भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

२७८ भावप्रकाशनिघण्टुः रासन का क्षुप-५ फीट तक ऊँचा एवं दृढ़ होता है। पत्र-चर्मवत्, ऊपर से खुरदरे एवं नीचे से घनरोमश तथा दन्तुर होते हैं। आधारीय पत्र ८-१८ इञ्च × ५-८ इञ्च बड़े, दीर्घ वृत्ताकार-भालाकार एवं लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। काण्डपत्र अंडाकार-आयताकार, अर्धकाण्डांसक्त एवं प्रायः आधार पर गहराई तक खंडित होते हैं। पुष्प-पीत वर्ण के १.५-२ इञ्च व्यास के गुच्छों में आते हैं। फल-छोटे, महीन एवं अग्र पर रक्ताभ रोमयुक्त होते हैं। इसकी ताजी जड़ में ओरिस् एवं कर्पूर जैसी तीव्र गंध होती है जो रखने पर कम हो जाती है। रासायनिक संगठन-रासन में अल्प मात्रा में उड़नशील तैल और इनुलिन् (Inulin) होता है। तैल में एलेण्टोलॅक्टोन (Alantonactone, C₁₅ H₂₀ O₂) नामक एक कृमिनाशक, कफनिःसारक एवं मूत्रल द्रव्य होता है। गुण और प्रयोग-यह पाचन, वातहर, कफहर, श्वासहर एवं गर्भाशय संकोचक है। इसका क्वाथ आधमान, उदरशूल, कुपचन, अनार्तव, कष्टार्तव, फुफ्फुस विकार जैसे दमा, जीर्ण श्वसनिका शोथ, क्षय, फुफ्फुसावरण शोथ एवं आमवात तथा अन्य वातिक रोगों में दिया जाता है। इससे ज्वर तथा सूजन कम होती है तथा वेदना दूर होती है। कण्डू आदि त्वचा के रोगों में इसके क्वाथ को शरीर पर लगाया जाता है। मूल को गोमूत्र में रगड़ कर खुजली, दाद एवं पामा आदि पर लगाया जाता है। राजयक्ष्मा के जन्तुओं से उत्पन्न त्वचा के व्रणों में इससे लाभ होता है। जन्तुओं के विष को दूर करने के लिये इसका उपयोग करते हैं तथा इससे वेदना कम होती है। प्रतिनिधि-कूठ। (३) Vanda roxburghii B. Br. (वॅण्डा रॉक्सवर्गाई) । Fam. Orchidacene (ओरचिडॅसी)। बांद्रा, वंगीर्य रास्ना। बं०-रास्ना। संताल-दरेबंकि। क०-मरवाले। ते०-कनपचेट्टू, वदनिके, नेरदानचेट्टू । यह बंगाल, बिहार, गुजरात तथा कोंकण से ट्रावनकोर तक प्राप्त होते हैं। इसके पौधे-प्रायः आम और मधूक वृक्षों की डालियों पर उगे हुए पाये जाते हैं। काण्ड-१-२ फीट लम्बा तथा उसकी ग्रन्थियों से अनेक मोटे और मांसल वातलम्बी (Epiphytic = एपिफाइटिक्) मूल निकले रहते हैं। पत्तियाँ-६-८ इञ्च लंबी, मध्य पर्णुक पर गहरी और दो कतारों में निकली हुई रहती है। सदण्डिक पुष्पमंजरियाँ पत्तियों से लम्बी होती है। पुष्प-व्यास में १ १/२-२ इञ्च और पंखड़ियाँ प्रायः मिश्रित वर्ण की होती हैं। वे अधिकतर पीताभ और कभी-कभी नीलाभ होती हैं और उनके कुछ भागों में बदामी, बैंगनी तथा सफेद रंग भी होते हैं। फल-३-३ १/२ इञ्च लम्बा और सन्धियों पर रीढ़दार होता है। इसके मूल का उपयोग किया जाता है। बंगाल के अधिकांश कविराज इसी को उपयोग में लाते हैं। वे प्रायः वाटिकाओं में आम के वृक्षों की मोटी टहनियों के ऊपर की खुरदरी छाल को पृथक् कर उस पर उक्त रासन को शोरियाँ युक्त बिठा रस्सी में बाँध कुछ मिट्टी का अंश दे पानी से कुछ रोज सींचा करते हैं। गुण और प्रयोग-आमवातादि में इससे कुछ लाभ होता है। ज्वर में सर्वाङ्ग पर इसके पत्तों का लेप किया जाता है। कर्णस्राव में इसके पत्तों का रस कान में डालते हैं। अनेक वातविकारों तथा आमवातादि में बाह्य प्रयोग के लिये इससे बने तेल का उपयोग किया जाता है। यह फिरङ्ग की द्वितीयावस्था तथा वृश्चिक दंश पर लाभदायक है। (४) Saccolabium papillosum Lindl. (सॅक्कोलेविअम् पॅप्पिल्लोसम्)। Fam. Orchidaceae (ऑरचिडॅसी)। क०-मरवाले। म०-कानभेर। इसके बाँदे भी आम्रवृक्ष के ऊपर होने वाले बाँदों की तरह दिखलाई देते हैं। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक है तथा इसका आमवातादि में प्रयोग होता है। केले के पत्तों में इसके पत्ते लपेटकर पुटपाक करके उसके रस को मधु के साथ कर्णपिटिका के लिये कान में डालते हैं जिससे कर्णपीड़ा दूर होती है।

हरीतक्यादिवर्गः २७९ (५) Tylophora asthmatica W. & A. (टाइलोफोरा एस्थ्मेटिका)। Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी)। हिं०-अंतमूल, जंगली पिकवन। बं०-अन्तोमूल। म०-पितकारी, खडकी रास्ना। ता०-नायपालै। ते०- वेरिपल। मल०-वल्लीपाल। क०-किरूमंजि। उडि०-मेंडी। सं०-मूलिनी, मूलरास्ना, पित्तवल्ली, आन्त्रपाचक। इसकी लता उत्तरी बंगाल, आसाम, कछार, उड़ीसा, कोंकण, दक्षिणी भारत, कनारा, मद्रास प्रान्त एवं पूर्व पाकिस्तान, वर्मा, मलाक्का द्वीप तथा लंका आदि स्थानों पर पायी जाती है। यह रेतीली भूमि पर अधिक होती है। बंबई के बजार में रास्ना के नाम से इसके मूल भी बिकते हैं। इसकी बहुवर्षायु लता होती है। पत्र-२ से ५ इञ्च लम्बे, १ से २ इञ्च चौड़े, लट्वाकार या अंडाकार, तीक्ष्णाग्र वा लम्बाग्र, आधार पर तांबूलाकार, अखण्ड, सनाल, ऊपरी पृष्ठ चिकना, अधोपृष्ठ रोमश भूरे रंग का, ताजी अवस्था में स्वाद एवं गंध हल्लासकर एवं सूखने पर गन्धहीन एवं रुचिहीन। पुष्प-बहुत, छोटे, हलके पीले रंग के, अन्दर से बैंगनी एवं गुच्छों में। फल-(Follicle)-२ से ४ इञ्च लंबा अग्र की तरफ नुकीला होता जाता है। मूल-बहुत लम्बे, मांसल, अनेक, बारीक, हलके पीले या मटमैले तन्तुयुक्त, अन्दर से हलके पीले रंग के, आसानी से टूटने वाले, गन्धहीन, स्वाद प्रारंभ में मीठा लेकिन बाद में कटु। इसकी लता ईश्वरमूल की तरह दिखलाई देती है लेकिन उसके पत्र के दोनों पृष्ठ हरे और चिकने तथा पुष्प बड़े होते हैं। इसके मूल तथा पत्र का व्यवहार किया जाता है जिनमें पत्र अधिक गुणकारी हैं। रासायनिक संगठन-इसमें टाइलोफोराइन् (Tylophorine, C₂₄ H₂₇ O₄ N), टाइलोफोरिनाइन् (Tylophorinine C₂₃ H₂₇ O₄ N, O.5 H₂O), ये दो रवेदार क्षाराभ, एक उड़नशील तैल ०.२६%, एक रंगहीन रवेदार अन्य पदार्थ ०.१८%, खनिज (Mineral matter) १५% तथा एक वामक द्रव्य आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-इसके मूल तथा पत्र अच्छे वामक, कफनिःसारक, स्वेदल, रक्तशोधक, आनुलोमिक एवं आमपाचक हैं। यह एपीकॅक् के अच्छे प्रतिनिधि हैं। अल्प मात्रा में इससे खाँसी दमा, बच्चों की कुक्कुर खाँसी, अतिसार एवं संग्रहणी आदि में बहुत लाभ होता है। अधिक मात्रा में यह वामक तथा अधिक बार प्रयोग से वमन के साथ विरेचन भी होता है। (१) यह १ माशा की मात्रा में चूर्ण के रूप में अतिसार, रक्तातिसार एवं संग्रहणी आदि में देने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ सोंठ, गोंद या अल्प मात्रा में अफीम मिलाई जा सकती है। (२) कफ विकारों में इसके चूर्ण को घोडबच एवं मुलेठी आदि के साथ देने से लाभ होता है। (३) प्रसूति के बाद स्रावशुद्धि के लिए इसका उपयोग करते हैं। (४) अजीर्ण आदि में वमन कराने के लिये ४ इञ्च लंबी ताजी जड़ की छाल जल में घिस कर देने से वमन होता है या १-२ माशा पत्र चूर्ण जल के साथ दिया जाता है। (५) इसको रसायन तथा रक्तशोधक मानते हैं एवं आमवात, फिरंगज आमवाताभ विकृति, सन्धिवात, शरीरपीडा एवं सर्पदंश आदि में इसका उपयोग करते हैं। (६) वातरक्त में इसके मूल का बाह्यलेप किया जाता है। मात्रा-१/४-१ रत्ती; वामक १-२ माशा। इन उपर्युक्त वनस्पतियों के अतिरिक्त मद्रास की तरफ कुलिञ्जन का व्यवहार रास्ना के नाम से कुछ करते हैं तथा धवलबरुआ और सर्पक्षी-ले० ओफिओराइझा मुन्गोस् (Ophiorrhiza mungos Linn.) एवं अन्य अनेक औषधियाँ भी रास्ना नाम से ली जाती हैं। इनमें से प्रथम ३ औषधियाँ अधिक प्रचलित हैं।

२८० भावपादनिशिण्टुः नोट :- सर्पाक्षी का वर्णन गुडूच्यादि वर्ग तथा धवलबरुआ का वर्णन नाकुली में किया गया है। अथ (रास्नाभेदः) नाकुली नामगुणानाह नाकुली सुरसा नागसुगन्धा गन्धनाकुली। नकुलेष्टा भुजङ्गाक्षी सर्पाङ्गी विषनाशिनी ।।१६५।। नाकुली तुवरा तिक्ता कटुकोष्णा विनाशयेत्। भोगिलूतावृश्चिकाखुविषज्वरकृमिव्रणान् ।।१६६।। नाकुलीकन्द के नाम तथा गुण-नाकुली, सुरसा, नागसुगन्धा, गन्धनाकुली, नकुलेष्टा, भुजङ्गाक्षी, सर्पाङ्गी तथा विषनाशिनी ये सब नाम 'नाकुलीकन्द' के हैं। नाकुलीकन्द-कषाय, तिक्त एवं कटुरसयुक्त तथा उष्णवीर्य होता है। और सर्प, मकड़ी, विच्छू तथा मूसा इन सबों के विष को दूर करने वाला एवं ज्वर, कृमि तथा व्रण को भी नष्ट करने वाला होता है। [१६५-१६६] ५१. नाकुली (धवलबरुआ, सर्पगन्धा) हिं०-नकुलकन्द, नाकुलीकन्द, नाई, हरकाई चन्द्रा, रास्नाभेद, छोटाचांद । उड़ीसा, बिहार-धन्नेरना, धनबरुआ, धवलबरुआ, सनोचाडो । बं०-नाकुली, गन्धरास्ना, चन्द्र । म०-अडकई, चन्द्र । - नोलबेल, अमेलपोदी । क०- सूत्रनाभि । ते०-पातालअगंधि । मा०-हरकय । मलया०-चुवन्ना अविलपोरी । फा०-छोटाचान्दा । ले०-Rauwolfia serpentina Benth. ex Kurz. (राँवोल्फिया सर्पेण्टाइना) । Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी) । वैद्य समाज में नकुलचन्द भी एक सन्दिग्ध वनौषधि है। कुछ लोगों ने नाकुली को ले०-एरिस्टोलोकिआ इण्डिका (Aristolochia indica Linn), ईशरमूल लिखा है तथा श्री ठा० बलवन्त सिंह जी भी उनसे सहमत होते हुए सर्पगन्धा नाम भी उसी के (नाकुली) लिये तथा धवलबरुआ के लिए राजनिघण्टु का जम्बू नाम उचित समझते हैं जिसको श्री भगीरथ स्वामी ने माना है। प्राचीन ग्रंथों में केवल सुश्रुत के अमानुषोपसर्गाध्याय में मानसरोगहर अपराजितगण में सर्पगन्धा नाम का उल्लेख मिलता है। यहाँ पर पहले वर्णन 'रावोल्फिया' का दिया जा रहा है जिसके बाद ईश्वरमूल का स्वतन्त्र वर्णन दिया जावेगा। धवलबरुआ के क्षुप हिमालय के निचले प्रदेशों में सरहिन्द से लेकर पूर्व में आसाम तक विशेष कर देहरादून, सिवालिक पहाड़ी भाग तथा रोहिलखण्ड, उत्तरी अवध और गोरखपुर के हिमालय के निचले भाग में ४००० फीट की ऊँचाई तक एवं कोंकण, उत्तरी कनारा, दक्षिणी महाराष्ट्र प्रान्त, मद्रास के पूर्वी तथा पश्चिमी घाट में ३००० फीट तक और बिहार के अनेक भाग में जैसे पटना, भागलपुर तथा उत्तरी एवं मध्य बंगाल, वर्मा, श्याम और जाबा आदि स्थानों में पाये जाते हैं। इसका क्षुप-छोटा, आकर्षक, १ से २ फीट ऊँचा क्वचित् ३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्र-हरे, चमकीले, ३-७ इञ्च लम्बे, १।।-२।। इञ्च चौड़े, भालाकार या व्यस्तभालाकार, तीक्ष्णाग्र या लम्बाग्र, आधार की ओर पतले होकर १/२ इञ्च पत्रनाल से युक्त एवं टहनी के प्रत्येक गाँठ पर ३-४ के चक्रों में (Whorled)। पुष्प-श्वेत या साधारण गुलाबी गुच्छों में, २-४ इंच लम्बे पुष्प दण्डों पर। फल-छोटे, मांसबैं एक या दो-दो जुड़े हुये पकने पर बैंगनी काले । मूल-सर्प की तरह टेढ़ा-मेढ़ा, करीब १६ इञ्च तक लम्बा, पौन इ० मोटा, खुरदरा, कुछ-कुछ झुर्रियों से युक्त, शाखाओं से युक्त और उस पर लम्बाई में धारियाँ रहती हैं। इसे तोड़ने पर भग्न छोटा एवं अनियमित । मूल की छाल धूसरित पीत (Greyish yellow) तथा अन्दर का काष्ठ श्वेताभ । स्वाद में अत्यन्त कड़वा तथा गन्धहीन । इसके मूल को तोड़कर कटे भाग पर २ भाग शोरे का तेजाब (Nitric acid) और १ भाग जल मिले घोल के २ बूँद डालने से मेड्युलरी रेज् (Medullary rays) विशेष कर अन्तःचर्म (Cortex) के पास वाले भाग रंगीन हो जाते हैं। इस क्षुप के ३- ४ साल पुराने पौधे के मूल को शरद्काल में संग्रह कर छाल सहित सुखाकर व्यवहार में लाया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २८१ रासायनिक संगठन—बिहार में उत्पन्न मूल में सम्पूर्ण क्षाराभ की मात्रा ०.८-१.३% रहती है जिसमें अज्मॅलाइन् (Ajmaline, C₂₀ H₂₆ O₂ N₂, 3 H₂ O), अज्मॅलीनाइन् (Ajmalinine, C₂₀ H₂₆ O₃ N₂] 1.5 H₂ O), अज्मॅलीसाइन् (Ajmalicine) तथा पीत वर्ण के क्षाराभ सर्पेण्टाइन् (Serpentine, C₂₀ H₂₀ O₃ N₂ 1.5 H₂ O), सर्पेण्टिनाइन् (Serpentinine, C₂₀ H₂₀ O₂ N₅, 1.5 H₂ O) तथा बिना रवेदार (Amorphous) क्षार (Bases) रहते हैं। देहरादून से प्राप्त जड़ में सम्पूर्ण क्षाराभ की मात्रा १.-१.३% तक रहती है लेकिन उसमें पीत वर्ण के क्षाराभ नहीं रहते तथा इसमें अज्मॅलाइन् और अज्मॅलीनाइन् के समसंगठन (Isomeric) वाले दो क्षार द्रव्य रहते हैं। इनके अतिरिक्त उभयविध प्रतिक्रिया (Amphoteric character) वाले कुछ दूसरे भी क्षाराभ होते हैं। इन क्षाराभों के अतिरिक्त इसके मूल में एक तैलीय राल (Oleoresin) और सरपोस्टेरॉल (Serposterol, C₃₀ H₄₈ O₂) रहता है। इसमें के अज्मॅलाइन, सर्पेण्टाइन् और सर्पेण्टिनाइन् क्षाराभ केन्द्रीय वातनाड़ी संस्थान को उत्तेजित करते हैं जिसमें से सर्पेण्टाइन् अधिक प्रभावशाली तथा विषैला है। इन ३ क्षाराभों से रहित सम्पूर्ण क्षाराभ तथा मद्यसारीय सत्व (Alcoholic extract) में शामक (Sedative) एवं निद्राकर (Hypnotic) गुण हैं। कुछ क्षाराभ निश्चित रूप से हृदय, रक्तवाहिनी एवं रक्तवाहिनी नियन्त्रक केन्द्र (Vaso-motor centre) के लिये अवसादक (Depressant) हैं। इसका निद्राकर (Hypnotic) प्रभाव क्षाराभ की अपेक्षा प्रधानतया इसके रालीय भाग में है। इसके शामक गुणों के कारण पागलपन एवं अन्य मानसिक व्याधियों में इसके मूल का बहुत व्यवहार हो रहा है तथा इसके मद्यसारीय सत्व का उपयोग रक्तचाप (Blood pressure) को कम करने के लिये किया जा रहा है। इधर कुछ दिनों से इस औषधि के संबंध में विदेशों में विशेष अनुसन्धान किया जा रहा है और इसके कार्यकारी सत्व को रीसर्पइन् (Reserpine) नाम दिया गया है जो मूल की अपेक्षा १ हजार गुना अधिक कार्यकारी कहा जाता है। यह नाड़ीकन्दों में अवरोध (Ganglionic blockade) उत्पन्न नहीं करता वरन् ऐसा मालूम होता है कि रक्तचाप को कम करने का इसका प्रभाव कुछ अंश में स्वतन्त्र नाड़ी संस्थान के केन्द्रीय निरोध (Central inhibition of sympathetic nervous system) के कारण है। गुण और प्रयोग—यह तिक्त पौष्टिक, शामक, निद्राकर, ज्वरहर, गर्भाशय उत्तेजक एवं विषहर है। इसका उपयोग बालातिसार और हैजे में ईश्वर मूल के साथ, उदरशूल में जंगली एरण्डमूल के साथ, रक्तातिसार में कुटज के साथ तथा जीर्णज्वर में मिरिच, घोड़वच, डिकेमाली, चिरायता एवं विडलवण के साथ किया जाता रहा है। प्रसव के समय आवि (Uterine contraction) वृद्धि के लिये एवं सर्पविष एवं अन्यान्य विषों को दूर करने के लिये भी इसको उपयोग में लाते हैं। सर्पविष में इसके १ से २ तो० मूल को जल में घिसकर पिलाते हैं तथा इसका लेप भी किया जाता है। नेत्र शुक्र में इसके पत्तों का रस आँख में डालते हैं। उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त यह औषधि युक्तप्रान्त तथा बिहार के प्रान्तों में पागल की दवा के नाम से बहुत दिनों से प्रसिद्ध है तथा इस कार्य के लिये बहुत दिनों से सफलतापूर्वक व्यवहार में लाई जा रही है। इधर विदेशी शास्त्रज्ञों ने इसके गुणों से आकृष्ट होकर इसका प्रयोग करना शुरू किया है तथा आज यह रक्तचाप (Hyperpiesis), वातिक उन्माद, अनिद्रा एवं अन्यान्य मानसिक विकारों के लिये बहुत उत्कृष्ट औषधि सिद्ध हुई है। इस औषधि के प्रारम्भ करने के पश्चात् ३ से ७ दिनों में इसका असर प्रारम्भ होता है तथा ३-६ सप्ताह में इसका पूर्ण प्रभाव स्पष्ट होता है तथा इसको बन्द करने के पश्चात् १ से ३ सप्ताह में इसका असर निकल जाता है। इसके उपयोग से मानसिक प्रक्षोभ दूर होकर शान्ति मिलती है एवं शिरःशूल, भ्रम आदि दूर होते हैं। रक्त चाप (Blood pressure) की अधिकता के लिये यह सबसे कम विषैली तथा उत्कृष्ट औषधि है। इसमें एक विशेष लाभ यह है कि

२८२ भावप्रकाशनिघण्टुः इससे एकाएक आसन परिवर्तनजन्य रक्तभाराल्पता (Postural hypotension) तथा बहुत अधिक रक्तभाराल्पता नहीं होती । अधिक मात्रा में लेने से अतिसार या अनिष्ट स्वप्न (Nightmares) होते हैं लेकिन कोई तीव्र दुष्परिणाम नहीं होते इसके अवांछनीय गुण जैसे रक्तचाप की कमी एवं मन्दहृदयता आदि चिकित्सा काल में बराबर बने रहते हैं । इसके उपयोग के समय नाक में रक्ताधिक्य (Nasal congestion), शरीर भार वृद्धि, बृहदांत्र की गति वृद्धि तथा कुछ लोगों में मैथुन शक्ति (Libido) का ह्रास होता है । इसके उपयोग से निद्रा की अपेक्षा तन्द्रा आती है तथा घबड़ाहट, चिड़चिड़ापन, तनाव, हृदय की धड़कन एवं थकावट आदि दूर होकर रोगी को बहुत आराम मिलता है । रक्तभार की अधिकता में प्रथम इसी औषधि को प्रारम्भ करना चाहिये । इसके चूर्ण की मात्रा १ रत्ती से लेकर १ माशे तक दी जा सकती है । यदि ६ सप्ताह में लाभ न हो तो अन्य औषधियाँ उसके साथ मिलाई जा सकती हैं । अंग्रेजी दवा की दुकानों में इसकी गोलियाँ तथा इसके सत्व की गोलियाँ बिकती हैं जिनका उपयोग सुगमता की दृष्टि से किया जा सकता है । रीसर्पिन् नामक इसके सत्व का उपयोग तमकश्वास, सव्रणस्थूलान्त्रशोथ (Ulcerative colitis), पैत्तिकशूल, वृक्कशूल एवं मानसिक अवसाद (Mental depression) आदि अवस्थाओं में नहीं करना चाहिये । व्यामिश्रण-इसमें रा केनेसेन्स (R. cnescens Lian. तथा रा० डेन्सिफ्लोरा (R. densiflora Benth.) के मूल की मिलावट होती है । मात्रा-चूर्ण १ से २ माशा । ५२. नाकुली ? (ईश्वरमूल) सं०-नाकुली, ईश्वरी, अर्कमूल । हिं०-ईशरमूल, रूद्रजटा । म०-सापसण । बं०-ईशरमूल । गु०- नोलबेल ता०-इचचुरामूली । ते०-ईश्वरवेरु । उडि०-गोपोकरोनि । अ०, फा०-जरवन्दे हिन्दी । उर्दू०-शपेसन्द । अं०-Indian birthwort (इण्डियन बर्थवर्ट) । Aristolochin indica Linn. (एरिस्टोलोकिआ इण्डिका) । Fam. Aristo-lochiaceae (एरिस्टोलोकिएसी) । इसकी लता भारतवर्ष के सभी भागों में विशेष कर दक्षिण कोंकण में होती है । इस लता के कांड लम्बे, .२- .४ इञ्च मोटे, गोल, चिकने तथा लम्बाई में धारियों से युक्त एवं कर्पूरवत् गंधयुक्त होते हैं । पत्र-हरे, डण्ठल की तरफ चौड़े तथा अग्र पर नुकीले विभिन्न आकार के एवं ५ शिराओं से युक्त । पुष्प-सदण्डिक हरित । बीज-अण्डाकार, चपटे एवं पंखयुक्त । मूल-गाँठदार, शाखाओं से युक्त, मोटा भाग .४-.६ इञ्च, हलके बादामी रंग के तथा मूलत्वक् मोटी, कहीं-कहीं अलग भई हुई । काष्ठ-श्वेत । भग्न-तन्तुमय । स्वाद-कुछ कडुआ । इसके पञ्चांग का व्यवहार होता है । रासायनिक संगठन-इसमें ॲरिस्टोलोचीन (Aristolochine) नामक तीन विभिन्न क्षार (Bases) पाये जाते हैं । इनके अतिरिक्त इसमें ३ भूयात्य अम्ल (Nitrogenous acids) जिन्हें ॲरिस्टिनिक् (Aristinic), ॲरिस्टिडिनिक् (Aristidinic) और ॲरिस्टोलिक् (Aristolic) अम्ल कहते हैं तथा एक उड़नशील तैल जिसमें शायद बोर्निओल (Borneol) रहता है एवं राल, टॅनिन् एवं स्टार्च आदि पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-यह बल्य, उत्तेजक, गर्भाशयसंकोचक, ज्वरहर, शूलहर तथा विषहर है । अल्प मात्रा में यह आमाशय के लिये उत्तेजक है लेकिन अधिक मात्रा में स्थानिक प्रक्षोभ उत्पन्न होकर हल्लास, मरोड़, शूल तथा कभी- कभी वमन एवं कुंथन भी होता है । ॲरिस्टोलोचीन् (Aristolochine) की क्रिया ॲलोइन (Aloin) के समान होती है लेकिन उससे यह विषैला है । यह उच्च श्रेणी के जानवरों में पाचन संस्थान तथा वृक्क में प्रक्षोभ उत्पन्न करता है तथा संन्यास एवं श्वसनाघात से मृत्यु होती है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २८३ (१) इसके चूर्ण का उपयोग ज्वर, आमवात, संधिशोथ एवं जलोदर आदि में बहुत लाभदायक है। (२) प्रसव के समय आविवृद्धि के लिये पिपरामूल के साथ देते हैं तथा अनार्तव, कष्टार्तव एवं प्रसव पश्चात् भी इसका उपयोग किया जाता है। गर्भपात करने के लिये भी इसका लोग उपयोग करते हैं। (३) मिरिच के साथ इसका प्रयोग पाचन के विकार जैसे कुपचन, अतिसार एवं शूल आदि में बहुत लाभदायक है। बच्चों में दन्तोद्भव के समय इसका अधिक व्यवहार किया जाता है। (४) सर्पविष तथा अन्य विषों के लिये भी इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। सर्पविष में इसके पत्तों का रस अथवा चूर्ण को काली मिर्च के साथ खिलाते हैं तथा बाह्य लेप भी करते हैं। (५) मधु के साथ श्वित्र पर इसका स्वरस लगाया जाता है। व्यामिश्रण—इसकी कई जातियाँ इस औषधि में मिली रहती हैं जिसमें से अॅ० ब्रॅक्टियाटा (A. bracteata Retz.), अॅ० टँगॅला (A. tagala Cham.) आदि मुख्य हैं जिनके पत्र की आकृति में अन्तर रहता है। मात्रा—पंचाङ्ग चूर्ण ५-१५ र०; टिंक्चर ⅛-½ तो०। अथ माचिका (पश्चिमदेशे 'मोइआ' इति लोके प्रसिद्धो वृक्षविशेषः) तस्या नामानि गुणांश्चाह- माचिकाप्रस्थिकाऽम्बष्ठा तथा चाम्बालिकाऽम्बिका। मयूरविदला केशीसहस्रा बालमूलिका ।।१६७।। माचिकाऽम्ला रसे पाके कषाया शीतला लघुः। पक्वातीसारपित्तास्रकफकण्ठामयापहा ।।१६८।। मोइया (पश्चिम देश में प्रसिद्ध वृक्ष विशेष) के नाम तथा गुण—माचिका, प्रस्थिका, अम्बष्ठा, अम्बालिका, अम्बिका, मयूरविदला, केशी, सहस्रा और बालमूलिका ये सब मोइया के नाम है। मोइया—अम्लरसयुक्त, परिपाक में कषाय रसयुक्त, शीतल तथा लघु होती है और पक्वातीसार, रक्तपित्त, कफ तथा कण्ठसम्बन्धी रोगों को दूर करती है। [१६७-१६८] ५३. माचिका (मोइया) माचिका के सम्बन्ध में विद्वानों में कुछ मतभेद है। कुछ लोगों ने इसको (ले०) सोर्लनम् नाइग्रम् (Solanum nigrum) लिखा है लेकिन यह तो काकमाची (छोटी मकोय) का नाम है। अन्य लोगों ने इसको (ले०) हिबिसकस् कॅन्नाबिनस् (Hibiscus cannabinus) लिखा है जो पटुआ (पटसन) का नाम है तथा इसके गुण भी शास्त्रीय माचिका के गुणों से मिलते नहीं। छोटी माई जिन्हें क्रमशः (ले०) टॅमॅरिक्स आर्टिक्युलेटा तथा टॅ० गॅलिका (Tamarix articulata & T. gallica) कहते हैं उनके गुण माचिका के शास्त्रीय गुणों से मिलते होने के कारण इन्हीं का व्यवहार माचिका नाम से करना चाहिये। माई के अर्थ में माचिका का वर्णन नीचे दिया जा रहा है तथा प्रसङ्गवश पटुआ का वर्णन भी आगे दिया जायगा। कुछ लोगों ने बड़ी माई को हाऊबेर माना है जो गलत है। हाऊबेर का वर्णन पहले ५० पृष्ठ पर आ चुका है। (क) Tamarix articulata Vahl (टॅमॅरिक्स आर्टिक्युलेटा)। Fam. Tamaricaceae (टॅमॅरिकॅसी)। सं०-झावुक। हिं०-लाल झाऊ, झाव, (कृमिगृह-छोटी माई)। बं०, गु०-झाऊ। पं०-परवन, फरस, फरवा। सिं०-लई, असरेले। इरा०-मझ़बर् अझ़वा। यू०-सुम्रत् अल् अस्ल। इसकी झाड़ी उत्तर भारत में नदी के किनारों पर उत्पन्न होती है सिंध तथा पञ्जाब में यह अधिकता से पाई जाती है तथा इसकी उपज भी की जाती है।

२८४ भावप्रकाशनिघण्टुः इस झाड़ी के कृमि गृहों (Glls-गॉलस्) को छोटी माई, मगिया, मैन, छोटी मैन आदि कहा जाता है । यद्यपि इन्हें लोग फल कहते हैं तथापि ये फल न हो कर एक प्रकार के कृमियों द्वारा निर्मित गृह होते हैं। ये गोल, ग्रन्थि युक्त, चने के बराबर तथा पीताभ धूसरित रङ्ग के होते हैं। ये त्रिकोणाकृति के नहीं होते । औषधि में ये कृमिगृह, इसकी छाल तथा पञ्चांग के क्षार का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-छोटी माई में माजूफल में होने वाला गॅलिक् (Gallic) तथा टॅनिकृ (Tannic) अम्ल बहुत होता है। रेतीली तथा समुद्र के किनारे होने वाली झाड़ी के पञ्चांग की राख में खारा नमक (Sodium sulphate सोडियम् सल्फेट) बहुत होता है। गुण और प्रयोग-छोटी माई माजूफल के समान ही गुण वाली है। यह ग्राही, स्तम्भन तथा रक्त स्रावावरोधक है। इसकी छाल तिक्त, ग्राही तथा बल्य होती है। छोटी माई का प्रयोग माजूफल के स्थान पर किया जाता है। (१) यह उत्तम संग्राही होने के कारण पित्तज अतिसार, रक्तातिसार तथा रक्तार्श में उपयोगी है। (२) इसमें रक्तस्तम्भक गुण बहुत प्रबल होता है। अतः इसका उपयोग रक्तष्ठीवन, नासारक्त स्राव तथा प्रदर आदि रक्त स्रावी व्याधियों में मुख द्वारा एवं स्थानीय प्रयोग के रूप में किया जाता है। (३) गुल्म, प्लीहा, श्वेत प्रदर, शीघ्रपतन एवं शुक्रतारल्य आदि में भी इससे लाभ होता है। (४) इसकी छाल, कबीला एवं तैल का प्रयोग बाजीकरण के लिये किया जाता है। (५) इसका प्रलेप सिर के अपरस (Eczema-एक्झिमा) में किया जाता है। (६) गलशुण्डी वृद्धि तथा दन्तशूल में इसके चूर्ण का मञ्जन तथा काढ़े का कुल्ला कराया जाता है। मात्रा-छो० माई चूर्ण २-४ मा०; छाल १/२-१ तो० क्वाथ बना कर। (ख) Tamarix gallica Linn. (टॅमॅरिकॅसी गॅलिका)। Fam. Tamaricaceae (टॅमॅरिकॅसी)। सं०-झाबुक। हिं०-झाऊ, झाव, पडवास (कृमिगृह-बड़ी माई) बं०-बोनझाऊ, झाउ, (कृमिगृह-बड़ी माई) म०-झाऊ, (कृमिगृह-मगिया माई, बड़ी मुई)। पं०-झाऊ, पिलची, (कृमिगृह-बड़ी माँही)। ता०-सिरूसबुक्कु । ते०-एरूसारू । उर्दू-जहेव । इरा०-गझनाझू । यू०-सुम्नात् उल् तुर्फाह् । अं०-Tamarix (टॅमॅरिक्स), Tamarisk (टॅमॅरिस्क)। इसकी झाड़ी भारत के सभी भागों में विशेष कर पञ्जाब तथा उत्तर प्रदेश में होती है। बंगाल में यह नदियों के किनारों एवं आर्द्र भूमि में उत्पन्न होती है। यह सिन्ध, बलूचिस्तान, इरान एवं अफगानिस्तान में भी बहुत होती है। इसकी झाड़ी छोटी माई की झाड़ी की अपेक्षा बड़ी होती है तथा कभी-कभी इसके छोटे वृक्ष भी देखने में आते हैं। शाखाएँ-पतली तथा आपस में मिली हुई। पत्र-सूक्ष्म, विनाकोषयुक्त, चिकने, बल्क सदृश एवं तीक्ष्णाग्र। पुष्प- द्विलिङ्गी, बहुत छोटे, १/१० इञ्च के घेरे में, श्वेत या गुलाबी, शाखाओं के अन्त में गुच्छों के रूप में। फली-१/१० इञ्च लम्बी। कृमिगृह (Galls = गॉलस्) गोल, जायफल इतने बड़े, तीन कोणयुक्त, गाँठदार, पीले, हरिताभ मटमैले तथा पुराने होने पर धूसरित तथा स्वाद में कषाय एवं कड़वे। इसके विदेशी वृक्षों से एक प्रकार की शर्करा प्राप्त होती है जिसे गझाँजबीन कहते हैं। यह शर्करा यहाँ की जलवायु में पतली हो जाती है तथा बजार में मधु के समान गाढ़ा पीत पदार्थ इस नाम से मिलता है। बाजारू शर्करा में अन्य वृक्षों से प्राप्त शर्कराएँ भी मिली रहती हैं। भारतीय वृक्षों से यह शर्करा प्राप्त नहीं होती। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २८५ रासायनिक संगठन-इसमें ४०% तक टॅनिक ॲसिड होता है। गंञ्जबीन में विभिन्न शर्कराएँ होती हैं। गुण और प्रयोग-इसके कृमिगृह (गॉल) माजूफल तथा छो० माई के समान ग्राही, स्तम्भन तथा रक्तस्तम्भक होते हैं। गंञ्जबीन मृदु विरेचक तथा कफघ्न है। इससे पाखाना पतला होता है लेकिन इससे आंत्र को कोई नुकसान नहीं होता। इसके पञ्चाङ्ग की राख मूत्रल एवं स्रसन होती है तथा पञ्चाङ्ग का क्वाथ ग्राही, शिथिलता दूर करने वाला एवं बल्य होता है। (१) गंञ्जबीन मीठा तथा सौम्य होने के कारण बच्चों को दस्त साफ होने के लिये व्यवहार में लाया जाता है। इसके लिये इसको दूध के साथ दे सकते हैं। अनेक विरेचक एवं कफघ्न मिश्रणों में यह प्रयुक्त होता है। (२) कृमिगृह (गॉल) का प्रयोग माजूफल के स्थान पर किया जाता है। ग्राही होने के कारण यह अतिसार, आमातिसार, संग्रहणी, अत्यार्तव, रक्तष्ठीवन एवं प्रदर में लाभदायक है। इसके लिये चतुर्गुण जल में इसका फांट बनाकर २ से ४ तोले की मात्रा में पिलाते हैं। (३) इसके फांट का उपयोग दुष्ट व्रण तथा बद (Bubo) के प्रक्षालन के लिये तथा मुखपाक, गले की तकलीफ एवं दन्त तथा मसूढ़ों की दुर्बलता में कुल्ला करने के लिये किया जाता है। (४) इसके पत्तों का लेप शोथघ्न है तथा प्लीहा एवं यकृत् वृद्धि पर इसका लेप किया जाता है। मसूरिका, दूषित व्रण एवं अर्श में इसका धुआँ दिया जाता है। (५) काले रंग का इसके पञ्चाङ्ग का घन क्वाथ झाव नाम से काठियावाड़ में बिकता है तथा गलशुण्डी वृद्धि, गले की शिथिलता तथा शुष्क कास में इसको चटाते हैं। (६) इसके कृमिगृह (गॉल) का चूर्ण ४ से ८ माशा एवं ह्वॅसलीन २ तो० इनका

रासायनिक संगठन—इसके बीजों में एक प्रकार का खाने योग्य तैल पाया जाता है । गुण और प्रयोग—इसके पत्र तथा पुष्प विरेचक, रुचिकारक तथा हृद्य हैं । पित्तमयता में इनका शाक बनाकर खाया जाता है । इसके पुष्पों का १ तो० स्वरस मरिच एवं मिश्री के साथ पित्त प्रकोप में दिया जाता है, जिससे शौच साफ हो जाता है । इसके बीजों के तेल को पीड़ा एवं मोच आदि पर मलते हैं तथा पुष्टि एवं वाजीकरण के लिए इस तैल का सेवन करते हैं । तीसी और तिल में तेल निकालते समय इसके बीज की मिलावट की जाती है । अथ तेजवती (तेजवल्कल१ 'तेजबल' इति च लोके) तस्या नामानि गुणाँश्चाह— तेजस्विनी तेजवती तेजोह्वा तेजनी तथा ।।१६९।। तेजस्विनी कफश्वासकासास्यामयवातहृत् । पाचन्युष्णाकटुस्तिक्तारुचिवह्निप्रदीपिनी ।।१७०।। तेजवती (तेजवल्कल या तेजबल नाम से भी लोक में प्रसिद्ध द्रव्य) के नाम तथा गुण—तेजस्विनी, तेजवती, तेजोह्वा तथा तेजनी ये सब तेजबल के नाम हैं । तेजबल—कफ श्वास, कास, मुखसम्बन्धी रोग तथा वायु को नष्ट करनेवाला होता है । तथा यह पाचक, उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्तरसयुक्त, रुचिकारक एवम् अग्निदीपक होता है ।[१६९-१७०] ५४. तेजवती (तेजबल) हिं०—तेजबल । म०-बं०-गु०—तेजबल । अं०—Toothache Tree (टूथएक ट्री) । ले०—Zanthoxylum alatum Roxb. (झैन्थोक्साइलम् एलैटम्) । Fam. Rutaceae (रूटेंसी) । तेज वनौषधि का परिचय 'तुम्बरु' के नाम से दिया जा चुका है । उसी वृक्ष की छाल को तेजबल और कालीमिरच के आकार वाले तथा फटे मुखवाले फल को 'तुम्बरु' कहते हैं । कुछ लोगों ने उसी वंश की अन्य जाति को तेजबल लिखा है जिसके फलों को भी दन्तशूल में चबाने के लिए देते हैं । अथ ज्योतिष्मती (मालकांगनी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह ज्योतिष्मती स्यात्कटभी ज्योतिष्का कङ्गुनीति च । पारावतपदी२ण्या लता प्रोक्ता ककुन्दनी ।।१७१।। ज्योतिष्मती कटुस्तिक्ता सरा कफसमीरजित् । अत्युष्णा वामनी तीक्ष्णा वह्निबुद्धिस्मृतिप्रदा ।।१७२।। मालकांगनी के नाम तथा गुण—ज्योतिष्मती, कटभी, ज्योतिष्का, कङ्गुनी, पारावतपदी, पण्या, लता और ककुन्दनी ये सब नाम मालकांगनी के हैं । मालकांगनी—कटु तथा तिक्तरस युक्त, सारक (दस्तावर), कफ वात- नाशक, अत्यन्त उष्णवीर्य, वमन करानेवाली और तीक्ष्ण एवं जठराग्नि, बुद्धि तथा स्मरणशक्ति को बढ़ाने वाली होती है ।[१७१-१७२] ५५. ज्योतिष्मती (मालकांगनी) हिं०—मालकांगनी, मालकौनी, मालटांगुन । बं०—लताफटकी, वनउच्छे । म०—मालकांगोणी, करडकंगोनी, पिंगवी, पेंगी । क०—करिगन्ने । ते०—बावंजी । गु०, मा०—मालकांगोणां । ता०—वलुलुवै । फा०—काल । अ०— १. 'तेजबल' स्थाने 'तेजपात' इति पाठान्तरम् । २. 'पण्ये'ति पाठान्तरम् ।

हरीतक्यादिवर्गः २८७

हब्बे किलकिल्। अं०—Staff tree (स्टाफ् ट्री)। ले०—Celastrus paniculatus Willd. (सिलॅस्ट्रस् पॅनिक्युलेटम्) Fam. Celastraceae (सिलेस्ट्रॅसी)। यह हिमालय पहाड़ के उष्ण तथा साधारण जगहों में पञ्जाब, झेलम के आसपास तक समस्त भारतवर्ष की पहाड़ी भूमि में, पूर्वी बंगाल, बिहार, दक्षिण भारत, ब्रह्मा और सिलोन आदि प्रदेशों में होती है। इसकी सुविस्तृत काष्ठमय लता होती है जिसकी नवीन शाखाओं पर बहुत श्वेत बिन्दु पड़े रहते हैं। पत्ते— विषमवर्त्ती लगते हैं और आकार में कई प्रकार के होते हैं तथा गोलाई लिये किञ्चित् लम्बे, ऊपर से लट्वाकार, चिकने, चर्मवत् और नुकीले तथा गोल दाँतों से युक्त धार वाले होते हैं। प्रायः इनकी लम्बाई २ से ४ इञ्च तक और चौड़ाई १॥ से ३ इञ्च तक होती है। फूल—आध इंच के घेरे में पीलापन लिये हरे रंग के होते हैं। इन पर आध-आध इंच के डाडे (ढेंड़ी) लगते हैं जो गोलाई लिये किञ्चित् चिपटे, चमकीले, कच्ची अवस्था में हरे और पक्व होने पर पीले रंग के होते हैं और उनके आगे का हिस्सा फटे रहने से बीज दिखलाई पड़ते हैं। आषाढ़ एवं श्रावण के महीने में जब इसमें पक्व फलों के गुच्छे लगते हैं तब यह लता बहुत सुन्दर प्रतीत होती है। प्रत्येक फल में ३ खण्ड होते हैं। उनमें ३ से ६ तक लगभग तिहाई इञ्च के काले बीज होते हैं और वे एक प्रकार के लाल आवरण से ढके रहते हैं। रासायनिक संगठन—इसके बीजों में एक गाढ़ा, रक्ताभ, कड़वा और गन्धयुक्त तैल ३०%, एक कड़वी राल, राख ५% और टॅनिन् आदि द्रव्य रहते हैं। इसके बीजों को जलाकर पाताल यन्त्र द्वारा भी यह तैल निकाल सकते हैं। गुण और प्रयोग—मालकांगनी के बीज उष्ण, स्वेदजनन, उत्तेजक, बुद्धि एवं स्मृतिवर्धक, वातहर, वातनाडी बल्य एवं त्वग्दोषहर हैं। (१) इसके बीजों के साथ लोहवान, लवंग, जायफल और जावित्री मिलाकर पाताल यन्त्र द्वारा यह तैल निकाला जाता है जिसे कृष्णतैल (Black oil) या ओलियम् नाइग्रम् (Oleum Nigrum) कहते हैं। यह तैल विजगापट्टम्, मसुलिपट्टम् और एल्लोर आदि स्थानों में बिकता है। यह तैल अत्यन्त उत्तेजक, मूत्रनिःसारक तथा स्वेदल होता है। नवीन-बेरी-बेरी (Beri Beri) नामक रोग में १० से १५ बूँद इस तैल को देने से बहुत लाभ होता है। या इसके बीजों को क्रमशः बढ़ाते हुये एक दिन में ५० बीजों तक सोंठ के साथ देते हैं। पहले इससे मूत्र की मात्रा बढ़ती है और बाद में जलशोथ कम होकर फिर संवेदनाशक्ति वापस आती है। जलोदर में भी इस तैल से लाभ होता है। मलेरिया ज्वर जैसी पीड़ा जब आमवात में होती है तब तथा अङ्गघात आदि में इसको रक्तोत्क्लेशक (Rubefacient) के रूप में लगाते हैं। बुद्धि बढ़ाने के लिये आठगुने मक्खन में इसे मिलाकर सर में लगाया जाता है। (२) इसके बीजों को दबाकर भी तेल निकाला जाता है। २ से १० बूँद की मात्रा में आमाशय के रोगों में एवं बुद्धि तथा स्मृतिवृद्धि के लिये इसको खिलाते हैं। सुश्रुत में इस तैल को जलोदर के लिये हींग तथा जवाखार के साथ दूध में पीने को लिखा है। रसरत्नसमुच्चय में इसके तेल को स्मृति एवं बुद्धि वृद्धि के लिये बहुत उपयोगी माना है। (३) इसके बीजों का क्वाथ अन्य सुगन्धित औषधों के साथ आमवात, वातरक्त, अंगघातादि वातरोग एवं कुष्ठ में लाभदायक है। (४) इसके बीजों को व्रण के ऊपर पीसकर लगाने से न भरने वाले व्रण जल्दी भरते हैं। मात्रा—कृष्णतैल-मूत्र वृद्धिकर १०-३० बूँद। स्वेदजनक ५-१५ बूँद। ज्ञानतन्तु उत्तेजक १०-१५ बूँद। दबाकर निकाला तैल २-१० बूँद।

२८८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कुष्ठम् (कूठ) तस्य नामानि गुणांश्चाह- कुष्ठं रोगाह्वयं वाप्यं¹ पारिभाव्यं तथोत्पलम् ।। कुष्ठमुष्णं कटु स्वादु शुक्रलं तिक्तकं लघु । हन्ति वातास्रवीसर्पकासकुष्ठमरुत्कफान् ।।१७३।। कूठ के नाम तथा गुण-कुष्ठ, रोगाह्वय (रोगवाची शब्द), वाप्य, पारिभाव्य तथा उत्पल ये सब कूठ के नाम हैं । कूठ-उष्णवीर्य, कटु, स्वादु तथा तिक्त रसयुक्त, शुक्रजनक और लघु होता है । और यह वातरक्त, विसर्प, कास, कुष्ठ, वायु तथा कफ को दूर करता है । [१७३] ५६. कुष्ठ (कूठ) हिं०-कूठ, कूट, कुष्ट । बं०-पाचक, कुर । म०-कोष्ठ, उपलेट । गु०-उपलेट, कठ । क०-कोष्ट । ते०- वेंगुलकोष्ठम् । पं०-कुट्ठ, कुट, कोठ । फा०-कुष्ठ-ई-तल्ख । अ०-कुस्तबेहेरी । काश्मी०-पोस्तखै, कूट । भोटिया०-कुष्ट । ता०-कोष्ठम्, गोष्टम् । अं०-Costus root (कोस्ट्स् रूट) । ले०-Saussurea lappa, C. B. Clarke (सॉसुरिया लप्पा) । Fam. Compositae (काँपोजिटी) । इसके क्षुप काश्मीर तथा उसके आसपास के आर्द्र ढालों पर ८०००-१३००० फीट की ऊँचाई पर तथा चेनाब और झेलम नदियों के आसपास के प्रदेशों में १००००-१३००० फीट की ऊँचाई पर पाये जाते हैं । इसका बहुवर्षायु क्षुप-बहुत दृढ़ होता है । काण्ड-स्वावलम्बी, ४-७ फीट ऊँचा, भद्दा, जड़ की ओर छोटी उंगली प्रमाण मोटा होता है । पत्ते-कौशेय सदृश, विषम दन्तुर, खण्डित, आधरीय बहुत लम्बे, २-४ फीट, त्रिकोणाकार, लम्बे खण्डयुक्त सपंख डण्ठलवाले तथा ऊपर के छोटे । फूल-दृढ़ १ से १ १/२ इञ्च गोल, विनाल, गुच्छेदार, गहरे नील बैंगनी रंग के या काले । फल-०.३१ इञ्च तक लम्बे, दबे हुये, मुड़े हुये चर्मलफल (Achene) । मूल-हलके मुरचई लाल या काले बादामी, हलके, दृढ़, सीधे १ से ३ इञ्च लम्बे, १ से १ १/२ इञ्च मोटे, छोटे-छोटे उभारों से युक्त; मोटे टुकड़े अन्दर से पीले; इसके ठीक कटे हुये पृष्ठ में ३ भाग स्पष्ट दिखाई देते हैं जिसमें से बाहरी भाग अंगूठी की तरह गोल, बीच का काष्ठमय भाग कुछ हलके रंग का तथा महीन किरणों के समान धारियों से युक्त एवं अन्दर में मध्यभाग; भग्न- छोटा तथा शृङ्गवत् (Horny); गंध-मधुर; स्वाद-कुछ कड़वा । इन्हीं मूलों का व्यवहार औषध में किया जाता है । चक्रपाणि ने अच्छे कूठ की पहचान यह दी है कि उसे तोड़ने पर नीचे उसके कण अलग होकर नहीं गिरते तथा वह मृगशृङ्ग के समान होता है । कुछ लोग मीठा और कड़वा कूट करके दो भेद करते हैं और मीठा कूठ, पुष्करमूल को कहते हैं । शास्त्रीय गुणों में पुष्करमूल कटु, तिक्त कहा गया है लेकिन कूठ कटु और स्वादु लिखा गया है । इससे यह बात स्पष्ट है कि मीठा कूट, पुष्करमूल नहीं है । कुछ लोगों ने इसका समाधान इस प्रकार किया है कि परिपक्व कूठ की मूल कड़वी तथा अपक्व कूठ की मूल कुछ मीठी होती है । फारसी लेखक तिक्त कुष्ठ को कुस्त-ई-तल्ख और मीठे कूठ को कुस्त-ई-सिरीन् लिखते हैं और मीठे कूठ को पुष्कर मूल का अंग्रेजी नाम ओरिस्रूट बतलाते हैं । कूठ काश्मीर से चीन को बहुत जाता है जिसे वहाँ लोग धूप की तरह व्यवहार में लाते हैं । ऊनी वस्त्रों की कृमियों से रक्षा करने के लिये कूठ के टुकड़ों को उनमें रखते हैं । रासायनिक संगठन-इसके मूल में एक उड़नशील तैल १.५-२.५%, एक सॉस्सुराइन (Saussurine) नामक क्षाराभ .०५%, राल ६%, इन्युलिन (Inulin) १८%, तैल, पोटैशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate), शर्करा तथा १. व्याप्यमाप्यं वेति पाठान्तरे । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २८९ टॅनिन आदि द्रव्य रहते हैं। एक अन्य कुष्टिन (Kushtin, C₂₀ H₂₆ O₃) नामक तरल पदार्थ भी इससे प्राप्त होता है। इसके उड़नशील तैल में कोस्टस् लॅक्टोन (Costus lactoue, C₁₅ H₂₀ O₂) ११, कोस्टुसिक् एसिड (Costusic acid, C₁₅ H₂₂ O₂) १४, डीहाइड्रोकोस्टस् लॅक्टोन (Dihydrocostus lactone) १५, ऍप्लोटॉक्सिन (Aplotoxin) २०, ऍल्फा-कोस्टेन (a-costene) ६, बीटा-कोस्टेन (B-Costene) ६, फेलैण्ड्रेन (Phelandrene) ०.४, कॅम्फेन (Camphene) ०.४ तथा टरपेन ॲल्कोहोल (Terpene alcohol) ०.२% पाया जाता है। इसके पत्तों में भी क्षाराभ आदि पाये जाते हैं लेकिन उड़नशील तैल नहीं रहता। कुछ लोगों के मत से इसमें हॅलेरिक् अम्ल (Valeric acid) के लवण तथा इसकी राख से मैंगनीज (Manganese) भी पाया जाता है। सॉस्सुराइन नामक क्षाराभ की क्रिया सुषुम्नाशीर्ष (Medulla) स्थित प्राणदा (Vagus) नाड़ी केन्द्र पर तथा श्वसनिका (Bronchioles) एवं पाचनसंस्थान (Gastro-intestinal) की अनैच्छिक (Involuntary) मांसपेशी तन्तुओं पर अवसादक (Depressant) होती है जिससे श्वसनिकाओं का विस्फार (Relaxation) होता है। इससे रक्तचाप की कुछ वृद्धि होती है जो लगातार बनी रहती है तथा हृदय, विशेष कर उसके निलय (Ventricles) के संकोच तथा विस्फार की शक्ति बढ़ती है। श्वसनिका विस्फार की क्रिया ॲड्रेनलीन (Adrenaline) के जितनी तीव्र नहीं होती न यह उतनी जल्दी कार्य ही करता हैं लेकिन इसका प्रभाव अधिक समय तक बना रहता है। इसमें का उड़नशील तैल (Volatile oil) जीवाणुओं के लिये, विशेष कर स्तबक तथा माला गोलाणु (Staphylo and Streptococcus) के लिये प्रतिदूषक (Antiseptic) तथा उपसर्ग नाशक (Disinfectant) है। यह वातानुलोमक, हृदयोत्तेजक, कफनिःसारक एवं मूत्रल है तथा अनैच्छिक मांसपेशी तन्तुओं को यह शिथिल करता है जिससे श्वसनिकाओं का विस्फार होता है। केन्द्रीय वातनाड़ी संस्थान पर इसका प्रभाव अन्य उड़नशील तैलों की तरह ही होता है। इसका उत्सर्ग वृक्क तथा फुफ्फुसों द्वारा होता है जिससे यह मूत्रल तथा कफनिःसारक है। इसका प्रवाही सत्व अधिक मात्रा में (१०-२० सी० सी०) यदि सेवन किया जाय तो उदर में कुछ प्रक्षोभ तथा बेचैनी होती है तथा तन्द्रा उत्पन्न होती है। कूठ का धूम्रपान केन्द्रीय वातनाडी संस्थान (Central Nervous System) में अवसाद उत्पन्न करता है और शायद यही कारण है कि अफीम के स्थान पर इसका धूम्रपान किया जाता है। गुण और प्रयोग-कूठ उष्ण, दीपन, पाचन, सुगन्धि, उत्तेजक कफनिःसारक, उद्वेष्ठननिरोधी, कुछ मूत्रन, बाजीकर, रसायन, आर्तवजनन, व्रणशोधक एवं रोपक, त्वग्दोषहर, प्रतिदूषक (Antiseptic) तथा उपसर्गनाशक (Disinfectant) है। इसका उपयोग फुफ्फुस विकार जैसे तमकश्वास, कास एवं कुपचन, विसूचिका, जीर्ण चर्मरोग, उन्माद, अपस्मारादि वातरोग, आमवात, वातकफज्वर, नष्टार्तव, कष्टार्तव, हृदयोदर, जलोदर तथा शिरःशूल आदि में किया जाता है। (१) तमकश्वास (Asthma) के लिए यह औषध बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुई है। इसके लिए इसका मद्यसारीय प्रवाही सत्व १/२-२ ड्राम की मात्रा में या इसका चूर्ण दिन में ३, ४ बार दिया जाता है। रात को सोते समय तथा जब भी श्वास के आवेग की सम्भावना हो तो इसकी एक मात्रा देने से आवेग नहीं आता न इससे ॲड्रिनॅलीन (Adrenaline) के इञ्जेक्शन वा दमे की सिगरेट आदि की तरह निद्रानाश आदि दुष्परिणाम ही होते हैं क्योंकि यह उद्वेष्ठन निरोधि होने के साथ-साथ केन्द्रीय वातनाडी संस्थान पर इसका अवसादक प्रभाव भी होता है। इस औषध को १०, १५ दिन लगातार देकर फिर कुछ दिन रोककर देखना चाहिये कि फिर दौरा तो नहीं होता। यदि फिर दौरा हो तो फिर इसे देना चाहिये। इसका न तो कोई संचायि (Cumulative) दुष्परिणाम होता है न सहनशीलता (Tolerance) ही उत्पन्न होती है जिससे प्रत्येक बार मात्रा में वृद्धि करनी पड़े। इस औषध के प्रयोग के समय तमकश्वास के कारणों की अवश्य खोज करनी चाहिये तथा उनको दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि जब तक कारण दूर नहीं होंगे तब तक स्थायी लाभ नहीं हो सकेगा। यह प्राणदा नाड़ी की उत्तेजना से होने वाले आवेगों (वगोटोनिक् टाइप = Vagotonic type) को २२ भाव.I

२९० भावप्रकाशनिघण्टुः रोकने में विशेष समर्थ है। इसके क्षाराभ तथा तैल दोनों संयुक्त मिलकर कार्य करते हैं। तैल श्वसनिकाओं के उद्वेष्टन को दूर करने के साथ-साथ श्लेष्मा को भी बाहर निकालता है तथा उससे श्लेष्मलकला की सूजन दूर होती है। इसके प्रवाही सत्व को पोर्टेशियम् आयोडाइड् के मिश्रण के साथ भी दे सकते हैं। इसका अल्प मात्रा में धूम्रपान भी लाभदायक है। (२) पाचन के विकार जैसे अजीर्ण, कुपचन, शूल, आध्मान, अतिसार एवं विसूचिका आदि में इससे युक्त अग्निमुख चूर्ण (चक्र.) १०-२० र० की मात्रा में सुरा आदि के साथ लाभदायक है। विसूचिका में बड़ी इलायची के साथ इसका फांट दिया जाता है। हृद्दौर्बल्यजन्य जलोदर में भी इससे पाचन सुधरता है तथा मूत्रवृद्धि होकर लाभ होता है। (३) आमवात में इसके चूर्ण को एरण्ड तैल के साथ खिलाते हैं तथा इसका बाह्यलेप भी करते हैं। (४) रसायन के लिये इसके चूर्ण को घृत तथा मधु के साथ नित्य सुबह चाटना चाहिये जिससे किसी भी प्रकार के रोग नहीं होने पाते तथा आयु की वृद्धि एवं शरीर की कांति बढ़ती है। अथर्ववेद में भी इसके रसायन गुणों के साथ इसे शिरोरोग, तृतीयक ज्वर, कुष्ठ एवं कृमि रोगों के लिये उपयोगी माना है लेकिन आधुनिक विद्वान् मलेरिया, आंत्रिक कृमि, महत्कुष्ठ एवं आमवातादि में अनुपयोगी बतलाते हैं। (५) बार-बार आनेवाली हिक्का में यह औषध लाभदायक है। इसमें कूठ तथा राल का धूम्रपान कराया जाता है। (६) चर्मरोगों में यह बहुत लाभदायक सिद्ध हुई है। व्रणों पर इसके मलहम का उपयोग किया जाता है। अरूंषिका (सर के बलेदयुक्त फोड़े फुन्सी) में इसका चूर्ण खपरैल में भूनकर तेल के साथ लगाया जाता है जिससे खुजली, जलन, पीड़ा एवं सर के व्रण आदि अच्छे होते हैं। मुख कान्ति वृद्धि के लिये इसे नींबू के रस में ७ दिन भिगोकर मधु के साथ मुख पर लगाना चाहिये। (७) एरण्डमूल के साथ इसकी कांजी में पीसकर उसके लेप से शिरःशूल दूर होता है। (८) यह गुलाबजल में पीसकर हाथ पैरों की सूजन, उदरवृद्धि, शिरःशूल तथा मोच आदि पर लगाया जाता है। (९) चीन में इसका उपयोग बालों को काला करने के लिए मसाले के रूप में एवं धूपन के लिये किया जाता है तथा दन्तशूल में कस्तूरी के साथ उसे लगाते हैं। बालों को धोने के काम में भी इसका उपयोग होता है मात्रा-चूर्ण २-१५ रत्ती; तरलसत्व १/२-२ ड्राम। प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण-कभी-कभी सॉस्सुरिया हाइपोल्यूका (Saussurea hypoleuca) के मूल इसके प्रतिनिधि के रूप में व्यवहार में आते हैं। इसमें कभी-कभी लॅवियेटी (Labiateae) वर्ग की सॅलविया लॅनेटा (Salvia lanata) या लिगुलॅरिया (Ligularia) के मूल, निर्विश (Kyllingia triceps), रास्ना भेद (Inula racemosa), कुछ हीन जाति के ॲकोनाईट (Aconite) के मूल एवं सेनेसिओ जॅक्वेमॉन्टियानस् (Senecio jacquemontianus) जिसे कश्मीर में पोष्कर कहते हैं आदि का व्यामिश्रण किया जाता है जिनको सूक्ष्मदर्शन यन्त्र एवं अन्य आकारादि द्वारा अलग पहचान सकते हैं। दक्षिण की तरफ कहीं-कहीं संभवतः केम़ुक (Costus speciosus-कोस्टस् स्पेसिओसस्) इसके स्थान पर लिया जाता रहा। अथ कुष्ठभेदः-पुष्करमूलम्, तस्य नामानि गुणाँश्चाह उक्तं पुष्करमूलं तु पौष्करं पुष्करञ्च तत्। पद्मपत्रञ्च काश्मीरं कुष्ठभेदममं जगुः ॥१७४॥ पौष्करं कटुकं तिक्तमुक्तं वातकफज्वरान्। हन्ति शोथारुचिश्वासान्विशेषात्पार्श्वशूलनुत् ॥१७५॥

हरीतक्यादिवर्गः २९१ कूठ के भेद पोहकर मूल के नाम तथा गुण-पुष्करमूल, पौष्कर, पुष्कर, पद्मपत्र, काश्मीर और कुष्ठभेद ये सब पोहकर मूल के नाम हैं। पोहकरमूल-कटु तथा तिक्त रसयुक्त होता है और वात कफ ज्वर, शोथ, अरुचि तथा श्वास को दूर करता है। और यह विशेषतः पार्श्वशूल को नष्ट करने वाला होता है। [१७४-१७५] ५७. पुष्करमूल हिं०-पोहकरमूल, पुष्करमूल। बं०-पुष्करमूल, कुष्ठविशेष। म०-पुष्करमूल, बालवेखण्ड। गु०-पोहकरमूल। पं०-पोहकरमूल, इरसा। काश्मी०-पातालपद्मिनी। अ०-सोसन इरसा। फा०-बेख-इ-वनफ्शा। अं०-Orris root (ओरिस रूट)। ले०-Iris germanica, Linn. (आइरिस् जर्मेनिका, लिन)। Fam. Iridaceae (आइरिडेसी)। पुष्करमूल के सम्बन्ध में विद्वानों में कुछ मतभेद है। कुछ लोगों ने यह लिखा है कि पुष्करमूल के अभाव में कूठ लेना चाहिये। प्राचीन समय में इसका अभाव होगा ऐसा प्रतीत नहीं होता। आधुनिक विद्वानों में डॉ० देसाई ने पुष्करमूल को (ले०) आइरिस् जर्मेनिका। (Iris germanica) माना है लेकिन उसी को वह बालवच (हैमवती, श्वेतवचा) भी मानते हैं। कुछ अन्य विद्वान् पुष्करमूल को (ले०) इनूला रेसिमोसा (Inula racemosa) मानते हैं जिसको डॉ० देसाई ने 'रास्ना' माना है तथा बालवच (हैमवती, वेतावचा) को (ले०) आइरिस हेरसिकोलर (Iris versicolor) मानते हैं। सभी विद्वान् पुष्करमूल का अंग्रेजी नाम ओरिस रूट (Orris Root) लिखते हैं। ओरिस रूट (ले०) आइरिस् फ्लोरेंटिना (Iris florentina Linn) का मूल है। बम्बई के बजार में (अं०) ओरिस् रूट नाम से अधिकतर (ले०) आइरिस् जर्मेनिका के गुण कूठ से मिलते-जुलते होने से इसका ग्रहण उचित जान पड़ता है। कुछ लोग कमल की जड़ को पुष्करमूल के नाम से लेते हैं जो बिलकुल गलत मालूम होता है। कूठ के स्थान पर लिये जाने वाले द्रव्यों को भी इसके स्थान पर कुछ लोग लेते हैं जो उचित नहीं है। (ले०) इनूला रेसिमोसा का वर्णन 'रास्ना' के अन्तर्गत किया जा चुका है। यहाँ पर निम्नलिखित वर्णन (ले०) आइरिस् जर्मेनिका का किया जा रहा है। यह इरान तथा काश्मीर में उत्पन्न होता है तथा काश्मीर में इसकी उपज भी की जाती है। इसका छोटा पौधा होता है। पत्ते-अनेक, चौड़े तथा तलवार के आकार के होते हैं। पुष्प-लम्बे दंड पर आते हैं। मूल-कठोर, पीताभश्वेत, ५ से १० से० मी० लम्बे तथा २-३ से० मी० चौड़े टुकड़ों में, चिपटे, वार्षिक वृद्धि के कारण उत्पन्न सान्तर संकोच युक्त, सुगन्ध युक्त एवं स्वाद में तिक्त रहते हैं। ३ साल पुराने पौधे की जड़ निकालकर छील कर हल्की धूप में ५- ६ दिन सुखाते हैं फिर ३ वर्ष तक बंद करके रखते हैं तब इसमें गन्ध आती है। ताजी अवस्था में यह गन्धहीन एवं स्वाद में कुछ कटु रहता है। मूल का उपयोग चिकित्सा के अतिरिक्त पाउडर में तथा सुगन्ध द्रव्य के रूप में किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल, आइरिडीन (Iridin) ग्लूकोसाइड, स्टार्च, शर्करा, राल, टैनिन तथा कैल्शियम ऑक्झेलेट आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-इसके गुण कूठ के समान हैं तथा यह उष्ण, आनुलोमिक, मूत्रजनन, उत्तेजक, शोथघ्न एवं व्रणरोपक है। अधिक मात्रा में यह विरेचक तथा वामक है। इसका उपयोग श्वास, कास, पार्श्वशूल, कुपचन, अरुचि तथा पित्ताशय की बीमारियों में किया जाता है। हकीम लोग इसको विरेचक एवं मूत्रल मानते हैं तथा यकृत् के विकारों में इसका प्रयोग करते हैं। दंतशूल तथा दांत हिलते हों तब एवं मुख दुर्गन्धि में इसके चूर्ण से मञ्जन किया जाता है तथा इसके टुकड़े को मुख में रखकर चूसते भी हैं। केशतैलों को सुगन्धित करने के लिये इसका व्यवहार किया जाता है। छोटे व्रणों तथा फोड़े फुन्सियों पर इसका लेप लाभदायक है। मात्रा-२ से १५ रत्ती।

२१२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कटुपर्णी (चोक) तस्या नामानि गुणाँश्चाह कटुपर्णी हैमवती हेमक्षीरी हिमावती । हेमाह्वा पीतदुग्धा च तन्मूलं चोकमुच्यते ।। १७६ ।। हेमाह्वा रेचनी तिक्ता भेदित्युत्क्लेशकारिणी । कृमिकण्डूविपानाहकफपित्तास्रकुष्ठनुत् ।। १७७ ।। सत्यानाशी (चोक) के नाम तथा गुण—कटुपर्णी, हैमवती, हेमक्षीरी, हिमावती, हेमाह्वा और पीतदुग्धा ये सब सत्यानाशी के नाम हैं और इसी के जड़ भाग को चोक कहते हैं । सत्यानाशी—रेचक, तिक्तरसयुक्त, भेदक (मल को भेदन करने वाली) और उत्क्लेश कारक होती है एवम् कृमि, खुजली, विष, आनाह, कफ, पित्त, रक्त विकार और कुष्ठ को दूर करने वाली होती है । [१७६-१७७] ५८. कटुपर्णी (चोक) हिं०—सत्यानाशी, पीला धतूरा, फरंगी धतूरा, उजर कांटा, सियाल काँटा, भड़भांड़, चोक । बं०—सोनाखिरणी, शियाल काँटा, बड़ो सियाल काँटा । म०—काँटे धोत्रा । गु०—दारूडी । क०—अरसिन उन्मत्त । ता०—ब्रह्मदण्डु, कुडियोट्टि, कुरुक्कुम चेडि । ते०—ब्रह्मदण्डी चेट्टु । पं०—कण्डियारी, स्यालकांटा, भटमिल, सत्यनशा, भैरवण्ड, भटकटेया । सन्ता०—गोकुहल जानम । पश्चिमो०—भरभुरवा, कडवह कण्टेला । मला०—पोन्नुम्मत्तम् । उडि०— कांटाकुशम । अं०—Mexican poppy (मेक्सिकन पॉप्पी), Prickly poppy (प्रिक्ली पॉप्पी), Yellow thistle (यलो थिसल्) । ले०—Argemone mexicana Linn. (आर्जिमोन् मेक्सिकाना) । Fam. Papaveraceae पॅपेव्हेर्रेसी । यह सब प्रान्तों के खेत, मैदान, झाड़ी, खण्डहर, सड़क के किनारे आदि गन्दी जमीन में उत्पन्न होती है । शिमल में ५००० फीट ऊँची भूमि पर भी पाई जाती है । सत्यानाशी क्षुप—जाति की वनस्पति २ से ४ फीट तक ऊँची, अनेक शाखाओं से युक्त सघन होती है । इसके क्षुप, पत्ते, फल इत्यादि पर तीक्ष्ण काँटे होते हैं । डण्डी और पत्तों को तोड़ने से पीला दूध निकलता है । पत्ते—३ से ७ इञ्च तक लम्बे, कटे हुए, तीक्ष्ण कँटीले नोक वाले, सफेद धब्बों से युक्त तथा रेशेवाले होते हैं । फूल—कटेरी नुमा चमकीले पीले रंग के आते हैं और वे खुले मुख होते हैं । फल—लम्बे तथा गोल होते हैं और उनसे राई के समान काले रंग के बीज निकलते हैं । वैशाख, ज्येष्ठ की गरमी से इसका क्षुप सूख कर नष्ट हो जाता है । फल के सूखने पर बीज भूमि पर गिर जाते हैं और वे ही शरद ऋतु में अङ्कुरित हो पौधे के रूप में परिणत हो जाते हैं । इसकी जड़ का नाम 'चोक' है । कुछ विद्वान् इस पौधे को विदेशी मानते हैं तथा इसे प्राचीन 'स्वर्णक्षीरी' नहीं मानते । इस वनस्पति के ताजे मूल, क्षीर, बीज तथा तैलादि का औषध में उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन—पहले ऐसा समझा जाता रहा कि इस वनस्पति के पत्तों तथा फलियों में मॉर्फीन (Morphine) या आर्जेमोनाइन् (Argemonine) क्षाराभ पाये जाते हैं लेकिन बाद के प्रयोगों से ज्ञात हुआ कि इसमें इस प्रकार के कोई क्षाराभ नहीं रहते लेकिन बर्बेरीन (Berberine) तथा प्रोटोपाइन (Protopine) नामक अन्य क्षाराभ होते हैं । इसके बीजों में एक गहरे बदामी रंग का, स्वादहीन तैल २२% पाया जाता है जो पहले पतला रहता है लेकिन बाद में रखने पर गाढ़ा होता जाता है । इसके अतिरिक्त इन बीजों में कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates) एवं अॅल्ब्यूमिन (Albumin) ४९%, आर्द्रता ९% तथा राख ६% पाई जाती है । इस राख में क्षारीय फॉस्फेट (Phosphate) तथा सल्फेट (Sulphate) पाये जाते हैं । इस वनस्पति में पीले रंग का दूध बहुत होता है जिसमें अल्प मात्रा में बर्बेरीन (Ber-berine) होता है । पोटैशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate) लवण भी इसमें होता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २९३ गुण और प्रयोग-यह विरेचक, रसायन, कुष्ठघ्न एवं कृमिघ्न है तथा इसका प्रयोग फिरंग, उपदंश, सोजाक, कुष्ठ, चर्मरोग तथा नेत्र विकारों में किया जाता है। (१) इसके बीजों का तेल मृदुरेचक, रसायन कुष्ठघ्न एवं त्वचा के रोगों में लाभदायक है। यह ३० बूँद की मात्रा में शर्करा के साथ दिया जाता है। इसके नये बीज वामक होने के कारण इन बीजों को एक साल रख कर फिर तेल निकालते हैं तथा ताजे निकाले तेल का ही उपयोग अच्छा होता है। इसमें एरण्ड तैल के समान न तो कोई दुर्गन्ध या खराब स्वाद होता है न इससे मरोड़ आदि होती है तथा यह अल्प मात्रा में प्रभावशाली होता है। आमातिसार, संग्रहणी, विसूचिका उदरशूल, विबन्ध युक्त उदरशूल एवं सर्वांगशोथ आदि में इसका उपयोग किया जाता है। फिरङ्ग तथा उपदंश में इसके बीजों का प्रयोग विरेचन के लिये किया जाता है। कुष्ठ, दाद, विसर्प, श्वित्र एवं अन्यान्य पीड़ा एवं दाहयुक्त चर्मविकारों में इसका तैल लगाया जाता है जिससे शान्ति मिलती है। (२) इसके बीज वामक तथा उत्क्लेशकारक होने के कारण इनका उपयोग गले के विकार, फुफ्फुस विकार, कास, कुकास एवं तमकश्वास आदि में लाभदायक होता है। इसमें कोई उद्वेष्टन निरोधि गुण नहीं है जो तमकश्वास में लाभदायक होता हो। ये रेचक तथा वेदनास्थापक भी होते हैं। दाँतों में गड्ढे होकर पीड़ा होती हो तो इनके धूम्रपान से लाभ होता है। (३) इस पौधे में जो पीले रंग का दूध होता हैं वह रसायन, कुष्ठघ्न, मूत्रजनन, व्रणशोधक तथा रोपक, शोथप्रतिकारक, ज्वरहर एवं नेत्र के लिये हितकारक होता है। फिरंग, उपदंश एवं सोजाक आदि में 'किडमार' (Aristolochia bracteata Retz) के रस के साथ इसको पिलाते हैं। मलेरिया आदि जीर्ण विषमज्वरों में नींबू के रस में इसे घोंट कर पिलाते हैं। सोजाक में इसको घी के साथ देने से लाभ होता है। जलोदर एवं कामला आदि में भी इसका व्यवहार किया जाता है। नेत्राभिष्यन्द में पलकों पर इसको लगाते हैं तथा नेत्रशुक्ल, अधिमांस एवं दृष्टिमांद्य आदि में घी के साथ १ बूँद इसे आँखों में डालते हैं। इससे किसी प्रकार की हानि नहीं होती। सर्वदा के प्रयोग के लिये इसको सुखाकर रख सकते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर घी या दूध में घिसकर उपयोग में ला सकते हैं। पुराने व्रण, फिरंगादि से उत्पन्न व्रण एवं खुजली (Scabies) आदि में इसको लगाने से लाभ होता है। (४) इसका मूल रसायन, कृमिघ्न तथा कुष्ठघ्न है। फिरंग, उपदंश, सोजाक, अश्मरी तथा अन्य चर्मरोगों में इसका क्वाथ दिया जाता है एवं इसका लेप भी करते हैं। स्फीत कृमि (Tape-worm) के लिये इसके चूर्ण को ४ माशा की मात्रा में खिलाते हैं। बिच्छू काटने पर इसकी ताजी जड़ को घिस कर लगाते हैं। (५) कुष्ठ (Leprosy) में इसके स्वरस को १ तोले की मात्रा में ४० दिन तक रोज सबेरे दूध के साथ पिलाने से लाभ होता है। यह रसायन एवं बलवर्धक है तथा फिरंगादि में भी यह लाभदायक होता है। (६) सरसों में इसके बीजों की मिलावट करके तेल निकालते हैं। ऐसा मिलावटी तेल बहुत हानिकार होता है तथा इससे बेरी बेरी (Beri beri) एवं एपिडेमीक् (Epidemic dropsy) नामक रोग होते हैं जिसमें पैरों में सूजन, हृदय की दुर्बलता, पाचनसंस्थान के विकार एवं वात नाड़ी शोथ आदि होते हैं। परीक्षा-सरसों के तेल में इसकी मिलावट है या नहीं इसकी निम्नलिखित परीक्षाएँ की जाती हैं- (क) सरसों के तेल के बराबर शोरे का तेजाब (Nitric acid-नाइट्रिक एसिड) मिलाकर हिलाने से मिलावट न होने पर धूसर लाल (Brownish red) या नारंग (Orange) रंग उत्पन्न नहीं होता।

२९४ भावप्रकाशनिघण्टुः (ख) ३ मि० लि० सरसों का तेल, १ मि० लि० ग्लेशियल ॲसेटिक ॲसिड (Glacial acetic acid) तथा क्यूप्रिक ॲसिटेट (Cupric acetate) के जलीय ३% घोल का ३ मि० लि० धीरे-धीरे हिलावें। फिर जलयुक्त पात्र में इसके पात्र को रखकर १५ मिनट गरम करके फिर अच्छी तरह हिला कर रख दें। मिलावट न होने पर अवक्षेप नहीं होता तथा उसके जलीय भाग में नीले रंग से हरे रंग में कोई परिवर्तन नहीं होता। मात्रा—बीज तैल ३० बूँद; बीज १/४ तो०; पीतवर्ण का दुग्ध १-२ माशा; मूल २-४ माशा। अथ कर्कटशृङ्गी (काकड़ासिंगी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह शृङ्गी कर्कटशृङ्गी च स्यात्कुलीरविषाणिका। अजशृङ्गी च चक्रा¹ च कर्कटाख्या च कीर्त्तिता ।।१७८।। शृङ्गी कषाया तिक्तोष्णा कफवातक्षयज्वरान्। श्वासोर्ध्ववाततृट्कासहिक्काऽरुचिर्वमीन्हरेत् ।।१७९।। काकड़ासिङ्गी के नाम तथा गुण—शृङ्गी, कर्कटशृङ्गी, कुलीरविषाणिका, अजशृङ्गी, चक्रा और कर्कटाख्या ये सब काकड़ासिङ्गी के नाम हैं। काकरासिङ्गी—कषाय तथा तिक्तरस युक्त एवं उष्णवीर्य होती है। और यह कफ, वात, क्षय, ज्वर, श्वास, ऊर्ध्ववात, प्यास, कास, हिचकी, अरुचि तथा वमन को दूर करने वाली होती है। [१७८-१७९] ५९. कर्कटशृङ्गी (काकड़ासिंगी) हिं०—काकड़ासिङ्गी, काकड़ासिंगी, काकरासिंगी (घी), ककड़ाव। बं०—कांकराशृङ्गी। म०—काकड़ाशिंगी। क०—कर्कटिशृङ्गी, दुष्टपुचत्तु। ते०—काकर सिंगी। ता०—काक्कट शिंगी। मा०—काकड़ाशिंगी। पं०—ककर, सुमाक। गु०—काकड़ा सोंगी। काश्मी०—कक्कर। ले०—Pistacia integerrima, Stew, ex Brandis (पिस्टॅसिया इंटिजिरेमा)। Fam. Anacardiaceae (अॅनॅकार्डिएसी)। इसके वृक्ष उत्तर पश्चिमी हिमालय के बाहरी कतारों पर १५००-८००० फीट की ऊँचाई तक तथा पंजाब, सीमाप्रान्त आदि स्थानों पर पाये जाते हैं। इसके वृक्ष मध्यमाकार के होते हैं। छाल—सफेद रंग की। पत्र—युग्म अथवा अयुग्मपक्षाकार तथा ६-९ इञ्च लम्बे। पत्रक—४-६ जोड़े, किञ्चित् सनाल, भालाकार, लम्बे नोक तथा सरल धार वाले और चिकने। कोपलें (नवीन पत्र) लाल रंग की। पुष्प—स्त्रीपुष्प और पुंपुष्प अलग-अलग वृक्षों पर तथा सवृन्त काण्डज पुष्पसमूहों में एवं बाह्य कोषों (पंखुड़ियों) से हीन। अष्ठिफल शुष्क, चिकने, झुर्रीदार, गोल, बहुत छोटे एवं पकने पर धूसर वर्ण के हो जाते हैं। इस वृक्ष की पत्तियों, पर्णवृन्तों तथा टहनियों पर एक प्रकार की लम्बी-लम्बी शृंगवत् रचना लगी रहती है जिन्हें कृमिगृह (Galls—गॉल्स) कहते हैं। ये एक प्रकार के कीड़ों, जिन्हें एफिस (Aphis) कहा जाता है द्वारा निर्मित होते हैं। इन कृमिगृहों को ही काकरासिंगी कहते हैं। ये विभिन्न नाप के ३-९ इञ्च लम्बे, पीले एवं कड़े होते हैं। इनका बाह्य पृष्ठ हलका हरिताभ बादामी रंग का, पतला तथा झालरदार (Fimbriated) दिखलाई देता है। इसको तोड़ने पर अन्दर का पृष्ठ रक्ताभ दिखलाई देता है जो महीन रजः कणों से ढका रहता है। सूक्ष्मदर्शक यन्त्र द्वारा देखने से यह सिद्ध हुआ है कि ये कण उन कीड़ों के मृतदेह तथा उनके मल हैं। काकरासिंगी का चूर्ण स्वाद में अत्यन्त कसैला तथा कुछ कड़वा होता है तथा इसमें तारपीन के तेल की तरह गन्ध आती है। तिन्तिडीक जाति (Rhus) के वृक्षों में भी कृमिगृह बनते हैं परन्तु वे काकरासिंगी से भिन्न हैं। कुछ लोगों ने भ्रम से कर्कट वृक्ष का नाम हस् सविसडेनिया (Rhus succedanea Linn.) दे दिया है जो उचित नहीं है। १. 'वक्ते'ति पाठान्तर प्रामादिकम्। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २९५ प्राचीन ग्रन्थों में इसके कीड़ों से उत्पन्न होने के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता लेकिन कास आदि के लिये इसका बहुत प्रयोग किया गया है। रासायनिक संगठन-इसमें एक हलके हरिताभ पीतवर्ण का एवं तारपीन के तेल की तरह गन्धवाला उड़नशील तैल १.३%, रवेदार हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbon) ३.४%, टॅनिन ६०%, गम मॅस्टिक (Gum mastic) ५%, एक रालीय पदार्थ तथा दो अन्य रवेदार अम्ल पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह बल्य, कफनिःसारक, उष्ण एवं ग्राही है। इसमें के उड़नशील तैल के कारण इससे तमकश्वास, कास, श्वासनलिका शोथ एवं राजयक्ष्मा आदि में अच्छा लाभ होता है। इससे श्लैष्मिककला को बल मिलकर कफ बाहर निकलने लगता है एवं नया कफ बनने नहीं पाता। इसमें टॅनिन बहुत होने के कारण इसका अतिसारादि में भी अन्य औषध के साथ उपयोग किया जाता है। आमाशय के प्रकोप से उत्पन्न वमन, हिक्का, जीर्ण अतिसार, आमातिसार तथा उपजिह्विका की वृद्धि से उत्पन्न खाँसी आदि में इसको देने से अच्छा लाभ होता है। बच्चों के लिये यह विशेष लाभदायक है। वयस्कों के लिये इसकी साधारण मात्रा १० रत्ती की है। (१) इसके चूर्ण को घृत में भूनकर उसमें मिश्री मिलाकर संग्रहणी (Dysentery) में देने से बहुत लाभ होता है। (२) बच्चों में दन्तोद्भव के समय जब खाँसी, ज्वर, अतिसार एवं पाचन के विकार आदि होते हैं, तब काकरासिंगी, अतीस एवं छोटी पीपल समान मात्रा में लेकर उसके चूर्ण को १/२-२ रत्ती की मात्रा में मधु के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है। इस चूर्ण में नागरमोथा भी कुछ लोग मिलाते हैं। बच्चों के श्वास में मूली के फल एवं इसके चूर्ण को मधु तथा घृत के साथ चटाने से लाभ होता है। (३) शुष्क कास तथा अन्य श्वसन संस्थान के विकारों में काकरासिंगी, भारङ्गीमूल, सोंठ, छोटी पीपल, कचूर तथा मुनक्का इनका चूर्ण १५ रत्ती की मात्रा में मधु के साथ देना चाहिये। (४) कफज छर्दि में नागरमोथा एवं इसका चूर्ण मधु के साथ चटाने से लाभ होता है। (५) इसका बाह्य लेप सोरियाँसिस् (Psoriasis) नामक जीर्ण चर्मरोग में किया जाता है तथा मसूड़ों आदि से खून जाता हो तो इसके क्वाथ से गण्डूष कराया जाता है। मात्रा-चूर्ण १/२-२ माशा। अथ कट्फलस्य (कायफल) नामानि गुणांश्चाह कट्फलः सोमवल्कश्च कैटर्यः कुम्भिकाऽपि च । श्रीपर्णिका कुमुदिका भद्रा भद्रवतीति च ।। १८० ।। कट्फलस्तुवरस्तिक्त कटुर्वातकफज्वरान् । हन्ति श्वासप्रमेहार्शः कासकण्ठामयारुचीः ।। १८१ ।। कायफल के नाम तथा गुण-कट्फल, सोमवल्क, कैटर्य, कुम्भिका, श्रीपर्णिका, कुमुदिका, भद्रा और भद्रवती ये सब कायफल के नाम है। कायफल-कषाय, तिक्त तथा कटु रसयुक्त होता है तथा वात, कफ, ज्वर, श्वास, प्रमेह, बवासीर, कास, कण्ठसम्बन्धी रोग तथा अरुचि को दूर करता है। [१८०-१८१] ६०. कट्फल (कायफल) हिं०-कायफर, कायफल, काफल। बं०-कायछाल, कायफल, कट्फल। क०-किरिशिवनि। तै०-कैदर्यमु। म०-मा०-गु०-पं०-कायफल। खासिया०-डिंगसोलिर। ता०-मरुदम्पत्तै। फा०-दारशीशान्। अ०-उदुलुबर्क, अजूरी। अं०-Box Myrtle; Bay-berry (बाक्स मिर्टल; बे-बेरी)। ले०-Myrica nagi, Thumb. (मायुरिका नेगी)। Fam. Myricaceae (मायुरिकेसी)।

