भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः २७७ शोथ, श्वास, वातरक्त, वातशूल, उदर रोग, कास, गुरु, उष्णवीर्य और कफ वातनाशक है तथा शोथ, श्वास, वातरक्त, वातशूल, उदर रोग, कास, ज्वर, विष अस्सी (८०) प्रकार के वात रोग तथा सिध्म इन सबको दूर करती हैं। [१६३-१६४] ५०. रास्ना आज कल वैद्य समाज में रास्ना एक भ्रमात्मक औषधि मानी जा रही है। वात विकारों के लिये आयुर्वेद में इसका प्रयोग रास्नादि, महारास्नादि क्वाथ के रूप में बहुत किया जाता है। भिन्न-भिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न औषधि रास्ना नाम से ली जाती है। प्राचीन ग्रन्थों में इसके परिचय में निम्न श्लोक प्राप्त होते हैं। रास्ना तु त्रिविधा प्रोक्ता मूलं पत्रं तृणं तथा। ज्ञेयौ मूलदलौ श्रेष्ठौ तृणरास्ना तु मध्यमा। (रा. नि.) अथ रास्ना भृङ्गपत्रा पाषाणादौ प्रजायते। गिरौ च लघु-रास्ना स्यात् ततो हीनगुणा स्मृता ।। (शिवदत्तः) सुगन्धमूला, एलापर्णी ।। नीचे रास्ना नाम से ली जाने वाली विभिन्न वनस्पतियों का वर्णन अलग-अलग किया गया है। (१) Pluchea lanceolata Oliver & Hiern (प्लूचिया लॅन्सिओलॅटा)। Fam. Compositae (काम्पोज़िटी)। हि०-रायसन, रोशना, वायसुरई। पं०-रासन। सिन्ध०-कौरसन। रा० पु०-छोटा कलिया। अलीगढ़-वनसेरई, वनसोरई, वायसुरई। आगरा-छोटी कलिया। कानपुर-सुरही, सोरहि। बिहार-रोशना, रचना, रोचना। यह अपर बंगाल, बिहार, अवध, कानपुर और पश्चिम की ओर पञ्जाब तथा सिन्ध तक पाई जाती है। पत्तों का आकार रास्ना अर्थात् जिह्वा के सदृश होने से इसका नाम रास्ना रखा गया है। इसी के आधार पर उत्तर प्रदेश, पश्चिमोत्तर प्रदेश आदि जगहों के अधिकांश वैद्य वायसुरई को ही 'रास्ना' मानते हैं। बिहार के ग्रामीण इसको 'रचना' और 'रोचना' के नाम से पुकारते हैं। मालूम होता है कि-रचना शब्द रसना का अपभ्रंश है। बिहार के अधिकांश वैद्य भी इसको उपयोग में लाते हैं। श्रीमान् ठा० बलवन्त सिंहजी इसी को उपयोग में लाने की सलाह देते हैं। इसका क्षुप-१-२ फीट ऊँचा, अनेक शाखा-प्रशाख करके झाड़दार तथा उन पर असंख्य बारीक भूरे रङ्ग के रोवें होते हैं। पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे सनाय के पत्तों के आकार वाले किन्तु उससे बड़े होते हैं तथा सूखने पर पीलापन लिये भूरे रङ्ग के हो जाते हैं। पर्णवृन्त छोटा एवं ऐंठा हुआ होता है। पतली-पतली शाखाओं के अन्त में नन्हें-नन्हें बैंगनी रङ्ग के फूलों की घुण्डियाँ लगती हैं। गुण और प्रयोग-इसके पत्र सनाय की तरह भेदन हैं तथा सनाय के स्थान पर प्रयोग में आते हैं। (२) Inula racemosa Hook. f. (इनुला रेसिमोसा)। Fam. Compositae (कॉम्पोझिटी)। फा०- रासन, कुछ-इ-शामी। अ०-जंजबीलशमी। ईरान०-पिल्गूष् घार्ष। कश्मीर-पोष्कर। डॉ. देसाई अन्य शास्त्रज्ञों के साथ सहमत होते हुए रास्ना के स्थान पर इसी क्षुप के मूल को व्यवहार करने की सलाह देते हैं क्योंकि इसके गुण रास्ना से मिलते जुलते हैं। कुछ अन्य विद्वान् इनूला को पुष्करमूल मानते हैं स्थान भेद से इसके क्षुप की ३, ४ जातियाँ पाई जाती हैं। यह काश्मीर तथा उत्तर-पश्चिम हिमालय में होती है। भारत में जहाँ-जहाँ सुगन्ध कूठ होता है वहाँ-वहाँ यह उत्पन्न होने से तथा उसके समान दिखलाई देने से कूठ में इसकी मिलावट की जाती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA