भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २८९ टॅनिन आदि द्रव्य रहते हैं। एक अन्य कुष्टिन (Kushtin, C₂₀ H₂₆ O₃) नामक तरल पदार्थ भी इससे प्राप्त होता है। इसके उड़नशील तैल में कोस्टस् लॅक्टोन (Costus lactoue, C₁₅ H₂₀ O₂) ११, कोस्टुसिक् एसिड (Costusic acid, C₁₅ H₂₂ O₂) १४, डीहाइड्रोकोस्टस् लॅक्टोन (Dihydrocostus lactone) १५, ऍप्लोटॉक्सिन (Aplotoxin) २०, ऍल्फा-कोस्टेन (a-costene) ६, बीटा-कोस्टेन (B-Costene) ६, फेलैण्ड्रेन (Phelandrene) ०.४, कॅम्फेन (Camphene) ०.४ तथा टरपेन ॲल्कोहोल (Terpene alcohol) ०.२% पाया जाता है। इसके पत्तों में भी क्षाराभ आदि पाये जाते हैं लेकिन उड़नशील तैल नहीं रहता। कुछ लोगों के मत से इसमें हॅलेरिक् अम्ल (Valeric acid) के लवण तथा इसकी राख से मैंगनीज (Manganese) भी पाया जाता है। सॉस्सुराइन नामक क्षाराभ की क्रिया सुषुम्नाशीर्ष (Medulla) स्थित प्राणदा (Vagus) नाड़ी केन्द्र पर तथा श्वसनिका (Bronchioles) एवं पाचनसंस्थान (Gastro-intestinal) की अनैच्छिक (Involuntary) मांसपेशी तन्तुओं पर अवसादक (Depressant) होती है जिससे श्वसनिकाओं का विस्फार (Relaxation) होता है। इससे रक्तचाप की कुछ वृद्धि होती है जो लगातार बनी रहती है तथा हृदय, विशेष कर उसके निलय (Ventricles) के संकोच तथा विस्फार की शक्ति बढ़ती है। श्वसनिका विस्फार की क्रिया ॲड्रेनलीन (Adrenaline) के जितनी तीव्र नहीं होती न यह उतनी जल्दी कार्य ही करता हैं लेकिन इसका प्रभाव अधिक समय तक बना रहता है। इसमें का उड़नशील तैल (Volatile oil) जीवाणुओं के लिये, विशेष कर स्तबक तथा माला गोलाणु (Staphylo and Streptococcus) के लिये प्रतिदूषक (Antiseptic) तथा उपसर्ग नाशक (Disinfectant) है। यह वातानुलोमक, हृदयोत्तेजक, कफनिःसारक एवं मूत्रल है तथा अनैच्छिक मांसपेशी तन्तुओं को यह शिथिल करता है जिससे श्वसनिकाओं का विस्फार होता है। केन्द्रीय वातनाड़ी संस्थान पर इसका प्रभाव अन्य उड़नशील तैलों की तरह ही होता है। इसका उत्सर्ग वृक्क तथा फुफ्फुसों द्वारा होता है जिससे यह मूत्रल तथा कफनिःसारक है। इसका प्रवाही सत्व अधिक मात्रा में (१०-२० सी० सी०) यदि सेवन किया जाय तो उदर में कुछ प्रक्षोभ तथा बेचैनी होती है तथा तन्द्रा उत्पन्न होती है। कूठ का धूम्रपान केन्द्रीय वातनाडी संस्थान (Central Nervous System) में अवसाद उत्पन्न करता है और शायद यही कारण है कि अफीम के स्थान पर इसका धूम्रपान किया जाता है। गुण और प्रयोग-कूठ उष्ण, दीपन, पाचन, सुगन्धि, उत्तेजक कफनिःसारक, उद्वेष्ठननिरोधी, कुछ मूत्रन, बाजीकर, रसायन, आर्तवजनन, व्रणशोधक एवं रोपक, त्वग्दोषहर, प्रतिदूषक (Antiseptic) तथा उपसर्गनाशक (Disinfectant) है। इसका उपयोग फुफ्फुस विकार जैसे तमकश्वास, कास एवं कुपचन, विसूचिका, जीर्ण चर्मरोग, उन्माद, अपस्मारादि वातरोग, आमवात, वातकफज्वर, नष्टार्तव, कष्टार्तव, हृदयोदर, जलोदर तथा शिरःशूल आदि में किया जाता है। (१) तमकश्वास (Asthma) के लिए यह औषध बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुई है। इसके लिए इसका मद्यसारीय प्रवाही सत्व १/२-२ ड्राम की मात्रा में या इसका चूर्ण दिन में ३, ४ बार दिया जाता है। रात को सोते समय तथा जब भी श्वास के आवेग की सम्भावना हो तो इसकी एक मात्रा देने से आवेग नहीं आता न इससे ॲड्रिनॅलीन (Adrenaline) के इञ्जेक्शन वा दमे की सिगरेट आदि की तरह निद्रानाश आदि दुष्परिणाम ही होते हैं क्योंकि यह उद्वेष्ठन निरोधि होने के साथ-साथ केन्द्रीय वातनाडी संस्थान पर इसका अवसादक प्रभाव भी होता है। इस औषध को १०, १५ दिन लगातार देकर फिर कुछ दिन रोककर देखना चाहिये कि फिर दौरा तो नहीं होता। यदि फिर दौरा हो तो फिर इसे देना चाहिये। इसका न तो कोई संचायि (Cumulative) दुष्परिणाम होता है न सहनशीलता (Tolerance) ही उत्पन्न होती है जिससे प्रत्येक बार मात्रा में वृद्धि करनी पड़े। इस औषध के प्रयोग के समय तमकश्वास के कारणों की अवश्य खोज करनी चाहिये तथा उनको दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि जब तक कारण दूर नहीं होंगे तब तक स्थायी लाभ नहीं हो सकेगा। यह प्राणदा नाड़ी की उत्तेजना से होने वाले आवेगों (वगोटोनिक् टाइप = Vagotonic type) को २२ भाव.I