भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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२६८ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) इसके बीज वामक होते हैं तथा ५-७ बीजों का चूर्ण वमन के लिये दिया जाता है । (३) इसकी छाल के क्वाथ से कवल करने से गले की गाँठों की सूजन कम होती है । (४) इसके पत्तों का रस अर्दित में पिलाया जाता है तथा जिस अंग का घात हुआ हो वहाँ इससे मला जाता है । दाद तथा भिलावें की सूजन पर इसके लगाने से लाभ होता है । (५) इसकी मूल तीव्र विरेचक एवं ज्वरहर होती है । मात्रा-गुद्दी ४/८ माशा । अथ कटुकाया नामगुणानाह कट्वी तु कटुका तिक्ता कृष्णभेदा कटम्भरा९ ।। अशोका मत्स्यशकला चक्राङ्गी शकुलादनी ।। मत्स्यपित्ता काण्डरुहा रोहिणी कटुरोहिणी ।। १५१ ।। कट्वी तु कटुका पाके तिक्ता रूक्षा हिमा लघुः । भेदिनी दीपनी हृद्या कफपित्तज्वरापहा ।। प्रमेहश्वासकासास्रदाहकुष्ठक्रिमिप्रणुत् ।। १५२ ।। कुटकी के नाम तथा गुण-कट्वी, कटुका, तिक्ता, कृष्णभेदा, कटम्भरा, अशोका, मत्स्यशकला, चक्राङ्गी, शकुलादनी, मत्स्यपित्ता, काण्डरुहा, रोहिणी और कटुरोहिणी ये सब कुटकी के नाम हैं । कुटकी-तिक्त रसयुक्त, परिपाक में कटु रसयुक्त, रूक्ष, शीतल, लघु, मल को भेदन करने वाली, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकर, कफ, पित्तज्वर, प्रमेह, श्वास, रक्त दोष, दाह, कुष्ठ तथा कृमि का नाश करने वाली होती है । [१५१-१५२] ४६. कुटकी हिं०-कुटकी, कटुकी, कटुका बं०-कटकी । म०-केदारकडू, काली कुटकी । गु०-बालकडू, कडू । ते०- कटुकुरोणी । क०-कटुक रोहणी, कटुकुरोहिनी । ता०- कटुकु रोगणी । फा०-खर्बकै हिन्दी । अ०-सर्वके अस्वद, खानेखस्वैल । अं०- Picrorhiza (पिक्रोहाइझा) । ले०-Picrorhiza kurroa Royle ex Benth. (पिक्रोहाइझा कुर्रों) । Fam. Scrophulariaceae (स्क़्रोफ्युलॅरियासी) । यह हिमालय पहाड़ की ९०००-१५००० फीट ऊँची चोटियों पर काश्मीर से सिक्कम तक बहुत उत्पन्न होती है । इसका क्षुप-रोमश होता है । इसका भामिक तना बहुवर्षायु, छोटी उँगली के समान मोटा एवं ६ से १०- १२ इञ्च तक लम्बा होता है । पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, सुवाकार, जड़ की ओर संकुचित, आगे की ओर चौड़े, किञ्चित् चिकने और कटे हुए झालदार किनारे वाले होते हैं । क्षुप के बीच से एक डण्डी निकलती है जिसके अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं । फूल-नीले या सफेद रङ्ग के आते हैं । फली-चौथाई इञ्च की होती है । कुटकी इस क्षुप के मूल (भौमिकत ने-Rhizome) को कहते हैं । यह १ से २ इञ्च लम्बे, कपिश लोहबान की तरह रंग वाले, खुरदरे एवं मुड़े हुए टुकड़े होते हैं । इन पर छोटी-छोटी चक्राकार गाँठें तथा गिरे हुए पत्तों एवं मूल के निशान रहते हैं । यह एक तरफ मोटी तथा दूसरी तरफ पतली होती है तथा इसमें एक प्रकार की हल्की गन्ध होती है । इसका स्वाद अत्यन्त कड़ुवा होता है । रासायनिक संगठन-इसमें पिक्रोह्राइझिन् (Picrorhizin) नामक एक कड़ुआ रवेदार मधुमेय (Glycoside) २६.६% पाया जाता है, जिसका उदांशन (Hydrolysis) होने पर पिक्रोह्रीझेटिन् (Picrohizetin) एवं एक प्रकार की मधु शर्करा (Dextrose) प्राप्त होती है । यह मधुमेय जल, मद्यसार, एसिटोन (Acetone) और एथिल् ऑसिटेट्