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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २९३ गुण और प्रयोग-यह विरेचक, रसायन, कुष्ठघ्न एवं कृमिघ्न है तथा इसका प्रयोग फिरंग, उपदंश, सोजाक, कुष्ठ, चर्मरोग तथा नेत्र विकारों में किया जाता है। (१) इसके बीजों का तेल मृदुरेचक, रसायन कुष्ठघ्न एवं त्वचा के रोगों में लाभदायक है। यह ३० बूँद की मात्रा में शर्करा के साथ दिया जाता है। इसके नये बीज वामक होने के कारण इन बीजों को एक साल रख कर फिर तेल निकालते हैं तथा ताजे निकाले तेल का ही उपयोग अच्छा होता है। इसमें एरण्ड तैल के समान न तो कोई दुर्गन्ध या खराब स्वाद होता है न इससे मरोड़ आदि होती है तथा यह अल्प मात्रा में प्रभावशाली होता है। आमातिसार, संग्रहणी, विसूचिका उदरशूल, विबन्ध युक्त उदरशूल एवं सर्वांगशोथ आदि में इसका उपयोग किया जाता है। फिरङ्ग तथा उपदंश में इसके बीजों का प्रयोग विरेचन के लिये किया जाता है। कुष्ठ, दाद, विसर्प, श्वित्र एवं अन्यान्य पीड़ा एवं दाहयुक्त चर्मविकारों में इसका तैल लगाया जाता है जिससे शान्ति मिलती है। (२) इसके बीज वामक तथा उत्क्लेशकारक होने के कारण इनका उपयोग गले के विकार, फुफ्फुस विकार, कास, कुकास एवं तमकश्वास आदि में लाभदायक होता है। इसमें कोई उद्वेष्टन निरोधि गुण नहीं है जो तमकश्वास में लाभदायक होता हो। ये रेचक तथा वेदनास्थापक भी होते हैं। दाँतों में गड्ढे होकर पीड़ा होती हो तो इनके धूम्रपान से लाभ होता है। (३) इस पौधे में जो पीले रंग का दूध होता हैं वह रसायन, कुष्ठघ्न, मूत्रजनन, व्रणशोधक तथा रोपक, शोथप्रतिकारक, ज्वरहर एवं नेत्र के लिये हितकारक होता है। फिरंग, उपदंश एवं सोजाक आदि में 'किडमार' (Aristolochia bracteata Retz) के रस के साथ इसको पिलाते हैं। मलेरिया आदि जीर्ण विषमज्वरों में नींबू के रस में इसे घोंट कर पिलाते हैं। सोजाक में इसको घी के साथ देने से लाभ होता है। जलोदर एवं कामला आदि में भी इसका व्यवहार किया जाता है। नेत्राभिष्यन्द में पलकों पर इसको लगाते हैं तथा नेत्रशुक्ल, अधिमांस एवं दृष्टिमांद्य आदि में घी के साथ १ बूँद इसे आँखों में डालते हैं। इससे किसी प्रकार की हानि नहीं होती। सर्वदा के प्रयोग के लिये इसको सुखाकर रख सकते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर घी या दूध में घिसकर उपयोग में ला सकते हैं। पुराने व्रण, फिरंगादि से उत्पन्न व्रण एवं खुजली (Scabies) आदि में इसको लगाने से लाभ होता है। (४) इसका मूल रसायन, कृमिघ्न तथा कुष्ठघ्न है। फिरंग, उपदंश, सोजाक, अश्मरी तथा अन्य चर्मरोगों में इसका क्वाथ दिया जाता है एवं इसका लेप भी करते हैं। स्फीत कृमि (Tape-worm) के लिये इसके चूर्ण को ४ माशा की मात्रा में खिलाते हैं। बिच्छू काटने पर इसकी ताजी जड़ को घिस कर लगाते हैं। (५) कुष्ठ (Leprosy) में इसके स्वरस को १ तोले की मात्रा में ४० दिन तक रोज सबेरे दूध के साथ पिलाने से लाभ होता है। यह रसायन एवं बलवर्धक है तथा फिरंगादि में भी यह लाभदायक होता है। (६) सरसों में इसके बीजों की मिलावट करके तेल निकालते हैं। ऐसा मिलावटी तेल बहुत हानिकार होता है तथा इससे बेरी बेरी (Beri beri) एवं एपिडेमीक् (Epidemic dropsy) नामक रोग होते हैं जिसमें पैरों में सूजन, हृदय की दुर्बलता, पाचनसंस्थान के विकार एवं वात नाड़ी शोथ आदि होते हैं। परीक्षा-सरसों के तेल में इसकी मिलावट है या नहीं इसकी निम्नलिखित परीक्षाएँ की जाती हैं- (क) सरसों के तेल के बराबर शोरे का तेजाब (Nitric acid-नाइट्रिक एसिड) मिलाकर हिलाने से मिलावट न होने पर धूसर लाल (Brownish red) या नारंग (Orange) रंग उत्पन्न नहीं होता।