भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ भावप्रकाशनिघण्टुः रासन का क्षुप-५ फीट तक ऊँचा एवं दृढ़ होता है। पत्र-चर्मवत्, ऊपर से खुरदरे एवं नीचे से घनरोमश तथा दन्तुर होते हैं। आधारीय पत्र ८-१८ इञ्च × ५-८ इञ्च बड़े, दीर्घ वृत्ताकार-भालाकार एवं लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। काण्डपत्र अंडाकार-आयताकार, अर्धकाण्डांसक्त एवं प्रायः आधार पर गहराई तक खंडित होते हैं। पुष्प-पीत वर्ण के १.५-२ इञ्च व्यास के गुच्छों में आते हैं। फल-छोटे, महीन एवं अग्र पर रक्ताभ रोमयुक्त होते हैं। इसकी ताजी जड़ में ओरिस् एवं कर्पूर जैसी तीव्र गंध होती है जो रखने पर कम हो जाती है। रासायनिक संगठन-रासन में अल्प मात्रा में उड़नशील तैल और इनुलिन् (Inulin) होता है। तैल में एलेण्टोलॅक्टोन (Alantonactone, C₁₅ H₂₀ O₂) नामक एक कृमिनाशक, कफनिःसारक एवं मूत्रल द्रव्य होता है। गुण और प्रयोग-यह पाचन, वातहर, कफहर, श्वासहर एवं गर्भाशय संकोचक है। इसका क्वाथ आधमान, उदरशूल, कुपचन, अनार्तव, कष्टार्तव, फुफ्फुस विकार जैसे दमा, जीर्ण श्वसनिका शोथ, क्षय, फुफ्फुसावरण शोथ एवं आमवात तथा अन्य वातिक रोगों में दिया जाता है। इससे ज्वर तथा सूजन कम होती है तथा वेदना दूर होती है। कण्डू आदि त्वचा के रोगों में इसके क्वाथ को शरीर पर लगाया जाता है। मूल को गोमूत्र में रगड़ कर खुजली, दाद एवं पामा आदि पर लगाया जाता है। राजयक्ष्मा के जन्तुओं से उत्पन्न त्वचा के व्रणों में इससे लाभ होता है। जन्तुओं के विष को दूर करने के लिये इसका उपयोग करते हैं तथा इससे वेदना कम होती है। प्रतिनिधि-कूठ। (३) Vanda roxburghii B. Br. (वॅण्डा रॉक्सवर्गाई) । Fam. Orchidacene (ओरचिडॅसी)। बांद्रा, वंगीर्य रास्ना। बं०-रास्ना। संताल-दरेबंकि। क०-मरवाले। ते०-कनपचेट्टू, वदनिके, नेरदानचेट्टू । यह बंगाल, बिहार, गुजरात तथा कोंकण से ट्रावनकोर तक प्राप्त होते हैं। इसके पौधे-प्रायः आम और मधूक वृक्षों की डालियों पर उगे हुए पाये जाते हैं। काण्ड-१-२ फीट लम्बा तथा उसकी ग्रन्थियों से अनेक मोटे और मांसल वातलम्बी (Epiphytic = एपिफाइटिक्) मूल निकले रहते हैं। पत्तियाँ-६-८ इञ्च लंबी, मध्य पर्णुक पर गहरी और दो कतारों में निकली हुई रहती है। सदण्डिक पुष्पमंजरियाँ पत्तियों से लम्बी होती है। पुष्प-व्यास में १ १/२-२ इञ्च और पंखड़ियाँ प्रायः मिश्रित वर्ण की होती हैं। वे अधिकतर पीताभ और कभी-कभी नीलाभ होती हैं और उनके कुछ भागों में बदामी, बैंगनी तथा सफेद रंग भी होते हैं। फल-३-३ १/२ इञ्च लम्बा और सन्धियों पर रीढ़दार होता है। इसके मूल का उपयोग किया जाता है। बंगाल के अधिकांश कविराज इसी को उपयोग में लाते हैं। वे प्रायः वाटिकाओं में आम के वृक्षों की मोटी टहनियों के ऊपर की खुरदरी छाल को पृथक् कर उस पर उक्त रासन को शोरियाँ युक्त बिठा रस्सी में बाँध कुछ मिट्टी का अंश दे पानी से कुछ रोज सींचा करते हैं। गुण और प्रयोग-आमवातादि में इससे कुछ लाभ होता है। ज्वर में सर्वाङ्ग पर इसके पत्तों का लेप किया जाता है। कर्णस्राव में इसके पत्तों का रस कान में डालते हैं। अनेक वातविकारों तथा आमवातादि में बाह्य प्रयोग के लिये इससे बने तेल का उपयोग किया जाता है। यह फिरङ्ग की द्वितीयावस्था तथा वृश्चिक दंश पर लाभदायक है। (४) Saccolabium papillosum Lindl. (सॅक्कोलेविअम् पॅप्पिल्लोसम्)। Fam. Orchidaceae (ऑरचिडॅसी)। क०-मरवाले। म०-कानभेर। इसके बाँदे भी आम्रवृक्ष के ऊपर होने वाले बाँदों की तरह दिखलाई देते हैं। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक है तथा इसका आमवातादि में प्रयोग होता है। केले के पत्तों में इसके पत्ते लपेटकर पुटपाक करके उसके रस को मधु के साथ कर्णपिटिका के लिये कान में डालते हैं जिससे कर्णपीड़ा दूर होती है।