२९६ भावप्रकाशनिघण्टुः यह हिमालय के साधारण उष्ण प्रदेशों में रावी से पूरब की ओर, खासिया पहाड़, सिलहट तक, ३-६ हजार फीट के बीच पाया जाता है और सिंगापुर में भी इसके वृक्ष देखने में आते हैं। चीन तथा जापान में इसकी बहुत उपज की जाती है। इसके मध्यम ऊँचाई के सदाहरित वृक्ष होते हैं। छाल-बादामी, धूसर अथवा कृष्णाभ, भारी, सुगन्धित, करीब १/२ इञ्च मोटी और खुरदरी होती है। काष्ठ १/२ इञ्च से १ इञ्च मोटा, बिना रेशे का और रक्ताभ बादामी होता है। पत्रनाल, मञ्जरी तथा नवीन शाखाओं पर बादामी रोमावरण होता है। पत्ते-४ से ८ इञ्च लम्बे तथा १ १/२-२ इञ्च चौड़े, ऊपर से भालाकार अथवा कुछ-कुछ आयताकार भी और उनके अधः पृष्ठ प्रायः मुरचई रंग के होते हैं। फूल-लाल। फल- १/२ इञ्च लम्बे, अण्डाकार, कुछ चिपटे, पृष्ठ पर दानेदार और पकने पर रक्ताभ या पीताभ बादामी होते हैं। फलों में मोम की तरह एक तेल होता है। ये फल स्वाद में कुछ खट्टे होते हैं। इन्हें सिलहट में 'सोफी' कहते हैं जिन्हें लोग खाते हैं। यद्यपि इस वृक्ष का नाम कायफल है तब भी औषधार्थ इसकी छाल का ही प्रयोग 'कायफल' नाम से किया जाता है। इस छाल को सूँघने से छींक आती है तथा इसे जल में डालने पर जल लाल हो जाता है। आधुनिक विद्वान् इसके फल का भी औषधार्थ प्रयोग बतलाते हैं। भ्रमवश कितने वैद्य जंगली जायफल, ले०-मायरिस्टिका मलबारिका (Myristica malabarica Lam.) के वृक्ष को कायफल का वृक्ष बतलाते हैं। जंगली जायफल के फल के ऊपर जावित्री के समान जो छिलका होता है उसको रामपत्री कहते हैं। कायफल के फल का छिलका न जावित्री के समान होता है और न रामपत्री कहलाता है। कुछ लोगों ने इस वृक्ष को कुम्भी वृक्ष, ले०-कॅरेया आर्बोरिया (Careya arborea Roxb.) माना है जो गलत है। रासायनिक संगठन-इसमें कुछ टैनिन, शर्करा सम द्रव्य तथा कुछ लवण रहते हैं। इसके चूर्ण से एक मायरिसेटिन (Myricetin) नामक रञ्जक पदार्थ प्राप्त होता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, ग्राही, स्वेदजनक, कफघ्न, वातहर, शोथघ्न, शिरोविरेचक, उत्तेजक तथा गर्भाशयसंकोचक है। अधिक मात्रा में लेने से इससे वमन होता है तथा थकावट मालूम होती है। इसका प्रयोग घरेलू औषध के रूप में अनेक रोगों में किया जाता है। (१) सोंठ एवं दालचीनी के साथ इसका क्वाथ प्रतिश्याय, गले की सूजन, मुखपाक, स्वरभंग, तमकश्वास, जीर्ण श्वासनलिका शोथ, कास तथा अग्निमांद्य, अरुचि, आध्मान, कुपचन, आमातिसार, रक्तातिसार, मूत्रातिसार, गण्डमाला एवं गृध्रसी आदि में दिया जाता है। (२) अर्श में कत्था, हींग एवं कर्पूर के साथ या घृत के साथ इसका लेप लाभदायक है तथा इसका आन्तरिक प्रयोग भी किया जाता है। (३) केशर, काले तिल तथा सनई के बीजों को इसके साथ पूर्ण मात्रा में गुड़ के साथ देते हैं जिससे कष्टार्तव में अच्छा लाभ होता है। इसके देने के कुछ देर बाद भोजन देना चाहिये नहीं तो जी मिचलाने लगता है। इसके चूर्ण का पिचु भी योनि में धारण कराया जाता है। (४) प्रतिश्याय, चक्कर, शिरःशूल एवं अपस्मार आदि में इसके नस्य से लाभ होता है। (५) इसके क्वाथ से व्रण प्रक्षालन किया जाता है तथा इसका चूर्ण व्रणों पर डाला जाता है। इसको घिसकर सूजन, चोट एवं मोच आदि पर लगाने से लाभ होता है। (६) इसका तैल व्रणों के लिये लाभदायक है तथा संधिशूल में इसे लगाते हैं।

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः २९७ (७) सिरके में इसे घिसकर मसूढ़ों पर रगड़ने से दंतशूल दूर होता है तथा मसूढ़े मजबूत होते हैं। (८) इससे सिद्ध तैल का प्रयोग कर्णशूल में कर्णबिन्दू के रूप में किया जाता है। (९) हैजे में हाथ पर ठंडे हो जाने पर इसके चूर्ण को सोंठ के साथ मिलाकर हाथ पैरों पर मलते हैं। (१०) इसके फलों को उबालने से एक मोम के सदृश पदार्थ निकलता है जिसका व्रण पूरण के लिये प्रयोग करते हैं। मात्रा-चूर्ण १०-३० र० आर्द्रक रस एवं मधु के साथ। बच्चों को १-२ रत्ती। अथ भार्गी (भारङ्गी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह भार्गी भृगुभवा पद्मा फञ्जी ब्राह्मणयष्टिका। ब्राह्मण्याङ्गारवल्ली च खरशाकश्च हञ्जिका ।।१८२।। भार्गी रूक्षा कटुस्तिक्ता रुच्योष्णा पाचनी लघुः । दीपनी तुवरा गुल्मरक्तनुन्नाशयेद् ध्रुवम् ।। शोथकासकफश्वासपीनसज्वरमारुतान् ।।१८३।। भारङ्गी (बभनेटी) के नाम तथा गुण-भार्गी, भृगुभवा, पद्मा, फञ्जी, ब्राह्मणयष्टिका, ब्राह्मणी, अङ्गारवल्ल, खरशाक और हञ्जिका ये सब नाम भारङ्गी के हैं। भारङ्गी-रूक्ष, कटु, कषाय तथा तिक्तरसयुक्त रुचिजन्क, उष्णवीर्य, पाचक, लघु तथा अग्निदीपक होती है। एवं गुल्म, रक्तदोष, शोथ, कास, कफ, श्वास, पीनस, ज्वर और वायु को नष्ट करती है। [१८२-१८३] ६१. भार्गी (भारङ्गी) भारङ्गी के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद है तथा इस नाम से ४ वनस्पतियों की छाल ली जाती है। बङ्गाल में क्वाशिया नामक डाक्टरी ओषधि का प्रतिनिधि 'ख' का व्यवहार भारङ्गी नाम से होता है। श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी अपनी 'वनौषधि दर्शिका' नामक पुस्तक में लिखते हैं कि भारङ्गी नाम से बाजार में बिकने वाली छाल क्लेरोडेंड्रान (Clerodenron) की नहीं मालूम होती जिसे अधिकांश लोगों ने भारङ्गी माना है तथा यह संभवतः 'ख' की ही छाल हो। डॉ० देसाई 'क' को ही शास्त्रीय भारङ्गी मानते हैं तथा अन्य अधिकांश विद्वानों ने भी इसे ही भारङ्गी माना है। अन्य दो 'ग' वनस्पतियों का भी कहीं-कहीं व्यवहार होता है। इन चारों वनस्पतियों का अलग-अलग वर्णन नीचे दिया जा रहा है। प्राचीन समय में इसका आन्तरिक प्रयोग श्वास, कास आदि में किया गया है तथा सुश्रुत (उ० अ० ६१) में अपस्मार के लिये एक विशेष प्रकार से निर्मित सुरा का प्रयोग बतलाया गया है। इसका बाह्य प्रयोग गण्डमाला, कुरंड (वृद्धि) तथा शस्त्रक्षत में किया गया है। (क) Clerodendron serratum, Spreng. (क्लेरोडेण्ड्रोन् सेरैटम्, स्प्रेँग)। Fam. Verbenaceae (हर्बिनेंसी)। हिं०-भारङ्गी, भारिङ्गी, ब्रह्मयष्टि, बभनेटी। बं०-वामन हाटी, भुइजाम, म०-भारङ्ग। गु०-भारङ्गी। क०-गंटुभारङ्गी। ते०-नालनिरैडु। ने०-चूया। पं०-भाड़ङ्गी। मा०-भाराङ्गमूल। ता०-चेरूटेकू। जौनसार०- वनबाकरी। फा०-हञ्जिका। यह हिमालय में सतलज से खासिया पहाड़ और आसाम तक तथा ब्रह्मा, नीलगिरी, पश्चिमघाट थाना, रत्नांगिरी और सिलोन में पाई जाती है। इसके पौधे ३ से ५ हजार फीट की ऊँचाई तक प्रायः पर्वतों के घासवाले ढालों पर होते हैं। भारङ्गी क्षुप जाति की वनौषधि ४-८ फीट तक ऊँची होती है। शाखाएँ-इसके काष्ठमय मूलस्तम्भ से प्रतिवर्ष शाखाएँ निकलती हैं। प्रत्येक गाँठ पर तीन-तीन पत्ते रहते हैं जो ४ से ८ इञ्च लम्बे, १ १/२-२ १/२ इञ्च चौड़े, आयताकार,