भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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ज्वरहृद्रोगपित्तास्रवातोदावर्त्तशूलनुत् । तत्फलं स्रं सनं रुच्यं कुष्ठपित्तकफापहम् ।। ज्वरे तु सततं पथ्यं कोष्ठशुद्धिकरं परम् ।। १५० ।। अमलतास (धनबहेरा) के नाम तथा गुण—आरग्वध, राजवृक्ष, शम्पाक, चतुरङ्गुल, आरवेत, व्याधिघात, कृतमाल, सुवर्णक, कर्णिकार, दीर्घफल, स्वर्णाङ्ग और स्वर्णफल ये नाम अमलतास के हैं । अमलतास—गुरु, मधुर, शीतल और उत्तम रेचक है । यह ज्वर, हृद्रोग, रक्तपित्त, वायु, उदावर्त्त और शूल को दूर करता है । अमलतास का फल—मृदु रेचक, रुचिकारक, कुष्ठ, पित्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है । यह ज्वर में सदा हितकर होता है एवं कोष्ठ को अत्यन्त शुद्ध करने वाला होता है । [१४८-१५०]

४५. आरग्वध (अमलतास) हिं०—अमलतास, सोनहाली । बं०—सोन्दाली, सोनालु, बन्दर लाठी । म०—बाहवा । क०—कक्केमर । ते०— रेलचेट्टु । गु०—गरमाली । पं०—अमलतास, करङ्गल, कनियार । ता०—कोत्रेमरं, शरकोन्ने, कोरैकाय । फा०— ख्यारेचम्बर । अ०—ख्यारे शम्बर, ख्यारशम्बर । अं०—Pudding Pipe Tree (पुडिंग पाइप ट्री) या Indian Laburnum (इण्डियन लॅवर्नम्), या Purging Cassia (पर्जिंग केशिया) । ले०—Cassia fistula, Linn. (केशिया फिस्टुला, लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है । इसका वृक्ष—मध्यमाकार का होता है, किन्तु कहीं-कहीं बड़े वृक्ष भी देखने में आते हैं। लकड़ी बहुत मजबूत होती है । १२ से १८ इञ्च तक की लम्बी-लम्बी सींकों पर ४ से ८ जोड़े पत्ते लगते हैं जो १।। से ३।। इञ्च तक लम्बे, अण्डाकार होते हैं । १०-२० इञ्च तक की लम्बी टहनियों पर सुनहले चमकीले पीले-पीले रङ्ग के पाँच-पाँच दल वाले फूलों के घनहरे लगते हैं, जो चैत के अन्त से ज्येष्ठ तक वृक्षों को सुशोभित करते हैं। जेठ में पतली सलाई के समान हरी-हरी फलियाँ निकल कर वर्षा के अन्त तक १-२ फीट लम्बी १ इञ्च तक मोटी हरी-हरी फलियाँ लटकती दिखाई पड़ती हैं । फिर हेमन्त के अन्त से काला रूप धारण करके वसन्त में पक जाती हैं । फलियों के भीतर पुरानी चवन्नी बराबर गोल-गोल पतले-पतले काले रस से लिपटे हुए परत रहते हैं और परतों के बीच सिरस के बीज के समान बीज होते हैं । रासायनिक संगठन—अमलतास के गूदे में गोंद, पेक्टिन (Pectin), रंजक पदार्थ, शर्करा, अल्प मात्रा में एक मधुगंधि उड़नशील तैल तथा हाइड्रोक्सिमेथिल्-अन्थ्राँक्विनोन् (Hydroxymethyl-anthraquinone) आदि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग—(१) अमलतास की गुद्दी आनुलोमिक, दाहशामक एवं वेदना स्थापक है । यह मृदु विरेचनों में सर्वश्रेष्ठ है । इसका प्रयोग ज्वरावस्था में सुकुमार, बाल, गर्भिणी एवं कोमल प्रकृति की नारियों में किया जाता है । मृदु विरेचन के लिये इसके स्वतंत्र प्रयोग की अपेक्षा सनाय के साथ बनाया हुआ अवलेह (Confectio seana) अधिक अच्छा है जिससे मरोड़, हल्लास, शूल, आध्मान आदि नहीं होते जो स्वतन्त्र प्रयोग में अधिक मात्रा में लेने से होते हैं । इससे बनी गुलकन्द का भी व्यवहार किया जाता है । रक्त की उष्णता बढ़ने पर अथवा मल संचय होकर वातरक्त एवं आमवात आदि रोग उत्पन्न होने पर विरेचन के लिये इसका उपयोग करते हैं। जिन्हें कब्जियत की शिकायत हमेशा रहती है उन्हें अल्प मात्रा में इसे बराबर सेवन कराया जाता है । अधिक दिन प्रयोग से मूत्र का रंग गहरे बादामी रंग का हो जाता है । ज्वर में अथवा मधुमेह में विरेचन की आवश्यकता हो तो इसका उपयोग कर सकते हैं। कॉफी के सत्व में इसकी मिलावट की जाती है । इसका लेप आमवात, वातरक्त एवं व्रणशोथ आदि पर किया जाता है ।