भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कुष्ठम् (कूठ) तस्य नामानि गुणांश्चाह- कुष्ठं रोगाह्वयं वाप्यं¹ पारिभाव्यं तथोत्पलम् ।। कुष्ठमुष्णं कटु स्वादु शुक्रलं तिक्तकं लघु । हन्ति वातास्रवीसर्पकासकुष्ठमरुत्कफान् ।।१७३।। कूठ के नाम तथा गुण-कुष्ठ, रोगाह्वय (रोगवाची शब्द), वाप्य, पारिभाव्य तथा उत्पल ये सब कूठ के नाम हैं । कूठ-उष्णवीर्य, कटु, स्वादु तथा तिक्त रसयुक्त, शुक्रजनक और लघु होता है । और यह वातरक्त, विसर्प, कास, कुष्ठ, वायु तथा कफ को दूर करता है । [१७३] ५६. कुष्ठ (कूठ) हिं०-कूठ, कूट, कुष्ट । बं०-पाचक, कुर । म०-कोष्ठ, उपलेट । गु०-उपलेट, कठ । क०-कोष्ट । ते०- वेंगुलकोष्ठम् । पं०-कुट्ठ, कुट, कोठ । फा०-कुष्ठ-ई-तल्ख । अ०-कुस्तबेहेरी । काश्मी०-पोस्तखै, कूट । भोटिया०-कुष्ट । ता०-कोष्ठम्, गोष्टम् । अं०-Costus root (कोस्ट्स् रूट) । ले०-Saussurea lappa, C. B. Clarke (सॉसुरिया लप्पा) । Fam. Compositae (काँपोजिटी) । इसके क्षुप काश्मीर तथा उसके आसपास के आर्द्र ढालों पर ८०००-१३००० फीट की ऊँचाई पर तथा चेनाब और झेलम नदियों के आसपास के प्रदेशों में १००००-१३००० फीट की ऊँचाई पर पाये जाते हैं । इसका बहुवर्षायु क्षुप-बहुत दृढ़ होता है । काण्ड-स्वावलम्बी, ४-७ फीट ऊँचा, भद्दा, जड़ की ओर छोटी उंगली प्रमाण मोटा होता है । पत्ते-कौशेय सदृश, विषम दन्तुर, खण्डित, आधरीय बहुत लम्बे, २-४ फीट, त्रिकोणाकार, लम्बे खण्डयुक्त सपंख डण्ठलवाले तथा ऊपर के छोटे । फूल-दृढ़ १ से १ १/२ इञ्च गोल, विनाल, गुच्छेदार, गहरे नील बैंगनी रंग के या काले । फल-०.३१ इञ्च तक लम्बे, दबे हुये, मुड़े हुये चर्मलफल (Achene) । मूल-हलके मुरचई लाल या काले बादामी, हलके, दृढ़, सीधे १ से ३ इञ्च लम्बे, १ से १ १/२ इञ्च मोटे, छोटे-छोटे उभारों से युक्त; मोटे टुकड़े अन्दर से पीले; इसके ठीक कटे हुये पृष्ठ में ३ भाग स्पष्ट दिखाई देते हैं जिसमें से बाहरी भाग अंगूठी की तरह गोल, बीच का काष्ठमय भाग कुछ हलके रंग का तथा महीन किरणों के समान धारियों से युक्त एवं अन्दर में मध्यभाग; भग्न- छोटा तथा शृङ्गवत् (Horny); गंध-मधुर; स्वाद-कुछ कड़वा । इन्हीं मूलों का व्यवहार औषध में किया जाता है । चक्रपाणि ने अच्छे कूठ की पहचान यह दी है कि उसे तोड़ने पर नीचे उसके कण अलग होकर नहीं गिरते तथा वह मृगशृङ्ग के समान होता है । कुछ लोग मीठा और कड़वा कूट करके दो भेद करते हैं और मीठा कूठ, पुष्करमूल को कहते हैं । शास्त्रीय गुणों में पुष्करमूल कटु, तिक्त कहा गया है लेकिन कूठ कटु और स्वादु लिखा गया है । इससे यह बात स्पष्ट है कि मीठा कूट, पुष्करमूल नहीं है । कुछ लोगों ने इसका समाधान इस प्रकार किया है कि परिपक्व कूठ की मूल कड़वी तथा अपक्व कूठ की मूल कुछ मीठी होती है । फारसी लेखक तिक्त कुष्ठ को कुस्त-ई-तल्ख और मीठे कूठ को कुस्त-ई-सिरीन् लिखते हैं और मीठे कूठ को पुष्कर मूल का अंग्रेजी नाम ओरिस्रूट बतलाते हैं । कूठ काश्मीर से चीन को बहुत जाता है जिसे वहाँ लोग धूप की तरह व्यवहार में लाते हैं । ऊनी वस्त्रों की कृमियों से रक्षा करने के लिये कूठ के टुकड़ों को उनमें रखते हैं । रासायनिक संगठन-इसके मूल में एक उड़नशील तैल १.५-२.५%, एक सॉस्सुराइन (Saussurine) नामक क्षाराभ .०५%, राल ६%, इन्युलिन (Inulin) १८%, तैल, पोटैशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate), शर्करा तथा १. व्याप्यमाप्यं वेति पाठान्तरे । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA