ इञ्च लंबी ताजी जड़ की छाल जल में घिस कर देने से वमन होता है या १-२ माशा पत्र चूर्ण जल के साथ दिया जाता है। (५) इसको रसायन तथा रक्तशोधक मानते हैं एवं आमवात, फिरंगज आमवाताभ विकृति, सन्धिवात, शरीरपीडा एवं सर्पदंश आदि में इसका उपयोग करते हैं। (६) वातरक्त में इसके मूल का बाह्यलेप किया जाता है। मात्रा-१/४-१ रत्ती; वामक १-२ माशा। इन उपर्युक्त वनस्पतियों के अतिरिक्त मद्रास की तरफ कुलिञ्जन का व्यवहार रास्ना के नाम से कुछ करते हैं तथा धवलबरुआ और सर्पक्षी-ले० ओफिओराइझा मुन्गोस् (Ophiorrhiza mungos Linn.) एवं अन्य अनेक औषधियाँ भी रास्ना नाम से ली जाती हैं। इनमें से प्रथम ३ औषधियाँ अधिक प्रचलित हैं।