भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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हरीतक्यादिवर्गः २८७

हब्बे किलकिल्। अं०—Staff tree (स्टाफ् ट्री)। ले०—Celastrus paniculatus Willd. (सिलॅस्ट्रस् पॅनिक्युलेटम्) Fam. Celastraceae (सिलेस्ट्रॅसी)। यह हिमालय पहाड़ के उष्ण तथा साधारण जगहों में पञ्जाब, झेलम के आसपास तक समस्त भारतवर्ष की पहाड़ी भूमि में, पूर्वी बंगाल, बिहार, दक्षिण भारत, ब्रह्मा और सिलोन आदि प्रदेशों में होती है। इसकी सुविस्तृत काष्ठमय लता होती है जिसकी नवीन शाखाओं पर बहुत श्वेत बिन्दु पड़े रहते हैं। पत्ते— विषमवर्त्ती लगते हैं और आकार में कई प्रकार के होते हैं तथा गोलाई लिये किञ्चित् लम्बे, ऊपर से लट्वाकार, चिकने, चर्मवत् और नुकीले तथा गोल दाँतों से युक्त धार वाले होते हैं। प्रायः इनकी लम्बाई २ से ४ इञ्च तक और चौड़ाई १॥ से ३ इञ्च तक होती है। फूल—आध इंच के घेरे में पीलापन लिये हरे रंग के होते हैं। इन पर आध-आध इंच के डाडे (ढेंड़ी) लगते हैं जो गोलाई लिये किञ्चित् चिपटे, चमकीले, कच्ची अवस्था में हरे और पक्व होने पर पीले रंग के होते हैं और उनके आगे का हिस्सा फटे रहने से बीज दिखलाई पड़ते हैं। आषाढ़ एवं श्रावण के महीने में जब इसमें पक्व फलों के गुच्छे लगते हैं तब यह लता बहुत सुन्दर प्रतीत होती है। प्रत्येक फल में ३ खण्ड होते हैं। उनमें ३ से ६ तक लगभग तिहाई इञ्च के काले बीज होते हैं और वे एक प्रकार के लाल आवरण से ढके रहते हैं। रासायनिक संगठन—इसके बीजों में एक गाढ़ा, रक्ताभ, कड़वा और गन्धयुक्त तैल ३०%, एक कड़वी राल, राख ५% और टॅनिन् आदि द्रव्य रहते हैं। इसके बीजों को जलाकर पाताल यन्त्र द्वारा भी यह तैल निकाल सकते हैं। गुण और प्रयोग—मालकांगनी के बीज उष्ण, स्वेदजनन, उत्तेजक, बुद्धि एवं स्मृतिवर्धक, वातहर, वातनाडी बल्य एवं त्वग्दोषहर हैं। (१) इसके बीजों के साथ लोहवान, लवंग, जायफल और जावित्री मिलाकर पाताल यन्त्र द्वारा यह तैल निकाला जाता है जिसे कृष्णतैल (Black oil) या ओलियम् नाइग्रम् (Oleum Nigrum) कहते हैं। यह तैल विजगापट्टम्, मसुलिपट्टम् और एल्लोर आदि स्थानों में बिकता है। यह तैल अत्यन्त उत्तेजक, मूत्रनिःसारक तथा स्वेदल होता है। नवीन-बेरी-बेरी (Beri Beri) नामक रोग में १० से १५ बूँद इस तैल को देने से बहुत लाभ होता है। या इसके बीजों को क्रमशः बढ़ाते हुये एक दिन में ५० बीजों तक सोंठ के साथ देते हैं। पहले इससे मूत्र की मात्रा बढ़ती है और बाद में जलशोथ कम होकर फिर संवेदनाशक्ति वापस आती है। जलोदर में भी इस तैल से लाभ होता है। मलेरिया ज्वर जैसी पीड़ा जब आमवात में होती है तब तथा अङ्गघात आदि में इसको रक्तोत्क्लेशक (Rubefacient) के रूप में लगाते हैं। बुद्धि बढ़ाने के लिये आठगुने मक्खन में इसे मिलाकर सर में लगाया जाता है। (२) इसके बीजों को दबाकर भी तेल निकाला जाता है। २ से १० बूँद की मात्रा में आमाशय के रोगों में एवं बुद्धि तथा स्मृतिवृद्धि के लिये इसको खिलाते हैं। सुश्रुत में इस तैल को जलोदर के लिये हींग तथा जवाखार के साथ दूध में पीने को लिखा है। रसरत्नसमुच्चय में इसके तेल को स्मृति एवं बुद्धि वृद्धि के लिये बहुत उपयोगी माना है। (३) इसके बीजों का क्वाथ अन्य सुगन्धित औषधों के साथ आमवात, वातरक्त, अंगघातादि वातरोग एवं कुष्ठ में लाभदायक है। (४) इसके बीजों को व्रण के ऊपर पीसकर लगाने से न भरने वाले व्रण जल्दी भरते हैं। मात्रा—कृष्णतैल-मूत्र वृद्धिकर १०-३० बूँद। स्वेदजनक ५-१५ बूँद। ज्ञानतन्तु उत्तेजक १०-१५ बूँद। दबाकर निकाला तैल २-१० बूँद।