भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 345, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें२९४ भावप्रकाशनिघण्टुः (ख) ३ मि० लि० सरसों का तेल, १ मि० लि० ग्लेशियल ॲसेटिक ॲसिड (Glacial acetic acid) तथा क्यूप्रिक ॲसिटेट (Cupric acetate) के जलीय ३% घोल का ३ मि० लि० धीरे-धीरे हिलावें। फिर जलयुक्त पात्र में इसके पात्र को रखकर १५ मिनट गरम करके फिर अच्छी तरह हिला कर रख दें। मिलावट न होने पर अवक्षेप नहीं होता तथा उसके जलीय भाग में नीले रंग से हरे रंग में कोई परिवर्तन नहीं होता। मात्रा—बीज तैल ३० बूँद; बीज १/४ तो०; पीतवर्ण का दुग्ध १-२ माशा; मूल २-४ माशा। अथ कर्कटशृङ्गी (काकड़ासिंगी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह शृङ्गी कर्कटशृङ्गी च स्यात्कुलीरविषाणिका। अजशृङ्गी च चक्रा¹ च कर्कटाख्या च कीर्त्तिता ।।१७८।। शृङ्गी कषाया तिक्तोष्णा कफवातक्षयज्वरान्। श्वासोर्ध्ववाततृट्कासहिक्काऽरुचिर्वमीन्हरेत् ।।१७९।। काकड़ासिङ्गी के नाम तथा गुण—शृङ्गी, कर्कटशृङ्गी, कुलीरविषाणिका, अजशृङ्गी, चक्रा और कर्कटाख्या ये सब काकड़ासिङ्गी के नाम हैं। काकरासिङ्गी—कषाय तथा तिक्तरस युक्त एवं उष्णवीर्य होती है। और यह कफ, वात, क्षय, ज्वर, श्वास, ऊर्ध्ववात, प्यास, कास, हिचकी, अरुचि तथा वमन को दूर करने वाली होती है। [१७८-१७९] ५९. कर्कटशृङ्गी (काकड़ासिंगी) हिं०—काकड़ासिङ्गी, काकड़ासिंगी, काकरासिंगी (घी), ककड़ाव। बं०—कांकराशृङ्गी। म०—काकड़ाशिंगी। क०—कर्कटिशृङ्गी, दुष्टपुचत्तु। ते०—काकर सिंगी। ता०—काक्कट शिंगी। मा०—काकड़ाशिंगी। पं०—ककर, सुमाक। गु०—काकड़ा सोंगी। काश्मी०—कक्कर। ले०—Pistacia integerrima, Stew, ex Brandis (पिस्टॅसिया इंटिजिरेमा)। Fam. Anacardiaceae (अॅनॅकार्डिएसी)। इसके वृक्ष उत्तर पश्चिमी हिमालय के बाहरी कतारों पर १५००-८००० फीट की ऊँचाई तक तथा पंजाब, सीमाप्रान्त आदि स्थानों पर पाये जाते हैं। इसके वृक्ष मध्यमाकार के होते हैं। छाल—सफेद रंग की। पत्र—युग्म अथवा अयुग्मपक्षाकार तथा ६-९ इञ्च लम्बे। पत्रक—४-६ जोड़े, किञ्चित् सनाल, भालाकार, लम्बे नोक तथा सरल धार वाले और चिकने। कोपलें (नवीन पत्र) लाल रंग की। पुष्प—स्त्रीपुष्प और पुंपुष्प अलग-अलग वृक्षों पर तथा सवृन्त काण्डज पुष्पसमूहों में एवं बाह्य कोषों (पंखुड़ियों) से हीन। अष्ठिफल शुष्क, चिकने, झुर्रीदार, गोल, बहुत छोटे एवं पकने पर धूसर वर्ण के हो जाते हैं। इस वृक्ष की पत्तियों, पर्णवृन्तों तथा टहनियों पर एक प्रकार की लम्बी-लम्बी शृंगवत् रचना लगी रहती है जिन्हें कृमिगृह (Galls—गॉल्स) कहते हैं। ये एक प्रकार के कीड़ों, जिन्हें एफिस (Aphis) कहा जाता है द्वारा निर्मित होते हैं। इन कृमिगृहों को ही काकरासिंगी कहते हैं। ये विभिन्न नाप के ३-९ इञ्च लम्बे, पीले एवं कड़े होते हैं। इनका बाह्य पृष्ठ हलका हरिताभ बादामी रंग का, पतला तथा झालरदार (Fimbriated) दिखलाई देता है। इसको तोड़ने पर अन्दर का पृष्ठ रक्ताभ दिखलाई देता है जो महीन रजः कणों से ढका रहता है। सूक्ष्मदर्शक यन्त्र द्वारा देखने से यह सिद्ध हुआ है कि ये कण उन कीड़ों के मृतदेह तथा उनके मल हैं। काकरासिंगी का चूर्ण स्वाद में अत्यन्त कसैला तथा कुछ कड़वा होता है तथा इसमें तारपीन के तेल की तरह गन्ध आती है। तिन्तिडीक जाति (Rhus) के वृक्षों में भी कृमिगृह बनते हैं परन्तु वे काकरासिंगी से भिन्न हैं। कुछ लोगों ने भ्रम से कर्कट वृक्ष का नाम हस् सविसडेनिया (Rhus succedanea Linn.) दे दिया है जो उचित नहीं है। १. 'वक्ते'ति पाठान्तर प्रामादिकम्। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA